<rss version="2.0" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"><channel><lastBuildDate>Mon, 07 Sep 2026 19:00:09 +0530</lastBuildDate><title><![CDATA[ Bhakti Times]]></title><link>https://www.bhaktitimes.in/dharm</link><language/><description><![CDATA[ Bhakti Times ]]> </description><item><guid isPermaLink="false">156102559</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 14:51:45 +0530</pubDate><title><![CDATA[ सुख-दुख की लहरों से ऊपर कैसे उठें? अष्टावक्र गीता में जनक का जवाब ]]></title><description><![CDATA[ Ashtavakra Gita Hindi: अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में राजा जनक आत्मज्ञान की स्थिति को बहुत गहराई से समझाते हैं। इन शब्दों में आत्मज्ञान का रहस्य छिपा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ashtavakra-gita-hindi-chapter-18-advaita-vedanta-non-attachment-article-156102559 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156102558,thumbsize-98203,width-1280,height-720,resizemode-75/156102558.jpg" alt="ashtavakra gita hindi chapter 18 advaita vedanta non attachment" /></div><p><strong>Ashtavakra Gita Hindi: </strong>भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के 12वें भाग में आज हम आपको श्लोक 74 से श्लोक 78 तक के अर्थों का सार बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में राजा जनक आत्मज्ञान की स्थिति को बहुत गहराई से समझाते हैं।</p><p><strong>मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः।</p><p>भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता।। 74।।</strong></p><p>राजा जनक कह रहे हैं, 'मैं अनंत महासागर के समान हूं और यह संसार एक नाव की तरह मेरे भीतर इधर-उधर घूम रहा है। लेकिन यह सब मन रूपी हवा के कारण हो रहा है। इसलिए मुझे किसी तरह की बेचैनी या असहिष्णुता नहीं है।'</p><p><strong>मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः।</p><p>उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न न क्षतिः।। 75।।</strong></p><p>राजा जनक कह रहे हैं, 'मैं अनंत महासागर के समान हूं और संसार रूपी लहरें अपने स्वभाव से उठती और फिर शांत हो जाती हैं। उनके उठने या मिटने से मुझमें न कोई वृद्धि होती है और न कोई कमी।'</p><p><strong>मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वं नाम विकल्पना।</p><p>अतिशान्तो निराकार एतदेवाहमास्थितः।। 76।।</strong></p><p>राजा जनक कह रहे हैं, 'मैं अनंत महासागर के समान हूं और यह पूरा संसार केवल एक कल्पना या विचार के रूप में मेरे भीतर दिखाई देता है। मैं अत्यंत शांत, निराकार और स्थिर हूं। इसी अवस्था में मैं स्थित हूं।'</p><p><strong>नात्मा भावेषु नो भावस्तत्रानन्ते निरंजने।</p><p>इत्यसक्तोऽस्पृहः शान्त एतदेवाहमास्थिताः।। 77।।</strong></p><p>राजा जनक कह रहे हैं, 'आत्मा किसी वस्तु या भाव में नहीं है और कोई भी वस्तु उस अनंत, निर्मल आत्मा में वास्तव में बंधी हुई नहीं है। इस सत्य को जानकर मैं आसक्ति और इच्छाओं से मुक्त होकर शांत अवस्था में स्थित हूं।'</p><p><strong>अहो चिन्मात्रमेवाह मिन्द्रजालोपमं जगत्‌।</p><p>अतो मम कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना।। 78।।</strong></p><p>राजा जनक कह रहे हैं, 'अहो! यह पूरा संसार केवल चेतना मात्र में दिखाई देने वाला इंद्रजाल अर्थात जादू जैसा है। इसलिए मेरे लिए अब यह तय करने की कोई आवश्यकता नहीं कि क्या छोड़ना है और क्या अपनाना है।'</p><p><h2>इन पांचों श्लोकों का सार</h2></p><p>जनक का संदेश है कि हम अपनी परिस्थितियां नहीं हैं। हमारा वास्तविक स्वरूप उनसे कहीं अधिक विशाल और शांत है। जब व्यक्ति इस बात को अनुभव करने लगता है, तब आसक्ति, इच्छा, भय और पाना-खोना जैसी मानसिक उलझनें धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156102166</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 13:30:23 +0530</pubDate><title><![CDATA[ अधूरे काम पूरे करने और नई शुरुआत का महीना है सितंबर, जानें आध्यात्मिक मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Spiritual Journey: सितंबर को सिर्फ कैलेंडर का एक और पन्ना समझने के बजाय आप इसे अपने लिए एक छोटा सा reset month बना सकते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/spiritual-journey-self-reflection-september-spiritual-meaning-article-156102166 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156102163,thumbsize-102383,width-1280,height-720,resizemode-75/156102163.jpg" alt="spiritual journey self reflection september spiritual meaning" /></div><p><strong>Spiritual Journey: </strong>सितंबर का महीना हमें थोड़ा रुकने, पीछे देखने और आगे की दिशा तय करने का मौका देता है। आध्यात्मिक नजरिए से सितंबर महीने को आत्मचिंतन और बदलाव से जोड़कर देखा जाता है। यह समय खुद से यह पूछने का होता है कि हम जिस रास्ते पर चल रहे हैं, क्या वह सच में हमारे लिए सही है? किन चीजों को पीछे छोड़ना है और किन सपनों पर अब दोबारा ध्यान देना है?</p><p><h2>सितंबर और अंक 9 का कनेक्शन</h2></p><p>सितंबर साल का नौवां महीना है और अंक ज्योतिष में 9 को एक खास संख्या माना जाता है। अंक 9 को पूर्णता, अनुभव और किसी चक्र के पूरा होने से जोड़ा जाता है। इसलिए सितंबर आपके लिए यह सोचने का अच्छा समय हो सकता है कि इस साल अब तक आपने क्या सीखा, कहां गलती हुई और आगे क्या सुधार करना है।</p><p><h2>पुरानी चीजों को छोड़ने का समय</h2></p><p>हम अक्सर अपने साथ ऐसी कई बातें लेकर चलते रहते हैं जिनकी अब जरूरत नहीं होती। कोई पुरानी नाराजगी, किसी रिश्ते की कड़वाहट, असफलता का डर या किसी फैसले को लेकर पछतावा। सितंबर को आध्यात्मिक नजरिए से इन भावनाओं को पहचानने और धीरे-धीरे छोड़ने का समय माना जा सकता है।</p><p><h2>दिनचर्या में थोड़ा बदलाव करें</h2></p><p>आध्यात्मिक जागरण के लिए हमेशा कोई बड़ा अनुष्ठान करना जरूरी नहीं है। कई बार छोटे बदलाव ही काफी होते हैं। सुबह कुछ मिनट शांत बैठना, खुली हवा में टहलना या कुछ देर धूप में रहना दिन की शुरुआत को बेहतर बना सकता है। अगर संभव हो तो सुबह उठने के बाद कुछ समय मोबाइल से दूरी बनाकर रखें। आप चाहें तो 5 से 10 मिनट ध्यान कर सकते हैं। इस दौरान किसी खास विचार पर जोर देने की जरूरत नहीं है। बस अपनी सांसों पर ध्यान दें और मन को शांत होने दें।</p><p><h2>अपने अधूरे लक्ष्यों पर एक नजर डालें</h2></p><p>साल की शुरुआत में आपने भी कुछ लक्ष्य बनाए होंगे। सितंबर में एक बार उन्हें दोबारा देखना उपयोगी हो सकता है। खुद से पूछें-इनमें से कौन-सा लक्ष्य अभी भी मेरे लिए महत्वपूर्ण है? कौन-सी चीज सिर्फ इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मैंने उसे साल की शुरुआत में तय किया था? सितंबर आपको प्राथमिकताएं दोबारा तय करने का मौका दे सकता है।</p><p><h2>संतुलन का संदेश भी देता है सितंबर</h2></p><p>सितंबर के आसपास उत्तरी गोलार्ध में मौसम में बदलाव महसूस होने लगता है। आगे चलकर शरद विषुव के समय दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। इसी वजह से कई संस्कृतियों में इस समय को संतुलन से जोड़कर देखा गया है। आध्यात्मिक रूपक के तौर पर इसे जिंदगी में बैलेंस लाने का संकेत भी माना जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156101970</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 12:57:52 +0530</pubDate><title><![CDATA[ बार-बार एक ही सपना क्यों आता है? आध्यात्मिक मान्यताओं में छिपा है इसका खास संकेत ]]></title><description><![CDATA[ Dream Psychology: इस नजरिए से अगर कोई सपना बार-बार आता है तो संभव है कि उसके पीछे कोई ऐसी भावना या अनुभव हो जिसे व्यक्ति जागते हुए नजरअंदाज कर रहा हो।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/dream-psychology-repeated-dreams-meaning-dream-symbols-article-156101970 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156101969,thumbsize-112640,width-1280,height-720,resizemode-75/156101969.jpg" alt="dream psychology repeated dreams meaning dream symbols" /></div><p><strong>Dream Psychology: </strong>क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि कोई सपना बार-बार आपको आता है? सपना खत्म हो जाता है, लेकिन उसकी कहानी दिमाग में चलती ही रहती है? कई बार एक ही सपना महीनों या सालों बाद दोबारा दिखाई दे जाता है? आध्यात्मिक परंपराओं में अगर आप सपनों को समझेंगे तो जानेंगे कि इसका तरीका थोड़ा अलग है। अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों में बार-बार आने वाले सपनों को भीतर चल रही किसी प्रक्रिया, भावना या संदेश से जोड़कर देखा गया है। आइए समझते हैं कि अलग-अलग आध्यात्मिक परंपराएं बार-बार आने वाले सपनों को किस नजर से देखती हैं।</p><p><h2>हिंदू परंपरा में सपने और संस्कारों का संबंध</h2></p><p>आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार, अगर कोई सपना बार-बार आता है तो यह मन में मौजूद किसी अधूरी भावना या पुराने प्रभाव की ओर इशारा कर सकता है। जरूरी नहीं कि इसका मतलब कोई बुरी घटना हो। मसलन, अगर कोई व्यक्ति बार-बार किसी पुराने घर का सपना देखता है, तो आध्यात्मिक नजरिए से इसे उसके अतीत से जुड़े भावों का प्रतीक माना जा सकता है। इसी तरह किसी से भागने वाला सपना डर, तनाव या किसी ऐसी स्थिति की ओर संकेत माना जा सकता है जिसका सामना व्यक्ति भीतर से करना चाहता है।</p><p><h2>बौद्ध धर्म में सपनों को कैसे देखा जाता है?</h2></p><p>बौद्ध दर्शन में इच्छा, आसक्ति और मन की चंचलता पर काफी जोर दिया गया है। इसी वजह से बार-बार आने वाले सपनों को भी मन की इच्छाओं और लगाव से जोड़कर देखा जा सकता है। मान लीजिए किसी व्यक्ति को बार-बार किसी प्रिय चीज को खोने का सपना आता है। आध्यात्मिक नजरिए से यह उसके भीतर मौजूद खोने के डर या किसी चीज से बहुत ज्यादा जुड़ाव को दर्शा सकता है। बौद्ध दृष्टिकोण में समाधान केवल सपने का अर्थ खोजने में नहीं, बल्कि अपने मन को समझने में है। ध्यान और आत्मनिरीक्षण के जरिए व्यक्ति यह देख सकता है कि उसके भीतर कौन-सी भावना बार-बार सक्रिय हो रही है।</p><p><h2>ईसाई रहस्यवाद में सपनों के प्रतीक</h2></p><p>अगर कोई सपना लगातार दोहराया जा रहा है तो आध्यात्मिक व्याख्या में इसे आत्मचिंतन का अवसर माना जा सकता है। यह व्यक्ति को अपने डर, गलतियों, रिश्तों या जीवन के किसी अनसुलझे पहलू पर ध्यान देने के लिए प्रेरित कर सकता है।</p><p>इस नजरिए में सपने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यह नहीं होता कि उसमें क्या दिखाई दिया, बल्कि यह होता है कि उसे देखने के बाद व्यक्ति के भीतर कौन-सी भावना पैदा हुई।</p><p><h2>कार्ल जंग ने आवर्ती सपनों को कैसे समझा?</h2></p><p>कार्ल जंग आध्यात्मिक गुरु नहीं बल्कि प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक थे। फिर भी उनके विचार सपनों की चर्चा में काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। जंग के अनुसार सपने हमारे अवचेतन मन से जुड़ी सामग्री सामने ला सकते हैं। उन्होंने Shadow यानी व्यक्तित्व के उन हिस्सों की बात की जिन्हें हम स्वीकार या पहचान नहीं पाते।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156097846</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 20:06:38 +0530</pubDate><title><![CDATA[ चांद की कलाओं का मन से क्या रिश्ता है? ज्योतिष में छिपा है बड़ा राज ]]></title><description><![CDATA[ Moon Astrology: ज्योतिष में चंद्रमा की स्थिति को व्यक्ति के स्वभाव और भावनात्मक दुनिया को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जाता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/moon-astrology-full-moon-effects-moon-and-mental-health-article-156097846 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156097840,thumbsize-66690,width-1280,height-720,resizemode-75/156097840.jpg" alt="moon astrology full moon effects moon and mental health" /></div><p><strong>Moon Astrology: </strong>सदियों से चांद को इंसान की भावनाओं और मन से जोड़कर देखा जाता रहा है। ज्योतिष में चंद्रमा को सीधे मन, भावनाओं, सोच और मानसिक स्थिति का कारक माना गया है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक कहा जाता है। यानी आपकी भावनाएं कैसी हैं, आप किसी बात पर कितनी जल्दी प्रतिक्रिया देते हैं, आपका मन कितना स्थिर रहता है और आप चीजों को भावनात्मक रूप से कैसे लेते हैं, इन सबका संबंध चंद्रमा से जोड़कर देखा जाता है।</p><p>इसी वजह से कुंडली में चंद्रमा की राशि, भाव और उस पर पड़ने वाली ग्रहों की दृष्टि को काफी महत्व दिया जाता है। माना जाता है कि मजबूत चंद्रमा व्यक्ति को भावनात्मक रूप से संतुलित और शांत बना सकता है, जबकि कमजोर या पीड़ित चंद्रमा बेचैनी और भावनात्मक उतार-चढ़ाव से जोड़ा जाता है।</p><p><h2>चांद के चरण और मन का कनेक्शन</h2></p><p>चंद्रमा लगातार एक जैसा दिखाई नहीं देता। कभी वह बिल्कुल नजर नहीं आता, कभी आधा दिखाई देता है और फिर धीरे-धीरे पूरा गोल हो जाता है। इसके बाद दोबारा उसका आकार कम होने लगता है। चंद्रमा के इन्हीं बदलावों को चंद्र कलाएं या Moon Phases कहा जाता है। ज्योतिष और कई आध्यात्मिक परंपराओं में इन चरणों को अलग-अलग ऊर्जा और मनोदशा से जोड़ा गया है।</p><p><h2>बढ़ते चांद के साथ बढ़ती सक्रियता</h2></p><p>अमावस्या के बाद चंद्रमा धीरे-धीरे बढ़ता है। इसे शुक्ल पक्ष कहा जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में यह चरण वृद्धि, आगे बढ़ने और नई चीजों को शुरू करने से जोड़ा जाता है। इस दौरान लोग अपने लक्ष्यों पर ज्यादा ध्यान लगाने, नई योजनाएं बनाने और अधूरे कामों को पूरा करने की प्रेरणा महसूस कर सकते हैं। हालांकि हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है।</p><p><h2>भावनाओं का चरम</h2></p><p>पूर्णिमा पर चंद्रमा अपने सबसे चमकीले रूप में दिखाई देता है। भारतीय परंपरा में पूर्णिमा का विशेष धार्मिक महत्व है। इस दिन कई व्रत और पूजा-पाठ किए जाते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार पूर्णिमा का संबंध भावनाओं की तीव्रता से जोड़ा जाता है। कुछ लोगों को इस समय मन ज्यादा सक्रिय या संवेदनशील महसूस हो सकता है।</p><p><h2>धीमा होने और खुद पर ध्यान देने का समय</h2></p><p>पूर्णिमा के बाद चंद्रमा धीरे-धीरे घटता है। इसे कृष्ण पक्ष कहा जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इस समय को छोड़ने, आत्मचिंतन और भीतर की सफाई से जोड़कर देखा जाता है। इस दौरान आप यह सोच सकते हैं कि कौन सी आदतें या बातें आपके लिए उपयोगी नहीं हैं। उन्हें धीरे-धीरे अपनी जिंदगी से कम करने की कोशिश की जा सकती है।</p><p><h2>हिंदू धर्म में चंद्रमा का महत्व</h2></p><p>भारतीय संस्कृति में चंद्रमा का महत्व केवल ज्योतिष तक सीमित नहीं है। हिंदू पंचांग में तिथियों और कई धार्मिक पर्वों की गणना चंद्रमा की गति और चंद्र चरणों से जुड़ी होती है। करवा चौथ, शरद पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा जैसे कई महत्वपूर्ण पर्व चंद्र तिथियों से जुड़े हैं। भगवान शिव के मस्तक पर चंद्रमा का होना भी भारतीय धार्मिक परंपरा में चंद्रमा के विशेष महत्व को दर्शाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156097303</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 17:19:42 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कुछ मिनट का मौन और भीतर की ओर सफर, जानें ध्यानलिंग का रहस्य ]]></title><description><![CDATA[ Dhyanalinga Temple: कोयंबटूर की वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के पास स्थित ध्यानलिंग एक ऐसी जगह है जहां कुछ कहने की नहीं, बस चुप बैठने की जरूरत है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/dhyanalinga-isha-yoga-center-coimbatore-velliangiri-article-156097303 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156097302,thumbsize-127314,width-1280,height-720,resizemode-75/156097302.jpg" alt="dhyanalinga isha yoga center coimbatore velliangiri" /></div><p><strong>Dhyanalinga Temple: </strong>कोयंबटूर की वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के पास स्थित ध्यानलिंग को ऐसी जगह के तौर पर देखा जाता है, जहां पहुंचकर आपको किसी खास पूजा-पाठ या धार्मिक नियम का पालन नहीं करना पड़ता। मौन और ध्यान को यहां सबसे ज्यादा महत्व दिया जाता है। 24 जून 1999 को ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सद्गुरु ने ध्यानलिंग को समर्पित किया था। ध्यानलिंग की खासियत यही है कि यह किसी एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है। अलग-अलग विचारों और धार्मिक पृष्ठभूमि के लोग यहां आते हैं और कुछ समय शांत बैठते हैं।</p><p><h2>ध्यानलिंग में क्यों रखा जाता है इतना मौन?</h2></p><p>काम का दबाव और रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच हमारी जिंदगी लगातार शोर-शराबे से घिरी हुई है। लोगों के लिए कुछ पल भी चुपचाप बैठना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से ध्यानलिंग में मौन को खास जगह दी गई है। यहां पूजा, आरती या किसी तरह के कर्मकांड की व्यवस्था नहीं है। आने वाले लोगों को कुछ समय शांत बैठने और अपने भीतर ध्यान लगाने का अवसर मिलता है। यही वजह है कि इसे सामान्य मंदिर से थोड़ा अलग अनुभव वाला स्थान माना जाता है।</p><p><h2>ध्यानलिंग की स्थापना को क्यों माना जाता है खास?</h2></p><p>ध्यानलिंग की स्थापना के पीछे प्राण प्रतिष्ठा की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण बताया जाता है। ईशा परंपरा के अनुसार, इसका उद्देश्य किसी मूर्ति की सामान्य स्थापना से अलग एक शक्तिशाली योगिक ऊर्जा रूप तैयार करना था। सद्गुरु ने इसे आध्यात्मिक साधना के लिए एक विशेष संभावना के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, ध्यानलिंग किसी विशेष धार्मिक विश्वास को मानने की मांग नहीं करता। यहां आने वाला व्यक्ति सिर्फ कुछ समय शांत होकर बैठ सकता है।</p><p><h2>सात चक्रों से जुड़ी है ध्यानलिंग की अवधारणा</h2></p><p>ध्यानलिंग की सबसे चर्चित विशेषताओं में इसकी योगिक संरचना भी शामिल है। सद्गुरु के अनुसार, इसमें मानव शरीर से जुड़े सात प्रमुख चक्रों को उनके उच्चतम स्तर पर प्रतिष्ठित किया गया है। योग की परंपरा में चक्रों को शरीर और चेतना के अलग-अलग आयामों से जोड़कर देखा जाता है। इसी अवधारणा के आधार पर ध्यानलिंग को एक पूर्ण योगिक ऊर्जा रूप के तौर पर बताया जाता है। यह बात इसे सामान्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है, क्योंकि यहां जोर किसी एक देवी-देवता की पूजा के बजाय ध्यान और आंतरिक अनुभव पर रहता है।</p><p><h2>वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के बीच क्यों बनाया गया?</h2></p><p>ध्यानलिंग का स्थान भी इसकी कहानी का अहम हिस्सा है। यह वेल्लियांगिरी पहाड़ियों के आसपास स्थित है। इस क्षेत्र को लंबे समय से योग और साधना के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। पहाड़ों, हरियाली और शांत वातावरण के बीच स्थित होने के कारण यहां आने वाले लोगों को शहर की भागदौड़ से अलग माहौल मिलता है। प्राकृतिक वातावरण और ध्यान का शांत अनुभव इस जगह की खास पहचान बन गया है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156096950</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 16:03:03 +0530</pubDate><title><![CDATA[ अष्टावक्र ने जनक को बताया जीवन का सबसे बड़ा सत्य, यह श्लोक देता है बड़ा ज्ञान ]]></title><description><![CDATA[ Ashtavakra Gita Hindi: अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र और राजा जनक के बीच आत्मज्ञान, संसार की वास्तविकता और त्याग की गहरी बात कही गई है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ashtavakra-gita-hindi-self-realization-atma-gyan-advaita-vedanta-article-156096950 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156096943,thumbsize-105372,width-1280,height-720,resizemode-75/156096943.jpg" alt="ashtavakra gita hindi self realization atma gyan advaita vedanta" /></div><p><strong>Ashtavakra Gita Hindi: </strong>भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के 11वें भाग में आज हम आपको श्लोक 66 से श्लोक 73 तक के अर्थों का सार बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र और राजा जनक के बीच आत्मज्ञान, संसार की वास्तविकता और त्याग की गहरी बात कही गई है।</p><p><strong>न ते संगोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।</p><p>संघातविलयं कुवर्र्न्नेमेव लयं व्रज।। 66।।</strong></p><p>अष्टावक्र कहते हैं, 'इंसान दुखी इसलिए होता है क्योंकि वह शरीर, रिश्तों, विचारों और इच्छाओं को अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है। आत्मज्ञान होने पर समझ आता है कि आत्मा इन सबसे अलग और शुद्ध है।'</p><p><strong>उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुदबुदः।</p><p>इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज।। 67।।</strong></p><p>अष्टावक्र कहते हैं, 'जैसे समुद्र से बुलबुला उठता है और वापस समुद्र में मिल जाता है, वैसे ही संसार भी उसी परम चेतना से प्रकट होकर उसी में समाप्त होता है।'</p><p><strong>प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।</p><p>रज्जुसर्प इव व्यकृमेवमेव लयं व्रज।। 68।।</strong></p><p>अष्टावक्र कहते हैं, 'रस्सी वास्तव में रस्सी ही रहती है, लेकिन अज्ञान के कारण वह सांप दिखाई देती है। इसी तरह आत्मा के ऊपर संसार की अलग-अलग पहचान और भेद दिखाई देते हैं। ज्ञान होने पर भ्रम दूर हो जाता है।'</p><p><strong>समदुःख सुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।</p><p>समजीवित मृत्युः सन्नैवमेव लयं व्रज।। 69।।</strong></p><p>अष्टावक्र कहते हैं, 'आत्मज्ञानी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार बहुत ज्यादा खुश या दुखी नहीं होता। वह समझता है कि सुख-दुख और जीवन-मृत्यु बदलने वाली अवस्थाएं हैं, जबकि आत्मा इन सबसे परे है।'</p><p><strong>आकाशवदनंतोऽहं घटवत्‌ प्राकृतं जगत्‌।</p><p>इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 70।।</p><p></strong></p><p>राजा जनक कहते हैं, 'मैं आकाश की तरह अनंत हूं और यह संसार एक घड़े की तरह सीमित और प्रकृति से बना हुआ है। इस ज्ञान को समझ लेने के बाद न मुझे किसी चीज का त्याग करना है, न किसी चीज को पकड़कर रखना है और न ही किसी चीज में लीन होने की इच्छा है।'</p><p><strong>महौदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसन्निभिः।</p><p>इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 71।।</strong></p><p>राजा जनक कहते हैं, 'मैं स्वयं विशाल समुद्र के समान हूं और यह पूरा संसार समुद्र की लहरों के समान है। लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं। यह ज्ञान होने के बाद मेरे लिए न त्याग है, न ग्रहण और न ही किसी चीज में विलय की आवश्यकता।'</p><p><strong>अहं स शुक्तिसंकाशो रूप्पवद्विश्वकल्पना।</p><p>इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 72।।</strong></p><p>राजा जनक कहते हैं, 'मैं उस सीप के समान हूं जिसमें चांदी दिखाई देने का भ्रम पैदा हो सकता है। उसी तरह इस संसार के अलग-अलग रूप भी एक कल्पना या भ्रम की तरह हैं। इस सत्य को जान लेने के बाद मुझे कुछ छोड़ने या कुछ पाने की आवश्यकता नहीं है।'</p><p><strong>अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्ययो मयि।</p><p>इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 73।।</strong></p><p>राजा जनक कहते हैं, 'मैं सभी प्राणियों में मौजूद हूं और सभी प्राणी मेरे ही भीतर मौजूद हैं। जब यह ज्ञान हो जाता है, तब किसी चीज को छोड़ने या पाने का सवाल ही नहीं रहता।'</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156096379</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 13:42:27 +0530</pubDate><title><![CDATA[ शनिवार को अशुभ क्यों माना जाता है बाल धोना, जानिए धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Saturday Rituals: आइए जानते हैं शनिवार को बाल धोने से जुड़ी मान्यताओं के बारे में। क्या इसके पीछे कोई धार्मिक वजह है या फिर यह सिर्फ पुरानी परंपरा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/saturday-religious-beliefs-hindu-traditions-saturday-rituals-article-156096379 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156096375,thumbsize-121278,width-1280,height-720,resizemode-75/156096375.jpg" alt="saturday religious beliefs hindu traditions saturday rituals" /></div><p><strong>Saturday Rituals:</strong> धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता और ग्रह से जुड़ा हुआ होता है। यही कारण है कि भारत के ज्यादातर घरों में कई कामों को लेकर दिन के हिसाब से अलग-अलग मान्यताएं भी सुनने को मिलती हैं। कहीं मंगलवार को बाल काटने से मना किया जाता है, तो कहीं शनिवार को बाल धोने से बचने की सलाह दी जाती है। खासकर घर के बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि शनिवार के दिन बाल नहीं धोने चाहिए। आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है? क्या इसके पीछे कोई धार्मिक वजह है या फिर यह सिर्फ पुरानी परंपरा है? आइए जानते हैं शनिवार को बाल धोने से जुड़ी मान्यताओं के बारे में।</p><p><h2>किस ग्रह से जुड़ा है शनिवार का दिन</h2></p><p>ज्योतिष में शनिवार का संबंध शनि ग्रह से माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इसी दिन शनि देव की पूजा की जाती है। शनि को कर्म, न्याय, अनुशासन, धैर्य और जिम्मेदारी से जोड़कर देखा जाता है। मान्यता है कि शनि देव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए शनिवार को लोग पूजा-पाठ, दान और जरूरतमंदों की मदद जैसे काम करना शुभ मानते हैं। इसी धार्मिक माहौल में शनिवार के दिन कुछ ऐसे कामों से बचने की परंपरा भी बनी, जिन्हें बहुत ज्यादा भौतिक सुख-सुविधा या श्रृंगार से जोड़कर देखा जाता था।</p><p><h2>शनिवार को बाल धोने से क्यों बचते हैं लोग</h2></p><p> इसके पीछे कोई एक सर्वमान्य शास्त्रीय नियम नहीं मिलता। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इससे जुड़ी लोकमान्यताएं जरूर प्रचलित हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, शनिवार का दिन सादगी, संयम और आत्मचिंतन के लिए बेहतर माना जाता है। इसलिए इस दिन अनावश्यक श्रृंगार या शरीर की सजावट से जुड़े कामों को टालने की परंपरा कुछ परिवारों में रही है। इसी वजह से कुछ समुदायों में शनिवार को बाल धोने से बचने की परंपरा बनी।</p><p><h2>शनिवार को क्या करना शुभ माना जाता है?</h2></p><p>शनिवार के दिन कई लोग शनि देव की पूजा करते हैं। कुछ भक्त जरूरतमंद लोगों को भोजन कराते हैं या अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। काले तिल, तेल या अन्य वस्तुओं के दान की परंपरा भी कई स्थानों पर देखने को मिलती है। कुछ लोग शनि मंदिर में जाकर प्रार्थना करते हैं और अपने कर्मों को बेहतर बनाने का संकल्प लेते हैं। धार्मिक दृष्टि से देखें तो शनिवार का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही माना जा सकता है कि व्यक्ति अपने कर्मों के प्रति जिम्मेदार रहे और दूसरों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करे।</p><p><h2>परंपरा का सम्मान, लेकिन समझ के साथ</h2></p><p>भारतीय संस्कृति की खूबसूरती यही है कि यहां कई परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं। इन परंपराओं के पीछे धार्मिक विश्वास, स्थानीय संस्कृति और पुराने समय की जीवनशैली तीनों का प्रभाव हो सकता है। शनिवार को बाल न धोने की मान्यता को भी इसी नजरिए से देखना चाहिए। यह कुछ परिवारों और समुदायों की धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है, लेकिन इसे हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य नियम मानना सही नहीं होगा।</p><p><strong>डिस्क्लेमर: </strong>यह लेख प्रचलित धार्मिक मान्यताओं, ज्योतिषीय धारणाओं और लोकविश्वासों पर आधारित है। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य या अनिवार्य धार्मिक नियम न माना जाए।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156096307</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 13:22:01 +0530</pubDate><title><![CDATA[ पुरी जगन्नाथ मंदिर के 22 चरणों का रहस्य, जानें क्यों खास है बैसी पहाचा ]]></title><description><![CDATA[ Jagannath Temple Puri: भगवान जगन्नाथ के मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए इन 22 सीढ़ियों का अनुभव अपने आप में खास होता है।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/22-steps-of-jagannath-temple-baisi-pahacha-article-156096307 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156096305,thumbsize-135696,width-1280,height-720,resizemode-75/156096305.jpg" alt="22 steps of jagannath temple baisi pahacha" /></div><p><strong>Jagannath Temple Puri: </strong>ओडिशा के पुरी में स्थित प्रसिद्ध तीर्थस्थल भगवान जगन्नाथ का मंदिर चार धामों में शामिल है। पुरी के श्री जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं भी लोगों को हमेशा से आकर्षित करती रही हैं। मंदिर से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं, जिनके बारे में जानकर भक्तों की जिज्ञासा और बढ़ जाती है। इन्हीं में से एक है मंदिर के सिंह द्वार के भीतर मौजूद 22 सीढ़ियां, जिन्हें स्थानीय रूप से- बैसी पहाचा कहा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए इन सीढ़ियों को पार करना मंदिर की यात्रा का अहम हिस्सा माना जाता है। इन 22 चरणों को लेकर धार्मिक आस्था, लोकविश्वास और आध्यात्मिक व्याख्याएं भी प्रचलित हैं।</p><p><h2>क्या है बैसी पहाचा</h2></p><p>बैसी पहाचा का मतलब स्थानीय भाषा में 22 सीढ़ियां माना जाता है। ये सीढ़ियां मंदिर के सिंह द्वार क्षेत्र से आगे मंदिर परिसर की ओर ले जाती हैं। भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए आने वाले भक्त इन्हीं चरणों को पार करके आगे बढ़ते हैं। श्रद्धालुओं के बीच इनसे जुड़ी कई धार्मिक मान्यताएं भी सदियों से चली आ रही हैं। यही वजह है कि बैसी पहाचा जगन्नाथ मंदिर आने वाले भक्तों के लिए खास महत्व रखता है।</p><p><h2>22 चरणों को लेकर क्या है मान्यता</h2></p><p>बैसी पहाचा से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यताओं में से एक यह है कि ये 22 चरण इंसान की अलग-अलग कमजोरियों और सांसारिक बंधनों का प्रतीक माने जाते हैं। लोकमान्यता के अनुसार, व्यक्ति जब इन सीढ़ियों को पार करता है तो इसे केवल मंदिर के भीतर जाने की यात्रा नहीं, बल्कि अपने भीतर की कमियों से ऊपर उठने की यात्रा के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि, 22 चरणों का यही एक निश्चित अर्थ है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। अलग-अलग परंपराओं और धार्मिक व्याख्याओं में इनके अर्थ अलग-अलग बताए जाते हैं।</p><p><h2>तीसरी सीढ़ी और यम शिला का रहस्य</h2></p><p>बैसी पहाचा से जुड़ी एक और प्रसिद्ध मान्यता यम शिला को लेकर है। कहा जाता है कि इन सीढ़ियों में एक विशेष पत्थर है, जिसे यम शिला कहा जाता है। लोकविश्वास के अनुसार, मंदिर में प्रवेश करते समय इस शिला पर पैर रखने को पापों से मुक्ति से जोड़ा जाता है। वहीं मंदिर से बाहर निकलते समय इस पर पैर रखने को लेकर एक अलग मान्यता है। कहा जाता है कि ऐसा करने से भगवान जगन्नाथ के दर्शन से प्राप्त पुण्य प्रभावित हो सकता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि यम शिला से जुड़ी ये बातें धार्मिक मान्यताएं और लोकविश्वास हैं। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।</p><p><h2>आध्यात्मिक यात्रा से कैसे जुड़ी हैं ये सीढ़ियां?</h2></p><p>इन 22 चरणों को लेकर एक खूबसूरत आध्यात्मिक विचार भी सामने आता है। माना जाता है कि मंदिर तक पहुंचना केवल बाहर से भीतर जाने की प्रक्रिया नहीं है। यह इंसान के भीतर की यात्रा का भी प्रतीक हो सकता है।</p><p>जब भक्त एक-एक सीढ़ी चढ़ता है तो इसे अपने मन को शांत करने, अहंकार को पीछे छोड़ने और भगवान के प्रति समर्पित होने के भाव से जोड़ा जाता है। इस नजरिए से बैसी पहाचा हमें याद दिलाती है कि पूजा केवल बाहरी क्रिया नहीं है, बल्कि मन की शुद्धता भी उतनी ही जरूरी है।</p><p><h2>22 चरण और इंसान की कमजोरियां</h2></p><p>कुछ धार्मिक व्याख्याओं में 22 चरणों को मानव जीवन से जुड़े अलग-अलग दोषों, इच्छाओं और कमजोरियों का प्रतीक बताया जाता है। इस सोच के अनुसार, इंसान को आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए अपने भीतर मौजूद मोह, अहंकार, क्रोध और दूसरी नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करना चाहिए। यानी इन सीढ़ियों को एक तरह से आत्मसंयम और आत्मचिंतन की यात्रा के रूप में समझा जा सकता है। हर चरण व्यक्ति को यह संदेश देता हुआ माना जाता है कि भगवान के करीब जाने के साथ-साथ अपने भीतर भी बदलाव लाना जरूरी है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156095507</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 09:52:52 +0530</pubDate><title><![CDATA[ रविवार को क्या खाएं और क्या नहीं? जानें भोजन से जुड़े धार्मिक नियम ]]></title><description><![CDATA[ What To Eat & What Not To Eat On Sunday: क्या आप भी रविवार के दिन कुछ भी, कभी भी खा लेते हैं? अगर हां, तो आज से ही अपनी इस आदत को बदल लें। चलिए जानें रविवार को क्या खाना चाहिए और किन चीज़ों से परहेज़ करना अच्छा होता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ravivar-ke-din-kya-nahin-khana-chahie-what-to-eat-and-what-not-to-eat-on-sunday-as-per-astrology-article-156095507 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156095523,thumbsize-151957,width-1280,height-720,resizemode-75/156095523.jpg" alt="ravivar ke din kya nahin khana chahie what to eat and what not to eat on sunday as per astrology" /></div><p><strong>What To Eat &amp; What Not To Eat On Sunday:</strong> रविवार का दिन अधिकतर लोगों को अच्छा लगता है क्योंकि इस दिन उन्हें ऑफिस के काम से ब्रेक मिलता है। इस दिन जहां कुछ लोग घर पर स्वादिष्ट व्यंजन बनाकर खाते हैं। वहीं, उन लोगों की भी कमी नहीं है जो पूरे दिन केवल बाहर का खाना खाते हैं। हालांकि, रविवार के दिन कुछ विशेष चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि उनका जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। आज यहां पर आप जानेंगे कि धार्मिक दृष्टि से रविवार के दिन किन चीजों का सेवन करना चाहिए और किन चीजों को खाने से बचना चाहिए।</p><p><h2><strong>रविवार को कौन सी चीजें खानी चाहिए?</p><p></strong></h2>रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित है, इसलिए इस दिन सूर्य ग्रह से जुड़ी चीजों का सेवन करना शुभ होता है। इस दिन आप दलिया, बेसन के लड्डू, दूध, दही, घी, आम, अनार, संतरा, स्ट्रॉबेरी और लीची खा सकते हैं। इसके अलावा गुड़, केसर और गेहूं से बनी चीजों को खाने से भी सूर्य दोष नहीं लगता है, बल्कि व्यक्ति दिनभर एनर्जेटिक और सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहता है। </p><p><h2><strong>रविवार को कौन सी चीजें नहीं खानी चाहिए?</p><p></strong></h2>सूर्य देव को समर्पित होने के कारण रविवार के दिन शनि ग्रह से जुड़ी चीजें नहीं खाई जाती हैं। दरअसल, शनि और सूर्य के बीच शत्रुता का भाव है। जो लोग इस दिन शनि ग्रह से जुड़ी चीजों का सेवन करते हैं, उन्हें सूर्य दोष लगता है। साथ ही स्वास्थ्य, आर्थिक स्थिति और मान-सम्मान पर अशुभ प्रभाव पड़ता है। इसलिए रविवार को अदरक, प्याज, लहसुन, उड़द दाल वाली खिचड़ी, मसूर की दाल, साग, काली उड़द की दाल, शराब, मदिरा, काले चने और खट्टा दही नहीं खाएं। खाना बनाने में नमक, गर्म मसाले, सरसों के तेल, तिल के तेल, नींबू और इमली का इस्तेमाल न करें। मान्यता है कि जो लोग रविवार को बासी भोजन और खट्टे फलों का सेवन करते हैं, उन्हें सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त नहीं होती है।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/ravivar-ko-kya-kharidna-chahiye-aur-kya-nhi-sunday-shopping-rules-as-per-astrology-article-156095159" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>रविवार को क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं? जानें पूरी लिस्ट</strong></a></p><p><h2><strong>रविवार को किस बर्तन में भोजन नहीं करना चाहिए?</p><p></strong></h2></p><p>लोहे का संबंध सीधे शनि ग्रह से है, जिसके कारण इनके बर्तनों में रविवार के दिन भोजन करना शुभ नहीं होता है। साथ ही तांबे और लोहे से बनी चीजों का इस्तेमाल करने से जीवन में नकारात्मकता अट्रैक्ट होती है। रविवार को कांसे के बर्तन में भोजन करना भी शुभ नहीं होता है।</p><p><h2><strong>रविवार को किस बर्तन में भोजन करें?</p><p></strong></h2></p><p>पीतल और तांबे का सूर्य ग्रह से संबंध है, जिनके बर्तनों में रविवार के दिन भोजन करना शुभ होता है। इससे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और आत्मविश्वास बढ़ता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156095159</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 08:18:55 +0530</pubDate><title><![CDATA[ रविवार को क्या खरीदना चाहिए और क्या नहीं? जानें शुभ-अशुभ चीजों की पूरी लिस्ट ]]></title><description><![CDATA[ Ravivar Astro Niyam: क्या आप भी शॉपिंग करने के लिए रविवार के दिन का इंतजार करते हैं? यदि हां, तो सबसे पहले जान लें कि इस दिन क्या खरीदना धार्मिक दृष्टि से शुभ होता है और कौन सी चीजों की शॉपिंग का अशुभ प्रभाव जीवन पर पड़ सकता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ravivar-ko-kya-kharidna-chahiye-aur-kya-nhi-sunday-shopping-rules-as-per-astrology-article-156095159 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156095237,thumbsize-170784,width-1280,height-720,resizemode-75/156095237.jpg" alt="ravivar ko kya kharidna chahiye aur kya nhi sunday shopping rules as per astrology" /></div><p><strong>Sunday Shopping Rules:</strong> अधिकतर लोगों को रविवार के दिन का इंतजार रहता है क्योंकि ये छुट्टी का दिन होता है। स्कूल, कॉलेज और कई ऑफिस रविवार को बंद होते हैं। ऐसे में इस दिन लोग अपने दोस्तों व परिवार वालों के साथ कहीं घूमने या शॉपिंग करने का प्लान बनाते हैं। हालांकि, शास्त्रों में रविवार के दिन से जुड़े विभिन्न नियमों के बारे में भी बताया गया है। यहां तक कि खरीदारी से जुड़े भी कई नियम हैं, जिन्हें अनदेखा करना अच्छा नहीं होता है। आज यहां पर आप जानेंगे कि रविवार के दिन क्या नहीं खरीदना चाहिए और किन चीजों की खरीदारी से लाभ हो सकता है।</p><p><h2><strong>रविवार को क्या नहीं खरीदना चाहिए? (ravivar ko kya nahi kharidna chahiye)</p><p></strong></h2>रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है सूर्य और शनि ग्रह के बीच शत्रुता का भाव है, जिसके कारण रविवार के दिन शनि ग्रह से जुड़ी किसी भी तरह की चीज की खरीदारी नहीं करनी चाहिए। इस दिन काले छाते, काले तिल, उड़द की दाल, चक्की, मसूर की दाल, कच्चा आम, खटाई, लौंग, नमक, सरसों का तेल, झाड़ू, कैंची, कोयला, जूते-चप्पल, तामसिक चीजें और ईंधन खरीदना नहीं चाहिए। साथ ही लोहे, लकड़ी, हार्डवेयर, गार्डनिंग, कांच, स्टेशनरी, चमड़े, शीशे और नुकीली चीजों को खरीदने से बचें।</p><p><h2><strong>रविवार को किस रंग के कपड़े न खरीदें?</p><p></strong></h2>काले, नीले और भूरे रंग के कपड़ों की खरीदारी रविवार के दिन (ravivar ko kis rang ka kapda nhi kharidna chahiye) नहीं करनी चाहिए। इन रंगों का संबंध सीधे शनि ग्रह से है, जिनका सूर्य ग्रह से शत्रुता का भाव है। यदि आप रविवार को इन रंगों के कपड़ों की खरीदारी करते हैं तो आपको आर्थिक और शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/sunday-morning-quotes-surya-dev-motivational-quotes-in-hindi-ravivar-ke-shubh-sandesh-article-156094907" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>रविवार की सुबह को बनाएं खास, सूर्य देव की ऊर्जा से भरे ये कोट्स अपनों को जरूर भेजें</strong></a> </p><p><h2><strong>रविवार को क्या खरीदना चाहिए? </p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार के दिन (ravivar ko kya kharidna chahiye) सूर्य ग्रह से जुड़ी चीजों की खरीदारी करने से घर में बरकत होती है। साथ ही सेहत और घर के सदस्यों की आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस दिन आप तांबे, बिजली, अग्नि और सोने से बनी चीजों की खरीदारी कर सकते हैं। इसके अलावा अनाज, गुड़, चश्मा, दलिया, लाल मसूर और पर्स खरीदना शुभ होता है। </p><p><h2><strong>रविवार को किस रंग के कपड़े खरीदें?</p><p></strong></h2></p><p>जो लोग लाल, पीले और सुनहरे रंग के कपड़े रविवार के दिन (ravivar ko kis rang ke kapde kharide) खरीदते हैं, उन्हें सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। साथ ही सकारात्मक ऊर्जा अट्रैक्ट होती है और जीवन में खुशियों का स्थायी वास होता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156094907</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 06:54:39 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Sunday Morning Quotes In Hindi: रविवार की सुबह को बनाएं खास, सूर्य देव की ऊर्जा से भरे ये कोट्स अपनों को जरूर भेजें ]]></title><description><![CDATA[ R​avivar Ke Shubh Sandesh:​​ रविवार के दिन को आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए खास बना सकते हैं। यहां पर सूर्य देव को समर्पित रविवार के प्रेरणादायक कोट्स दिए गए हैं। ​​ ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/sunday-morning-quotes-surya-dev-motivational-quotes-in-hindi-ravivar-ke-shubh-sandesh-article-156094907 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156094974,thumbsize-119140,width-1280,height-720,resizemode-75/156094974.jpg" alt="sunday morning quotes surya dev motivational quotes in hindi ravivar ke shubh sandesh" /></div><p><strong>Surya Dev Motivational Quotes In Hindi:</strong> रविवार का दिन सूर्य देव की आराधना और उनका आशीर्वाद पाने के लिए खास होता है। इस शुभ दिन की शुरुआत सूर्य देव को नमन करने के साथ की जा सकती है। इसके अलावा सकारात्मक विचारों का साथ होना भी जरूरी है। रविवार के इस पावन अवसर पर आप अपने दोस्तों तथा रिश्तेदारों के साथ भक्तिमय और प्रेरणादायक संदेश साझा कर सकते हैं। यहां </p><p>सूर्य देव की ऊर्जा से भरे सकारात्मक कोट्स दिए गए हैं, जो रविवार की सुबह आप अपने प्रियजनों को भेज सकते हैं। </p><p><h2><strong>रविवार कोट्स इन हिंदी</p><p></strong></h2>1. </p><p>बनना है तो सूर्य देव की तरह बनो</p><p>जो बिना भेदभाव के पूरे संसार को जगमगाते हैं। </p><p>गुड मॉर्निंग!!</p><p>2. </p><p>जैसे सूर्य के उदय के साथ ही अंधकार मिट जाता है</p><p>ठीक वैसे ही आज रविवार की ये नई सुबह </p><p>आपके जीवन से सभी कष्टों को दूर करे</p><p>शुभ रविवार!!</p><p>3.</p><p>रविवार की सुबह आपके जीवन में नया प्रकाश लाए </p><p>असीम खुशियों की आप पर बरसात हो</p><p>ऐसी भगवान सूर्य की कृपा आप पर बनी रहे</p><p>गुड मॉर्निंग!!</p><p>4. </p><p>उगते हुए सूरज से मेरी यही प्रार्थना है </p><p>कि आपका हर दिन खुशियों से भरा हो। </p><p>गुड मॉर्निंग, शुभ रविवार!!</p><p>5. </p><p>रविवार का पावन दिन आपके परिवार में सुख-शांति लाए </p><p>हे सूर्य देव, अपनी कृपा सब पर बनाए रखना</p><p>सुप्रभात!!</p><p>6. </p><p>इस रविवार खुद भी चमकें और दूसरों की जिंदगी भी रोशन करें</p><p>गुड मॉर्निंग, शुभ रविवार!!</p><p>7.</p><p>जैसे सूर्य का तेज हर कोने को रोशन करता है</p><p>वैसे ही आपका व्यक्तित्व हर दिल में जगह बनाए</p><p>हैव अ वंडरफुल संडे!!</p><p>8.</p><p>रविवार के दिन की नई किरणें आपके सपनों को उड़ान दें</p><p>सूर्य देव का आशीर्वाद हमेशा आपके ऊपर बना रहे </p><p>गुड मॉर्निंग!!</p><p>9. </p><p>सफलता की चमक तो सूर्य के जैसी होनी चाहिए</p><p>अविरल, निस्वार्थ और तेजस्वी</p><p>हैव अ वंडरफुल संडे!!</p><p>10.</p><p>मन की शांति और दोस्तों-परिवार वालों का प्यार</p><p>ये ही है रविवार का सबसे खूबसूरत उपहार</p><p>हैव अ वंडरफुल संडे!!</p><p><h2><strong>रविवार के महाउपाय</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रविवार का दिन सूर्य देव और काल भैरव को समर्पित है। इस दिन को खास बनाने के लिए सुबह के समय तांबे के लोटे से सूर्य देव को जल अर्पित करें। जल अर्पित करते समय 'ॐ घृणि सूर्याय नमः' मंत्र का 3 से 7 बार जाप करें। इसके अलावा शाम को काल भैरव के मंदिर जाएं। वहां जाकर उनकी प्रतिमा के सामने सरसों के तेल का एक दीपक जलाएं। दीपक में काले तिल जरूर डालें।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156047864</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 20:08:04 +0530</pubDate><title><![CDATA[ सूर्य ऊर्जा को मजबूत करने के लिए 5 रागों पर करें ध्यान, ज्योतिष में माना जाता है खास असर ]]></title><description><![CDATA[ Surya Energy: अगर आप ध्यान के जरिए सूर्य से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा पर फोकस करना चाहते हैं, तो इन 5 रागों को अपनी दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/strong-sun-in-astrology-raga-bhairav-raga-saurashtram-raga-bilahari-article-156047864 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156047865,thumbsize-118159,width-1280,height-720,resizemode-75/156047865.jpg" alt="strong sun in astrology raga bhairav raga saurashtram raga bilahari" /></div><p><strong>Surya Energy: </strong>भारतीय ज्योतिष में सूर्य को आत्मबल और आत्मविश्वास से जोड़कर देखा जाता है। इसके अलावा सूर्य का कनेक्शन व्यक्तित्व, नेतृत्व, ऊर्जा और जीवन के उद्देश्य से भी माना जाता है। मान्यता है कि जन्म कुंडली में सूर्य की स्थिति व्यक्ति के स्वभाव और जीवन के कई पहलुओं पर प्रभाव डाल सकती है। सूर्य से जुड़ी ऊर्जा को संतुलित करने के लिए पूजा-पाठ, मंत्र जाप और सूर्य नमस्कार जैसे कई उपाय बताए जाते हैं। इसी तरह संगीत और रागों को भी मन को शांत करने और ध्यान केंद्रित करने का माध्यम माना गया है। कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, खास रागों को सही समय पर सुनते हुए ध्यान करने से व्यक्ति को मानसिक रूप से सकारात्मक महसूस करने में मदद मिल सकती है।</p><p><h2>1- राग भैरव से करें दिन की शुरुआत</h2></p><p>भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रमुख रागों में राग भैरव को गिना जाता है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, सुबह करीब 4 बजे से 7 बजे के बीच राग भैरव सुनते हुए ध्यान करने से मन को स्थिर करने में मदद मिल सकती है। सुबह का शांत वातावरण भी ध्यान के लिए अनुकूल माना जाता है।</p><p><h2>2- राग सौराष्ट्रम् से बढ़ाएं आत्मविश्वास</h2></p><p>राग सौराष्ट्रम् को भी कुछ आध्यात्मिक परंपराओं में सूर्य से जुड़ी ऊर्जा के साथ जोड़ा जाता है। मान्यता है कि सुबह 5:30 बजे से 8 बजे के बीच इस राग को सुनते हुए ध्यान करने से व्यक्ति अपने भीतर नेतृत्व और आत्मविश्वास की भावना पर ध्यान केंद्रित कर सकता है।</p><p><h2>3- राग बिलहरी से करें मन को सकारात्मक</h2></p><p>राग बिलहरी को भी सुबह के समय सुनने वाले रागों में शामिल किया जाता है। इसे करीब सुबह 7 बजे से 10 बजे के बीच सुना जा सकता है। आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह राग आत्मविश्वास और सामाजिक सहजता पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है। </p><p><h2>4- राग अहिर भैरव के साथ करें ध्यान</h2></p><p>राग अहिर भैरव को सुबह के समय सुनना काफी लोकप्रिय है। इसका स्वरूप शांत और गंभीर माना जाता है, इसलिए इसे ध्यान और मन की एकाग्रता से भी जोड़ा जाता है। सुबह 5 बजे से 7 बजे के बीच कुछ समय निकालकर इस राग को सुनते हुए ध्यान किया जा सकता है। इस दौरान शरीर को आराम की स्थिति में रखें और सांसों पर ध्यान दें।</p><p><h2>5. राग दीपक</h2></p><p>राग दीपक का नाम ही अग्नि और प्रकाश की याद दिलाता है। कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं में इसे अग्नि तत्व और ऊर्जा से जोड़ा जाता है। मूल सामग्री में इसे शाम 4 बजे से 7 बजे के बीच सुनने की बात कही गई है। हालांकि, राग दीपक को लेकर प्रचलित कथाओं को ऐतिहासिक या वैज्ञानिक तथ्य मानने के बजाय संगीत और आध्यात्मिक परंपरा के हिस्से के रूप में देखना बेहतर है।</p><p><strong>डिसक्लेमर:</strong> रागों और ग्रहों के बीच बताए जाने वाले प्रभाव मुख्य रूप से ज्योतिषीय और आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके प्रभाव को वैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य उपचार के तौर पर प्रमाणित नहीं माना जाना चाहिए।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156047410</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 18:10:30 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Ashtavakra Gita: ज्ञानी व्यक्ति को पुण्य-पाप क्यों नहीं बांधते? अष्टावक्र गीता के ये श्लोक देंगे जवाब ]]></title><description><![CDATA[ Ashtavakra Gita Hindi: अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में राजा जनक ने बताया है कि आत्मज्ञान का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए मोह, इच्छा, अहंकार और भय से मुक्त हो जाना है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ashtavakra-gita-hindi-atma-gyan-advaita-vedanta-self-realization-article-156047410 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156047407,thumbsize-199787,width-1280,height-720,resizemode-75/156047407.jpg" alt="ashtavakra gita hindi atma gyan advaita vedanta self realization" /></div><p><strong>Ashtavakra Gita Hindi: </strong>भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के दसवें भाग में आज हम आपको श्लोक 60 से श्लोक 65 तक के अर्थों का सार बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में राजा जनक कह रहे हैं कि आत्मज्ञान का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए मोह, इच्छा, अहंकार और भय से मुक्त हो जाना है।</p><p><strong>श्लोक 60-</strong> हंतात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।</p><p>न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जो व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका है और धैर्यवान है, वह संसार में रहते हुए भी जीवन के भोगों और गतिविधियों को एक खेल की तरह देखता है। उसकी तुलना उन अज्ञानी लोगों से नहीं की जा सकती, जो संसार के मोह-माया के बोझ को ढोते रहते हैं।'</p><p><strong>श्लोक 61- </strong>यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।</p><p>अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जिस परम अवस्था को प्राप्त करने की इच्छा इंद्र आदि सभी देवता भी करते हैं, उसी अवस्था में स्थित योगी को देखकर आश्चर्य होता है कि वह उसमें भी कोई विशेष हर्ष या उत्साह नहीं दिखाता।'</p><p><strong>श्लोक 62-</strong> तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।</p><p>न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानोऽपि संगतिः।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'उस आत्मज्ञानी व्यक्ति के भीतर पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता। जैसे आकाश दिखाई देने वाले धुएं से वास्तव में जुड़ता नहीं है, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति कर्मों के बंधन से भीतर से प्रभावित नहीं होता।'</p><p><strong>श्लोक 63- </strong>आत्मवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।</p><p>यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जिस महात्मा ने इस पूरे संसार को अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जान लिया है, और जो जीवन में सहज रूप से जैसा घट रहा है वैसा ही स्वीकार करते हुए रहता है, उसे रोकने या बांधने की सामर्थ्य किसमें है?'</p><p><strong>श्लोक 64-</strong> आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।</p><p>विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'ब्रह्मा से लेकर छोटे से छोटे जीव तक इस संसार में जितने भी चार प्रकार के जीव हैं, उनमें आत्मज्ञानी व्यक्ति ही ऐसा है जो इच्छा और अनिच्छा—दोनों से परे रहने की सामर्थ्य रखता है।'</p><p><strong>श्लोक 65- </strong>आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानति जगदीश्वरम्।</p><p>यद्वेति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।</p><p>अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जो कोई व्यक्ति अपने अद्वैत आत्मस्वरूप को ही जगत के ईश्वर के रूप में जान लेता है, वह जैसा अपने वास्तविक स्वरूप को जानता है, उसी ज्ञान के अनुसार जीवन जीता है। फिर उसे किसी भी बात का भय नहीं रहता।'</p><p><h2>इन 6 श्लोकों का सार</h2></p><p>इन श्लोकों में राजा जनक एक आत्मज्ञानी व्यक्ति की अवस्था को बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। राजा जनक कहते हैं- वह संसार में रहता है, लेकिन संसार का गुलाम नहीं होता। सुख-सुविधाओं को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं मानता। बड़ी उपलब्धि मिलने पर भी अहंकार नहीं करता। पुण्य-पाप और कर्मों से अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को अलग जानता है। परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करता है। इच्छा और अनिच्छा के द्वंद्व से ऊपर उठता है। और अंततः अद्वैत आत्मज्ञान के कारण भय से मुक्त हो जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156046940</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 16:10:45 +0530</pubDate><title><![CDATA[ गणेश पूजा में लाल रंग का क्यों है इतना महत्व? जानें इसके पीछे की धार्मिक वजह ]]></title><description><![CDATA[ Ganpati Puja Rituals: लाल रंग उत्साह, सक्रियता और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। गणेश पूजा के दौरान भक्त लाल फूल या सिंदूर अर्पित करते हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ganpati-puja-rituals-ganesh-puja-red-colour-lord-ganesha-favourite-colour-article-156046940 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156046938,thumbsize-178148,width-1280,height-720,resizemode-75/156046938.jpg" alt="ganpati puja rituals ganesh puja red colour lord ganesha favourite colour" /></div><p><strong>Ganpati Puja Rituals:</strong> भगवान गणेश की पूजा के दौरान लाल रंग का अपना खास महत्व है। भक्त अक्सर गणपति बप्पा की पूजा में लाल फूल, लाल वस्त्र, लाल चंदन और सिंदूर का इस्तेमाल करते हैं। गणेश पूजा में लाल रंग का इस्तेमाल सिर्फ रंग की खूबसूरती के लिए नहीं किया जाता बल्कि इससे धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। लाल रंग को आमतौर पर शक्ति, उत्साह, मंगल और समृद्धि से जोड़कर देखा जाता है। यही वजह है कि गणेश जी की पूजा में इस रंग का इस्तेमाल भक्तों के लिए विशेष भाव रखता है। आइए समझते हैं कि आखिर गणपति पूजा में लाल रंग को इतना खास क्यों माना जाता है।</p><p><h2>भगवान गणेश से लाल रंग का संबंध</h2></p><p>धार्मिक मान्यताओं में लाल रंग को भगवान गणेश का प्रिय रंग माना जाता है। यही कारण है कि गणपति की पूजा में लाल फूल और लाल रंग की दूसरी पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार गणेश जी को लाल फूल अर्पित करते हैं और सिंदूर भी चढ़ाते हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश को सिंदूर अर्पित करने से भक्त की मनोकामना पूरी होने और जीवन में शुभता आने का आशीर्वाद मिलता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में पूजा की विधि कुछ अलग हो सकती है।</p><p><h2>लाल फूल क्यों चढ़ाए जाते हैं?</h2></p><p>गणेश जी को लाल फूल अर्पित करने की परंपरा पुरानी है। खासकर लाल गुड़हल जैसे फूलों को गणेश पूजा में चढ़ाया जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार उपलब्ध फूल भगवान को अर्पित करते हैं। फूल चढ़ाने का भाव केवल सजावट से जुड़ा नहीं होता। फूल को प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। </p><p><h2>लाल रंग को माना जाता है शुभ</h2></p><p>भारतीय परंपरा में लाल रंग को शुभ अवसरों से जोड़कर देखा जाता है। शादी-विवाह से लेकर कई धार्मिक अनुष्ठानों तक लाल रंग का इस्तेमाल होता है। इसे मंगल, सौभाग्य और उत्सव का रंग माना जाता है। गणेश जी स्वयं शुभता और मंगल के देवता माने जाते हैं। इसलिए उनकी पूजा में लाल रंग का इस्तेमाल धार्मिक भावनाओं के साथ अच्छी तरह जुड़ जाता है।</p><p><h2>समृद्धि और सौभाग्य से जुड़ा है लाल रंग</h2></p><p>लाल रंग को कई भारतीय परंपराओं में सौभाग्य और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है। गणेश जी को बुद्धि, विवेक और शुभ कार्यों की शुरुआत के देवता के रूप में पूजा जाता है। इसलिए उनकी पूजा में लाल रंग का इस्तेमाल जीवन में शुभता और सफलता की कामना के भाव को दर्शाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156045238</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 08:48:11 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Goga Navami 2026 Today: आज गोगा नवमी पर जानिए कौन थे 'जाहरवीर गोगाजी', जिनकी पूजा हिंदू-मुस्लिम और सिख तीनों धर्मों में होती है ]]></title><description><![CDATA[ Jaharveer Goga Ji Maharaj Kaun The: गोगा नवमी का पर्व आज 5 सितंबर 2026, शनिवार को मनाया जा रहा है। ये पर्व जाहरवीर गोगाजी महाराज को समर्पित है। चलिए जानें गोगाजी महाराज के जीवन से जुड़ी खास बातों के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/goga-navami-2026-today-jaharveer-goga-ji-maharaj-kaun-the-gogamedi-mandir-rajasthan-article-156045238 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156045252,thumbsize-125126,width-1280,height-720,resizemode-75/156045252.jpg" alt="goga navami 2026 today jaharveer goga ji maharaj kaun the gogamedi mandir rajasthan" /></div><p><strong>Jaharveer Goga Ji Maharaj Kaun The:</strong> गोगाजी महाराज को उत्तर भारत के एक प्रसिद्ध लोक देवता के रूप में जाना जाता है, जिन्हें जाहरवीर गोगाजी, गुग्गा पीर और सांपों के देवता के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को वीर गोगाजी का जन्म हुआ था। उनकी स्मृति में हर साल इस तिथि पर गोगा नवमी का पर्व मनाया जाता है। साल 2026 में आज 5 सितंबर को गोगा नवमी मनाई जा रही है। मान्यता है कि इस दिन गोगाजी की पूजा करने से सांप के काटने का भय नहीं रहता है। इसी के साथ महिलाएं अपनी संतान की लंबी उम्र, परिवार वालों के अच्छे स्वास्थ्य और सुख-शांति के लिए व्रत रखती हैं तथा गोगाजी की आराधना करती हैं। आइए अब जानें गोगाजी महाराज के जीवन से जुड़ी खास बातों के बारे में।</p><p><h2><strong>गोगाजी ने अनेक विद्याएं की थीं सिद्ध</p><p></strong></h2>राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा गांव में चौहान राजपूत वंश के राजा के घर गोगाजी का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम जेवर सिंह और माता रानी बाछल कंवर थीं। गोगाजी ने अपने गुरु गोरखनाथ जी के मार्गदर्शन में बहुत ही कम उम्र में अनेक विद्याएं सिद्ध कर ली थीं। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी दिव्य ऊर्जा और कृपा से कई लोगों को उनकी परेशानियों से मुक्त किया है। उनके पास भूत-प्रेत, बुरी आत्माओं और तंत्र-मंत्र के प्रभावों को कम करने के अचूक उपाय थे। इसी के साथ उनकी शक्ति सांप के काटने या विषैले जीवों के प्रभाव को कम करने में मदद करती थी। इसी वजह से उन्हें सांपों का देवता कहा जाने लगा।</p><p><h2><strong>तीनों धर्म में पूजे जाते हैं बाबा </p><p></strong></h2></p><p>बता दें कि गोगाजी महाराज की पूजा हिंदू, मुस्लिम और सिख तीनों धर्मों में की जाती है। हिंदू धर्म के लोग गोगाजी महाराज को सांपों के देवता और वीर योद्धा के रूप में पूजते हैं। मुस्लिम समुदाय में बाबा को गोगा पीर या जाहर पीर का स्थान प्राप्त है। जाहर पीर का अर्थ होता है 'साक्षात प्रकट होने वाला पीर या देवता।' विशेषकर कायमखानी और चायल जाति के मुसलमान बाबा को लोक देवता का रूप मानते हैं। वहीं, सिख समुदाय के लोग भी बाबा की वीरता और लोक कल्याणकारी स्वरूप को याद करते हैं।</p><p><h2><strong>इस जगह गिरा था गोगाजी का धड़</p><p></strong></h2></p><p>राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में जाहरवीर गोगाजी का मुख्य और प्रसिद्ध धाम 'गोगामेड़ी' स्थित है, जिसे 'धड़ मेड़ी' के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि यहां गोगाजी महाराज का धड़ गिरा था। बता दें कि भक्तों के लिए बाबा का ये मंदिर हर दिन खुला रहता है। यहां रोजाना सुबह-शाम गोगा महाराज की पूजा की जाती है। इसके अलावा भाद्रपद माह में विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें शामिल होने के लिए भक्तजन दूर-दूर से आते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156045120</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 07:50:41 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Happy Teachers Day 2026: अर्जुन की भांति गुरु से पाएं ज्ञान का प्रकाश, शिक्षक दिवस पर शेयर करें ये संदेश ]]></title><description><![CDATA[ Teacher's Day 2026 Wishes In Hindi: प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यदि आप भी आज अपने शिक्षकों के प्रति आभार व्यक्त करना चाहते हैं तो उन्हें ये खूबसूरत शुभकामनाएं संदेश भेज सकते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/happy-teachers-day-2026-wishes-in-hindi-shikshak-diwas-ki-shubhkamnaye-sandesh-article-156045120 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156045143,thumbsize-170206,width-1280,height-720,resizemode-75/156045143.jpg" alt="happy teachers day 2026 wishes in hindi shikshak diwas ki shubhkamnaye sandesh" /></div><p><strong>Happy Teacher's Day Wishes 2026 In Hindi:</strong> भारत में गुरु और शिक्षक को हमेशा से ही सम्माननीय स्थान दिया गया है। हिंदू धर्म में गुरु को केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं माना जाता है, बल्कि जीवन को दिशा दिखाने वाला मार्गदर्शक भी मानते हैं। गुरु-शिष्य के संबंध का उदाहरण भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में भी देखने को मिलता है। द्वारपर युग में महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को धर्म और कर्म की सीख दी थी। इसी वजह से 'गुरु' को भारतीय संस्कृति में ईश्वर के समान स्थान दिया गया है। हर साल 5 सितंबर को देश के महान शिक्षक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती के अवसर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है। ये दिन शिक्षकों के प्रति आभार और कृतज्ञता व्यक्त करने का होता है। </p><p>शिक्षक दिवस 2026 के अवसर पर यदि आप भी अपने गुरुजनों को धन्यवाद करना चाहते हैं तो उन्हें ये खूबसूरत टीचर डे कोट्स और शुभकामनाओं के संदेश भेज सकते हैं। </p><p><h2><strong>शिक्षक दिवस के शुभकामना संदेश (Happy Teachers Day Wishes 2026)</p><p></strong></h2>1. </p><p>अज्ञान के अंधकार से निकाला </p><p>ज्ञान के प्रकाश की ओर लेकर गए</p><p>ऐसे गुरु को मैं रोज प्रणाम करता हूं</p><p>ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका आशीर्वाद मुझ पर सदा बना रहे</p><p>शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं! गुरु जी</p><p>2. </p><p>आपके ज्ञान और मार्गदर्शन से जीवन को सही दिशा मिली है </p><p>आपका आशीर्वाद हमेशा हम पर बना रहे</p><p>शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं!! </p><p>3. </p><p>आपका स्थान मेरे जीवन में सबसे ऊंचा है</p><p>आपके दिए ज्ञान और संस्कारों के लिए दिल से धन्यवाद</p><p>गुरु जी, शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>4.</p><p>आपने मुझे सिर्फ किताबों का ज्ञान नहीं दिया</p><p>बल्कि जिंदगी को जीने की कला भी सिखाई है </p><p>आपके मार्गदर्शन के लिए बहुत धन्यवाद</p><p>हैप्पी टीचर्स डे!!</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/goga-navami-2026-wishes-goga-navami-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-quotes-article-156044984" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>गोगाजी महाराज की भक्ति में डूबे ये शुभकामना संदेश आज अपनों को भेजें</strong></a></p><p>5.</p><p>जिसने मुझे ज्ञान की रोशनी दिखाई</p><p>उस महान गुरु को शिक्षक दिवस पर मैं शत-शत नमन करता हूं</p><p>शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>6.</p><p>आपका मार्गदर्शन हमारे लिए प्रेरणा है</p><p>ईश्वर आपको हमेशा स्वस्थ और खुश रखे</p><p>शिक्षक दिवस की शुभकामनाएं!!</p><p>7.</p><p>आपकी सिखाई हुई हर बात जीवन में बहुत काम आएगी</p><p>एक बेहतरीन शिक्षक के साथ-साथ मार्गदर्शक बनने के लिए आपका दिल से धन्यवाद</p><p>हैप्पी टीचर्स डे!! गुरु जी</p><p>8.</p><p>आज शिक्षक दिवस के खास मौके पर मैं आपको नमन करता हूं </p><p>आपने मेरी गलतियों को सुधार, मेरी प्रतिभा को पहचाना </p><p>मुझे आगे बढ़ने का हौसला दिया</p><p>इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद</p><p>हैप्पी टीचर्स डे!! गुरु जी</p><p>9.</p><p>आपका ज्ञान और सीख मेरी लिए बहुत खास है </p><p>आज शिक्षक दिवस पर मैं आपको दिल से धन्यवाद करता हूं</p><p>हैप्पी टीचर्स डे!! सर</p><p>10.</p><p>एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी का भविष्य बदल सकता है ये बात मैं मान गया</p><p>मेरे भविष्य को बेहतर बनाने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद मैम</p><p>दिल से हैप्पी टीचर्स डे आपको!!</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156044984</guid><pubDate>Sat, 05 Sep 2026 06:50:04 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Goga Navami 2026 Wishes: जब-जब मैं हारा, तूने दिया सहारा... गोगाजी महाराज की भक्ति में डूबे ये शुभकामना संदेश आज अपनों को भेजें ]]></title><description><![CDATA[ Goga Navami 2026 Shubhkamna Sandesh In Hindi: आज 5 सितंबर 2026, शनिवार को गोगा नवमी का पर्व मनाया जा रहा है। चलिए जानें इस पावन दिन अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भेजे जाने वाले शुभकामना संदेशों के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/goga-navami-2026-wishes-goga-navami-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-quotes-article-156044984 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156045011,thumbsize-208702,width-1280,height-720,resizemode-75/156045011.jpg" alt="goga navami 2026 wishes goga navami ki hardik shubhkamnaye in hindi quotes" /></div><p><strong>Goga Navami 2026 Quotes In Hindi:</strong> भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव कल 4 सितंबर 2026 को मनाया गया, जिसके बाद आज 5 सितंबर को गोगा नवमी मनाई जा रही है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि पर गोगा नवमी का पर्व मनाया जाता है, जो कि सांपों के देवता वीर गोगाजी महाराज को समर्पित है। प्रत्येक वर्ष राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब के कई इलाकों में बहुत ही धूमधाम से गोगा नवमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन भक्तजन व्रत रखते हैं और गोगाजी की पूजा करते हैं। मान्यता है कि गोगा नवमी पर पूजा-पाठ करने से परिवार में सुख-शांति का आगमन होता है। इसी के साथ सांप के काटने का भय दूर होता है। </p><p>यदि आप भी आज के पावन दिन अपनों को गोगा नवमी की शुभकामनाएं देना चाहते हैं तो उसके लिए नीचे दिए गए संदेशों को चुन सकते हैं।</p><p><h2><strong>गोगा नवमी पर भेजें ये दिल छू लेने वाले संदेश</p><p></strong></h2>1. </p><p>हर मोड़ पर जाहर वीर श्री गोगा जी दें आपका साथ ये ही है हमारी इच्छा</p><p>आपको और आपके परिवार वालों को गोगा नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>2. </p><p>नेक काम कर और सच्चाई के रास्ते पर चल</p><p>क्योंकि ऐसे बंदों पर मेहर करना गोगा जी कभी भूलते नहीं</p><p>आपको मेरी तरफ से गोगा नवमी की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>3. </p><p>बाबा तू ही तो है जिसने मुझे कभी हारने नहीं दिया</p><p>बाबा तू ही तो है जो हर बार देता है मेरा साथ</p><p>आज के पावन दिन कैसे मैं तुझे याद न करूं</p><p>गोगा नवमी की ढेरों शुभकामनाएं!!</p><p>4. </p><p>जब-जब मैं हारा, तूने दिया सहारा</p><p>जब-जब न मिला किनारा, बाबा तूने पार उतारा।</p><p>गोगा नवमी 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं</p><p>5. </p><p>न मांगू मैं महल, न बंगला न कोठी,</p><p>जन्म मिले उस आंगन में, जहां जले बाबा के नाम की ज्योति।</p><p>जय बोलो … गोगा महाराज जी की।</p><p>गोगा नवमी 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं</p><p>6. </p><p>गोगा महाराज की कृपा से आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। </p><p>गोगा नवमी के पावन पर्व की आपको हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>7. </p><p>गोगाजी महाराज आपको हर संकट से बचाएं</p><p>जीवन में भरें खुशियां और पूरी करें हर इच्छा</p><p>गोगा नवमी 2026 की मंगलमय शुभकामनाएं!!</p><p>8.</p><p>जय गोगाजी महाराज! </p><p>गोगा नवमी के शुभ अवसर पर आपके जीवन में हो नई ऊर्जा का आगमन </p><p>हर संकट से रहें आप दूर और रहें सदा खुश</p><p>गोगा नवमी 2026 की शुभकामनाएं!!</p><p>9.</p><p>बाबा गोगाजी दूर करेंगे सभी कष्ट </p><p>जीवन में भरेंगे खुशियां</p><p>गोगा नवमी की आपको और आपके परिवार वालों को </p><p>ढेरों शुभकामनाएं!!</p><p>10.</p><p>गोगा नवमी आपके जीवन में सुख और शांति लेकर आए</p><p>गोगाजी महाराज की कृपा से आपकी हर मनोकामना पूर्ण हो।</p><p>गोगा नवमी की आपको ढेरों शुभकामनाएं!!</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156044292</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 23:30:47 +0530</pubDate><title><![CDATA[ आध्यात्मिकता में गुरु का महत्व, जीवन को देते हैं सही दिशा ]]></title><description><![CDATA[ Teachers Day 2026: आध्यात्मिकता में गुरु का महत्व सिर्फ परंपरा तक सीमित नहीं है। गुरु व्यक्ति को खुद को समझने और जीवन को बेहतर तरीके से जीने की प्रेरणा देता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/teachers-day-2026-importance-of-guru-in-spirituality-article-156044292 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156044295,thumbsize-165153,width-1280,height-720,resizemode-75/156044295.jpg" alt="teachers day 2026 importance of guru in spirituality" /></div><p><strong>Teachers Day 2026: </strong>आध्यात्मिकता सिर्फ पूजा-पाठ तक ही सीमित नहीं है। अगर आपको खुद को समझना है अपने मन को शांत करना है और जीवन के सही मायनों को जानना है तो इसके लिए आध्यात्मिकता की गहराई में उतरना बेहद जरूरी है। आध्यात्मिकता की गहराई से हमारा मतलब खुदको जानने से है। बड़े-बड़े धार्मिक गुरुओं ने आत्मज्ञान को ही सबसे बड़ा ज्ञान बताया है। अब बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर आत्मज्ञान हो तो हो कैसे? आत्मज्ञान के लिए क्या रास्ता है?</p><p>आत्मज्ञान के पथ पर चल रहे पथिकों को ये जानना बेहद जरूरी है कि इस यात्रा में गुरु की भूमिका बहुत खास मानी जाती है। 'गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष। गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष' कबीर दास का ये दोहा यहां पूरी तरह से फिट बैठता है। </p><p>जब आप आत्मज्ञान के पथ पर चलेंगे तो जानेंगे कि इस दिशा में चलते वक्त मन में तरह-तरह के सवाल चलते रहते हैं। ऐसे समय में गुरु एक मार्गदर्शक की तरह काम करता है। वह हमें बाहर की दुनिया से ज्यादा अपने भीतर झांकना सिखाता है।</p><p><h2>गुरु सिर्फ ज्ञान देने वाला नहीं होता</h2></p><p>गुरु को अक्सर शिक्षक समझ लिया जाता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से गुरु की भूमिका इससे कहीं बड़ी होती है। एक सामान्य शिक्षक हमें किसी विषय के बारे में जानकारी देता है, जबकि गुरु जीवन को समझने की दृष्टि विकसित करने में मदद करता है। गुरु हमें बताते हैं कि सुख-दुख जीवन का हिस्सा हैं और हर परिस्थिति में मन को संतुलित रखना जरूरी है। उनकी सीख इंसान को अपनी कमियों को स्वीकार करने और उन्हें सुधारने की प्रेरणा देती है।</p><p><h2>आध्यात्मिक यात्रा में गुरु क्यों जरूरी है</h2></p><p>आध्यात्मिक रास्ता हमेशा सीधा और आसान नहीं होता। कई बार व्यक्ति अपने अनुभवों और भावनाओं को लेकर उलझ जाता है। उसे समझ नहीं आता कि वह सही दिशा में जा रहा है या नहीं। यहीं गुरु की जरूरत महसूस होती है। गुरु अपने अनुभव और समझ के आधार पर शिष्य को रास्ता दिखाते हैं। वह उसे जल्दबाजी में फैसले लेने के बजाय धैर्य रखने की सीख देते हैं। गुरु का काम हर सवाल का जवाब देना ही नहीं होता। कई बार वह ऐसा सवाल पूछते हैं, जिससे शिष्य खुद जवाब खोजने की कोशिश करे। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे आत्मज्ञान की ओर ले जाती है।</p><p><h2>गुरु हमें अपने भीतर देखना सिखाते हैं</h2></p><p>आध्यात्मिकता हमें अपने मन और विचारों को समझने की सीख देती है जिसमें गुरु की भूमिका अहम होती है। गुरु बताते हैं कि मन को समझे बिना सच्ची शांति पाना मुश्किल है। जब इंसान अपने विचारों, इच्छाओं और भावनाओं को समझना शुरू करता है, तो उसके भीतर धीरे-धीरे बदलाव आने लगता है। यही वजह है कि गुरु को आध्यात्मिक यात्रा का मार्गदर्शक कहा जाता है।</p><p><h2>भरोसे पर टिका होता है गुरु-शिष्य का रिश्ता</h2> </p><p>गुरु और शिष्य का रिश्ता सिर्फ ज्ञान लेने-देने का रिश्ता नहीं है। इसमें विश्वास, सम्मान और समर्पण की भावना भी जुड़ी होती है। शिष्य गुरु की सीख को अपने जीवन में उतारने की कोशिश करता है और गुरु उसे सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। सच्ची आध्यात्मिक शिक्षा व्यक्ति को समझदार और विवेकशील बनाती है। एक अच्छा गुरु अंधविश्वास बढ़ाने के बजाय सही और गलत के बीच फर्क समझने की क्षमता विकसित करता है।</p><p><h2>सच्चे गुरु की पहचान क्या है</h2></p><p>किसी को गुरु मानने से पहले समझदारी बेहद जरूरी है। सच्चा गुरु वही माना जा सकता है जो अपने शिष्य में डर पैदा करने के बजाय समझ और आत्मविश्वास पैदा करे। जो व्यक्ति को अपने ऊपर निर्भर बनाने के बजाय उसे अपने विवेक से जीवन जीना सिखाए। गुरु की पहचान सिर्फ उनके चमत्कारों या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उनकी सीख और उनके आचरण से होनी चाहिए।</p><p><h2>गुरु का महत्व आखिर क्यों है</h2></p><p>आज के बदलते समय में इंटरनेट पर कुछ ही सेकंड में हजारों आध्यात्मिक बातें पढ़ी और जानी जा सकती हैं। फिर भी गुरु की जरूरत खत्म नहीं हुई है। जानकारी और अनुभव में फर्क होता है इस बात को जानना बेहद जरूरी है। अगर आप खुदको जानने के रास्ते पर चल रहे हैं तो उस समय आने वाली उलझनों को समझने में अनुभवी मार्गदर्शन काफी मददगार हो सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156043093</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 18:47:21 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: कृष्ण की भक्ति में पूजा से ज्यादा जरूरी क्यों है प्रेम? समझिए गहरी बात ]]></title><description><![CDATA[ Krishna Bhakti: कृष्ण भक्ति का सबसे सुंदर रूप यही है कि हम भगवान को दूर बैठी कोई शक्ति न समझें, बल्कि अपने सबसे करीब महसूस करें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-krishna-bhakti-krishna-janmashtami-devotion-to-krishna-article-156043093 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156043092,thumbsize-189177,width-1280,height-720,resizemode-75/156043092.jpg" alt="janmashtami 2026 krishna bhakti krishna janmashtami devotion to krishna" /></div><p><strong>Krishna Bhakti: </strong>जन्माष्टमी के पावन मौके पर भक्त भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं। कोई व्रत रखता है, कोई पूजा की तैयारी करता है तो कोई लड्डू गोपाल को नए कपड़े पहनाकर उनका श्रृंगार करता है। इस पूरे उत्सव के बीच एक सवाल मन में जरूर आता है- क्या कृष्ण की पूजा करना ही भक्ति है या फिर उनसे प्रेम करना उससे भी आगे की बात है?</p><p>हम अक्सर भगवान की पूजा एक उम्मीद के साथ करते हैं। मन में कोई इच्छा होती है तो हम प्रार्थना करते हैं कि भगवान उसे पूरा कर दें। परीक्षा अच्छी हो जाए, नौकरी मिल जाए, घर में सुख-शांति बनी रहे या कोई परेशानी दूर हो जाए। लेकिन कृष्ण भक्ति का भाव शायद इससे कहीं ज्यादा गहरा है। यहां बात सिर्फ भगवान से कुछ मांगने की नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन का हिस्सा मानने की है।</p><p>कृष्ण की सबसे खास बात यही है कि वे सिर्फ पूजे जाने वाले भगवान नहीं हैं। वे किसी के बेटे हैं, किसी के सखा हैं, किसी के प्रिय हैं और किसी के लिए नटखट कान्हा। यशोदा मैया ने उन्हें सिर्फ भगवान मानकर नहीं देखा था। उन्होंने कान्हा को दुलार दिया, डांटा, उनके पीछे भागीं और उनकी शरारतों पर कभी हंसीं तो कभी नाराज भी हुईं। यही कृष्ण के साथ रिश्ते की खूबसूरती है।</p><p>जब हम कृष्ण को सिर्फ एक भगवान मानकर दूर से हाथ जोड़ते हैं, तब हमारे और उनके बीच एक दूरी बनी रहती है। लेकिन जब हम उन्हें अपना मानने लगते हैं, तब भक्ति का रंग बदल जाता है। फिर पूजा केवल पूजा की थाली, दीपक और अगरबत्ती तक सीमित नहीं रहती। रोजमर्रा की जिंदगी में भी कृष्ण याद आने लगते हैं।</p><p>कई आध्यात्मिक शिक्षक भी भक्ति में इसी भाव को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि भगवान के साथ रिश्ता किसी लेन-देन जैसा नहीं होना चाहिए। यानी मैंने इतना व्रत रखा, इतनी पूजा की, इसलिए भगवान मुझे यह दे दें। सच्ची भक्ति में धीरे-धीरे यह हिसाब खत्म होने लगता है। वहां इंसान भगवान से सिर्फ मांगता नहीं, बल्कि उन पर भरोसा करना भी सीखता है।</p><p>कृष्ण से प्रेम करने का मतलब यह नहीं कि आप पूजा-पाठ छोड़ दें। पूजा भी भक्ति का ही एक सुंदर रास्ता है। फर्क सिर्फ भावना का है। अगर पूजा करते समय मन में कृष्ण के लिए अपनापन है, उनके प्रति प्रेम है और यह एहसास है कि वे हमारे सुख-दुख में हमारे साथ हैं, तो वही पूजा धीरे-धीरे प्रेम भक्ति में बदलने लगती है।</p><p>जन्माष्टमी पर जब आप आधी रात को कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएं, तो एक बार खुद से जरूर पूछिए- क्या मैं कृष्ण से सिर्फ अपनी इच्छाएं पूरी करवाने के लिए जुड़ा हूं या उन्हें सच में अपने जीवन का हिस्सा मानता हूं? जब कृष्ण से रिश्ता मांगने से ज्यादा प्रेम करने का हो जाता है, तब भक्ति सिर्फ एक रस्म नहीं रहती, बल्कि जीवन जीने का एक खूबसूरत तरीका बन जाती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156042557</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 17:59:20 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कौन हैं मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान... गाने वाले सुनील लोधी, कभी पेट भरने के लिए ट्रेन में गाते थे भजन ]]></title><description><![CDATA[ Who Is Sunil Lodhi: फिल्म हनुमान अंश का गाना 'तेरे ही भरोसे हनुमान...' दर्शकों को खूब पसंद आ रहा है। इस गाने को नेत्रहीन गायक सुनील लोधी ने अपनी आवाज दी है। चलिए जानें सुनील लोधी कौन हैं और वो यहां तक कैसे पहुंचे। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/sunil-lodhi-kaun-hai-who-is-the-singer-of-maine-tere-hi-bharose-hanuman-ansh-movie-article-156042557 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156042587,thumbsize-111651,width-1280,height-720,resizemode-75/156042587.jpg" alt="sunil lodhi kaun hai who is the singer of maine tere hi bharose hanuman ansh movie" /></div><p><strong>Hanuman Ansh Movie Singer:</strong> प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु नीम करोली बाबा के जीवन और चमत्कारों पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' की चर्चा इस समय हर जगह हो रही है। इसी के साथ फिल्म का गाना 'तेरे ही भरोसे हनुमान...' और इस गाने के गायक सुनील लोधी भी दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। सुनील लोधी नेत्रहीन हैं। वो कभी स्कूल नहीं गए और न ही उनके पास जीवन में सुख-सुविधाओं के पर्याप्त साधन थे, बावजूद इसके उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी मेहनत और सुरों के दम पर एक खास मुकाम हासिल किया। चलिए जानते हैं हनुमान अंश के स्टार सिंगर सुनील लोधी के संघर्ष से सफलता तक के सफर के बारे में।</p><p><h2><strong>सुनील की बचपन से ही नहीं थी आंखों की रोशनी</p><p></strong></h2></p><p>सुनील लोधी का जन्म मध्य प्रदेश के सागर जिले में एक छोटे से गांव में हुआ। वो एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता महेन्द्र सिंह लोधी एक किसान हैं, जबकि माता श्रीमती भाग बाई गृहिणी हैं। बचपन से ही सुनील की आंखों की रोशनी नहीं थी, जिसके कारण वो कभी स्कूल नहीं गए और न ही सामान्य शिक्षा प्राप्त की।</p><p><h2><strong>सुनील ट्रेनों में गाया करते थे भजन</p><p></strong></h2>सुनील को बचपन से ही संगीत से खास लगाव था। वो तमूरा (एक पारंपरिक वाद्य) को अपने हाथ में लेकर भजन और बुंदेली लोकगीत गाया करते थे। शुरुआत में वो अलग-अलग गांवों में घूमकर भजन गाया करते थे, लेकिन धीरे-धीरे ट्रेनों में गाना शुरू कर दिया। वो कटोरा लेकर ट्रेन के डिब्बों में घूमते और देवी-देवताओं के भजन गाते। यात्रियों के दान से ही वो अपना और अपने परिवार वालों का खर्चा चलाते थे। इसके अलावा सुनील ने गांव के छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी गाना शुरू कर दिया, जिससे कुछ कमाई हो सके।</p><p><h2><strong>सुनील का ये भजन हुआ था वायरल</p><p></strong></h2></p><p>साल 2019 में सुनील की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई जब उनकी मुलाकात एक यूट्यूबर और स्थानीय संगीत प्रेमी से हुई। उन्होंने सुनील के भजन को रिकॉर्ड करना शुरू किया, जिसमें से 'मोरे संकट के कटैया हनुमान...' भजन सोशल मीडिया पर कुछ ही समय में बहुत तेजी से वायरल हो गया। इस भजन पर लोग इंस्टाग्राम और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर रील्स बनाने लगे, जिसके बाद सुनील को भी सिंगर के तौर पर एक अलग पहचान मिली।</p><p>वायरल होते-होते सुनील का ये भजन निर्माता पंकज वीआरके के पास पहुंचा। उन्होंने सुनील को मुंबई बुलाया और एक अन्य भजन रिकॉर्ड करवाया। उस समय तक सुनील को नहीं पता था कि वो भजन किस फिल्म के लिए रिकॉर्ड कर रहे हैं।</p><p><h2><strong>निर्देशक विशाल चतुर्वेदी को भी पसंद आए सुनील के भजन</p><p></strong></h2></p><p>इसके बाद फिल्म हनुमान अंश के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी का ध्यान सुनील के भजनों की तरफ गया। उन्होंने सुनील के बहुत सारे भजन सुने, जिनमें से 'मैंने तेरे ही भरोसे हनुमान, सागर में नैया डार दई....' भजन को अपनी फिल्म हनुमान अंश में शामिल करने का फैसला किया। बता दें कि इस समय दर्शक विशाल चतुर्वेदी की फिल्म हनुमान अंश और उसके भजन को काफी प्यार दे रहे हैं। इसके अलावा सुनील के पुराने भजन भी सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156041818</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 15:22:41 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: कान्हा के पीले वस्त्र का क्या है राज? जन्माष्टमी पर जानें पीतांबर का महत्व ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भक्तों में पीले रंग के कपड़े पहनने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। आइए जानते हैं इसके पीछे का कारण। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-why-krishna-wears-yellow-article-156041818 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156041817,thumbsize-246301,width-1280,height-720,resizemode-75/156041817.jpg" alt="janmashtami 2026 why krishna wears yellow" /></div><p><strong>Janmashtami 2026: </strong>जन्माष्टमी के पावन पर्व पर कहीं लड्डू गोपाल के लिए नई पोशाक आती है तो कहीं उनके झूले को सजाया जाता है। गौर करने वाली बात ये है कि भक्त इस दिन पूजा-पाठ के साथ ही अपने पहनावे का भी खास ध्यान रखते हैं। जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami) पर पीले रंग के कपड़े पहनने की परंपरा काफी लोकप्रिय है। क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर कान्हा के वस्त्रों का रंग पीला ही क्यों माना जाता है और इस दिन ज्यादातर भक्त पीले कपड़े क्यों पहनते हैं? आइए जानते हैं इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और क्या है इसका महत्व।</p><p><h2>भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा जताने का तरीका</h2></p><p>पीताम्बर दो शब्दों से मिलकर बना है- 'पीत' यानी पीला और 'अम्बर' यानी वस्त्र। इसलिए पीताम्बर का अर्थ हुआ पीले रंग के वस्त्र धारण करने वाला। भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीरों और मूर्तियों में अक्सर उन्हें पीली धोती या पीले वस्त्र पहने हुए दिखाया जाता है। इसी वजह से उन्हें पीताम्बरधारी भी कहा जाता है। जन्माष्टमी पर भक्त भगवान कृष्ण को पीले वस्त्र पहनाते हैं और खुद भी पीले रंग के कपड़े पहनकर पूजा करते हैं। इसे भगवान के प्रति प्रेम और श्रद्धा जताने का एक तरीका माना जाता है।</p><p><h2>श्रीकृष्ण से जुड़ा है पीला रंग</h2></p><p>हिंदू धार्मिक परंपराओं में पीले रंग को काफी शुभ माना गया है। भगवान कृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है और विष्णु जी के स्वरूप में भी पीले वस्त्रों का विशेष उल्लेख मिलता है। पीला रंग प्रकृति में प्रकाश और ऊर्जा का एहसास भी कराता है। यही वजह है कि पूजा और धार्मिक आयोजनों में पीले रंग के कपड़े, फूल और दूसरी चीजों का इस्तेमाल देखने को मिलता है। यह रंग ज्ञान, सकारात्मकता, पवित्रता और आध्यात्मिकता से जोड़ा जाता है। </p><p><h2>जन्माष्टमी पर पीले कपड़े पहनने की मान्यता</h2></p><p>मान्यता है कि जन्माष्टमी के पावन दिन भगवान कृष्ण के प्रिय रंग को पहनकर उनकी पूजा करने से भक्त का मन भगवान के प्रति भक्ति में अधिक जुड़ता है। इसके अलावा जन्माष्टमी के मौके पर कृष्ण से जुड़े दूसरे रंगों को भी पसंद किया जाता है। नीला रंग भगवान कृष्ण की विशालता और दिव्यता से जोड़ा जाता है। वहीं हरा रंग वृंदावन की हरियाली और प्रकृति की याद दिलाता है।</p><p><h2>जन्माष्टमी पर पीताम्बर पहनने का असली संदेश</h2></p><p>कृष्ण जन्माष्टमी पर पीला रंग पहनने की परंपरा को केवल कपड़ों तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। इसके पीछे भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम, श्रद्धा और उनकी शिक्षाओं को जीवन में उतारने की भावना भी जुड़ी है। इस दिन अगर आप पीले कपड़े पहनकर कान्हा की पूजा करते हैं तो इसे अपनी आस्था के प्रतीक के रूप में देख सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156041035</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 13:26:20 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Gajendra Moksha: संकट से तुरंत मुक्ति के लिए करें गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का पाठ, पढ़ें इसकी कथा, पाठ और महत्व ]]></title><description><![CDATA[ Gajendra Moksha: गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र भगवान विष्णु की शरणागति और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण में वर्णित गजेंद्र की कथा सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विश्वास और ईश्वर का स्मरण मनुष्य को संबल देता है। आगे पढ़ें गजेंद्र संपूर्ण मोक्ष स्तोत्र अर्थ सहित... ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/gajendra-moksha-stotram-lyrics-and-meaning-in-hindi-article-156041035 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156041204,thumbsize-1075719,width-1280,height-720,resizemode-75/156041204.jpg" alt="gajendra moksha stotram lyrics and meaning in hindi" /></div><p><strong>Gajendra Moksha: </strong>हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विष्णु की भक्ति और शरणागति से जुड़े अनेक स्तोत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र की कथा बेहद भावपूर्ण है। यह केवल एक हाथी और मगरमच्छ के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस क्षण की कथा है जब अपनी पूरी शक्ति समाप्त होने के बाद गजेंद्र ने स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान का स्मरण करने पर भक्त को कठिन परिस्थितियों में भी आशा और संबल मिलता है।</p><p>गजेंद्र मोक्ष का मूल प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में आता है। दूसरे अध्याय में गजेंद्र के संकट का वर्णन है, जबकि तीसरे अध्याय में उसकी भगवान विष्णु के प्रति प्रार्थना और उसके बाद भगवान द्वारा उद्धार का प्रसंग मिलता है। अध्याय 3 में 33 श्लोक हैं। आगे पढ़ें गजेंद्र संपूर्ण मोक्ष स्तोत्र <strong>(Gajendra Moksha Stotram Lyrics)</strong> अर्थ सहित....</p><p><h2>गजेंद्र मोक्ष का पाठ - Gajendra Moksha Stotram Lyrics</h2></p><p><strong>1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय</strong></p><p>ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम।</p><p>पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> गजेंद्र भगवान श्रीहरि का ध्यान करते हुए कहते हैं मैं उन परम शक्तिशाली भगवान को नमन करता हूं, जिनके कारण शरीर और मन में चेतना का संचार होता है। जो समस्त सृष्टि के आदि कारण और हर जीव के भीतर चेतना के रूप में विद्यमान हैं, मैं उन्हीं परमेश्वर का स्मरण करता हूं।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/lord-krishna-motivational-quotes-in-hindi-bhagwan-shri-krishna-ke-anmol-vachan-article-156040317" data-type="tilCustomLink" target="_blank">जन्माष्टमी पर पढ़ें श्री कृष्ण के ये जीवन बदलने वाले विचार</a></p><p></strong></p><p><strong>2.</strong></p><p>यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं।</p><p>योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> गजेंद्र कहते हैं, मैं उन स्वयंभू भगवान की शरण लेता हूं, जिनके आधार पर यह पूरा संसार टिका है और जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है। जिन्होंने प्रकृति की रचना की और स्वयं उससे परे रहते हुए भी हर जगह मौजूद हैं, ऐसे सर्वोच्च परमात्मा को मैं नमन करता हूं।</p><p><strong>3.</strong></p><p>यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम।</p><p>अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षतेस आत्ममूलोवतु मां परात्परः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो भगवान अपनी माया से इस संसार को कभी प्रकट और कभी अप्रकट करते हैं, लेकिन स्वयं इन सभी परिवर्तनों के साक्षी बने रहते हैं और उनसे प्रभावित नहीं होते, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें।</p><p><strong>4.</strong></p><p>कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु।</p><p>तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरंयस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः।।</p><p><strong>अर्थ:</strong> जब समय के साथ समस्त लोक और उनके रक्षक पंचतत्वों में विलीन हो जाते हैं तथा सृष्टि के सभी कारण प्रकृति में समा जाते हैं, तब केवल गहरा अंधकार रह जाता है। उस अंधकार से परे अपने परम धाम में प्रकाशित होने वाले सर्वव्यापी भगवान मेरी रक्षा करें।</p><p><strong>5.</strong></p><p>न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम।</p><p>यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतोदुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिनके वास्तविक स्वरूप को देवता और ऋषि भी पूरी तरह नहीं जान पाते, उन्हें एक सामान्य जीव कैसे समझ या वर्णित कर सकता है? जैसे अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेता का वास्तविक रूप पहचानना कठिन होता है, वैसे ही भगवान की वास्तविक महिमा समझना भी अत्यंत कठिन है। ऐसे अगम्य स्वरूप वाले प्रभु मेरी रक्षा करें।</p><p><strong>6.</strong></p><p>दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलमविमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः।</p><p>चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वनेभूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिन परमात्मा के मंगलमय स्वरूप का दर्शन करने की इच्छा से ऋषि-मुनि संसार से विरक्त होकर वन में रहते हैं और कठिन व्रतों का पालन करते हैं, वही परम प्रभु मेरे जीवन की अंतिम शरण और परम गति हैं।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-wishes-in-hindi-greetings-sri-krishna-janmashtmi-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-article-156039555" data-type="tilCustomLink" target="_blank">जन्माष्टमी पर भेजें ये खास शुभकामना संदेश, अपनों के साथ जरूर करें शेयर</a></p><p></strong></p><p><strong>7.</strong></p><p>न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वान नाम रूपे गुणदोष एव वा।</p><p>तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यःस्वमायया तान्युलाकमृच्छति॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> परमात्मा का हमारे समान कोई जन्म नहीं होता और न ही वे कर्मों के बंधन में बंधते हैं। उनके निर्गुण स्वरूप का कोई निश्चित नाम या रूप नहीं है। फिर भी संसार की सृष्टि और प्रलय के लिए वे अपनी माया के माध्यम से अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं।</p><p><strong>8.</strong></p><p>तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये।</p><p>अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> अनंत शक्तियों से संपन्न उस परम ब्रह्म परमेश्वर को मेरा प्रणाम है। जो मूल रूप से निराकार हैं, फिर भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं और जिनकी लीलाएं अद्भुत हैं, ऐसे भगवान को बार-बार नमन है।</p><p><strong>9.</strong></p><p>नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने।</p><p>नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो स्वयं प्रकाशमान हैं, सबके साक्षी और परमात्मा हैं, उन्हें मेरा शत-शत प्रणाम। जो वाणी, मन और चित्त की सामान्य सीमाओं से परे हैं, उन परमेश्वर को मेरा बार-बार नमन है।</p><p><strong>10.</strong></p><p>सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता।</p><p>नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो विवेकशील और निष्काम भाव से साधना करने वाले भक्तों को प्राप्त होते हैं तथा मोक्ष के आनंद का अनुभव कराते हैं, उन परम भगवान को मेरा नमन है। वे ही कैवल्य और मुक्ति के स्वामी हैं।</p><p><strong>11.</strong></p><p>नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे।</p><p>निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों के आधार हैं, फिर भी इन गुणों से परे हैं; जो शांत स्वरूप, ज्ञान के सघन स्वरूप और समभाव वाले परमात्मा हैं, उन्हें मेरा प्रणाम है।</p><p><strong>12.</strong></p><p>क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।</p><p>पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः॥</p><p><strong>अर्थ: </strong>हे प्रभु! आप सभी शरीरों के ज्ञाता, सबके स्वामी और साक्षी हैं। आप सभी जीवों के अंतर्यामी हैं और प्रकृति के मूल कारण हैं, जबकि आपका स्वयं कोई दूसरा कारण नहीं है। ऐसे परमेश्वर को मेरा शत-शत नमन है।</p><p><strong>13.</strong></p><p>सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे।</p><p>असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो सभी इंद्रियों और उनके विषयों के ज्ञाता हैं, हर प्रकार की अनुभूति के मूल कारण हैं और इस जड़ संसार के पीछे विद्यमान चेतना के आधार हैं, उन भगवान को मेरा प्रणाम है।</p><p><strong>14.</strong></p><p>नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय।</p><p>सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> हे प्रभु! आप समस्त सृष्टि के कारण हैं, लेकिन स्वयं किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुए। आप सभी कारणों से भी विलक्षण और अद्भुत हैं। वेद-शास्त्र जिनके परम सत्य की ओर संकेत करते हैं, ऐसे मोक्षस्वरूप और श्रेष्ठ परम आश्रय भगवान को बार-बार प्रणाम है।</p><p><strong>15.</strong></p><p>गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपायतत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय।</p><p>नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो त्रिगुणों के भीतर छिपी ज्ञानरूपी अग्नि के समान हैं और जिनकी शक्ति से सृष्टि की गतिविधियां आरंभ होती हैं, उन स्वयं प्रकाशित भगवान को मेरा प्रणाम है। जो आत्मज्ञान के माध्यम से कर्मों के बंधन और शास्त्रों के विधि-निषेध से भी ऊपर उठने का मार्ग दिखाते हैं, उन्हें नमन है।</p><p><strong>16.</strong></p><p>मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।</p><p>स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> मेरे जैसे शरणागत जीवों को अज्ञान और बंधनों से मुक्त करने वाले, अत्यंत दयालु और करुणामय भगवान को मेरा प्रणाम है। जो अपने अंश के रूप में सभी जीवों के मन में अंतर्यामी बनकर विद्यमान हैं और सबका मार्गदर्शन करते हैं, उन अनंत परमात्मा को मेरा नमन है।</p><p><strong>17.</strong></p><p>आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय।</p><p>मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो शरीर, संतान, मित्र, घर, धन और परिवार के मोह में बंधे लोगों के लिए कठिनाई से प्राप्त होते हैं, लेकिन मुक्त आत्माओं द्वारा हृदय में निरंतर अनुभव किए जाते हैं, उन ज्ञानस्वरूप सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मेरा प्रणाम है।</p><p><strong>18.</strong></p><p>यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामाभजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।</p><p>किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययंकरोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम्॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिन भगवान की उपासना करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे अपने इच्छित पुरुषार्थ प्राप्त करने की कामना करता है, वे भक्तों को अनेक प्रकार के वरदान देने में समर्थ हैं। ऐसे दयालु प्रभु मुझे इस संकट और बंधन से स्थायी मुक्ति प्रदान करें।</p><p><strong>19.</strong></p><p>एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थवांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।</p><p>अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलंगायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जो भक्त पूरी तरह भगवान की शरण में आ जाते हैं, वे सांसारिक वस्तुओं की इच्छा नहीं रखते। वे भगवान के अत्यंत अद्भुत और मंगलमय चरित्र का गुणगान करते हुए भक्ति के आनंद में डूबे रहते हैं।</p><p><strong>20.</strong></p><p>तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।</p><p>अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> मैं उन अविनाशी और परम ब्रह्म की स्तुति करता हूं, जो इंद्रियों की पहुंच से परे हैं, अत्यंत सूक्ष्म हैं और भक्तियोग के माध्यम से अनुभव किए जा सकते हैं। वे अनंत, आदि और हर प्रकार से पूर्ण परमात्मा हैं।</p><p><strong>21.</strong></p><p>यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः।</p><p>नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिन परमात्मा की शक्ति के छोटे से अंश से ब्रह्मा सहित सभी देवता, चारों वेद तथा संसार के समस्त चर-अचर जीव नाम और रूप के भेद के साथ अस्तित्व में आए हैं, मैं उन्हीं भगवान को नमन करता हूं।</p><p><strong>22.</strong></p><p>यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयोनिर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः।</p><p>तथा यतोयं गुणसंप्रवाहोबुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिस तरह अग्नि की लपटें और सूर्य की किरणें अपने मूल स्रोत से निकलकर फिर उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इंद्रियां और विभिन्न शरीर परमात्मा से उत्पन्न होकर अंततः उसी में समा जाते हैं।</p><p><strong>23.</strong></p><p>स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंगन स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः।</p><p>नायं गुणः कर्म न सन्न चासननिषेधशेषो जयतादशेषः॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> भगवान न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य और न किसी अन्य योनि के जीव। वे न स्त्री हैं, न पुरुष और न ही नपुंसक। वे न गुण हैं, न कर्म और न कार्य-कारण के सामान्य बंधन में आते हैं। इन सभी सीमाओं से परे जो परम सत्य है, वही भगवान का वास्तविक स्वरूप है। ऐसे प्रभु मेरी रक्षा करें।</p><p><strong>24.</strong></p><p>जिजीविषे नाहमिहामुया कि मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।</p><p>इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> गजेंद्र कहते हैं - अब मैं केवल इस हाथी के शरीर के साथ जीवित रहने की इच्छा नहीं रखता। मैं उस अज्ञान के आवरण से मुक्त होना चाहता हूं, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढक देता है और जिसे केवल समय बीतने से दूर नहीं किया जा सकता।</p><p><strong>25.</strong></p><p>सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम।</p><p>विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> मैं उस परम भगवान की शरण में जाता हूं, जो संसार के रचयिता हैं, स्वयं संसार में व्याप्त हैं और फिर भी संसार से परे हैं। वे अजन्मा, सर्वव्यापी और सभी प्राप्त करने योग्य वस्तुओं में सर्वोच्च परम पद हैं।</p><p><strong>26.</strong></p><p>योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते।</p><p>योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> जिन योगेश्वर भगवान को योगी अपने शुद्ध हृदय में योग के माध्यम से अनुभव करते हैं और जिनकी शक्ति से कर्मों के बंधन समाप्त हो जाते हैं, उन परम योगेश्वर को मैं नमन करता हूं।</p><p><strong>27.</strong></p><p>नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।</p><p>प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> हे प्रभु! आपकी तीनों शक्तियां अत्यंत प्रबल हैं और आपकी महिमा इंद्रियों की सामान्य सीमा से परे है। आप शरण में आए भक्तों की रक्षा करने वाले और अनंत शक्ति से संपन्न हैं। ऐसे परमेश्वर को मेरा बार-बार प्रणाम है।</p><p><strong>28.</strong></p><p>नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम।</p><p>तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम॥</p><p><strong>अर्थ:</strong> अज्ञान और अहंकार की शक्ति से ढका हुआ जीव स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप को भी ठीक से नहीं पहचान पाता। ऐसे अपार महिमा वाले भगवान को मैं अपनी शरण मानता हूं और उन्हें नमन करता हूं।</p><p><strong>गजेंद्र को मिला वरदान</strong> </p><p>गजेंद्र की प्रार्थना समाप्त होते ही भगवान विष्णु उसकी पुकार सुनकर गरुड़ पर सवार होकर वहां पहुंचते हैं। श्रीमद्भागवत के वर्णन के अनुसार भगवान चक्र धारण किए हुए गजेंद्र के पास आते हैं। गजेंद्र भगवान को देखकर अपनी सूंड में उठाए कमल को उनकी ओर अर्पित करता है और उन्हें प्रणाम करता है। इसके बाद भगवान विष्णु गजेंद्र को मगरमच्छ के बंधन से मुक्त करते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156040825</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 13:16:14 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: छोटे बच्चों को क्या 12 बजे कान्हा का जन्म दिखाना चाहिए? जानें नियम ]]></title><description><![CDATA[ Krishna Janmashtami 2026 Today: जन्माष्टमी की रात ठीक 12 बजे श्रीकृष्ण के जन्म की परंपरा निभाई जाती है। घर के छोटे बच्चों को क्या ये परंपरा दिखानी चाहिए? चलिए, इस बारे में जानते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-today-chote-baccho-ko-kanha-ka-janm-dikhaye-ya-nhi-article-156040825 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156040829,thumbsize-165817,width-1280,height-720,resizemode-75/156040829.jpg" alt="krishna janmashtami 2026 today chote baccho ko kanha ka janm dikhaye ya nhi" /></div><p><strong>Janmashtami 2026 Today:</strong> आज 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ देशभर में मनाया जा रहा है। इस दिन भक्तजन लड्डू गोपाल की विशेष रूप से पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण जी का जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि यानी रात 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इसी कारण से हर साल जन्माष्टमी की रात 12 बजे खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक मानकर सिक्के से काटा जाता है, जो दर्शाता है कि श्रीकृष्ण ने गर्भ से बाहर आकर संसार में प्रवेश किया है। इसके बाद उन्हें पंचामृत से स्नान कराया जाता है। वस्त्र पहनाकर श्रृंगार किया जाता है, जिसके बाद विधि-विधान से पूजा होती है। साथ ही लड्डू गोपाल को झूला झुलाया जाता है। </p><p>चलिए जानते हैं छोटे बच्चों को ये पूरी परंपरा दिखानी चाहिए या नहीं और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत से जुड़े नियम क्या हैं।</p><p><h2><strong>छोटे बच्चों को रात 12 बजे जगाएं या सुलाएं?</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छोटे बच्चों को जगाकर रात 12 बजे कान्हा का जन्म दिखाना आवश्यक नहीं है। यदि वो जगे हुए हैं तो आप उन्हें कृष्ण जी के जन्म की पूजा दिखा सकते हैं। धर्म कभी भी बच्चों की सेहत या नींद की कीमत पर भगवान के किसी उत्सव में शामिल होने की जिद नहीं करता है। भगवान केवल भाव के भूखे होते हैं, इसलिए बच्चों को जबरदस्ती जगाना ठीक नहीं है। आप बच्चों को जन्माष्टमी के अगले दिन सुबह स्नान कराकर कान्हा के दर्शन करवा सकते हैं। यदि आप आधी रात को जबरदस्ती उन्हें जगाएंगे तो इससे उनकी नींद खराब होगी। ऐसे में चिड़चिड़े हो सकते हैं।</p><p><h2><strong></p><p></strong></h2><h2>बच्चों को जन्माष्टमी का व्रत रखना चाहिए या नहीं?</p><p></h2></p><p>शास्त्रों में बताया गया है कि छोटे बच्चों को जन्माष्टमी का निर्जला उपवास रखने से बचना चाहिए। यदि जिद्द करके वो निर्जला व्रत रख भी लेते हैं और उसे पूरा नहीं कर पाते हैं तो उन्हें पाप लग सकता है। अगर बच्चा उपवास रखने की बहुत ज्यादा जिद्द करता है तो उसे फलाहार व्रत रखने दें, जिसमें दूध, फल, मखाना, अरबी की सब्जी, साबूदाना की खिचड़ी, ड्राई फ्रूट्स, समा के चावल, पनीर, मलाई और कुट्टू के आटे की पूड़ी जैसी चीजें खाई जा सकती हैं।</p><p><h2><strong>जन्माष्टमी पर कृष्ण जी को सबसे पहले क्या भोग लगाएं?</p><p></strong></h2></p><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जन्माष्टमी की रात कृष्ण जी का श्रृंगार करने के बाद उन्हें सबसे पहले चरणामृत या पंचामृत का भोग लगाना चाहिए। इसके बाद माखन-मिश्री और धनिया पंजीरी का भोग लगाएं। हालांकि, कुछ जगहों पर कृष्ण जी को सबसे पहले शहद की घुट्टी चटाने की परंपरा है। बता दें कि कृष्ण जी के प्रत्येक भोग में तुलसी का पत्ता होना चाहिए क्योंकि इसके बिना वो भोग स्वीकार नहीं करते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156040317</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 11:03:37 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Lord Krishna Motivational Quotes: क्या आप भी सफलता की तलाश में हैं? आज जन्माष्टमी पर पढ़ें श्री कृष्ण के ये जीवन बदलने वाले विचार ]]></title><description><![CDATA[ Lord Krishna Motivational Quotes: हर समय मोटिवेटेड रहने और सफलता हासिल करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के विचारों को अपने जीवन में अपनाया जा सकता है। उन्होंने कई ऐसी बातें बताई हैं, जो किसी हारे हुए इंसान को नई ऊर्जा और प्रेरणा से भर सकती हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/lord-krishna-motivational-quotes-in-hindi-bhagwan-shri-krishna-ke-anmol-vachan-article-156040317 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156040352,thumbsize-147649,width-1280,height-720,resizemode-75/156040352.jpg" alt="lord krishna motivational quotes in hindi bhagwan shri krishna ke anmol vachan" /></div><p><strong>Lord Krishna Motivational Quotes In Hindi:</strong> आज 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को जन्माष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। हिंदू धर्म में जन्माष्टमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को प्रेम, करुणा, धर्म, कर्म और मित्रता का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन संघर्षों से भरा हुआ था, लेकिन उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी और न ही अपने दोस्तों व परिवार के सदस्यों को हार मानने दी। उन्होंने हर निराश व्यक्ति को जीवन में आगे बढ़ने का सही मार्ग दिखाया है। इसी वजह से उनका जीवन आज भी कई लोगों के लिए प्रेरणादायक है। माना जाता है कि उनके विचारों के साथ-साथ व्यवहार से लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है। चलिए आज जानें जन्माष्टमी के खास मौके पर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़े कुछ खास प्रेरणादायक विचारों के बारे में।</p><p><h2><strong>कर्म ही सर्वोच्च है</p><p></strong></h2>श्रीकृष्ण ने बताया था कि कर्म ही सर्वोच्च होता है यानी कर्म से बड़ा कुछ भी नहीं है। इसलिए हर व्यक्ति को अच्छे कर्म करने चाहिए। कभी कोई ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए, जिसका पछतावा जीवनभर रहे।</p><p><h2><strong>परिवर्तन ही सत्य है</p><p></strong></h2>भगवान कृष्ण का मानना था कि परिवर्तन ही संसार का सबसे बड़ा सत्य है। जो व्यक्ति समय के साथ खुद को नहीं बदलता है वो पीछे रह जाता है। खासकर, सफलता हासिल करने के लिए परिवर्तन को स्वीकार करना बहुत जरूरी है।</p><p><h2><strong>मृत्यु है कटु सत्य</p><p></strong></h2>भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में बताया है कि मृत्यु एक अटल सत्य है। जिस-जिस व्यक्ति का पृथ्वी पर जन्म हुआ है, उसका मरना (मृत्यु होना) तय है। इसलिए मृत्यु को लेकर कभी भी परेशान नहीं होना चाहिए। </p><p><h2>सत्य से बड़ा कुछ नहीं</p><p></h2>भगवान कृष्ण ने द्वापर युग में कई बार लोगों को समझाया है कि सत्य से बड़ा कुछ नहीं है। जो व्यक्ति सत्य बोलता है और इसकी (सत्य) राह पर चलता है, उसे स्वर्ग अवश्य मिलता है। साथ ही उसका जीवन खुशियों से भरा रहता है।</p><p><h2><strong>मोह है सबसे बड़ी कमजोरी</p><p></strong></h2>भगवान कृष्‍ण ने पांडवों को कई बार समझाया था कि व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी मोह है। जो व्यक्ति मोह के जाल में फंस जाता है, वो कभी खुश नहीं रहता है। खासकर, भौतिक चीजों से मोह रखने से नुकसान होता है और ये वस्तुएं सफलता की राह में रोड़ा बनती हैं।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <sub><a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-wishes-in-hindi-greetings-sri-krishna-janmashtmi-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-article-156039555" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>जन्माष्टमी पर भेजें ये खास शुभकामना संदेश, अपनों के साथ जरूर करें शेयर</strong></a></sub> </p><p><h2><strong>मुश्किल समय में याद रखें ये बातें</p><p></strong></h2></p><p><ul><li>परेशानियों से भागने की जगह उनका सामना करना ही एक सच्चे इंसान की पहचान है।</li><li>मुश्किल समय में अपनी कमजोरियों से ज्यादा खूबियों पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि ये व्यक्ति की ताकत बन सकती हैं।</li><li>मुश्किल समय में दूसरों से ज्यादा खुद पर भरोसा रखना जरूरी है क्योंकि यही व्यक्ति को परेशानियों से निकलने में मदद करता है।</li></ul></p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156039706</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 08:34:45 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Shri Krishna Chalisa: जन्माष्टमी 2026 पर पढ़ें श्री कृष्ण चालीसा के लिरिक्स, 'बंशी शोभित कर मधुर, नील जलद तन श्याम'... ]]></title><description><![CDATA[ Shri Krishna Chalisa in Hindi: जन्माष्टमी के पावन पर्व पर विधि-विधान से लड्डू गोपाल की पूजा होती है। आज 4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। यहां पढ़ें श्री कृष्ण चालीसा के संपूर्ण लिरिक्स हिंदी में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/shri-krishna-chalisa-janmashtami-2026-read-lord-krishna-chalisa-lyrics-in-hindi-article-156039706 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156039705,thumbsize-361623,width-1280,height-720,resizemode-75/156039705.jpg" alt="shri krishna chalisa janmashtami 2026 read lord krishna chalisa lyrics in hindi" /></div><p><strong>Shri Krishna Chalisa in Hindi, Lord Krishna Chalisa Full Text Lyrics in Hindi:</strong> जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। इस दिन देशभर में भक्त श्रद्धा और उल्लास के साथ कान्हा की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। जन्माष्टमी पर भक्त उपवास रखते हैं और रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के बाद विधि-विधान से पूजा करते हैं। आज 4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। इस दौरान लड्डू गोपाल को उनके प्रिय वस्तुओं का भोग लगाया जाता है। श्रीकृष्ण की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए भक्त भजन, मंत्र और चालीसा का पाठ भी करते हैं। यहां पढ़ें श्री कृष्ण चालीसा की पूरी लिरिक्स <strong>(Krishna Chalisa Lyrics in Hindi)</strong> हिंदी में।</p><p><strong>॥ दोहा ॥</strong></p><p>बंशी शोभित कर मधुर,नील जलद तन श्याम।</p><p>अरुण अधर जनु बिम्बा फल,पिताम्बर शुभ साज॥</p><p>जय मनमोहन मदन छवि,कृष्णचन्द्र महाराज।</p><p>करहु कृपा हे रवि तनय,राखहु जन की लाज॥</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-wishes-in-hindi-greetings-sri-krishna-janmashtmi-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-article-156039555" data-type="tilCustomLink" target="_blank">जन्माष्टमी पर भेजें ये खास शुभकामना संदेश, अपनों के साथ जरूर करें शेयर</a></p><p></strong></p><p><strong>चौपाई</strong></p><p>जय यदुनन्दन जय जगवन्दन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥</p><p>जय यशुदा सुत नन्द दुलारे।जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥</p><p>जय नट-नागर नाग नथैया।कृष्ण कन्हैया धेनु चरैया॥</p><p>पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो।आओ दीनन कष्ट निवारो॥</p><p>वंशी मधुर अधर धरी तेरी।होवे पूर्ण मनोरथ मेरो॥</p><p>आओ हरि पुनि माखन चाखो।आज लाज भारत की राखो॥</p><p>गोल कपोल, चिबुक अरुणारे।मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥</p><p>रंजित राजिव नयन विशाला।मोर मुकुट वैजयंती माला॥</p><p>कुण्डल श्रवण पीतपट आछे।कटि किंकणी काछन काछे॥</p><p>नील जलज सुन्दर तनु सोहे।छवि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥</p><p>मस्तक तिलक, अलक घुंघराले।आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥</p><p>करि पय पान, पुतनहि तारयो।अका बका कागासुर मारयो॥</p><p>मधुवन जलत अग्नि जब ज्वाला।भै शीतल, लखितहिं नन्दलाला॥</p><p>सुरपति जब ब्रज चढ़यो रिसाई।मसूर धार वारि वर्षाई॥</p><p>लगत-लगत ब्रज चहन बहायो।गोवर्धन नखधारि बचायो॥</p><p>लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई।मुख महं चौदह भुवन दिखाई॥</p><p>दुष्ट कंस अति उधम मचायो।कोटि कमल जब फूल मंगायो॥</p><p>नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें।चरणचिन्ह दै निर्भय किन्हें॥</p><p>करि गोपिन संग रास विलासा।सबकी पूरण करी अभिलाषा॥</p><p>केतिक महा असुर संहारयो।कंसहि केस पकड़ि दै मारयो॥</p><p>मात-पिता की बन्दि छुड़ाई।उग्रसेन कहं राज दिलाई॥</p><p>महि से मृतक छहों सुत लायो।मातु देवकी शोक मिटायो॥</p><p>भौमासुर मुर दैत्य संहारी।लाये षट दश सहसकुमारी॥</p><p>दै भिन्हीं तृण चीर सहारा।जरासिंधु राक्षस कहं मारा॥</p><p>असुर बकासुर आदिक मारयो।भक्तन के तब कष्ट निवारियो॥</p><p>दीन सुदामा के दुःख टारयो।तंदुल तीन मूंठ मुख डारयो॥</p><p>प्रेम के साग विदुर घर मांगे।दुर्योधन के मेवा त्यागे॥</p><p>लखि प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥</p><p>भारत के पारथ रथ हांके।लिए चक्र कर नहिं बल ताके॥</p><p>निज गीता के ज्ञान सुनाये।भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये॥</p><p>मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥</p><p>राना भेजा सांप पिटारी।शालिग्राम बने बनवारी॥</p><p>निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥</p><p>तब शत निन्दा करी तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥</p><p>जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥</p><p>तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥</p><p>अस नाथ के नाथ कन्हैया।डूबत भंवर बचावत नैया॥</p><p>सुन्दरदास आस उर धारी।दयादृष्टि कीजै बनवारी॥</p><p>नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥</p><p>खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हैया की जै॥</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- </strong><a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-bhagwan-shri-krishna-ke-108-naam-lord-krishna-108-names-in-hindi-article-156039474" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>जन्माष्टमी पर जरूर पढ़ें भगवान श्रीकृष्‍ण के 108 नाम, इनको जपने से बनेंगे सभी काम</strong></a></p><p><h2>कृष्ण चालीसा पढ़ने के लाभ</h2></p><p>श्रीकृष्ण चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। भक्तों का विश्वास है कि नियमित पाठ से भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। चालीसा का पाठ मन की एकाग्रता बढ़ाने, नकारात्मक विचारों को दूर करने और आध्यात्मिक विश्वास मजबूत करने में सहायक माना जाता है। जन्माष्टमी के दिन विशेष रूप से श्रीकृष्ण चालीसा पढ़ना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इससे घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भक्त को कठिन परिस्थितियों में धैर्य व आत्मबल मिलता है। यह पाठ श्रद्धा, भक्ति और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने वाला माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156039474</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 07:19:19 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Lord Krishna 108 Names: जन्माष्टमी पर जरूर पढ़ें भगवान श्रीकृष्‍ण के 108 नाम, इनको जपने से बनेंगे सभी काम ]]></title><description><![CDATA[ Krishna Janmashtami 2026। Lord Krishna 108 Names in Hindi (श्री कृष्‍ण जी के 108 नाम): श्री कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन कृष्ण जी के 108 नामों का जाप करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। आगे पढ़ें श्री कृष्ण के 108 नाम हिंदी में... ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-bhagwan-shri-krishna-ke-108-naam-lord-krishna-108-names-in-hindi-article-156039474 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156039468,thumbsize-1015633,width-1280,height-720,resizemode-75/156039468.jpg" alt="krishna janmashtami 2026 bhagwan shri krishna ke 108 naam lord krishna 108 names in hindi" /></div><p><strong>Krishna Janmashtami, Lord Krishna 108 Names in Hindi:</strong> भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित जन्माष्टमी का पर्व भक्तों के लिए बेहद विशेष माना जाता है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं, भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं और रात में निशीथ काल में बाल गोपाल के जन्म का उत्सव मनाते हैं। मंदिरों से लेकर घरों तक कृष्ण जन्मोत्सव की विशेष तैयारियां की जाती हैं। सनातन परंपरा में भगवान के नामों के स्मरण और जाप को विशेष महत्व दिया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और भक्तिभाव से भगवान श्रीकृष्ण के नामों का जाप करने से मन को शांति मिलती है और भक्त का ध्यान भगवान की भक्ति में केंद्रित होता है। जन्माष्टमी के अवसर पर श्रीकृष्ण के 108 नामों का स्मरण करना भी विशेष फलदायी माना जाता है।</p><p>भगवान श्रीकृष्ण के 108 नाम उनके व्यक्तित्व, बाल लीलाओं, पराक्रम, स्वरूप और विभिन्न दिव्य गुणों को दर्शाते हैं। कहीं वे यशोदा के लाड़ले कन्हैया हैं तो कहीं गोवर्धन उठाने वाले गिरधारी, कहीं भक्तों के रक्षक हैं तो कहीं अर्जुन के सारथी। आइए जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami 2026) के इस पावन अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण के 108 नामों का स्मरण करें।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-brahmand-vihari-temple-mathura-mitti-ke-pede-bhog-kha-lagya-jata-hai-article-156035760" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>मथुरा के इस मंदिर में कान्हा को लगता है मिट्टी के पेड़ों का भोग</strong></a></p><p><h2>भगवान श्री कृष्ण के 108 नाम - <strong>Lord Krishna 108 Names</strong></p><p></h2></p><p><strong>1. कृष्ण</p><p>2. कमलनाथ</p><p>3. वासुदेव</p><p>4. सनातन</p><p>5. वसुदेवात्मज</p><p>6. पुण्य</p><p>7. लीलामानुष विग्रह</p><p>8. श्रीवत्स कौस्तुभधराय</p><p>9. यशोदावत्सल</p><p>10. हरि</p><p>11. चतुर्भुजात्त चक्रासिगदा</p><p>12. सङ्खाम्बुजा युदायुजाय</p><p>13. देवाकीनन्दन</p><p>14. श्रीशाय</p><p>15. नन्दगोप प्रियात्मज</p><p>16. यमुनावेगा संहार</p><p>17. बलभद्र प्रियनुज</p><p>18. पूतना जीवित हर</p><p>19. शकटासुर भञ्जन</p><p>20. नन्दव्रज जनानन्दिन</p><p>21. सच्चिदानन्दविग्रह</p><p>22. नवनीत विलिप्ताङ्ग</p><p>23. नवनीतनटन</p><p>24. मुचुकुन्द प्रसादक</p><p>25. षोडशस्त्री सहस्रेश</p><p>26. त्रिभङ्गी</p><p>27. मधुराकृत</p><p>28. शुकवागमृताब्दीन्दवे</p><p>29. गोविन्द</p><p>30. योगीपति</p><p>31. वत्सवाटि चराय</p><p>32. अनन्त</p><p>33. धेनुकासुरभञ्जनाय</p><p>34. तृणी-कृत-तृणावर्ताय</p><p>35. यमलार्जुन भञ्जन</p><p>36. उत्तलोत्तालभेत्रे</p><p>37. तमाल श्यामल कृता</p><p>38. गोप गोपीश्वर</p><p>39. योगी</p><p>40. कोटिसूर्य समप्रभा</p><p>41. इलापति</p><p>42. परंज्योतिष</p><p>43. यादवेंद्र</p><p>44. यदूद्वहाय</p><p>45. वनमालिने</p><p>46. पीतवससे</p><p>47. पारिजातापहारकाय</p><p>48. गोवर्थनाचलोद्धर्त्रे</p><p>49. गोपाल</p><p>50. सर्वपालकाय</p><p>51. अजाय</p><p>52. निरञ्जन</p><p>53. कामजनक</p><p>54. कञ्जलोचनाय</p><p>55. मधुघ्ने</p><p>56. मथुरानाथ</p><p>57. द्वारकानायक</p><p>58. बलि</p><p>59. बृन्दावनान्त सञ्चारिणे</p><p>60. तुलसीदाम भूषनाय</p><p>61. स्यमन्तकमणेर्हर्त्रे</p><p>62. नरनारयणात्मकाय</p><p>63. कुब्जा कृष्णाम्बरधराय</p><p>64. मायिने</p><p>65. परमपुरुष</p><p>66. मुष्टिकासुर चाणूर मल्लयुद्ध विशारदाय</p><p>67. संसारवैरी</p><p>68. कंसारिर</p><p>69. मुरारी</p><p>70. नाराकान्तक</p><p>71. अनादि ब्रह्मचारिक</p><p>72. कृष्णाव्यसन कर्शक</p><p>73. शिशुपालशिरश्छेत्त</p><p>74. दुर्यॊधनकुलान्तकृत</p><p>75. विदुराक्रूर वरद</p><p>76. विश्वरूपप्रदर्शक</p><p>77. सत्यवाचॆ</p><p>78. सत्य सङ्कल्प</p><p>79. सत्यभामारता</p><p>80. जयी</p><p>81. सुभद्रा पूर्वज</p><p>82. विष्णु</p><p>83. भीष्ममुक्ति प्रदायक</p><p>84. जगद्गुरू</p><p>85. जगन्नाथ</p><p>86. वॆणुनाद विशारद</p><p>87. वृषभासुर विध्वंसि</p><p>88. बाणासुर करान्तकृत</p><p>89. युधिष्ठिर प्रतिष्ठात्रे</p><p>90. बर्हिबर्हावतंसक</p><p>91. पार्थसारथी</p><p>92. अव्यक्त</p><p>93. गीतामृत महोदधी</p><p>94. कालीयफणिमाणिक्य रञ्जित श्रीपदाम्बुज</p><p>95. दामोदर</p><p>96. यज्ञभोक्त</p><p>97. दानवेन्द्र विनाशक</p><p>98. नारायण</p><p>99. परब्रह्म</p><p>100. पन्नगाशन वाहन</p><p>101. जलक्रीडा समासक्त गोपीवस्त्रापहाराक</p><p>102. पुण्य श्लॊक</p><p>103. तीर्थकरा</p><p>104. वेदवेद्या</p><p>105. दयानिधि</p><p>106. सर्वभूतात्मका</p><p>107. सर्वग्रहरुपी</p><p>108. परात्पराय</p><p></strong></p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/rashifal/4-september-2026-janmashtami-rashifal-rajyog-astrology-predictions-article-156036943" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>जन्माष्टमी पर बन रहे विशेष राजयोग, इन 5 राशियों की चमकेगी किस्मत और बढ़ेगा धन</strong></a></p><p><h2>जन्माष्टमी पर क्यों करें श्रीकृष्ण का नाम जाप</p><p></h2></p><p>भगवान श्रीकृष्ण के ये 108 नाम उनके अलग-अलग स्वरूपों और लीलाओं की झलक प्रस्तुत करते हैं। जन्माष्टमी की रात भगवान के जन्मोत्सव के समय भक्त जब इन नामों का श्रद्धापूर्वक जाप करते हैं, तो वातावरण भक्तिमय हो उठता है। नाम-स्मरण के दौरान मन को एकाग्र रखने और भगवान के स्वरूप का ध्यान करने से आध्यात्मिक शांति का अनुभव भी किया जा सकता है।</p><p>जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं, बल्कि उनके जीवन और शिक्षाओं को स्मरण करने का अवसर भी है। इसलिए इस दिन पूजा, व्रत और भजन के साथ श्रीकृष्ण के 108 नामों का पाठ करके भक्त अपने आराध्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156036766</guid><pubDate>Thu, 03 Sep 2026 17:35:44 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: घर पर सजाएं कान्हा की सुंदर मटकी, इन आसान तरीकों से करें डेकोरेशन ]]></title><description><![CDATA[ Kanha Matki Decoration: कान्हा की मटकी सजाने के लिए जरूरी नहीं कि उसे बहुत ज्यादा चमकदार बनाया जाए। कई बार साधारण सजावट भी बहुत खूबसूरत लगती है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-kanha-matki-decoration-janmashtami-decoration-ideas-article-156036766 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156036798,thumbsize-233570,width-1280,height-720,resizemode-75/156036798.jpg" alt="janmashtami 2026 kanha matki decoration janmashtami decoration ideas" /></div><p><strong>Kanha Matki Decoration: </strong>इस साल जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी के पावन पर्व पर बच्चों के साथ मिलकर कान्हा की मटकी सजाना लोग काफी पसंद करते हैं। अगर आप भी बच्चों के साथ मिलकर हाथों से मटकी सजाने का प्लान कर रहे हैं तो ये आर्टिकल आपके लिए ही है। कान्हा की मटकी सजाने के लिए बहुत महंगी चीजों की जरूरत नहीं है। थोड़ी सी क्रिएटिविटी और घर में रखे सामान से भी आप एक सुंदर मटकी तैयार कर सकते हैं।</p><p><h2>मिट्टी की मटकी से करें शुरुआत</h2></p><p>सबसे पहले एक साधारण मिट्टी की मटकी ले लें। मटकी को अच्छी तरह साफ करके कुछ देर सूखने दें। जन्माष्टमी के लिए पीला, नीला, लाल, हरा या सुनहरा रंग काफी अच्छा लगता है। अपने हिसाब से किसी भी हल्के रंग से मटकी को पेंट कर दें। मटकी पर रंग करने के बाद उसे पूरी तरह सूखने दें। इसके बाद मटकी के ऊपरी हिस्से या सामने की तरफ एक-दो मोर पंख लगाएं मोर पंख के साथ छोटी सी बांसुरी की आकृति भी लगा दें तो मटकी का पूरा लुक ही कृष्णमय हो जाएगा। </p><p><h2>गोटा पट्टी और लेस से सजाएं मटकी</h2></p><p>मटकी को थोड़ा रॉयल लुक देना चाहते हैं तो गोटा पट्टी, जरी या सुनहरी लेस का इस्तेमाल करें। इसे मटकी के मुंह और नीचे के हिस्से पर चिपकाया जा सकता है। किनारों पर मोती वाली लेस लगाने से मटकी काफी सुंदर दिखाई देती है। इसके अलावा रंग-बिरंगे रिबन से भी बॉर्डर बनाया जा सकता है। ध्यान रखें कि सजावट ज्यादा भारी न हो, वरना मिट्टी की मटकी टूटने का डर रहता है।</p><p><h2>नाम से बढ़ाएं खूबसूरती</h2></p><p>मटकी पर 'राधे-राधे', 'जय श्री कृष्ण' या 'कान्हा' लिख सकते हैं। इसके लिए पेंट या मार्कर का इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर हाथ से लिखने में दिक्कत हो तो बाजार में मिलने वाले स्टिकर भी लगाए जा सकते हैं। जन्माष्टमी के मौके पर कान्हा लिखी हुई मटकी काफी भाती है। इसके अलावा बच्चों को भी आप लिखने या स्टीकर चिपकाने का टास्क दे सकते हैं।</p><p><h2>मोती और सितारों से दें चमक</h2></p><p>मटकी को थोड़ा चमकदार बनाने के लिए छोटे मोती, सितारे, स्टोन और मिरर वर्क का इस्तेमाल करें। मटकी के बीच में एक बड़ा गोल डिजाइन बनाएं और उसके चारों तरफ छोटे-छोटे स्टोन लगाएं। बच्चों को रंग भरने, मोर पंख लगाने और स्टिकर चिपकाने जैसे छोटे काम जरूर दें। इससे बच्चों को जन्माष्टमी के त्योहार से जुड़ने का मौका मिलेगा और उनके लिए यह एक मजेदार एक्टिविटी भी बन जाएगी।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156035760</guid><pubDate>Thu, 03 Sep 2026 14:57:31 +0530</pubDate><title><![CDATA[ मथुरा के इस मंदिर में कान्हा को लगता है मिट्टी के पेड़ों का भोग, जानें ब्रह्मांड दर्शन से जुड़ी अनोखी परंपरा ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026: मथुरा के महावन में स्थित एक मंदिर में भगवान कृष्ण को मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है। यहीं माता यशोदा को भगवान के मुख में संपूर्ण ब्रह्मांड के दर्शन हुए थे। आइए जानते हैं इस खास मंदिर के बार में... ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-brahmand-vihari-temple-mathura-mitti-ke-pede-bhog-kha-lagya-jata-hai-article-156035760 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156035825,thumbsize-1440077,width-1280,height-720,resizemode-75/156035825.jpg" alt="janmashtami 2026 brahmand vihari temple mathura mitti ke pede bhog kha lagya jata hai" /></div><p><strong>Janmashtami 2026:</strong> भगवान ने जन्म लेते ही कंस की जेल की बेड़ियों को तोड़ दिया और गोकुल पहुंचे, इसके बाद नंदलाल के जन्मोत्सव की तैयारियां देशभर में शुरू हो चुकी हैं। इस साल 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। मथुरा-वृंदावन और पूरे ब्रज में कान्हा के जन्म की खुशी अलग ही रंग में दिखाई देती है। कहीं माखन-मिश्री का भोग सजता है, तो कहीं बाल गोपाल को तरह-तरह की मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। लेकिन ब्रजभूमि में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण को मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है।</p><p>यह अनोखी परंपरा मथुरा के महावन स्थित ब्रह्मांड घाट <strong>(Brahmand Vihari Temple)</strong> से जुड़ी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाल कृष्ण ने मिट्टी खाई थी और माता यशोदा को उनके मुख में पूरे ब्रह्मांड के दर्शन हुए थे। इसी अद्भुत लीला की स्मृति में यहां आज भी कान्हा को मिट्टी से बने पेड़ों का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।</p><p><h2>जहां ब्रह्मांड के हुए दर्शन</h2></p><p>ब्रज की गलियों में कृष्ण की बाल लीलाओं की अनगिनत कथाएं आज भी जीवंत हैं। उन्हीं में से एक सबसे अद्भुत प्रसंग ब्रह्मांड घाट से जुड़ा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, बाल कृष्ण एक दिन गोप-बालकों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते उन्होंने मिट्टी खा ली। जब यह बात माता यशोदा को पता चली तो उन्होंने बलराम से पूछा। बलराम ने भी कन्हैया के मिट्टी खाने की बात कह दी। इसके बाद मैया ने कृष्ण से अपना मुंह खोलने को कहा।</p><p>कन्हैया ने जैसे ही मुंह खोला, यशोदा मैया के सामने ऐसा दृश्य आया जिसे देखकर वह स्तब्ध रह गईं। मान्यता है कि उन्हें कृष्ण के मुख के भीतर अनगिनत ब्रह्मांड, सूर्य-चंद्रमा और ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित संपूर्ण सृष्टि के दर्शन हुए। कुछ क्षणों के लिए मैया को समझ ही नहीं आया कि वह क्या देख रही हैं। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। लेकिन जब दोबारा आंखें खोलीं तो वही नन्हे कन्हैया उनकी गोद में बैठे थे।</p><p><h2>ब्रह्मांड घाट नाम</p><p></h2></p><p>कृष्ण की इसी अद्भुत लीला से इस स्थान का संबंध माना जाता है। कहा जाता है कि यशोदा मैया घर लौटने के बाद ब्राह्मणों को बुलाकर स्वस्ति वाचन कराया और गोदान सहित दान-दक्षिणा दी। कालांतर में यह स्थान ब्रह्मांड घाट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहीं स्थापित मंदिर को ब्रह्मांड विहारी मंदिर कहा जाता है। भगवान ने अपनी बाल लीला के दौरान माता यशोदा को अपने मुख में ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे, इसलिए उनके इसी स्वरूप की स्मृति इस स्थान से जुड़ी मानी जाती है।</p><p><h2>मिट्टी के पेड़े का भोग</p><p></h2></p><p>ब्रज में कृष्ण के लिए माखन-मिश्री का भोग सबसे प्रसिद्ध है। लेकिन ब्रह्मांड घाट का यह मंदिर अपनी एक अलग परंपरा के कारण भक्तों को आकर्षित करता है। यहां भगवान श्रीकृष्ण को मिट्टी से तैयार किए गए पेड़े अर्पित किए जाते हैं। बताया जाता है कि यमुना की रेत-मिट्टी से तैयार इस विशेष प्रसाद को श्रद्धालु अपने घर भी लेकर जाते हैं। अपने रिश्तेदारों, मित्रों और स्वजनों में इसे बांटने की परंपरा भी बताई जाती है। इस प्रसाद के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि कृष्ण की उस बाल लीला की स्मृति जुड़ी है जिसमें उन्होंने मिट्टी खाई थी।</p><p><h2>कान्हा की बाल लीला से जुड़ी है मान्यता</p><p></h2></p><p>ब्रह्मांड घाट पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीलाओं का जीवंत स्मरण है। यहां आने वाले भक्त मंदिर में दर्शन करने के साथ उस स्थान को भी नमन करते हैं, जहां मान्यता के अनुसार कन्हैया ने गोप-बालकों के साथ खेलते हुए मिट्टी खाई थी। मंदिर से जुड़ी परंपरा में मिट्टी के पेड़े का प्रसाद इसी कथा को श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाता है। भक्त इसे भगवान की लीला का प्रतीक मानकर ग्रहण करते और अपनों के बीच वितरित करते हैं।</p><p><h2>जन्माष्टमी पर खास रौनक</h2></p><p>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा और ब्रज के मंदिरों में विशेष सजावट, पूजा-अर्चना और भोग की तैयारियां होती हैं। ऐसे में ब्रह्मांड बिहारी मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बन जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव मनाने मथुरा आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान इसलिए भी खास है क्योंकि यहां उन्हें कान्हा के उस बाल स्वरूप से जुड़ी परंपरा देखने को मिलती है, जिसमें भगवान ने अपनी मां को खेल-खेल में पूरे ब्रह्मांड का दर्शन करा दिया था।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156028797</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 12:00:49 +0530</pubDate><title><![CDATA[ हलछठ पर्व की पूरी जानकारी: ललही छठ क्यों और कैसे मनाई जाती है, नोट करें बलराम जयंती की पूजा विधि और आरती ]]></title><description><![CDATA[ Hal Chhath 2026: हलछठ का व्रत माताएं संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए करती हैं। आज 2 सितंबर को हलषष्ठी पर्व के मौके पर पढ़ें संपूर्ण कथा, पूजा सामग्री, छठी माता का चित्र बनाने की परंपरा, सात धान्य का महत्व और व्रत से जुड़ी संपूर्ण जानकारी। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/hal-chhath-vrat-katha-har-chhath-puja-vidhi-samagri-balram-jayanti-aarti-explained-article-156028797 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156029146,thumbsize-1275789,width-1280,height-720,resizemode-75/156029146.jpg" alt="hal chhath vrat katha har chhath puja vidhi samagri balram jayanti aarti explained" /></div><p><strong>Hal Chhath 2026:</strong> भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला हलछठ, हलषष्ठी, हरछठ या ललही छठ माताओं के लिए विशेष आस्था का पर्व है। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और परिवार की मंगलकामना के लिए इस दिन व्रत और पूजा की जाती है। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से जुड़े इस पर्व में हल और खेती का विशेष महत्व माना गया है। यही वजह है कि पूजा-पद्धति से लेकर व्रत के भोजन तक में सामान्य दिनों से अलग नियम दिखाई देते हैं। हलछठ को हरछठ और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अलावा आज के दिन को बलराम जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। आइए एक ही लेख में विस्तार से जानते हैं हलछठ की कथा, पूजा सामग्री, माता का चित्र बनाने की परंपरा, व्रत के खान-पान के नियम और साल 2026 की सही तारीख से जुड़ी पूरी जानकारी।</p><p><h2>हलछठ कब है 2026 में?</p><p></h2></p><p>हलछठ/हलषष्ठी 2 सितंबर 2026, बुधवार को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 2 सितंबर की सुबह 6:12 बजे प्रारंभ होकर 3 सितंबर की सुबह 4:25 बजे के आसपास समाप्त होगी। चूंकि 2 सितंबर को सूर्योदय के समय षष्ठी तिथि मौजूद रहेगी, इसलिए इसी दिन व्रत रखा जाएगा।</p><p>यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि हलछठ और बलराम जयंती (Balram Jayanti) को हर परंपरा में एक ही पर्व नहीं माना जाता है। हलषष्ठी कृष्ण पक्ष की षष्ठी से जुड़ी है, जबकि भगवान बलराम की जन्म जयंती कई पंचांगों में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाई जाती है। उदाहरण के लिए 2026 में बलराम जयंती की तारीख 16 सितंबर बताई गई है। इसलिए दोनों पर्वों के नाम और धार्मिक संबंध को लेकर भ्रम नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/hal-chhath-2026-wishes-hindi-har-chhath-ke-shubhkamna-sandesh-article-156027982" data-type="tilCustomLink" target="_blank">हल छठ के पावन दिन अपनों को भेजें शुभकामनाएं</a> </p><p></strong></p><p><h2>हलछठ पर्व का महत्व</h2></p><p>हलषष्ठी को मुख्य रूप से संतान की मंगलकामना से जुड़ा पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए आशीर्वाद प्राप्त होता है। कई स्थानों पर महिलाएं देवी षष्ठी के साथ भगवान बलराम की पूजा करती हैं। भगवान बलराम के हाथ में हल उनका प्रमुख अस्त्र माना जाता है। इसी कारण इस पर्व में हल, खेत, अन्न और प्रकृति से जुड़े प्रतीकों का विशेष स्थान बन गया है। हलषष्ठी के व्रत में खेत में हल चलाकर उगाए गए अन्न से परहेज करने की परंपरा इसी प्रतीकात्मक संबंध से जुड़ी है।</p><p>    <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156029203,width-540,height-303,resizemode-75/156029203.jpg" alt="हलछठ का महत्व और पूजा विधि" title="हलछठ का महत्व और पूजा विधि"/></p><p><h2>हरछठ की पूजा विधि</h2>हरछठ का व्रत परंपरागत रूप से निराहार रखा जाता है। इस दिन हल से जोते या बोए गए अन्न, फल-सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता। सुबह महुए की दातून से दांत साफ कर स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल की दीवार पर भैंस के गोबर से छठ माता, हल, सप्तऋषि, पशु और किसान के चित्र बनाए जाते हैं। चौकी पर कलश, गणेश और माता पार्वती की स्थापना कर पूजा की जाती है। कुल्हड़ में ज्वार की धानी-महुआ और मटकी में देवली-छेवली रखकर पूजन होता है। भैंस के मक्खन से हवन, कथा और बलराम-कृष्ण की आरती के बाद महुआ व भैंस के दही से व्रत खोला जाता है।</p><p><h2>हलछठ की व्रत कथा</p><p></h2></p><p>हलषष्ठी से जुड़ी कई लोककथाएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं। इनमें ग्वालिन और उसकी संतान से जुड़ी कथा विशेष रूप से सुनाई जाती है। यह कथा व्रत में सत्य, श्रद्धा, संयम और संतान के प्रति मां की ममता का संदेश देती है।</p><p>कथा के अनुसार एक ग्वालिन के यहां संतान होने वाली थी। उसी समय गांव में एक महिला हलषष्ठी का व्रत और पूजा कर रही थी। ग्वालिन ने भी व्रत और पूजा से जुड़ी परंपराओं को देखा, लेकिन वह व्रत के नियमों को पूरी तरह नहीं समझ पाई। कथा में आगे बताया जाता है कि ग्वालिन से ऐसी भूल हो गई, जो हलषष्ठी के नियमों के विपरीत मानी जाती थी। इसके बाद उसके बच्चे को लेकर विपत्ति आ गई। अपने बच्चे की स्थिति देखकर वह अत्यंत दुखी हुई और उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। ग्वालिन ने देवी षष्ठी और भगवान बलराम से क्षमा मांगी। उसने पूरे मन से पूजा की और संतान के कल्याण की प्रार्थना की। उसकी सच्ची श्रद्धा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर देवी षष्ठी ने उसके बच्चे को जीवनदान दिया।</p><p>यही वजह है कि हलछठ की कथा में केवल व्रत रखने की बात नहीं आती, बल्कि नियमों का पालन, मन की शुद्धता और संतान के प्रति निष्ठा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। पूजा के दौरान इस कथा का श्रवण या पाठ करने की परंपरा कई क्षेत्रों में आज भी कायम है।</p><p><h2>हलछठ माता का चित्र कैसे बनाएं?। हरछठ माता की फोटो</h2></p><p>हलछठ की पूजा की सबसे खास परंपराओं में से एक है पूजा स्थल पर तालाब या कुंड का निर्माण और हरछठ की प्रतीकात्मक आकृति बनाना। कई ग्रामीण और पारंपरिक क्षेत्रों में पूजा स्थल को साफ करके वहां गोबर से चौक या आकृति बनाई जाती है। इसके बाद मिट्टी से छोटा-सा तालाब या कुंड बनाया जाता है। यह जल और प्रकृति से जुड़े जीवन का प्रतीक माना जाता है।</p><p>इसके बाद झरबेरी, पलाश और गूलर की टहनियों को एक साथ बांधकर हरछठ की आकृति तैयार करने की परंपरा बताई गई है। इन्हें कुंड में स्थापित करके पूजा की जाती है। कुछ परंपराओं में इस संरचना को हल से जुड़ा प्रतीकात्मक रूप भी दिया जाता है।</p><p>    <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156029206,width-540,height-303,resizemode-75/156029206.jpg" alt="हलछठ माता की फोटो" title="हलछठ माता की फोटो"/></p><p><h3>ऐसे बनाएं हलछठ माता का पारंपरिक चित्र</p><p></h3></p><p><ul><li>पूजा स्थल को साफ करके पवित्र करें।</li><li>गोबर या गेरू से पूजा की चौकी और आसपास का स्थान सजाएं।</li><li>मिट्टी से छोटा तालाब या कुंड बनाएं।</li><li>झरबेरी, पलाश और गूलर की टहनियां एक साथ बांधें।</li><li>इन्हें कुंड के पास स्थापित करें।</li><li>कच्चे सूत या जनेऊ से इन्हें बांधने की परंपरा भी कई जगह है।</li><li>पास में कलश स्थापित करें और उस पर षष्ठी माता का प्रतीकात्मक चित्र बनाया जा सकता है।</li></ul></p><p><strong>नोट -</strong> हालांकि कुछ परंपराओं में मिट्टी की गौरी-गणेश, शिव और कार्तिकेय की प्रतिमाएं बनाकर भी पूजा स्थल पर स्थापित की जाती हैं। इसलिए स्थानीय परंपरा के अनुसार विधि में थोड़ा अंतर होना स्वाभाविक है।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/hal-chhath-vrat-katha-2026-har-chhath-story-in-hindi-article-156028178" data-type="tilCustomLink" target="_blank">हलछठ की व्रत कथा, यहां पढ़ें हर छठ और ललही छठ व्रत की कहानी</a></p><p></strong></p><p><h2>हलछठ पूजन की पूजा सामग्री लिस्ट</h2></p><p>हलषष्ठी की पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री केवल पूजा की औपचारिक वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि उनमें खेती, प्रकृति और मातृत्व से जुड़े प्रतीक भी छिपे हैं।</p><p><strong>पूजा सामग्री लिस्ट </p><p></strong></p><p><ul><li>मिट्टी का कलश</li><li>मिट्टी या गोबर</li><li>झरबेरी की टहनियां</li><li>पलाश की टहनियां</li><li>गूलर की टहनियां</li><li>कुश</li><li>कच्चा सूत या जनेऊ</li><li>रोली और सिंदूर</li><li>हल्दी</li><li>अक्षत</li><li>फूल और फल</li><li>दीपक और धूप</li><li>सात प्रकार के अनाज या सात धान्य</li><li>भुने हुए अनाज</li><li>नया वस्त्र</li><li>सुहाग सामग्री</li><li>पूजा के लिए जल</li><li>भगवान बलराम और षष्ठी माता के प्रतीक</li></ul></p><p>कुछ परंपराओं में सात प्रकार के भुने अनाज का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें गेहूं, चना, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा और जौ जैसे अनाज शामिल किए जाते हैं।</p><p><h2>हलछठ व्रत में खान-पान के नियम</p><p></h2></p><p>हलषष्ठी के व्रत की सबसे अलग पहचान इसके भोजन संबंधी नियम हैं। इस दिन सामान्य अनाज खाने की बजाय ऐसे खाद्य पदार्थों को प्राथमिकता देने की परंपरा है, जो हल से जोती गई भूमि से प्राप्त न हों। मान्यता के अनुसार हल से उगाए गए अन्न का सेवन नहीं किया जाता, क्योंकि हल भगवान बलराम का प्रमुख अस्त्र है। इसके स्थान पर तालाब, नदी या अन्य जलस्रोतों में उगने वाले खाद्य पदार्थों और स्थानीय परंपरा के अनुसार फलाहार किया जाता है।</p><p><h3>क्या हलछठ व्रत में फल खा सकते हैं?</p><p></h3></p><p>फलाहार करने वाली परंपरा में व्रत के दौरान फल खाए जाते हैं। हालांकि व्रत के नियम क्षेत्र और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं। इसलिए जो महिलाएं निर्जल या कठोर व्रत रखती हैं, वे अपनी निर्धारित परंपरा का पालन करती हैं। कुछ स्थानों पर दूध, दही और घी के सेवन को लेकर भी अलग-अलग मान्यताएं मिलती हैं। इसलिए एक ही नियम सभी क्षेत्रों पर लागू नहीं किया जा सकता। स्थानीय परंपरा के अनुसार इसका पालन करना बेहतर माना जाता है।</p><p><h3>हलषष्ठी व्रत में किन चीजों को खाने से बचना चाहिए?</p><p></h3></p><p>हलछठ के दिन सबसे प्रमुख परहेज हल से उगाए गए अन्न को लेकर है। इसके अलावा व्रत रखने वाली महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार सामान्य भोजन, तले-भुने पदार्थ और ऐसे खाद्य पदार्थों से बचती हैं जो व्रत के नियमों के अनुकूल नहीं माने जाते हैं। इस दिन केवल खान-पान ही नहीं, बल्कि वाणी और व्यवहार की शुद्धता पर भी जोर दिया जाता है। कटु वचन, झूठ और अनावश्यक विवाद से बचना व्रत की भावना के अनुरूप माना जाता है।</p><p><h2>हलछठ व्रत का खेती से संबंध</p><p></h2></p><p>हलछठ की पूरी पूजा को ध्यान से देखें तो इसमें प्रकृति और कृषि का प्रभाव साफ दिखाई देता है। हल, अन्न, तालाब, पेड़-पौधों की टहनियां और सात धान्य- ये सभी मिलकर ग्रामीण जीवन की उस परंपरा को सामने लाते हैं, जिसमें खेती सिर्फ आजीविका नहीं, बल्कि जीवन का आधार थी। भगवान बलराम का हल इसी कृषि शक्ति का प्रतीक है। इसलिए हलषष्ठी में हल से प्राप्त अन्न का त्याग और प्रकृति से जुड़े पदार्थों का उपयोग एक प्रतीकात्मक संदेश भी देता है। ये दिन प्रकृति के प्रति सम्मान और अन्न के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का भी है।</p><p>    <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156029229,width-540,height-303,resizemode-75/156029229.jpg" alt="हलछठ का खेती से संबंध" title="हलछठ का खेती से संबंध"/></p><p><h2>हरछठ पूजा में माताएं क्यों रखती हैं व्रत?</p><p></h2></p><p>धार्मिक मान्यता में यह व्रत मुख्य रूप से संतान के कल्याण के लिए किया जाता है। माताएं अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुखी जीवन की कामना से हलषष्ठी का व्रत करती हैं। कुछ परंपराओं में संतान की इच्छा रखने वाले दंपतियों द्वारा भी इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करने की मान्यता मिलती है। लेकिन इस पर्व का भाव केवल किसी एक कामना तक सीमित नहीं है। मां और संतान के बीच के भावनात्मक रिश्ते को केंद्र में रखकर देखा जाए तो हलछठ ममता, त्याग, संरक्षण और आशीर्वाद का पर्व भी बन जाता है।</p><p><h3>हलछठ पूजा में कथा सुनने की परंपरा</p><p></h3></p><p>व्रत और पूजा की परंपरा में कथा का स्थान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कथा धार्मिक अनुष्ठान के पीछे छिपे भाव को समझाती है। हलछठ की कथा में भी नियमों के पालन, भूल का प्रायश्चित और देवी की कृपा का संदेश मिलता है। इसलिए पूजा के बाद या पूजा के दौरान परिवार की महिलाएं एक साथ बैठकर हलछठ व्रत कथा का पाठ या श्रवण करती हैं। कई क्षेत्रों में कथा के बाद आरती की जाती है और संतान के लिए मंगलकामना की जाती है।</p><p><h2>हल छठ माता की आरती | Hal Chhath Mata Ki Aarti In Hindi</p><p></h2></p><p>जय षष्ठी माते, जय हलषष्ठी माते।</p><p>नीराजनममरैर्कृतमाधात्रे जाते॥ जय हल…</p><p>करुणामयि गुणशीले तिथिशीलेऽभयदे।</p><p>वचसातीतमहिम्ने वात्सल्येऽऽनन्दे॥ जय हल…</p><p>कंसभगिन्या पूज्ये चन्द्रललितसुतदे।</p><p>वंशकरे प्रभुरिवगुणयुक्तवत्सकप्रदे॥ जय हल…</p><p>वैदर्भ्याऽपि सुपूज्ये नष्टपुत्रदात्रे।</p><p>श्रीखण्डप्रसवाङ्गे वरुणामोदकरे॥ जय हल…</p><p>क्रीडनकेन भवाब्धे पूज्ये सौख्यवरे।</p><p>अम्बुयुक्तचीरैरजिरेऽजरवज्रकरे॥ जय हल…</p><p>महिषीदुग्धप्रभाऽऽर्चे वरदे धर्मधरे।</p><p>कृष्णाग्रजगुणयुक्ते शुभ्रे कृष्णप्रिये॥ जय हल…</p><p>वरुणेनादियुगेऽस्मिन् हरिश्चद्रकुलदे।</p><p>स्वानन्दे प्रामीत्योऋणत्रिशङ्कुजनने॥ जय हल…</p><p>गायन्तीति मनुष्याः तीरे चाम्बुवरे।</p><p>काले दोषविमुक्ता वरुणानन्दमये॥ जय हल…</p><p><h2>दाऊजी महाराज की आरती - ॐ जय बलदेव हरे…</p><p></h2></p><p>जय बलदेव हरे, स्वामी जय बलदेव हरे।</p><p>हे दुःख भंजन, रोहिणी नंदन, सब दुख दूर करे।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>जय बलदेव हरे, स्वामी जय बलदेव हरे।</p><p>हे दुःख भंजन, रोहिणी नंदन, सब दुख दूर करे।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>मैं जग में भटका हूं, पार करो बाबा।</p><p>स्वामी पार करो बाबा।</p><p>अपनी शरण लगाओ, उद्धार करो बाबा।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>माथे मुकुट विराजे, सिर पंचरंग चीरा।</p><p>स्वामी सिर पंचरंग चीरा।</p><p>चंदा के सम चमके, ठोड़ी पै हीरा।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>सुंदर वस्त्र मनोहर, मन हरनी झांकी।</p><p>स्वामी मन हरनी झांकी।</p><p>अपने भक्त जनन पै, नजर करो बांकी।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>माखन-मिश्री खावें, विजया भोग धरे।</p><p>स्वामी विजया भोग धरे।</p><p>सकल मनोरथ सारे, विपदा दूर करे।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>मैया सम्मुख विराजें, सबके दुःख हरनी।</p><p>स्वामी सबके दुःख हरनी।</p><p>सबकी करें सहाई, मां मंगल करनी।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>जो नर तुमको ध्यावै, कष्ट नहीं पावै।</p><p>स्वामी कष्ट नहीं पावै।</p><p>अमर प्रेम पद पावै, भाव से तर जावै।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>सुंदर ताल बन्यो है, क्षीर सागर न्यारो।</p><p>स्वामी क्षीर सागर न्यारो।</p><p>जो स्नान करे जन, मिट जाए दुःख सारो।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>कृष्णचंद्र वृंदावन, महारास कीन्हो।</p><p>स्वामी महारास कीन्हो।</p><p>गिरि के ऊपर बैठे, सिंह रूप लीन्हो।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>अजब अनोखी लीला, है ब्रज में भारी।</p><p>स्वामी है ब्रज में भारी।</p><p>वानर द्विविद गिराया, हल-मूसल धारी।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p>दाऊ बाबा की आरती, जो जन नित गावै।</p><p>स्वामी जो जन नित गावै।</p><p>मनवांछित फल पावै, मन ही मन हरषावै।।</p><p>ॐ जय बलदेव हरे…</p><p><h2>श्री बलभद्र जी की आरती - ॐ जय बलभद्र हरे...</p><p></h2></p><p>ॐ जय बलभद्र हरे,</p><p>प्रभु जय बलभद्र हरे।</p><p>अपने कुल की रक्षा,</p><p>तू प्रभु नित्य करे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे…</p><p>जो सेवे सुख पावे,</p><p>प्रतिपल गुण गावे।</p><p>हो स्वामी प्रतिपल गुण गावे।</p><p>सुख-संपत्ति घर आवे,</p><p>निर्मल तन पावे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।1।।</p><p>तुम हलधर हो स्वामी,</p><p>सब सुख के दाता।</p><p>हो स्वामी सब सुख के दाता।</p><p>अन्न तुम्हारे हल से,</p><p>हर प्राणी पाता।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।2।।</p><p>गंगाजल-सा पावन,</p><p>है तेरी काया।</p><p>हो स्वामी है तेरी काया।</p><p>जगत के नाथ हो देवा,</p><p>जग तेरी माया।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।3।।</p><p>जल-थल के कण-कण में,</p><p>तुम्हें पाऊं देवा।</p><p>हो स्वामी तुम्हें पाऊं देवा।</p><p>ऐसा वर दो स्वामी,</p><p>नित्य करूं सेवा।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।4।।</p><p>भक्तजनों के रक्षक,</p><p>दिव्य स्वरूप धरे।</p><p>हो स्वामी दिव्य स्वरूप धरे।</p><p>गौरवर्ण नीलांबर,</p><p>सबके मन मोहे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।5।।</p><p>विषय-विकार मिटाओ,</p><p>पाप हरो देवा।</p><p>हो स्वामी पाप हरो देवा।</p><p>श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ,</p><p>करूं मन से सेवा।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।6।।</p><p>वंदन हे बलदेवा,</p><p>जग के सुखदाता।</p><p>हो स्वामी जग के सुखदाता।</p><p>चरणों में अर्पित पुष्प को,</p><p>स्वीकारो दाता।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।7।।</p><p>सभी भक्त मिल करें स्तुति,</p><p>जगदाता मेरे।</p><p>हो स्वामी जगदाता मेरे।</p><p>मुरलीधर के भैया,</p><p>सबके मन मोहे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।8।।</p><p>जो बलभद्र जी की आरती,</p><p>कोई जन गावे।</p><p>हो स्वामी प्रेम सहित गावे।</p><p>तन-मन सुख-संपत्ति,</p><p>मनवांछित फल पावे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे।।9।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे,</p><p>प्रभु जय बलभद्र हरे।</p><p>अपने कुल की रक्षा,</p><p>तू प्रभु नित्य करे।।</p><p>ॐ जय बलभद्र हरे…</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156028178</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 08:32:48 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Hal Chhath Vrat Katha 2026: हलछठ की व्रत कथा, यहां पढ़ें हर छठ और ललही छठ व्रत की कहानी ]]></title><description><![CDATA[ Hal Chhath Vrat Katha 2026: हल छठ का व्रत आज यानी 2 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। आज की पूजा के दौरान हरछठ माता की कथा सुनने की परंपरा है। जानें ग्वालिन और राजा की बहू से जुड़ी लोकप्रिय कथाएं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/hal-chhath-vrat-katha-2026-har-chhath-story-in-hindi-article-156028178 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156028183,thumbsize-452525,width-1280,height-720,resizemode-75/156028183.jpg" alt="hal chhath vrat katha 2026 har chhath story in hindi" /></div><p><strong>Hal Chhath Vrat Katha 2026:</strong> भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि सनातन परंपरा में मातृत्व, संतान की कुशलता और पारिवारिक सुख से जुड़ी मानी जाती है। इसी तिथि पर हल छठ, हर छठ या ललही छठ का व्रत रखा जाता है। 2026 में यह पावन व्रत आज यानी 2 सितंबर को मनाया जा रहा है। इस दिन माताएं संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से व्रत रखती हैं।</p><p>हल छठ के पूजन में हरछठ माता की आराधना के साथ व्रत कथा सुनने और पढ़ने की भी विशेष परंपरा है। लोकमान्यताओं में इस व्रत से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। इन कहानियों में कहीं मां की ममता दिखाई देती है तो कहीं अपनी भूल स्वीकार करने और सच्चाई के रास्ते पर लौटने का संदेश मिलता है। आइए जानते हैं हल छठ की दो लोकप्रचलित व्रत कथाएं, (Lalahi Chhath Vrat Katha) जिन्हें पूजा के समय श्रद्धापूर्वक पढ़ा या सुना जाता है।</p><p><h3>क्यों खास है हल छठ का व्रत?</p><p></h3></p><p>हल छठ को कई क्षेत्रों में हरछठ, ललही छठ और बलराम जयंती जैसे नामों से भी जाना जाता है। धार्मिक परंपरा में यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम से भी जोड़ा जाता है, जिनका प्रमुख अस्त्र हल माना जाता है। लोकपरंपरा में इस दिन खेती-किसानी और हल से जुड़ी वस्तुओं का विशेष महत्व माना गया है। कई स्थानों पर व्रत रखने वाली महिलाएं हल से जुते हुए खेत की उपज का सेवन नहीं करतीं और पूजा में विशेष प्रकार के प्राकृतिक पदार्थों का प्रयोग करती हैं। लेकिन इस व्रत की सबसे भावपूर्ण परंपराओं में से एक है हरछठ माता की कथा सुनना।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/hal-chhath-2026-wishes-hindi-har-chhath-ke-shubhkamna-sandesh-article-156027982" data-type="tilCustomLink" target="_blank">हल छठ के पावन दिन अपनों को भेजें शुभकामनाएं</a></p><p></strong></p><p><h2>पहली कथा: ग्वालिन की भूल और बच्चे का जीवन</p><p></h2></p><p>कथा के अनुसार, एक गांव में एक ग्वालिन रहती थी। वह गर्भवती थी और प्रसव का समय नजदीक था। इसके बावजूद रोजी-रोटी की चिंता उसे घर से बाहर निकलने के लिए मजबूर करती थी। एक दिन वह दूध-दही बेचने गांव की ओर जा रही थी। रास्ते में अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। वह एक झरबेरी की झाड़ी के पीछे चली गई और वहीं उसने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन दूध-दही बेचने की चिंता में वह नवजात को वहीं छोड़कर गांव चली गई। संयोग से उसी दिन हल छठ का व्रत था। कथा के अनुसार, ग्वालिन ने उस दिन गाय और भैंस के दूध को मिलाकर उसे केवल भैंस का दूध बताकर बेच दिया। यह छल उसके लिए भारी पड़ गया।</p><p>उधर उसी स्थान के पास एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदक गए। हल का फल झरबेरी की झाड़ी के पास पड़े नवजात बच्चे से जा टकराया। कथा के अनुसार, बच्चे को गंभीर चोट आई और उसकी मृत्यु हो गई। किसान इस घटना से बेहद दुखी हुआ। उसने झरबेरी के कांटों की मदद से बच्चे के घाव को जोड़ने का प्रयास किया और वहां से चला गया। कुछ देर बाद जब ग्वालिन वापस लौटी तो अपने बच्चे की हालत देखकर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे लगा कि दूध बेचते समय किए गए झूठ और छल का यह परिणाम है।</p><p>ग्वालिन पछतावे से भर उठी। वह गांव पहुंची और सभी लोगों के सामने अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसने बताया कि उसने दूध के बारे में झूठ बोलकर लोगों को धोखा दिया था। गांव की महिलाओं ने उसकी बात सुनी। उसके पश्चाताप को देखते हुए उसे क्षमा किया और हरछठ माता से बच्चे के जीवन की प्रार्थना की। जब ग्वालिन दोबारा अपने बच्चे के पास पहुंची तो उसका बच्चा जीवित मिला। इस घटना ने उसके जीवन की दिशा बदल दी। उसने भविष्य में कभी झूठ न बोलने और किसी को धोखा देकर लाभ न कमाने का संकल्प लिया। यह कथा संदेश देती है कि सच्चा पश्चाताप और सत्य के रास्ते पर लौटने का संकल्प जीवन में नई उम्मीद जगा सकता है।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/iskcon-krishna-janmashtami-2026-date-and-time-nishita-kaal-janmashtami-vrat-paran-samay-article-156023045" data-type="tilCustomLink" target="_blank">इस्कॉन में जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत खोलने का समय</a></p><p></strong></p><p><h2>दूसरी कथा: राजा की बहू और हरछठ माता की कृपा</h2></p><p>हल छठ की एक अन्य लोकप्रचलित कथा एक राजा और उसकी बहू से जुड़ी है। कहा जाता है कि एक राजा ने अपनी प्रजा के लिए विशाल जलाशय बनवाया। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद जलाशय में पानी नहीं आया। राजा बहुत चिंतित हुआ और उसने पुरोहित से इसका कारण पूछा। कथा के अनुसार, पुरोहित ने एक कठिन उपाय बताया। उन्होंने कहा कि जलाशय तभी पानी से भर सकता है, जब परिवार के बड़े बेटे या बेटी की बलि दी जाए। राजा इस उपाय को सुनकर दुखी हो गया। इसके बाद ऐसी योजना बनाई गई कि उसकी बहू को उसकी मां की तबीयत खराब होने का संदेश देकर मायके भेज दिया जाए।</p><p>राजा की बहू अपने मायके के लिए निकल पड़ी। रास्ते में उसे कुछ ऐसी बातें पता चलीं, जिससे उसे अपने साथ किसी अनहोनी की आशंका हुई। जब वह मायके पहुंची तो उसकी मां ने भी पूरी स्थिति समझ ली। मां ने बेटी को तुरंत वापस ससुराल जाने की सलाह दी। बहू लौटने लगी। रास्ते में उसने वही जलाशय देखा, जो पहले सूखा पड़ा था। अब उसमें पानी भरा हुआ था। उसके किनारे एक बच्चा खेल रहा था। जब बहू ने ध्यान से देखा तो उसके होश उड़ गए। वह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना बेटा था, जिसे वह मरा हुआ समझ रही थी।</p><p>बहू ने अपने बेटे को गोद में उठा लिया। उसकी आंखों से खुशी के आंसू बहने लगे। उसने हरछठ माता को नमन करते हुए अपने बच्चे के जीवन के लिए धन्यवाद दिया। जब वह बच्चे के साथ घर पहुंची तो परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। सभी ने इस घटना को हरछठ माता की कृपा माना और माता से परिवार की सुख-शांति तथा संतान के कल्याण की प्रार्थना की।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156025990</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 20:14:51 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Lord Krishna: मथुरा से द्वारका तक भगवान कृष्ण के जीवन से जुड़े हैं ये 11 पवित्र स्थल, जहां आज भी दिखेगी उनकी लीलाओं की झलक ]]></title><description><![CDATA[ Lord Krishna: जन्माष्टमी के मौके पर यदि आप भगवान श्रीकृष्ण की जीवन यात्रा को करीब से समझना चाहते हैं, तो मथुरा से द्वारका तक जुड़े इन 11 पवित्र स्थलों के बारे में जानना चाहिए। इन सभी जगहों के बारे में आपको जानना चाहिए। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/lord-krishna-related-11-sacred-places-from-mathura-vrindavan-to-dwarka-explained-article-156025990 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156026278,thumbsize-459737,width-1280,height-720,resizemode-75/156026278.jpg" alt="lord krishna related 11 sacred places from mathura vrindavan to dwarka explained" /></div><p><strong>Lord Krishna:</strong> भगवान श्रीकृष्ण का जीवन केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति का ऐसा अध्याय है जिसकी छाप आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देती है। कहीं यमुना के किनारे बाल गोपाल की शरारतों की कहानियां सुनाई देती हैं, तो कहीं गिरिराज पर्वत के साथ इंद्र के अहंकार को तोड़ने की कथा जुड़ी है। किसी स्थान पर राधा-कृष्ण की प्रेमभक्ति का भाव मिलता है, तो किसी तीर्थ पर वही कृष्ण अर्जुन के सारथी और गीता के उपदेशक के रूप में दिखाई देते हैं।</p><p>कृष्ण से जुड़े तीर्थों की यात्रा दरअसल उनके जीवन के अलग-अलग पड़ावों से गुजरने जैसी है। ब्रज क्षेत्र में जन्म और बाल लीलाओं की स्मृतियां हैं, जबकि पश्चिम भारत में द्वारका उनके राजसी जीवन और अंतिम लीलाओं से जुड़ी परंपराओं को सामने लाती है। हरियाणा का कुरुक्षेत्र कृष्ण के उस विराट स्वरूप की याद दिलाता है, जहां उन्होंने अर्जुन को कर्म और धर्म का संदेश दिया था।</p><p>उत्तर प्रदेश सरकार की ब्रज परिक्रमा संबंधी जानकारी में मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव और गोकुल जैसे स्थानों को कृष्ण की लीलास्थली से जोड़ा गया है। आइए जानते हैं भगवान श्रीकृष्ण से जुड़े ऐसे 11 पवित्र स्थानों (Krishna Pilgrimage Places) के बारे में, जहां पहुंचकर उनकी जीवन-कथा के अलग-अलग रंगों को महसूस किया जा सकता है।</p><p><h2>1. मथुरा - जहां हुआ कान्हा का जन्म</h2></p><p>कृष्ण की जीवन यात्रा की शुरुआत मथुरा से मानी जाती है। यमुना के किनारे बसी यह नगरी भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि के रूप में सबसे प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता के अनुसार देवकी और वसुदेव के यहां कृष्ण का जन्म कंस के कारागार में हुआ था। यहीं से भगवान कृष्ण की जीवन की जीवन कहानी रोमांचक मोड़ लेती है। कंस को भविष्यवाणी हुई थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इसी भय के कारण उसने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। लेकिन कृष्ण के जन्म के बाद वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल ले गए, जहां नंद और यशोदा के घर उनका पालन-पोषण हुआ।</p><p>आज मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि, विश्राम घाट और कई प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। मथुरा जिला प्रशासन भी कृष्ण जन्मभूमि को शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल करता है। मथुरा इसलिए खास है क्योंकि यहां कृष्ण की कथा एक शिशु के रूप में शुरू होती है, जो आगे चलकर धर्म की स्थापना के लिए पहचाने जाते हैं।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/iskcon-krishna-janmashtami-2026-date-and-time-nishita-kaal-janmashtami-vrat-paran-samay-article-156023045" data-type="tilCustomLink" target="_blank">इस्कॉन में जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत खोलने का समय</a></p><p></strong></p><p><h2>2. गोकुल - जहां बीता योगेश्वर श्रीकृष्ण का बचपन</h2></p><p>मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर मौजूद गोकुल का नाम लेते ही बाल कृष्ण की छवि आंखों के सामने उभरती है। मान्यता है कि कंस से कृष्ण को बचाने के लिए वसुदेव उन्हें यमुना पार गोकुल ले आए थे। यहां नंद बाबा और यशोदा ने उनका पालन-पोषण किया। गोकुल की गलियों में आज भी कृष्ण की बाल लीलाओं की कथाएं सुनाई जाती हैं। यहां आपको कृष्ण के बचपन से जुड़ी माखन चोरी, ग्वाल-बालों के साथ खेलना और यशोदा का अपने नटखट लाल को समझाना जैसी कथाएं सुनने को मिलेंगी। यही वह भावभूमि है जहां भगवान को एक विराट देवता के बजाय घर के प्यारे बच्चे के रूप में देखा जाता है।</p><p>गोकुल यमुना के किनारे स्थित है और जन्माष्टमी तथा नंदोत्सव के दौरान यहां विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है। गोकुल का महत्व इस बात में है कि यहां कृष्ण की कथा में ईश्वर से ज्यादा 'कान्हा' मां की गोद में खेलता, माखन चुराता और गांव की गलियों में दौड़ता एक बालक के रूप में दिखाई देते हैं।</p><p><h2>3. महावन</h2></p><p>गोकुल के आसपास स्थित महावन को भी कृष्ण की बाल लीलाओं से जोड़कर देखा जाता है। इसे प्राचीन समय में बृहद्वन भी कहा गया है। मथुरा जिला प्रशासन की जानकारी के अनुसार महावन को नंद बाबा से जुड़ी परंपराओं और कृष्ण के बाल्यकाल की स्मृतियों से संबंधित माना जाता है। यहां ब्रह्मांड घाट विशेष आकर्षण का केंद्र है। इससे जुड़ी कथा में बताया जाता है कि बाल कृष्ण ने मिट्टी खाने के बाद जब यशोदा मैया को अपना मुंह दिखाया तो उन्हें उसमें पूरा ब्रह्मांड दिखाई दिया। यह प्रसंग कृष्ण की कथा के उस अद्भुत पक्ष को सामने लाता है, जहां एक ओर वे यशोदा के नटखट लाल हैं और दूसरी ओर उनके भीतर संपूर्ण सृष्टि का विराट स्वरूप दिखाई देता है।</p><p><h2>4. वृंदावन - राधा-कृष्ण के प्रेम की धरती</h2></p><p>अगर मथुरा कृष्ण के जन्म की भूमि है तो वृंदावन को उनकी किशोरावस्था और राधा-कृष्ण की लीलाओं की प्रमुख भूमि के रूप में याद किया जाता है। यमुना किनारे बसा वृंदावन आज देश के सबसे प्रसिद्ध कृष्ण तीर्थों में शामिल है। बांके बिहारी मंदिर, केशी घाट और अनेक प्राचीन मंदिर इस नगर को अलग आध्यात्मिक पहचान देते हैं। मथुरा जिला प्रशासन वृंदावन को ब्रज का हृदय और राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं का साक्षी बताता है।</p><p>यहां कृष्ण की छवि एक राजा की नहीं, बल्कि बांसुरी बजाने वाले उस किशोर की है जिसके साथ गोपियों की भक्ति, राधा का प्रेम और रासलीला की परंपरा जुड़ी हुई है। वृंदावन की खासियत यह है कि यहां मंदिरों से निकलती घंटियों, गलियों में गूंजते 'राधे-राधे' और यमुना के घाटों के बीच कृष्ण की कथा केवल पढ़ी नहीं जाती, बल्कि एक जीवंत परंपरा के रूप में महसूस होती है।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-midnight-birth-nishith-kaal-tithi-nakshatra-article-156023877" data-type="tilCustomLink" target="_blank">कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है जन्मोत्सव? जानें तिथि, नक्षत्र और निशीथ काल का पूरा गणित</a></p><p></strong></p><p><h2>5. गोवर्धन - जहां समझाया प्रकृति पूजन का महत्व</h2></p><p>ब्रज की कृष्ण यात्रा गोवर्धन के बिना अधूरी मानी जाती है। मथुरा से लगभग 25 किलोमीटर दूर स्थित गोवर्धन पर्वत से वह कथा जुड़ी है जिसमें कृष्ण ने इंद्र के अहंकार को चुनौती दी थी। पौराणिक कथा के अनुसार ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित करने पर इंद्र क्रोधित हो गए और मूसलाधार बारिश शुरू कर दी। तब कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों को आश्रय दिया। मान्यता है कि सात दिन और सात रात तक पर्वत उठाए रखा गया।</p><p>आज गोवर्धन की करीब 21 किलोमीटर की परिक्रमा प्रमुख धार्मिक परंपराओं में शामिल है। दानघाटी, मानसी गंगा, कुसुम सरोवर और राधाकुंड जैसे स्थल इस यात्रा को और खास बनाते हैं। गोवर्धन की कथा केवल चमत्कार की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति, सामूहिकता और अहंकार के त्याग का प्रतीक भी मानी जाती है।</p><p><h2>6. नंदगांव - भगवान से जुड़ी घर की यादें</h2></p><p>मथुरा-ब्रज क्षेत्र में नंदगांव का विशेष स्थान है। धार्मिक परंपरा के अनुसार कृष्ण के पालन-पोषण से जुड़े नंद बाबा का घर यहीं माना जाता है। नंदगांव का नंदभवन या नंदालय इस क्षेत्र का प्रमुख धार्मिक स्थल है। यहां नंद बाबा, यशोदा, कृष्ण और बलराम की मूर्तियों के दर्शन किए जाते हैं। ब्रज परिक्रमा की आधिकारिक जानकारी भी नंदगांव को कृष्ण के बाल्यकाल और नंद बाबा से जुड़ा स्थल बताती है। नंदगांव की पहाड़ी पर पहुंचकर आसपास का ब्रज क्षेत्र देखने का अनुभव भक्तों के लिए विशेष माना जाता है। यहां कृष्ण की कथा में परिवार और वात्सल्य का भाव सबसे ज्यादा दिखाई देता है।</p><p><h2>7. बरसाना - राधा के घर कृष्ण की प्रेमलीला</p><p></h2></p><p>बरसाना को मुख्य रूप से राधा रानी की भूमि के रूप में जाना जाता है। इसलिए कृष्ण से जुड़े तीर्थों की सूची में इसका नाम अपने आप शामिल हो जाता है। कृष्ण की कथा को राधा के बिना समझना ब्रज की भक्ति परंपरा में अधूरा माना जाता है। बरसाना का श्री राधा रानी मंदिर प्रमुख धार्मिक आकर्षण है। उत्तर प्रदेश सरकार के मथुरा जिला प्रशासन के अनुसार बरसाना ब्रज क्षेत्र का अभिन्न हिस्सा है और कृष्ण तीर्थ यात्रा के प्रमुख सर्किट में शामिल है।</p><p>यहां कृष्ण की कथा प्रेम, समर्पण और भक्ति के रूप में सामने आती है। बरसाना की गलियों और पहाड़ियों में राधा-कृष्ण से जुड़ी अनेक लोक परंपराएं आज भी जीवित हैं। विशेष रूप से लट्ठमार होली के दौरान बरसाना का धार्मिक और सांस्कृतिक स्वरूप दुनिया भर में आकर्षण का केंद्र बन जाता है।</p><p><h2>8. कुरुक्षेत्र - जहां हुए विराट रूप के दर्शन</h2></p><p>कृष्ण की जीवन यात्रा का सबसे गंभीर और दार्शनिक पड़ाव कुरुक्षेत्र में दिखाई देता है। यही वह भूमि है जहां महाभारत युद्ध से पहले अर्जुन मोह और दुविधा में पड़ गए थे। कृष्ण ने अर्जुन को केवल युद्ध के लिए प्रेरित नहीं किया, बल्कि कर्म, धर्म, आत्मा और कर्तव्य का वह ज्ञान दिया जिसे आज भगवद्गीता के रूप में जाना जाता है।</p><p>कुरुक्षेत्र जिला प्रशासन के अनुसार ज्योतिसर वह पवित्र स्थान है जहां कृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता का संदेश दिया। इसे 'गीता का जन्मस्थान' भी कहा जाता है।ज्योतिसर में मौजूद प्राचीन वटवृक्ष और गीता उपदेश से जुड़ी परंपराएं श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण हैं। यहां पहुंचकर कृष्ण की छवि अचानक बदल जाती है। वृंदावन का बांसुरी वाला कान्हा यहां धर्म और कर्तव्य का मार्ग दिखाने वाले योगेश्वर कृष्ण बन जाता है।</p><p><h2>9. द्वारका - भगवान के राजा रूप में दर्शन </p><p></h2></p><p>ब्रज की गलियों से निकलकर कृष्ण की कथा पश्चिमी भारत के समुद्र तट तक पहुंचती है। गुजरात की द्वारका को भगवान कृष्ण की राजधानी और उनके राजकीय जीवन से जोड़कर देखा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार कंस के वध के बाद कृष्ण ने मथुरा छोड़कर समुद्र तट पर द्वारका नगरी बसाई। आज द्वारकाधीश मंदिर इस शहर की आध्यात्मिक पहचान का केंद्र है।</p><p>भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार द्वारका के प्रमुख धार्मिक स्थलों में द्वारकाधीश मंदिर के साथ रुक्मिणी देवी मंदिर भी महत्वपूर्ण है। द्वारका में कृष्ण का स्वरूप वृंदावन के किशोर कान्हा से अलग दिखाई देता है। यहां वे गृहस्थ, राजा, कूटनीतिज्ञ और धर्मरक्षक के रूप में सामने आते हैं। समुद्र की लहरों के सामने खड़ा द्वारकाधीश मंदिर इस बात की याद दिलाता है कि कृष्ण की कथा ब्रज की सीमाओं से बहुत आगे तक फैली हुई है।</p><p><h2>10. बेट द्वारका - मित्रता की अनमोल कहानी</h2></p><p>द्वारका से आगे समुद्र में स्थित बेट द्वारका, जिसे बेयट द्वारका भी कहा जाता है, कृष्ण से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण तीर्थ है। इस द्वीप को धार्मिक परंपरा में भगवान कृष्ण के निवास और उनके मित्र सुदामा से जुड़ी कथा का स्थल माना जाता है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के अनुसार बेट द्वारका को उस स्थान के रूप में भी माना जाता है जहां कृष्ण ने अपने मित्र सुदामा से जुड़ी स्मृति को जीवित रखा।</p><p>कृष्ण और सुदामा की मित्रता भारतीय संस्कृति में मित्रता के सबसे लोकप्रिय उदाहरणों में से एक है। इस कथा में राजसी वैभव और गरीबी के बीच का अंतर खत्म हो जाता है और बचपन की दोस्ती सबसे ऊपर दिखाई देती है। समुद्र से घिरा बेट द्वारका इस कथा को एक अलग ही वातावरण देता है। यहां यात्रा केवल किसी मंदिर तक पहुंचने की नहीं, बल्कि कृष्ण के जीवन के उस पक्ष को समझने की है जिसमें राजा बनने के बाद भी मित्रता का भाव नहीं बदलता।</p><p><h2>11. प्रभास क्षेत्र और भालका तीर्थ - भगवान की लीला की अंतिम स्मृति </p><p></h2></p><p>कृष्ण की जीवन यात्रा का अंतिम पड़ाव गुजरात के प्रभास क्षेत्र में दिखाई देता है। सोमनाथ के निकट स्थित भालका तीर्थ को उस घटना से जोड़ा जाता है जिसमें शिकारी जरा का तीर कृष्ण के पैर में लगा था। गुजरात पर्यटन और गिर सोमनाथ जिला प्रशासन के अनुसार भालका तीर्थ वह स्थान है जहां जरा नामक शिकारी के बाण से कृष्ण के घायल होने और इसके बाद उनके पृथ्वी से प्रस्थान की परंपरा जुड़ी है। इसे 'श्रीकृष्ण निजधाम प्रस्थान लीला' से संबंधित माना जाता है।</p><p>भालका तीर्थ से आगे प्रभास क्षेत्र और त्रिवेणी संगम की परंपरा भी कृष्ण की अंतिम लीला से जुड़ी हुई है। गुजरात पर्यटन के अनुसार प्रभास पाटन में कृष्ण के अंतिम चरण की कथा से जुड़े कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं। यहां कृष्ण की कथा एक बेहद शांत और दार्शनिक मोड़ लेती है। जिस कृष्ण ने बाल्यकाल में माखन चुराया, गोवर्धन उठाया, अर्जुन को गीता सुनाई और द्वारका पर शासन किया, उनकी अवतार लीला के समापन की स्मृति भी इसी क्षेत्र में जुड़ी हुई है।</p><p><h2>भगवान से जुड़े स्थलों की सीख</h2></p><p>मथुरा से शुरू होकर गोकुल, महावन, वृंदावन, गोवर्धन, नंदगांव और बरसाना से गुजरती कृष्ण की कथा हमें उनके बाल और किशोर स्वरूप से परिचित कराती है। इसके बाद कुरुक्षेत्र में वही कृष्ण जीवन के सबसे कठिन प्रश्नों का उत्तर देने वाले योगेश्वर बन जाते हैं। द्वारका में वे राजा और गृहस्थ के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि बेट द्वारका में मित्रता का भाव सामने आता है। अंत में प्रभास और भालका तीर्थ उनकी अंतिम लीला की स्मृति से जोड़ते हैं।</p><p>यही वजह है कि कृष्ण से जुड़े तीर्थ केवल मंदिरों और मूर्तियों का समूह नहीं हैं। ये भारत की उस आध्यात्मिक परंपरा के पड़ाव हैं जहां एक ही देवता जीवन के अलग-अलग रंगों में दिखाई देते हैं। कहीं वह मां यशोदा का लाल है, कहीं गोपियों का प्रियतम, कहीं गोवर्धनधारी, कहीं अर्जुन का सारथी और कहीं द्वारका का राजा। यही कृष्ण की सबसे बड़ी विशेषता है कि वे हर भूमिका में मनुष्य को जीवन का कोई न कोई अर्थ समझाते हैं।</p><p>इसलिए अगर कभी कृष्ण की जीवन यात्रा को केवल किताब में पढ़ने के बजाय उसे तीर्थों की आंखों से देखना हो, तो मथुरा से द्वारका तक की यह यात्रा एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव दे सकती है। इन स्थानों की मिट्टी, घाट, मंदिर, पर्वत और समुद्र सब मिलकर मानो एक ही कहानी कहते हैं कि कृष्ण केवल एक युग के नायक नहीं, बल्कि भारतीय चेतना में आज भी जीवित एक अनुभव हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156023877</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 13:57:56 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Krishna Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात को ही क्यों मनाया जाता है जन्मोत्सव? जानें तिथि, नक्षत्र और निशीथ काल का पूरा गणित ]]></title><description><![CDATA[ Krishna Janmashtami 2026: कृष्ण जन्माष्टमी पर आधी रात में जन्मोत्सव मनाने के पीछे धार्मिक मान्यता के साथ पंचांग का खास गणित है। जानिए 2026 में जन्माष्टमी की सही तिथि और आधी रात की पूजा का महत्व। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-midnight-birth-nishith-kaal-tithi-nakshatra-article-156023877 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156023904,thumbsize-1810589,width-1280,height-720,resizemode-75/156023904.jpg" alt="krishna janmashtami 2026 midnight birth nishith kaal tithi nakshatra" /></div><p><strong>Krishna Janmashtami 2026:</strong> भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मनाई जाने वाली जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण का अवतार मथुरा की कारागार में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में हुआ था। यही वजह है कि जन्माष्टमी पर दिनभर व्रत और पूजा के बाद आधी रात में लड्डू गोपाल का जन्मोत्सव मनाने की परंपरा है। श्रीकृष्ण का जन्म जिस समय हुआ, वह रात का सामान्य समय नहीं बल्कि निशीथ काल था। हिंदू कालगणना में रात के मध्य <strong>(Janmashtami Midnight Celebration)</strong> का यह विशेष समय धार्मिक अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए जन्माष्टमी की पूजा का सबसे प्रमुख समय भी निशीथ काल ही होता है।</p><p><h2>2026 में कब है जन्माष्टमी?</p><p></h2></p><p>पंचांग के अनुसार, साल 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 4 सितंबर, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। इस दिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को रात 2:25 बजे शुरू होगी और 5 सितंबर की रात 12:13 बजे समाप्त होगी। यानी जन्माष्टमी की निर्णायक घड़ी में अष्टमी तिथि का प्रभाव बना रहेगा। यही वह गणित है जिसके कारण जन्माष्टमी की तारीख तय करते समय केवल सूर्योदय की तिथि नहीं देखी जाती, बल्कि निशीथ काल में अष्टमी तिथि की स्थिति को भी विशेष महत्व दिया जाता है।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें-</strong> <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/iskcon-krishna-janmashtami-2026-date-and-time-nishita-kaal-janmashtami-vrat-paran-samay-article-156023045" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>इस्कॉन में जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत खोलने का समय</strong></a></p><p><h2>रोहिणी नक्षत्र से जन्माष्टमी का कनेक्शन</p><p></h2></p><p>श्रीकृष्ण की जन्मकथा में रोहिणी नक्षत्र का भी विशेष महत्व माना जाता है। 2026 में रोहिणी नक्षत्र 4 सितंबर को रात 12:29 बजे से रात 11:04 बजे तक रहेगा। हालांकि अलग-अलग स्थानों के स्थानीय समय के अनुसार पंचांग गणना में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। वैष्णव परंपरा में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के संयोग को श्रीकृष्ण जन्म से विशेष रूप से जोड़ा जाता है। इसलिए जन्माष्टमी की गणना में इन दोनों का महत्व बढ़ जाता है।</p><p><h2>क्या होता है निशीथ काल?</p><p></h2></p><p>निशीथ काल को सरल भाषा में हिंदू मध्यरात्रि कहा जा सकता है। यह घड़ी सामान्य 12 बजे की घड़ी से हमेशा बिल्कुल समान नहीं होती, क्योंकि इसकी गणना स्थानीय सूर्यास्त और सूर्योदय के आधार पर की जाती है। 2026 में दिल्ली के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का निशीथ पूजा समय लगभग रात 11:57 बजे से 5 सितंबर को 12:43 बजे तक रहेगा। वहीं उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में समय कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। उदाहरण के लिए बलरामपुर में यह समय 11:38 बजे से 12:23 बजे तक दिया गया है।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें-</strong> <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-date-vrat-paran-time-jayanti-yog-article-156017852" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>जन्माष्टमी 2026 पर दुर्लभ जयंती योग का संयोग, जानें व्रत और पारण का सही समय</strong></a></p><p><h2>जन्मोत्सव में आधी रात का महत्व</h2></p><p>निशीथ काल शुरू होते ही भक्त श्रीकृष्ण के जन्म की प्रतीक्षा करते हैं। मंदिरों और घरों में बाल गोपाल का पंचामृत से अभिषेक, नए वस्त्र और आभूषणों से श्रृंगार, आरती तथा माखन-मिश्री और अन्य भोग अर्पित करने की परंपरा है। कई स्थानों पर कारागार में श्रीकृष्ण के जन्म की झांकी भी सजाई जाती है। घड़ी जैसे ही जन्म के निर्धारित समय के करीब पहुंचती है, शंख-घंटियों की ध्वनि और 'नंद के घर आनंद भयो' जैसे भजनों से वातावरण भक्तिमय हो उठता है।</p><p><h2>12 बजे पूजा का महत्व</p><p></h2>जन्माष्टमी का असली गणित केवल घड़ी में 12 बजने तक सीमित नहीं है। अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और निशीथ काल इन तीनों की स्थिति को देखकर पर्व और पूजा का समय निर्धारित किया जाता है। इसी कारण अलग-अलग शहरों और परंपराओं में मुहूर्त कुछ मिनट अलग दिखाई दे सकता है। यानी आधी रात का जन्मोत्सव महज एक परंपरा नहीं, बल्कि श्रीकृष्ण के जन्म से जुड़ी धार्मिक मान्यता और पंचांग की गणना का सुंदर मेल है। यही वजह है कि दिनभर के व्रत के बाद भक्त उस विशेष निशीथ क्षण की प्रतीक्षा करते हैं, जब उनके आराध्य के बाल स्वरूप का जन्मोत्सव मनाया जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156019623</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 19:40:26 +0530</pubDate><title><![CDATA[ विवाह में देरी से हैं परेशान? इन प्राचीन मंदिरों में पूजा से बाधाएं दूर होने की है मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Temples for Marriage: देश में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पूजा करने और प्रार्थना करने से विवाह से जुड़ी परेशानियां दूर हो सकती हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/temples-in-india-believed-to-remove-marriage-obstacles-article-156019623 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156019618,thumbsize-82341,width-1280,height-720,resizemode-75/156019618.jpg" alt="temples in india believed to remove marriage obstacles" /></div><p><strong>Temples for Marriage: </strong>शादी में लगातार देरी हो रही है? बार-बार रिश्ते बनने के बाद बात नहीं बन पाती है? ऐसी स्थिति में चिंता होना स्वाभाविक है। भगवान से अच्छे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की प्रार्थना के लिए ऐसे में लोग मंदिरों का रुख करते हैं। देश में ऐसे कई मंदिर हैं, जिनके बारे में मान्यता है कि यहां सच्चे मन से प्रार्थना करने से विवाह से जुड़ी परेशानियां दूर हो सकती हैं। आइए जानते हैं भारत के कुछ ऐसे मंदिरों के बारे में, जहां लोग शादी की मनोकामना लेकर पहुंचते हैं।</p><p><h2>1- नित्यकल्याण पेरुमल मंदिर, तिरुविदंथई</h2></p><p>तमिलनाडु में स्थित नित्यकल्याण पेरुमल मंदिर भगवान विष्णु के वराह रूप से जुड़ा हुआ है। इस मंदिर की सबसे खास बात यहां होने वाली विवाह से जुड़ी परंपरा है। शादी में देरी का सामना कर रहे कई श्रद्धालु यहां आकर पूजा करते हैं और भगवान से अपने लिए अच्छे जीवनसाथी की प्रार्थना करते हैं।</p><p><h2>2- तिरुमानांचेरी मंदिर, तमिलनाडु</h2></p><p>तमिलनाडु के कुम्बकोणम के पास स्थित तिरुमानांचेरी मंदिर भगवान शिव और देवी पार्वती से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। शादी में देरी या रिश्ते में बार-बार परेशानी आने वाले लोग यहां दर्शन करने पहुंचते हैं। </p><p><h2>3- कात्यायनी मंदिर, दिल्ली</h2></p><p>दिल्ली के छतरपुर इलाके में स्थित कात्यायनी मंदिर भी विवाह की मनोकामना से जुड़ी मान्यताओं के लिए जाना जाता है। कई अविवाहित महिलाएं यहां मां कात्यायनी की पूजा करती हैं और मनचाहे जीवनसाथी की कामना करती हैं। </p><p><h2>4- श्रीनिवास मंगलापुरम मंदिर, आंध्र प्रदेश</h2></p><p>तिरुपति के पास स्थित श्रीनिवास मंगलापुरम मंदिर भगवान कल्याण वेंकटेश्वर को समर्पित है। मान्यता है कि यहां भगवान का आशीर्वाद लेने से वैवाहिक जीवन से जुड़ी परेशानियों में राहत मिल सकती है। अविवाहित लोग अच्छे जीवनसाथी की इच्छा से यहां आते हैं, वहीं शादीशुदा जोड़े अपने रिश्ते में सुख और शांति की प्रार्थना करते हैं।</p><p><h2>5- श्रीकालहस्ती मंदिर, आंध्र प्रदेश</h2></p><p>आंध्र प्रदेश का श्रीकालहस्ती मंदिर भगवान शिव को समर्पित प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह मंदिर खास तौर पर राहु-केतु पूजा के लिए जाना जाता है। ज्योतिष से जुड़ी मान्यताओं में राहु-केतु के प्रभाव को जीवन में आने वाली कई तरह की परेशानियों से जोड़ा जाता है। कुछ लोग विवाह में देरी को भी ग्रहों की स्थिति से जोड़ते हैं। ऐसे में श्रद्धालु यहां राहु-केतु की पूजा करवाते हैं और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होने की प्रार्थना करते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156019005</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 18:08:07 +0530</pubDate><title><![CDATA[ योग और ध्यान में क्यों खास हैं 7 चक्र? जानें इनके बारे में सबकुछ ]]></title><description><![CDATA[ Seven Energy Centers: शरीर में 7 प्रमुख चक्र माने जाते हैं। ये रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से लेकर सिर के ऊपरी हिस्से तक बताए गए हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/seven-energy-centers-chakra-meaning-chakra-meditation-article-156019005 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156019014,thumbsize-147760,width-1280,height-720,resizemode-75/156019014.jpg" alt="seven energy centers chakra meaning chakra meditation" /></div><p><strong>Seven Energy Centers: </strong>योग, ध्यान और आध्यात्मिकता की बात करते समय चक्रों के बारे में आपने जरूर सुना होगा। अगर आपके मन में सवाल है कि आखिर ये चक्र होते क्या हैं और इनका हमारे जीवन से क्या संबंध है तो ये आर्टिकल आपके बेहद काम आ सकता है। योग और भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में चक्रों को शरीर के ऊर्जा केंद्रों के रूप में समझाया गया है। चक्र शब्द संस्कृत से आया है, जिसका सामान्य अर्थ पहिया या घूमता हुआ चक्र होता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार शरीर में सात प्रमुख चक्र माने जाते हैं। ये रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से से लेकर सिर के ऊपरी हिस्से तक बताए गए हैं। हर चक्र का अपना अलग नाम, स्थान, रंग और उससे जुड़ी अलग मान्यता है।</p><p><h2>1. मूलाधार चक्र</h2></p><p>मूलाधार को सात प्रमुख चक्रों में सबसे नीचे का चक्र माना जाता है। इसे रीढ़ की हड्डी के आधार के आसपास स्थित बताया जाता है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह चक्र सुरक्षा, स्थिरता और जमीन से जुड़े रहने की भावना का प्रतीक है। इसका संबंध लाल रंग से जोड़ा जाता है।</p><p><h2>2. स्वाधिष्ठान चक्र</h2></p><p>स्वाधिष्ठान चक्र को नाभि के नीचे के हिस्से से जोड़ा जाता है और इसका रंग नारंगी माना जाता है। इसे भावनाओं, रचनात्मकता और आनंद से संबंधित माना जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के मुताबिक इस चक्र का संतुलन व्यक्ति को अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से समझने और रचनात्मक कामों में रुचि लेने में मदद कर सकता है।</p><p><h2>3. मणिपूर चक्र</h2></p><p>मणिपूर चक्र को पेट के ऊपरी हिस्से से जोड़ा जाता है। इसका रंग पीला माना जाता है। इसे आत्मविश्वास, इच्छाशक्ति और आंतरिक शक्ति का प्रतीक बताया जाता है। मान्यता है कि यह चक्र संतुलित होने पर व्यक्ति अपने फैसलों को लेकर ज्यादा आत्मविश्वास महसूस कर सकता है। वहीं असंतुलन की स्थिति को आत्म-संदेह और कमजोरी जैसी भावनाओं से जोड़ा जाता है।</p><p><h2>4. अनाहत चक्र</h2></p><p>अनाहत चक्र का संबंध छाती के बीच वाले हिस्से से माना जाता है। इसका रंग हरा बताया जाता है। यह चक्र प्रेम, करुणा, दया और भावनात्मक जुड़ाव से जुड़ा हुआ माना जाता है। दूसरों के प्रति प्रेम और सम्मान रखना, अपने करीबी लोगों के साथ समय बिताना और छोटी-छोटी चीजों के लिए आभार व्यक्त करना इससे जुड़े सकारात्मक अभ्यास माने जाते हैं।</p><p><h2>5. विशुद्ध चक्र</h2></p><p>विशुद्ध चक्र गले के हिस्से से जुड़ा माना जाता है और इसका रंग नीला बताया जाता है। इसे अपनी बात खुलकर और ईमानदारी से कहने की क्षमता से जोड़ा जाता है। कई आध्यात्मिक परंपराओं में माना जाता है कि यह चक्र व्यक्ति के संवाद और अभिव्यक्ति से संबंधित है। </p><p><h2>6. आज्ञा चक्र</h2></p><p>आज्ञा चक्र को आमतौर पर दोनों भौंहों के बीच का स्थान माना जाता है। इसे तीसरी आंख भी कहा जाता है और इसका रंग इंडिगो बताया जाता है। पारंपरिक मान्यता में यह चक्र समझ, एकाग्रता, अंतर्ज्ञान और भीतर की स्पष्टता से जुड़ा है। </p><p><h2>7. सहस्रार चक्र</h2></p><p>सहस्रार को सातों प्रमुख चक्रों में सबसे ऊपर माना जाता है। इसका स्थान सिर के शीर्ष पर बताया जाता है। इसका संबंध बैंगनी या सफेद रंग से जोड़ा जाता है। आध्यात्मिक परंपराओं में इसे चेतना, आत्मिक विकास और आध्यात्मिक जुड़ाव से संबंधित माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017289</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 14:29:40 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bhadrapada Month 2026: भाद्रपद माह की पूजा जानकारी हिंदी में- भादो मास का महत्व, पूजा विधि, मंत्र, कथा, नियम आदि ]]></title><description><![CDATA[ Bhadrapada Month: भाद्रपद माह का आरंभ हो गया है, जो सितंबर 2026 के अंत तक चलेगा। चलिए जानते हैं भाद्रपद माह के महत्व, नियम, व्रत-त्योहार, पूजा विधि, खान-पान से जुड़े नियम और भादो माह से जुड़ी हर जरूरी जानकारी के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/bhadrapada-month-deatils-in-hindi-bhado-maas-ki-puri-jankari-article-156017289 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017767,thumbsize-148650,width-1280,height-720,resizemode-75/156017767.jpg" alt="bhadrapada month deatils in hindi bhado maas ki puri jankari" /></div><p><strong>Bhadrapada Month 2026:</strong> 29 अगस्त 2026, शनिवार से भाद्रपद माह की शुरुआत हो गई है, जिसे आम बोलचाल की भाषा में भादो कहा जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद वर्ष का छठा महीना होता है, जो आमतौर पर अगस्त और सितंबर के बीच पड़ता है। इस महीने में कई महत्वपूर्ण व्रत और त्योहार आते हैं। साथ ही प्रमुख ग्रहों की चाल में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिलेगा यानी कुछ ग्रहों का राशि और नक्षत्र परिवर्तन होगा, जिनका गहरा प्रभाव 12 राशियों के करियर, आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य, लव लाइफ और जीवन के अन्य पहलुओं पर पड़ेगा। </p><p>आज यहां पर आप भाद्रपद माह 2026 की शुरुआत और समाप्ति तिथि क्या है, इस महीने में कौन-कौन से प्रमुख व्रत और त्योहार हैं, भादो में क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, इस माह का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है, इस दौरान मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं या नहीं, दान-पुण्य से जुड़े नियम क्या हैं और भाद्रपद मास का नाम ‘भादो’ क्यों पड़ा और इसका क्या अर्थ है आदि सवालों के जवाब विस्तार से जानेंगे।</p><p><h2><strong>भाद्रपद मास का नाम 'भादो' क्यों पड़ा और इसका क्या अर्थ है?</p><p></strong></h2></p><p>जब पूर्णिमा के दिन चंद्रमा रहता है तो उसके आधार पर हिन्दू पंचांग में चंद्र मास का नाम तय होता है। भाद्रपद महीने की पूर्णिमा तिथि को 'पूर्वा भाद्रपद' या 'उत्तरा भाद्रपद' नक्षत्र के पास चंद्रमा होता है, जिसकी वजह से इस महीने को भाद्रपद कहा जाता है। भाद्रपद संस्कृत का शब्द है, जिसे बोलचाल के रूप में 'भादो' नाम से जाना जाता है। भादो 'भाद्र' और 'पद' शब्द से मिलकर बना है। इसमें भद्र का अर्थ कल्याणकारी, शुभ या भला है, जबकि पद स्थान या चरण को दर्शाता है।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह 2026 कब से कब तक है?</p><p></strong></h2></p><p>द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में 29 अगस्त से लेकर 26 सितंबर तक भाद्रपद (bhadrapada month 2026 start date and end date) का महीना चलेगा। इस बार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 28 अगस्त 2026 की सुबह 09 बजकर 48 मिनट से हुआ है। वहीं, भादो का समापन 26 सितंबर 2026, शनिवार को रात 10 बजकर 18 मिनट पर भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के साथ होगा।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में किन-किन देवी-देवताओं की पूजा की जाती है?</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद (भादो) के पवित्र महीने में मुख्य रूप से भगवान कृष्ण, राधा रानी, भगवान गणेश और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती की उपासना करने का खास महत्व है।</p><p>            <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017599,width-540,height-303,resizemode-75/156017599.jpg" alt="भाद्रपद माह किस भगवान को समर्पित है?" title="भाद्रपद माह किस भगवान को समर्पित है?"/></p><p><h2>भाद्रपद माह में श्रीकृष्ण और शिव जी की पूजा की सही विधि क्या है?</p><p></h2></p><p><h3><strong>भगवान कृष्ण की पूजा विधि</p><p></strong></h3><ul><li>सुबह जल्दी उठकर स्नान करें।</li><li>घर में स्थापित श्रीकृष्ण की मूर्ति का पंचामृत से स्नान करें।</li><li>भगवान को पीले वस्त्र पहनाएं और श्रृंगार करें। साथ ही रोली, अक्षत, पीले फूल, फल, मिठाई और तुलसी दल अर्पित करें।</li><li>ॐ श्रीकृष्णाय नमः या ॐ गोविन्दाय नमः मंत्र का 108 बार जाप करें।</li><li>घी का दीपक जलाने के बाद आरती करें।</li></ul></p><p><h3><strong>भगवान शिव की पूजा विधि</p><p></strong></h3><ul><li>स्नान करके तैयार होने के बाद घर में स्थापित शिवलिंग का शुद्ध जल, गंगाजल या दूध से अभिषेक करें।</li><li>शिव जी को जल, बेलपत्र, धतूरा, भांग, भस्म, फल, फूल, मिठाई और सफेद चंदन अर्पित करें।</li><li>ॐ नमः शिवाय या पंचाक्षरी मंत्र का 108 बार जाप करें।</li><li>घी का दीपक जलाने के बाद आरती करें।</li></ul><h2><strong>भाद्रपद मास में कौन से मंत्रों का जाप करने से विशेष लाभ मिलता है?</p><p></strong></h2></p><p><h3><strong>कृष्ण जी का मंत्र- </p><p></strong></h3>ॐ नमो भगवते वासुदेवाय या कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः।।</p><p><ul><li><strong>लाभ:</strong> भगवान कृष्ण की कृपा से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मानसिक शांति मिलती है। साथ ही जीवन में प्रेम का स्थायी वास होता है।</li></ul><strong><h3>गणेश जी का मंत्र- </p><p></h3></strong>ॐ गं गणपतये नमः।।</p><p><ul><li><strong>लाभ:</strong> गणेश जी की कृपा से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और मुश्किल से मुश्किल कार्य में सफलता मिलती है।</li></ul></p><p><h3><strong>शिव जी का मंत्र-</p><p></strong></h3>ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् या ॐ सांब सदा शिवाय नमः।।</p><p><ul><li><strong>लाभ:</strong> शिव जी की कृपा से भय, नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियों से मुक्ति मिलती है। साथ ही बीमारियों का प्रभाव कम होता है।</li></ul></p><p><h2>भाद्रपद माह की कथा</h2></p><p>भाद्रपद के महीने का सीधा संबंध संसार में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश से है। द्वापर युग में जब पृथ्वी पर असुरराज कंस का अत्याचार लगातार बढ़ता जा रहा था तो भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर रोहिणी नक्षत्र में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था। कृष्ण जी ने लोगों को कंस के भय से मुक्ति दिलाई, जिसके बाद संपूर्ण जगत में प्रेम व भक्ति की स्थापना हुई। इसके अलावा भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तिथि को विघ्नहर्ता श्री गणेश का प्राकट्य हुआ था। गणेश जी ने न सिर्फ देवताओं के संकटों का हरण किया, बल्कि सृष्टि में ऋद्धि-सिद्धि का विस्तार भी किया।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में कौन-कौन से मुख्य व्रत और त्योहार हैं? (bhadrapada month 2026 vrat and tyohar)</p><p></strong></h2></p><p><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th>तारीख</th><th>दिन</th><th>व्रत / त्योहार / दिवस</th></tr></thead><tbody><tr><td>31 अगस्त 2026</td><td>सोमवार</td><td>कजरी तीज, बहुला चतुर्थी, हेरम्ब संकष्टी और महा संकटहरा चतुर्थी</td></tr><tr><td>1 सितंबर 2026</td><td>मंगलवार</td><td>नाग पंचमी (गुजरात और बंगाल- अमांत कैलेंडर)</td></tr><tr><td>2 सितंबर 2026</td><td>बुधवार</td><td>हल षष्ठी और रांधण छठ (शीतला माता)</td></tr><tr><td>3 सितंबर 2026</td><td>गुरुवार</td><td>शीतला सातम और मासिक कार्तिगाई</td></tr><tr><td>4 सितंबर 2026</td><td>शुक्रवार</td><td>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, आद्याकाली जयंती, विन्ध्यवासिनी जयंती, मासिक कालाष्टमी, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी रोहिणी, अगस्त्य अर्घ्य औररोहिणी व्रत</td></tr><tr><td>5 सितंबर 2026</td><td>शनिवार</td><td>दही हांडी, श्री गोगा नवमी और शिक्षक दिवस</td></tr><tr><td>7 सितंबर 2026</td><td>सोमवार</td><td>अजा एकादशी और बछ बारस द्वादशी</td></tr><tr><td>8 सितंबर 2026</td><td>मंगलवार</td><td>भौम प्रदोष व्रत, कृष्ण दामोदर द्वादशी और पर्युषण पर्व</td></tr><tr><td>9 सितंबर 2026</td><td>बुधवार</td><td>मासिक शिवरात्रि</td></tr><tr><td>10 सितंबर 2026</td><td>गुरुवार</td><td>पिठोरी अमावस्या और दर्श अमावस्या</td></tr><tr><td>11 सितंबर 2026</td><td>शुक्रवार</td><td>भाद्रपद अमावस्या, पोला औरवृषभोत्सव</td></tr><tr><td>12 सितंबर 2026</td><td>शनिवार</td><td>सामवेद उपाकर्म</td></tr><tr><td>13 सितंबर 2026</td><td>रविवार</td><td>वराह जयंती और चंद्र दर्शन</td></tr><tr><td>14 सितंबर 2026</td><td>सोमवार</td><td>हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी, गौरी हब्बा, मलयालम विनायक चतुर्थी, सिद्धिविनायक चतुर्थी और हिंदी दिवस</td></tr><tr><td>15 सितंबर 2026</td><td>मंगलवार</td><td>विश्वकर्मा जयंती, इंजीनियर्स डे, संवत्सरी पर्व और ऋषि पंचमी</td></tr><tr><td>16 सितंबर 2026</td><td>बुधवार</td><td>स्कंद षष्ठी और बलराम जयंती</td></tr><tr><td>17 सितंबर 2026</td><td>गुरुवार</td><td>कन्या संक्रांति, विश्वकर्मा पूजा और ज्येष्ठ गौरी आवाहन</td></tr><tr><td>18 सितंबर 2026</td><td>शुक्रवार</td><td>दूर्वा अष्टमी, ज्येष्ठ गौरी पूजा और ललिता सप्तमी</td></tr><tr><td>19 सितंबर 2026</td><td>शनिवार</td><td>राधा अष्टमी, दधीचि जयंती, ज्येष्ठ गौरी विसर्जन, मासिक दुर्गाष्टमी औरमहालक्ष्मी व्रत का आरंभ</td></tr><tr><td>21 सितंबर 2026</td><td>सोमवार</td><td>दशावतार व्रत</td></tr><tr><td>22 सितंबर 2026</td><td>मंगलवार</td><td>परिवर्तिनी एकादशी औरकल्कि द्वादशी</td></tr><tr><td>23 सितंबर 2026</td><td>बुधवार</td><td>भुवनेश्वरी जयंती और वामन जयंती</td></tr><tr><td>24 सितंबर 2026</td><td>गुरुवार</td><td>गुरु प्रदोष व्रत</td></tr><tr><td>25 सितंबर 2026</td><td>शुक्रवार</td><td>गणेश विसर्जन और अनंत चतुर्दशी (अनंत चौदस)</td></tr><tr><td>26 सितंबर 2026</td><td>शनिवार</td><td>भाद्रपद पूर्णिमा व्रत</td></tr></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody></table></p><p><h2><strong>भाद्रपद (भादो) के महीने में क्या खाना चाहिए? (bhadrapada month me kya khana chahiye)</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद के महीने में ताजा, हल्का और आसानी से पचने वाला सात्विक भोजन करना चाहिए। इसके साथ ही गाय का दूध, गाय का घी और मक्खन खाना सेहत के लिए फायदेमंद रहता है।</p><p><h2><strong>भाद्रपद (भादो) के महीने में क्या नहीं खाना चाहिए? (bhadrapada month me kya nahi khana chahiye)</p><p></strong></h2></p><p>भादो के महीने में दही खाना वर्जित है। इस मौसम में नमी और बैक्टीरिया दही में ज्यादा पनपते हैं, जिसके कारण दही जल्दी खराब हो जाती है। यदि आप खराब दही खाते हैं तो आपका पाचन दुरुस्त नहीं रहेगा। इसके अलावा कीड़े व बैक्टीरिया के पनपने के कारण भादो में हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन करना भी मना होता है। इस माह बासी भोजन भी न खाएं। साथ ही बैंगन, मूली, गुड़, तामसिक और मांसाहारी भोजन का सेवन करने से बचें।</p><p><strong><h2>भादो में मांगलिक कार्य क्यों नहीं किए जाते? (bhadrapad maas mein shubh kaam kyu nhi kiye jate)</p><p></h2></strong></p><p>भाद्रपद (भादो) का महीना चातुर्मास में पड़ता है, जिस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं। विष्णु जी जिस दौरान योगनिद्रा में होते हैं, उस समय विवाह, मुंडन, सगाई और गृह प्रवेश आदि जैसे मांगलिक कार्य करने पूरी तरह से वर्जित होते हैं। केवल इसी वजह से भादो के महीने में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।</p><p>            <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017608,width-540,height-303,resizemode-75/156017608.jpg" alt="भादो में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं" title="भादो में मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं"/></p><p><h2><strong>भाद्रपद पूर्णिमा से पितृ पक्ष (श्राद्ध) कब शुरू होंगे?</p><p></strong></h2></p><p>26 सितंबर 2026 को भाद्रपद का महीना समाप्त हो जाएगा, जिसके कारण इस दिन भाद्रपद पूर्णिमा मनाई जाएगी। भाद्रपद पूर्णिमा के समाप्त होते ही पितृ पक्ष (श्राद्ध) का आरंभ हो जाएगा। 26 सितंबर 2026 को देर रात 10 बजकर 18 मिनट पर भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि समाप्त हो रही है, जिससे अगले पल से ही भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा तिथि (पितृ पक्ष 2026) शुरू हो जाएगी। साल 2026 में पितृ पक्ष 27 सितंबर से लेकर 10 अक्टूबर तक रहेगा।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह का वैज्ञानिक महत्व क्या है?</p><p></strong></h2></p><p>भाद्रपद के महीने का प्रत्येक व्यक्ति के शरीर और खान-पान पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आयुर्वेद और ऋतु विज्ञान के अनुसार, इस महीने में वर्षा ऋतु के कारण वातावरण में नमी और उमस अधिक होती है, जिससे बैक्टीरिया और संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में पेट से जुड़े रोग, संक्रमण और त्वचा संबंधी समस्याओं के होने की संभावना अधिक रहती है। </p><p><h2><strong>भाद्रपद महीने में किन चीजों का दान करना चाहिए और किनका नहीं? </p><p></strong></h2>मान्यता है कि जो लोग भाद्रपद माह (bhadrapad maas me kin cheejo ka daan karna chahiye) में छाता, जूते-चप्पल, पीले रंग के वस्त्र, चने की दाल, मक्खन, मिश्री, अन्न और धन का दान करते हैं, उन्हें देवी-देवताओं के साथ-साथ नवग्रहों की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। साथ ही पुण्य मिलता है। वहीं, जो लोग भादो में फटी या पुरानी धार्मिक किताबें, इस्तेमाल की गई वस्तुएं, खंडित सामान, तामसिक भोजन, गुड़, प्लास्टिक या कांच के बर्तन, दही, शहद और कच्ची सब्जियों का दान करते हैं, वो हमेशा परेशान रहते हैं।</p><p>            <img src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017604,width-540,height-303,resizemode-75/156017604.jpg" alt="दान करते समय दें इन बातों पर विशेष ध्यान" title="दान करते समय दें इन बातों पर विशेष ध्यान"/></p><p><h2><strong>भाद्रपद मास में किन नियमों का पालन करना चाहिए? (bhadrapad maas niyam)</p><p></strong></h2><ul><li>पूरे महीने दही या उससे बनी किसी भी चीज का सेवन नहीं करना चाहिए। </li><li>कच्ची, बासी और तामसिक चीजें खाने से बचना चाहिए। </li><li>आलस को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए।</li><li>बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए।</li><li>मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए।</li><li>शरीर पर तेल की मालिश नहीं करनी चाहिए।</li><li>क्रोध, झूठ, अपमान और धार्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन आदि नकारात्मक चीजों से दूर रहना चाहिए।</li><li> नया व्यापार या किसी भी नए काम की शुरुआत नहीं करनी चाहिए।</li><li>सोना-चांदी, काले रंग की वस्तुएं, वाहन और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स खरीदने से बचना चाहिए।</li><li>आध्यात्मिक साधना, जप और तप का मन से पालन करना चाहिए।</li><li>गृहस्थों और विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य का सख्ती से पालन करना चाहिए।</li><li>प्रतिदिन तुलसी माता की पूजा करें और उनके पास दीपक प्रज्वलित करें।</li></ul></p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में तुलसी की पूजा करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?</p><p></strong></h2></p><p>भाद्रपद के महीने में देवी तुलसी की पूजा करना शुभ होता है, लेकिन उनकी पूजा के दौरान कुछ विशेष सावधानियों को अपनाना होता है। जैसे कि तुलसी की पूजा उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके ही करनी चाहिए। तुलसी के पौधे में जल सूर्योदय के आसपास ही अर्पित करना चाहिए। रविवार और एकादशी के दिन तुलसी के पौधे में जल नहीं चढ़ाना चाहिए और न ही पत्तों को छूना चाहिए। पूजा या भोग में तुलसी दल (पत्ते) की जरूरत है तो उसे सुबह के समय ही तोड़ लें। सूर्यास्त के बाद या रात के समय तुलसी के पत्ते तोड़ने से महापाप लग सकता है। </p><p>बता दें कि तुलसी के पत्ते को खींचकर या जबरदस्ती नहीं तोड़ना चाहिए। तुलसी माता को प्रणाम करने के बाद ही तुलसी का पत्ता तोड़ना चाहिए।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में जन्म लेने वाले लोग कैसे होते हैं?</p><p></strong></h2></p><p>वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भाद्रपद का महीना अगस्त और सितंबर में पड़ता है, जिस दौरान जन्मे बच्चे भाग्यशाली, मददगार, सच्चे और बड़े दिल वाले होते हैं। ये कभी किसी का गलत नहीं सोचते हैं, बल्कि दूसरों की मदद करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। कभी-कभी ये अपनी सनक में ऐसे काम भी कर देते हैं, जिन्हें पूरा करना काफी मुश्किल होता है।</p><p><h2>भाद्रपद माह में करने वाले उपाय</p><p></h2>भाद्रपद माह में भगवान कृष्ण की नियमित रूप से पूजा करें। साथ ही उन्हें रोजाना तुलसी दल अर्पित करें। इस दौरान "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 जाप करें। इससे आपके जीवन में स्थिरता आएगी और प्यार बढ़ेगा। इसके अलावा बुद्धि और सफलता के लिए गणेश जी को रोजाना सुबह दूर्वा और मोदक अर्पित करें।</p><p>यदि आप चाहते हैं कि आपके घर में सदा सुख-शांति बनी रहे तो इसके लिए भाद्रपद के पवित्र महीने में अपने घर की उत्तर, पूर्व या ईशान कोण दिशा में तुलसी का पौधा लगाएं। नियमित रूप से तुलसी के पौधे की पूजा करें और उसमें जल अर्पित करें। शाम के समय तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाना भी शुभ रहेगा। स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए तुलसी दल यानी पत्ते को दूध या चाय में उबालकर आप पी भी सकते हैं। </p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017705</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 14:11:47 +0530</pubDate><title><![CDATA[ नीम करौली बाबा नाम आखिर पड़ा कैसे? ट्रेन की वो कहानी, जिसने बदल दी महाराज जी की पहचान ]]></title><description><![CDATA[ Neem Karoli Baba story: महाराज जी को नीम करौली बाबा नाम कैसे मिला और इसके पीछे कौन-सा दिलचस्प किस्सा जुड़ा है। इस कहानी का हर मोड़ बेहद दिलचस्प रहने वाला है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/why-maharaj-ji-called-neem-karoli-baba-know-the-story-article-156017705 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017704,thumbsize-389265,width-1280,height-720,resizemode-75/156017704.jpg" alt="why maharaj ji called neem karoli baba know the story" /></div><p><strong>Neem Karoli Baba story: </strong>नीम करौली बाबा नाम के पीछे आखिर क्या कहानी है? कैसे एक ऐसा वाकया हुआ, जिसने महाराज जी की पहचान ही बदल दी। इस कहानी का हर मोड़ बेहद दिलचस्प रहने वाला है। यह बात कई साल पुरानी है। उस समय महाराज जी की उम्र शायद 20 के आखिरी सालों या 30 की शुरुआत में रही होगी। कई दिनों से उन्हें किसी ने खाना नहीं दिया था। इसके बाद भूख की वजह से पास के शहर जाने के लिए महाराज जी एक ट्रेन में सवार हो गए थे।</p><p><h2>बिना टिकट फर्स्ट क्लास में बैठे थे महाराज जी</h2></p><p>महाराज जी ट्रेन के फर्स्ट क्लास डिब्बे में बैठे थे। उनके पास टिकट नहीं था। जब कंडक्टर को इसका पता चला तो उसने इमरजेंसी ब्रेक खींच दिया और ट्रेन रुक गई। कंडक्टर और महाराज जी के बीच कुछ देर बहस हुई। इसके बाद महाराज जी को ट्रेन से नीचे उतार दिया गया। ट्रेन जिस जगह रुकी थी, वह नीब करौरी गांव के पास थी। ट्रेन से उतरने के बाद महाराज जी एक पेड़ की छांव में जाकर बैठ गए। दूसरी तरफ कंडक्टर ने सीटी बजाई और ड्राइवर ने ट्रेन चलाने के लिए इंजन की गति बढ़ाई। लेकिन ट्रेन टस से मस नहीं हुई।</p><p><h2>एक स्थानीय मजिस्ट्रेट ने दिया महाराज जी को वापस बुलाने का सुझाव</h2></p><p>महाराज जी को ट्रेन से उतारने के बाद ट्रेन को चलाने की हर कोशिश की गई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद ट्रेन को धक्का देने के लिए एक दूसरा इंजन भी बुलाया गया, लेकिन उससे भी ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। वहां एक स्थानीय मजिस्ट्रेट थे, जिनका एक हाथ नहीं था। वे महाराज जी को जानते थे। उन्होंने रेलवे अधिकारियों से कहा कि इस युवा साधु को वापस ट्रेन में बैठने के लिए मनाओ। शुरुआत में रेलवे अधिकारी इस बात से हैरान हुए। उन्हें यह सिर्फ अंधविश्वास लगा। लेकिन ट्रेन को चलाने की तमाम कोशिशें नाकाम होने के बाद उन्होंने आखिरकार इस सुझाव को आजमाने का फैसला किया।</p><p><h2>महाराज जी ने रखीं दो शर्तें</h2></p><p>कई यात्री और रेलवे अधिकारी महाराज जी के पास पहुंचे। वे अपने साथ खाना और मिठाइयां लेकर आए थे। उन्होंने महाराज जी से ट्रेन में वापस बैठने की गुजारिश की। महाराज जी ट्रेन में चढ़ने के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने इसके लिए दो शर्तें रखीं। पहली शर्त थी कि रेलवे अधिकारियों को नीब करौरी गांव में एक रेलवे स्टेशन बनवाने का वादा करना होगा। उस समय गांव के लोगों को नजदीकी रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के लिए कई मील पैदल चलना पड़ता था। दूसरी शर्त थी कि रेलवे को आगे से साधुओं के साथ बेहतर व्यवहार करना होगा। रेलवे अधिकारियों ने वादा किया कि वे अपनी तरफ से जो कुछ कर सकते हैं, वह करेंगे। इसके बाद महाराज जी फिर से ट्रेन में बैठ गए।</p><p><h2>महाराज जी के बैठने के बाद भी एक दिलचस्प बात हुई</h2></p><p>इसके बाद रेलवे अधिकारियों ने महाराज जी से कहा कि अब वे ट्रेन को चलवा दें। महाराज जी इस बात पर नाराज हो गए और गुस्से में बोले, -क्या ट्रेन चलाना भी मेरे जिम्मे है?' इसके बाद इंजीनियर ने ट्रेन चलाने की कोशिश की। ट्रेन कुछ गज आगे बढ़ी। लेकिन फिर इंजीनियर ने ट्रेन रोक दी और कहा, 'जब तक साधु मुझे आगे बढ़ने का आदेश नहीं देंगे, मैं ट्रेन आगे नहीं ले जाऊंगा।' महाराज जी ने कहा, 'इसे जाने दो।' इसके बाद ट्रेन आगे बढ़ गई। इस घटना के कुछ समय बाद नीब करौरी में रेलवे स्टेशन बनाया गया और ट्रेन में साधुओं के साथ ज्यादा सम्मान से व्यवहार किया जाने लगा।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017490</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 13:27:22 +0530</pubDate><title><![CDATA[ विशाखापट्टनम का सिंहाचलम मंदिर क्यों है इतना खास? जानें कथा, महत्व और पूजा विधि ]]></title><description><![CDATA[ सिम्हाचलम मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीनता नहीं है। यहां भगवान नरसिंह के जिस स्वरूप की पूजा होती है, वह इसे देश के दूसरे नरसिंह मंदिरों से अलग पहचान देता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/simhachalam-temple-visakhapatnam-varaha-lakshmi-narasimha-temple-article-156017490 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017488,thumbsize-218061,width-1280,height-720,resizemode-75/156017488.jpg" alt="simhachalam temple visakhapatnam varaha lakshmi narasimha temple" /></div><p>आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में स्थित सिम्हाचलम मंदिर (Simhachalam Temple) भगवान नरसिंह को समर्पित प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। इस मंदिर को श्री वराह लक्ष्मी नरसिंह स्वामी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। खास बात यह है कि यहां भगवान नरसिंह का स्वरूप दूसरे नरसिंह मंदिरों से थोड़ा अलग माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां भगवान विष्णु ने वराह और नरसिंह के स्वरूप का एक विशेष रूप धारण किया था।</p><p><h2>क्या है सिम्हाचलम मंदिर की पौराणिक कहानी?</h2></p><p>सिम्हाचलम मंदिर की कहानी भगवान नरसिंह, भक्त प्रह्लाद और राक्षस राजा हिरण्यकशिपु से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार, हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु का विरोधी था, जबकि उसका बेटा प्रह्लाद भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। जब भगवान नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया, तो उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। मान्यता है कि प्रह्लाद ने भगवान से प्रार्थना की। इसके बाद भगवान विष्णु ने वराह और नरसिंह के गुणों से युक्त एक विशेष स्वरूप धारण किया। इसी स्वरूप को वराह लक्ष्मी नरसिंह कहा जाता है। इसी वजह से सिम्हाचलम मंदिर को भगवान विष्णु के इस अनोखे स्वरूप का प्रमुख धाम माना जाता है।</p><p><h2>क्यों पड़ा नाम सिम्हाचलम?</h2></p><p>'सिम्हाचलम' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना माना जाता है। 'सिम्हा' यानी सिंह और 'अचलम' यानी पहाड़ी। आसान भाषा में इसका अर्थ हुआ सिंह की पहाड़ी। मंदिर एक पहाड़ी पर बना है और इसी वजह से इसका नाम सिम्हाचलम पड़ा। धार्मिक मान्यताओं में इस स्थान को बेहद पवित्र माना गया है। स्कंद पुराण और वराह पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इस तीर्थ का उल्लेख मिलने की बात कही जाती है।</p><p><h2>कैसे होती है भगवान नरसिंह की पूजा</h2></p><p>सिम्हाचलम मंदिर में पूजा-पद्धति पारंपरिक वैखानस आगम परंपरा के अनुसार की जाती है। यहां सुबह से ही भगवान की पूजा और अलग-अलग धार्मिक सेवाएं शुरू हो जाती हैं। सुबह भगवान की सुप्रभात सेवा की जाती है। इसके बाद नियमित पूजा, अर्चना, फूल और धूप आदि से भगवान का श्रृंगार किया जाता है। सुबह और शाम आरती भी होती है। त्योहारों के समय मंदिर में विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इनमें नरसिंह जयंती और चंदन यात्रा का विशेष महत्व माना जाता है।</p><p><h2>क्यों खास है सिम्हाचलम मंदिर</h2></p><p>सिम्हाचलम मंदिर की खासियत सिर्फ इसकी प्राचीनता नहीं है। यहां भगवान नरसिंह के जिस स्वरूप की पूजा होती है, वह इसे देश के दूसरे नरसिंह मंदिरों से अलग पहचान देता है। इसके अलावा पहाड़ी पर बना मंदिर, प्राचीन वास्तुकला, चंदन लेप की परंपरा और सदियों पुरानी पूजा-पद्धति इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल बनाती है। अगर आप भगवान विष्णु और नरसिंह से जुड़े प्राचीन तीर्थों को जानना चाहते हैं, तो सिम्हाचलम मंदिर इस सूची में खास जगह रखता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156013988</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 18:46:07 +0530</pubDate><title><![CDATA[ अपमान, क्रोध और बदले की भावना से कैसे बचें? बुद्ध की ये सीख आएगी काम ]]></title><description><![CDATA[ Buddha teachings: मन की सोच हमारे जीवन पर गहरा असर डालती है। बुद्ध के धम्मपद के ये छह श्लोक बताते हैं कि अच्छे विचार, क्षमा और शांति से जीवन कैसे बदलता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/buddha-teachings-that-can-change-the-way-you-think-article-156013988 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156013987,thumbsize-1025615,width-1280,height-720,resizemode-75/156013987.jpg" alt="buddha teachings that can change the way you think" /></div><p><strong>Buddha teachings: </strong>गौतम बुद्ध की वाणी अनूठी है। बुद्ध की बातों को सुनकर हृदय से भरे हुए लोग सुगमता से परमात्मा की तरफ चले जाते हैं। यहां धम्मपद के यमकवग्ग की पहली 6 गाथाएं हैं। इनका संदेश बहुत सीधा है- 'हमारे विचार ही हमारे शब्दों, कर्मों और आखिरकार हमारे सुख-दुःख को प्रभावित करते हैं। चलिए एक-एक करके बिल्कुल आसान भाषा में समझते हैं।'</p><p>मनो पुब्बङ्‌गमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया।</p><p>मनसा चे पदुट्ठेन भासति वा करोति वा,</p><p>ततो नं दुक्खमन्वेति चक्कं व वहतो पदं।।1।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'हमारे काम और व्यवहार के पीछे सबसे पहले हमारा मन होता है। अगर मन में गुस्सा, नफरत, ईर्ष्या या बुरी भावना है और हम उसी भावना से किसी से बात करते हैं या कोई काम करते हैं, तो उसका असर आखिरकार हम पर ही पड़ता है। जैसे बैलगाड़ी के पीछे उसके पहिए चलते हैं, वैसे ही गलत सोच के पीछे दुःख भी चलता है।'</p><p>मनो पुब्बङ्‌गमा धम्मा मनो सेट्ठा मनोमया।</p><p>मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा,</p><p>ततो नं सुखमन्वेति छाया’ व अनपायिनी।।2।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'अगर हमारा मन साफ और शांत है, तो हम अच्छे शब्द बोलेंगे और अच्छे काम करेंगे। ऐसे व्यवहार का परिणाम भी सुखद होता है।' बुद्ध इसकी तुलना ऐसी छाया से करते हैं जो इंसान का पीछा नहीं छोड़ती। यानी अच्छे कर्मों का अच्छा प्रभाव भी हमारे साथ रहता है।</p><p>अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।</p><p>ये च तं उपनय्हन्ति वेरं तेसं न सम्मति।।3।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'उसने मेरा अपमान किया था, उसने मुझे चोट पहुंचाई थी, उसने मुझे हरा दिया था, उसने मेरा नुकसान किया था। जब हम बार-बार ऐसी बातें मन में दोहराते रहते हैं और उन्हें लेकर बदले की भावना रखते हैं, तो हमारे अंदर का बैर खत्म नहीं होता।'</p><p>अक्कोच्छि मं अवधि मं अजिनि मं अहासि मे।</p><p>ये तं न उपनय्हन्ति वेरं तेसूपसम्मति।।4।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'अगर कोई व्यक्ति यह सोचता नहीं रहता कि उसने मेरे साथ ऐसा किया था, मैं उसे कभी नहीं छोड़ूंगा तो धीरे-धीरे उसके मन का बैर शांत होने लगता है।'</p><p>नहि वेरेन वेरामि सम्मन्तीध कुदाचनं।</p><p>अवेरेन च सम्मन्ति एस धम्मो सनंतनो।।5।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'बैर से बैर कभी खत्म नहीं होता। अगर एक व्यक्ति गुस्सा करेगा और दूसरा भी गुस्से से जवाब देगा, तो झगड़ा चलता ही रहेगा। बैर को खत्म करने के लिए बदले की जगह अबैर, संयम और समझदारी की जरूरत है।'</p><p>परे च न विजानन्ति मयमेत्थ यमामसे।</p><p>ये च तत्थ विजानन्ति ततो सम्मन्ति मेधगा।।6।।</p><p>बुद्ध कहते हैं- 'बहुत से लोग यह समझ ही नहीं पाते कि हमारा जीवन सीमित है और एक दिन मृत्यु आनी है। इसी वजह से लोग छोटी-छोटी बातों पर लड़ते-झगड़ते रहते हैं। लेकिन जो इस सच्चाई को समझ लेते हैं, वे बेवजह के विवादों को पकड़कर नहीं बैठते।'</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156013169</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 16:29:20 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कृष्ण की बांसुरी इतनी खास क्यों मानी जाती है? जानें इसके पीछे की कथा ]]></title><description><![CDATA[ Krishna bhakti: भगवान कृष्ण की बांसुरी में ऐसा क्या खास था? क्या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी छिपा है? कृष्ण की बांसुरी से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं जिसके बारे में यहां बताया गया है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-bhakti-significance-of-krishna-flute-article-156013169 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156013167,thumbsize-1279685,width-1280,height-720,resizemode-75/156013167.jpg" alt="krishna bhakti significance of krishna flute" /></div><p><strong>Krishna bhakti: </strong>भगवान कृष्ण के बारे में सोचते ही मन में कई तस्वीरें उभरती हैं। सिर पर मोरपंख, चेहरे पर प्यारी-सी मुस्कान, पीतांबर और हाथों में बांसुरी को भगवान कृष्ण की पहचान के रूप में देखा जाता है। इन सबमें भी बांसुरी के साथ कृष्ण का रिश्ता इतना गहरा है कि बांसुरी के बिना उनकी कल्पना अधूरी लगती है। मान्यता है कि कृष्ण जब बांसुरी बजाते थे तो केवल इंसान ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और पेड़-पौधे तक उनकी धुन से मंत्रमुग्ध हो जाते थे।</p><p><h2>कृष्ण और बांसुरी का रिश्ता</h2></p><p>धार्मिक कथाओं के अनुसार वृंदावन और गोकुल की गलियों में जब कृष्ण अपनी बांसुरी बजाते थे, तो उसकी आवाज सुनकर गोपियां खिंची चली आती हैं। गायें भी चरना छोड़कर उस धुन को सुनने लगती थीं। कृष्ण की बांसुरी की सबसे खास बात यह मानी जाती है कि वह एक साधारण-सी बांस की बनी बांसुरी थी, लेकिन कृष्ण के हाथों में आते ही उसकी धुन असाधारण हो जाती थी।</p><p><h2>बांसुरी से जुड़ी प्रचलित कथा</h2></p><p>कृष्ण की बांसुरी को लेकर एक प्रसिद्ध लोककथा सुनाई जाती है। कहा जाता है कि बांस कभी घने जंगल का हिस्सा था। एक दिन उसे काटकर एक साधारण बांसुरी बना दी गई। उसमें कई छेद किए गए और फिर वह कृष्ण के हाथों में पहुंची। लोकमान्यता के अनुसार, बांसुरी ने अपना सब कुछ कृष्ण को सौंप दिया था। उसमें खुद की कोई आवाज नहीं थी। कृष्ण जब उसमें सांस भरते थे, तभी मधुर संगीत निकलता था।</p><p>इसी वजह से बांसुरी को समर्पण का प्रतीक भी माना जाता है। यह संदेश देती है कि जब इंसान अपने अहंकार को छोड़कर खुद को ईश्वर के प्रति समर्पित कर देता है, तो उसके जीवन में भी मधुरता आ सकती है।</p><p><h2>बांसुरी में छेद होने का मतलब</h2></p><p>कृष्ण की बांसुरी में बने छेदों को लेकर भी आध्यात्मिक व्याख्या की जाती है। बांसुरी अपने अंदर कुछ नहीं रखती। वह पूरी तरह खाली होती है। जब तक उसमें से हवा न गुजरे, तब तक उससे कोई संगीत नहीं निकलता।</p><p><h2>राधा और कृष्ण की बांसुरी</h2></p><p>राधा-कृष्ण की कथाओं में भी बांसुरी का खास स्थान है। लोककथाओं में कहा जाता है कि कृष्ण की बांसुरी की धुन राधा के हृदय को विशेष रूप से छूती थी। बांसुरी की आवाज सुनते ही राधा का मन कृष्ण की ओर खिंच जाता था। इसी वजह से कृष्ण की बांसुरी को प्रेम, भक्ति और विरह से भी जोड़ा जाता है। इसकी धुन केवल कानों को सुनाई देने वाला संगीत नहीं मानी गई, बल्कि इसे प्रेम की ऐसी भाषा माना गया जिसे बिना शब्दों के भी समझा जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156013050</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 15:45:34 +0530</pubDate><title><![CDATA[ सुख मिले या दुख, ज्ञानी व्यक्ति क्यों नहीं बदलता? अष्टावक्र गीता का गहरा संदेश ]]></title><description><![CDATA[ Ashtavakra Gita Hindi: अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र ने बताया है आत्मज्ञान का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं, बल्कि दुनिया के बीच रहते हुए भी अपने भीतर स्थिर रहना है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/ashtavakra-gita-hindi-self-realization-advaita-vedanta-article-156013050 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156013053,thumbsize-990442,width-1280,height-720,resizemode-75/156013053.jpg" alt="ashtavakra gita hindi self realization advaita vedanta" /></div><p><strong>Ashtavakra Gita Hindi: </strong>भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के नवें भाग में आज हम आपको श्लोक 53 से श्लोक 59 तक के अर्थों को बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र ने बताया है कि आत्मज्ञान का मतलब दुनिया छोड़ देना नहीं, बल्कि दुनिया के बीच रहते हुए भी अपने भीतर स्थिर रहना है।</p><p><strong>श्लोक 53-</strong> इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।</p><p>आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जिस व्यक्ति का इस संसार और परलोक की भोग-विलास वाली इच्छाओं से मन हट चुका है और जो नश्वर तथा शाश्वत चीजों के बीच फर्क समझ चुका है, उसके लिए यह बड़ी हैरानी की बात है कि वह मोक्ष चाहता तो है, लेकिन मोक्ष से ही डरने लगता है।</p><p><strong>श्लोक 54- </strong>धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्‌यमानोऽपि सर्वदा।</p><p>आत्मानं केवलं पश्यन्‌ न तुष्यति न कुप्यति।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'ज्ञानी व्यक्ति चाहे सुख का अनुभव कर रहा हो या किसी पीड़ा से गुजर रहा हो, वह हमेशा अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को ही देखता है। इसलिए वह न अत्यधिक खुश होता है और न ही क्रोधित होता है।'</p><p><strong>श्लोक 55-</strong> चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।</p><p>संस्तवे चापि निंदायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जिस महान व्यक्ति को अपना शरीर भी दूसरे शरीर की तरह दिखाई देता है, यानी जो खुद को शरीर से अलग आत्मस्वरूप मानता है, वह प्रशंसा या निंदा से कैसे विचलित हो सकता है?'</p><p><strong>श्लोक 56- </strong>मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन्‌ विगतकौतुकः।</p><p>अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जो ज्ञानी इस पूरे संसार को माया के रूप में समझ चुका है और जिसकी बाहरी चीजों के प्रति उत्सुकता तथा आसक्ति समाप्त हो गई है, वह मृत्यु सामने खड़े होने पर भी क्यों डरेगा?'</p><p><strong>श्लोक 57- </strong>निस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।</p><p>तस्यात्म ज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जिस महान व्यक्ति का मन इच्छाओं से मुक्त हो गया है और जो निराशा की स्थिति में भी भीतर से शांत रहता है, जो आत्मज्ञान से संतुष्ट है, उसकी तुलना आखिर किससे की जा सकती है?'</p><p><strong>श्लोक 58-</strong> स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किंचन।</p><p>इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जो धीर व्यक्ति स्वभाव से ही यह जानता है कि दिखाई देने वाला संसार स्थायी और वास्तविक नहीं है, उसके लिए यह सोचने का क्या अर्थ रह जाता है कि यह चीज ग्रहण करनी है और वह चीज छोड़नी है?'</p><p><strong>श्लोक 59-</strong> अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।</p><p>यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्यतेये।।</p><p>अष्टावक्र कहते हैं- 'जिस व्यक्ति ने अपने भीतर के विकारों और इच्छाओं को छोड़ दिया है, जो सुख-दुख जैसे द्वंद्वों से ऊपर उठ चुका है और किसी विशेष इच्छा या उम्मीद में नहीं जीता, उसे जीवन में परिस्थितिवश मिलने वाला सुख न दुख देता है और न ही वह उसमें जरूरत से ज्यादा प्रसन्न होकर उलझता है।'</p><p><h2>इन सात श्लोकों का असली संदेश</h2> </p><p>'जब इंसान खुद को शरीर, मन, इच्छाओं और परिस्थितियों से अलग पहचानने लगता है, तब उसके भीतर एक ऐसी शांति पैदा होती है जिसे बाहरी दुनिया आसानी से हिला नहीं सकती।'</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156009311</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 20:22:25 +0530</pubDate><title><![CDATA[ हम्पी की इस पहाड़ी को क्यों माना जाता है हनुमान जी का जन्मस्थान? ]]></title><description><![CDATA[ Anjanadri Hill Hampi: भगवान हनुमान को समर्पित यह स्थान उन लोगों के लिए खास है जो रामायण से जुड़े स्थलों को करीब से देखना चाहते हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/anjanadri-hill-hampi-hanuman-birthplace-hanuman-temple-hampi-article-156009311 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156009305,thumbsize-696040,width-1280,height-720,resizemode-75/156009305.jpg" alt="anjanadri hill hampi hanuman birthplace hanuman temple hampi" /></div><p><strong>Anjanadri Hill Hampi: </strong>हम्पी का नाम आते ही आंखों के सामने प्राचीन मंदिर और पुरानी सभ्यता की तस्वीर उभर आती है। कर्नाटक का यह इलाका इतिहास के लिए तो खास है ही साथ ही इसका रिश्ता रामायण की कथाओं से भी है। हम्पी के पास अनेगुंडी क्षेत्र में स्थित अंजनाद्री पर्वत को लेकर मान्यता है कि यही भगवान हनुमान का जन्मस्थान है। टुंगभद्रा नदी के किनारे बसा यह पहाड़ आज देशभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। पहाड़ की चोटी पर स्थित हनुमान मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। रास्ता थोड़ा मेहनत वाला जरूर है, लेकिन ऊपर पहुंचने के बाद मिलने वाला नजारा सारी थकान दूर कर देता है।</p><p><h2>क्यों खास है अंजनाद्री पर्वत</h2></p><p>अंजनाद्री पर्वत का नाम भगवान हनुमान की माता अंजना से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, अंजना ने इसी क्षेत्र में तपस्या की थी और यहीं पवन देव के आशीर्वाद से हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसी वजह से यह जगह हनुमान भक्तों के लिए बेहद खास मानी जाती है।</p><p>यह पूरा इलाका रामायण की किष्किंधा नगरी से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि भगवान राम जब माता सीता की खोज में निकले थे, तब उनका सामना इसी क्षेत्र में सुग्रीव और हनुमान जी से हुआ था।</p><p><h2>मंदिर तक पहुंचने के लिए चढ़नी पड़ती हैं सैकड़ों सीढ़ियां</h2></p><p>अंजनाद्री पर्वत की चोटी तक पहुंचना अपने आप में एक छोटा-सा तीर्थ अनुभव है। मंदिर तक जाने के रास्ते में करीब 550 सीढ़ियां बताई जाती हैं। चढ़ाई में समय लग सकता है, खासकर अगर आप आराम-आराम से ऊपर जाना चाहते हैं। रास्ते में बंदर और लंगूर भी दिखाई देते हैं। इसलिए खाने-पीने का सामान संभालकर रखना बेहतर रहता है। पानी की बोतल या स्नैक्स खुले में लेकर चलने पर ये शरारती मेहमान उन्हें झपट सकते हैं। चढ़ाई के दौरान पीछे मुड़कर देखने पर टुंगभद्रा नदी और हम्पी के आसपास फैली चट्टानी पहाड़ियों का खूबसूरत नजारा दिखाई देता है।</p><p><h2>चोटी पर पहुंचते ही मिलता है अलग ही अनुभव</h2></p><p>मंदिर की चोटी पर पहुंचने के बाद माहौल काफी शांत महसूस होता है। यहां भगवान हनुमान की पूजा की जाती है। मंदिर परिसर में भगवान राम और माता सीता से जुड़े पूजा स्थल भी बताए जाते हैं। श्रद्धालु यहां हनुमान जी के दर्शन करने के साथ कुछ समय बैठकर प्रार्थना करते हैं। आसपास का प्राकृतिक वातावरण इस अनुभव को और खास बना देता है।</p><p><h2>मंदिर में रखी है 'तैरने वाली चट्टान'</h2></p><p>अंजनाद्री पर्वत के मंदिर परिसर से जुड़ी एक और दिलचस्प मान्यता लोगों का ध्यान खींचती है। यहां एक चट्टान को कांच के बॉक्स में रखा गया है। स्थानीय मान्यता में इसे राम सेतु से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि ऐसी ही चट्टानों की मदद से भगवान राम की सेना ने भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र पर पुल बनाया था। हालांकि इस तरह की बातें धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं का हिस्सा हैं, इसलिए इन्हें उसी रूप में देखना बेहतर है।</p><p><h2>रामायण और हम्पी का अनोखा रिश्ता</h2></p><p>हम्पी के आसपास का इलाका रामायण की किष्किंधा कथा से जोड़ा जाता है। माना जाता है कि यही वह क्षेत्र है जहां भगवान राम और हनुमान जी की मुलाकात हुई थी। सुग्रीव, वाली और हनुमान से जुड़ी कई कथाओं का संबंध भी इसी क्षेत्र से बताया जाता है। इसी वजह से हम्पी घूमने आने वाले कई लोग ऐतिहासिक स्मारकों के साथ इन धार्मिक स्थलों की यात्रा भी करते हैं। यहां इतिहास, लोककथाएं, धर्म और प्राकृतिक खूबसूरती एक साथ देखने को मिलती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156008946</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 19:20:19 +0530</pubDate><title><![CDATA[ 'मैं आत्मा हूं' फिर भी इच्छाओं के पीछे क्यों भागता है इंसान? अष्टावक्र का जवाब ]]></title><description><![CDATA[ Ashtavakra Gita Hindi: अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र ने बताया है कि क्यों इंसान कभी संतुष्ट नहीं होता और इच्छाओं के पीछे क्यों भागता रहता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/why-do-we-keep-chasing-wealth-ashtavakra-powerful-lesson-to-king-janaka-article-156008946 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156008951,thumbsize-739302,width-1280,height-720,resizemode-75/156008951.jpg" alt="why do we keep chasing wealth ashtavakra powerful lesson to king janaka" /></div><p><strong>Ashtavakra Gita Hindi: </strong>भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के आठवें भाग में आज हम आपको श्लोक 46 से श्लोक 52 तक के अर्थों को बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र ने बताया क्यों इंसान कभी संतुष्ट नहीं होता और इच्छाओं के पीछे भागने का असली कारण क्या है।</p><p><strong>श्लोक 46-</strong> अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः।</p><p>तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- जब तुमने वास्तव में उस एक अविनाशी आत्मा को जान लिया है, तब हे आत्मज्ञानी और धीर पुरुष! तुम्हारा मन धन-संपत्ति कमाने में कैसे लग सकता है?</p><p><strong>श्लोक 47- </strong>आत्माऽज्ञानादहो प्रीतिर्विषयभ्रमगोचरे।</p><p>शुक्तेरज्ञानतो लोभो यथा रजतविभ्रमे।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- अज्ञान के कारण ही मनुष्य विषय-वस्तुओं में इतना प्रेम और आकर्षण करता है। जैसे सीप को चांदी समझ लेने पर उसमें चांदी पाने का लालच पैदा हो जाता है। मतलब- समुद्र किनारे पड़ी सीप दूर से चांदी जैसी चमक सकती है। अगर कोई उसे चांदी समझ ले, तो उसे पाने के लिए दौड़ेगा। लेकिन जब सच्चाई पता चलती है कि वह चांदी नहीं, सिर्फ सीप है, तो लालच खत्म हो जाता है।</p><p><strong>श्लोक 48 -</strong> विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंग इव सागरे।</p><p>सोऽहमस्मीति विज्ञाय किं दीन इव धावसि।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- जिस चेतना में यह पूरा संसार समुद्र की लहरों की तरह उठता और दिखाई देता है, वही मैं हूं-यह जान लेने के बाद तुम किसी असहाय व्यक्ति की तरह इधर-उधर क्यों भाग रहे हो?</p><p><strong>श्लोक 49 -</strong> श्रुत्वाऽपि शुद्धचैतन्यमात्मानमतिसुन्दरम्‌।</p><p>उपस्थेऽत्यन्तसंसक्तो मालिन्यमधिगच्छति।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- शुद्ध और अत्यंत सुंदर आत्मा के बारे में सुन लेने के बाद भी यदि मनुष्य काम-वासनाओं में अत्यधिक आसक्त रहता है, तो यह आश्चर्य की बात है।</p><p><strong>श्लोक 50-</strong> सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।</p><p>मुनेर्जनितमाश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- जो मुनि सभी प्राणियों में अपने आत्मस्वरूप को और सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में देखता है, उसके भीतर भी यदि 'मेरा-तेरा' की भावना बनी रहे, तो यह आश्चर्य की बात है।</p><p><strong>श्लोक 51- </strong>आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।</p><p>आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- जो व्यक्ति परम अद्वैत को मानकर मोक्ष के मार्ग पर चल रहा है, उसका फिर भी कामनाओं के वश में होकर बेचैन होना और सांसारिक भोगों में उलझना सचमुच आश्चर्य की बात है।</p><p><strong>श्लोक 52 -</strong> उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रभवधार्याति दुर्बलः।</p><p>आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः।।</p><p>अष्टावक्र कह रहे हैं- जिस व्यक्ति के भीतर ज्ञान का उदय हो चुका है और जिसने संसार की नश्वरता को समझ लिया है, उसका फिर भी कमजोर होकर कामनाओं की इच्छा करना आश्चर्य की बात है, जबकि समय लगातार उसे मृत्यु की ओर ले जा रहा है।</p><p><h2>इन सातों श्लोकों का मूल संदेश</h2></p><p>'जिसने अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया, उसके लिए संसार की चीजें जीवन का मालिक नहीं, केवल जीवन के साधन रह जाती हैं।'</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156007433</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 15:11:54 +0530</pubDate><title><![CDATA[ भगवान शिव के डमरू का रहस्य, जानें नाद और सृष्टि से इसका संबंध ]]></title><description><![CDATA[ Lord Shiva Damru: शिव भक्तों के लिए डमरू की ध्वनि का एक अलग भावनात्मक महत्व भी है। महादेव के हाथ में डमरू देखकर उन्हें यह विश्वास मिलता है कि ब्रह्मांड में सब कुछ एक लय के साथ चल रहा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/lord-shiva-damru-shiva-and-nada-maheshwara-sutra-article-156007433 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156007434,thumbsize-909415,width-1280,height-720,resizemode-75/156007434.jpg" alt="lord shiva damru shiva and nada maheshwara sutra" /></div><p><strong>Lord Shiva Damru: </strong>भगवान शिव की तस्वीर या प्रतिमा देखते ही कुछ चीजें तुरंत ध्यान खींचती हैं। जटाओं में चंद्रमा, माथे पर तीसरा नेत्र, गले में सर्प और हाथ में डमरू। डमरू भले ही आकार में छोटा हो लेकिन शिव परंपरा में इसका महत्व काफी ज्यादा है। यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं है। इसे नाद, सृष्टि और परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है। शिव के डमरू से निकलने वाली ध्वनि को लेकर भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में कई मान्यताएं हैं। कहा जाता है कि जब डमरू बजता है तो उससे निकलने वाला नाद जीवन में गति और ऊर्जा का प्रतीक बन जाता है। यही वजह है कि महादेव के हाथ में मौजूद यह छोटा सा डमरू आज भी रहस्य और आस्था का विषय बना हुआ है।</p><p><h2>भगवान शिव के हाथ में डमरू क्यों रहता है?</p><p></h2></p><p>देखने में भले ही यह छोटा और साधारण लग सकता है लेकिन इसका स्वरूप प्रतीकात्मक माना जाता है। एक लोकप्रिय आध्यात्मिक व्याख्या के अनुसार, डमरू का एक सिरा सृष्टि और दूसरा सिरा विलय का संकेत देता है। बीच का हिस्सा दोनों के बीच संतुलन को दर्शाता है। यानी जहां कुछ शुरू होता है, वहां उसका अंत भी निश्चित है। और अंत के बाद किसी नए आरंभ की संभावना बनी रहती है। शिव के डमरू को इसी निरंतर चक्र का प्रतीक माना जाता है।</p><p><h2>डमरू और नाद का संबंध</h2></p><p>भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नाद का विशेष महत्व है। नाद यानी ऐसी ध्वनि जिसे केवल कानों से सुनने तक सीमित नहीं किया जाता, बल्कि उसे ऊर्जा और कंपन से भी जोड़ा जाता है। शिव के डमरू की ध्वनि को इसी नाद से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि सृष्टि की शुरुआत में ध्वनि या कंपन की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसलिए डमरू को आदि नाद का प्रतीक माना जाता है।</p><p><h2>डमरू और सृष्टि की शुरुआत की मान्यता</h2></p><p>परंपरा में कहा जाता है कि महादेव के डमरू से निकली चौदह ध्वनियों से महेश्वर सूत्र प्रकट हुए। इन्हें संस्कृत व्याकरण की ध्वनियों को व्यवस्थित करने से जोड़ा जाता है। यह कथा धार्मिक और भाषाई परंपरा का हिस्सा है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका संदेश बेहद दिलचस्प है-ध्वनि से शब्द बनते हैं, शब्द से विचार और विचार से अभिव्यक्ति। यही वजह है कि डमरू को केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि ज्ञान और भाषा के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156007377</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:58:09 +0530</pubDate><title><![CDATA[ अंग्रेजों के दौर में फिर खड़ा हुआ था ये शिव मंदिर, जानिए बैजनाथ महादेव की कहानी ]]></title><description><![CDATA[ Baijnath Mahadev Temple धार्मिक आस्था के साथ-साथ इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों के लिए भी खास है। इसका पुनर्निर्माण ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी और उनकी पत्नी से जुड़ा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/shiva-temple-india-baijnath-mahadev-temple-article-156007377 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156007375,thumbsize-693100,width-1280,height-720,resizemode-75/156007375.jpg" alt="shiva temple india baijnath mahadev temple" /></div><p><strong>Baijnath Mahadev Temple: </strong>भारत में भगवान शिव के हजारों मंदिर हैं और हर मंदिर की अपनी अलग मान्यता और कहानी है। मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले में मौजूद बैजनाथ महादेव मंदिर की कहानी थोड़ी दिलचस्प है जो आपको जरूर जानना चाहिए। यह मंदिर इसलिए भी खास है क्योंकि इसका पुनर्निर्माण ब्रिटिश सेना के एक अधिकारी और उनकी पत्नी से जुड़ा हुआ है। बांगंगा नदी के किनारे बने इस मंदिर के पीछे करीब डेढ़ सौ साल पुरानी एक ऐसी कहानी है, जिसमें एक ब्रिटिश अधिकारी की पत्नी, भगवान शिव में आस्था और पति की सुरक्षित वापसी की उम्मीद जुड़ी हुई है।</p><p><h2>16वीं शताब्दी में हुआ था मंदिर का निर्माण</h2></p><p>बताया जाता है कि बैजनाथ महादेव मंदिर का मूल निर्माण 16वीं शताब्दी में हुआ था। समय बीतने के साथ मंदिर की हालत खराब होती चली गई। बाद में 19वीं शताब्दी में इसका दोबारा निर्माण कराया गया। मंदिर के पुनर्निर्माण से जुड़ी कहानी ब्रिटिश शासन के दौर की है। उस समय एक ब्रिटिश सेना अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन अफगानिस्तान में युद्ध के मोर्चे पर तैनात थे। उनकी पत्नी आगर मालवा के कैंटोनमेंट में रहती थीं।</p><p>उस दौर में आज की तरह मोबाइल फोन या इंटरनेट नहीं था। किसी अपने की खबर जानने का सबसे बड़ा सहारा चिट्ठियां ही होती थीं। लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन की पत्नी को भी अपने पति की चिट्ठियों का इंतजार रहता था। लेकिन एक समय अचानक उनके पति की चिट्ठियां आनी बंद हो गईं। वह काफी परेशान हो गईं। उन्हें यह डर सताने लगा कि आखिर युद्ध के मैदान में उनके पति के साथ क्या हुआ होगा। अपनी चिंता कम करने के लिए वह अक्सर घुड़सवारी करने निकल जाती थीं। इसी दौरान एक दिन वह बैजनाथ महादेव मंदिर पहुंचीं।</p><p><h2>मंदिर की हालत देखकर हुईं परेशान</h2></p><p>उस समय मंदिर की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। बताया जाता है कि मंदिर में पूजा-पाठ चल रहा था। वहां मौजूद पुजारियों ने जब महिला को परेशान देखा तो उनकी चिंता का कारण पूछा। उन्होंने अपनी परेशानी पुजारियों को बताई और पति की सलामती के लिए प्रार्थना करने लगीं। तभी पुजारियों ने उन्हें भगवान शिव की पूजा करने और 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का जाप करने की सलाह दी। कहा जाता है कि उन्हें 11 दिनों तक भगवान शिव का जाप करने और अपने पति की सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना करने को कहा गया।</p><p><h2>प्रार्थना के बाद पति की हुई सुरक्षित वापसी</h2></p><p>कुछ समय बाद उनकी चिंता खत्म हुई और लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन सुरक्षित वापस लौट आए। पति को सही-सलामत देखकर उनकी पत्नी बेहद खुश हुईं। मान्यता है कि उन्होंने भगवान शिव को धन्यवाद देने के लिए मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। इसके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल मार्टिन ने मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए 15,000 रुपये की राशि दान की।</p><p>उस समय 15 हजार रुपये बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। मंदिर में मौजूद एक शिलालेख में इस दान और पुनर्निर्माण से जुड़ी जानकारी का उल्लेख बताया जाता है। इसमें वर्ष 1883 का भी जिक्र मिलता है।</p><p><h2>लोगों को आकर्षित करता है मंदिर</h2></p><p>करीब 50 फीट ऊंचा बैजनाथ महादेव मंदिर आज आगर मालवा जिले की प्रमुख धार्मिक और ऐतिहासिक जगहों में गिना जाता है। यहां भगवान शिव के दर्शन करने के लिए श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर की सबसे खास बात इसकी धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इससे जुड़ी ऐतिहासिक कहानी है। एक तरफ यहां भगवान शिव के प्रति लोगों की गहरी आस्था देखने को मिलती है, वहीं दूसरी तरफ मंदिर का इतिहास ब्रिटिश दौर की एक दिलचस्प घटना से जुड़ा हुआ है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156006704</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 13:32:07 +0530</pubDate><title><![CDATA[ राजस्थान के बीकानेर में मौजूद है ये अनोखा मंदिर, जहां देवी के दर्शन के साथ हजारों चूहों के बीच पूरी होती है श्रद्धालुओं की आस्था ]]></title><description><![CDATA[ Karni Mata Temple: राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक में स्थित करणी माता मंदिर अपनी अनोखी परंपरा के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। यहां हजारों चूहे खुलेआम घूमते हैं। इनके लिए प्रसाद व भोजन की व्यवस्था की जाती है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/rajasthan-bikaner-karni-mata-temple-rats-temple-in-india-article-156006704 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156006828,thumbsize-2363680,width-1280,height-720,resizemode-75/156006828.jpg" alt="rajasthan bikaner karni mata temple rats temple in india" /></div><p><strong>Karni Mata Temple:</strong> राजस्थान की पहचान सिर्फ रेगिस्तान, किलों और हवेलियों तक सीमित नहीं है। यहां कई ऐसे धार्मिक स्थल भी हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं और मान्यताओं के कारण दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में से एक है बीकानेर का करणी माता मंदिर, जिसे आम बोलचाल में ‘चूहों वाला मंदिर’ (Rat Temple Rajasthan) भी कहा जाता है। देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए यह मंदिर इसलिए खास है, क्योंकि यहां खुलेआम हजारों चूहे घूमते नजर आते हैं और श्रद्धालु इनके बीच बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं।</p><p><h2>बीकानेर में मौजूद है मंदिर</p><p></h2></p><p>करणी माता मंदिर राजस्थान के बीकानेर जिले के देशनोक कस्बे में स्थित है। बीकानेर शहर से इसकी दूरी लगभग 30 किलोमीटर है। मंदिर की वास्तुकला, धार्मिक मान्यताओं और यहां रहने वाले चूहों की वजह से यह स्थान राजस्थान के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में गिना जाता है। मंदिर में प्रवेश करते ही सबसे पहले श्रद्धालुओं का सामना बड़ी संख्या में घूमते चूहों से होता है। ये चूहे मंदिर के फर्श, दीवारों और आसपास के हिस्सों में दिखाई देते हैं। खास बात यह है कि यहां आने वाले भक्त इन्हें भगाने के बजाय श्रद्धा के साथ इनके बीच से गुजरते हैं।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/vastu-tips/home-vastu-tips-eye-level-placement-vastu-guidelines-in-positive-energy-article-156006347" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>घर में रखी चीजें आपकी नजर के सामने कितनी ऊंचाई पर हैं? जानें वास्तु में Eye-Level Placement का महत्व</strong></a></p><p><h2>चूहों से जुड़ी है धार्मिक मान्यता</p><p></h2></p><p>करणी माता मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित मान्यता इन चूहों को लेकर है। लोककथा के अनुसार, करणी माता ने अपने सौतेले पुत्र लक्ष्मण को मृत्यु से वापस लाने के लिए यमराज से प्रार्थना की थी। मान्यता है कि इसके बाद करणी माता ने अपने चारण अनुयायियों को मृत्यु के बाद चूहे के रूप में पुनर्जन्म मिलने का वरदान दिया था। इसी धार्मिक विश्वास के कारण मंदिर में रहने वाले चूहों को सामान्य जीव नहीं, बल्कि पवित्र माना जाता है। श्रद्धालु इन्हें ‘काबा’ कहकर संबोधित करते हैं और इनके लिए भोजन-पानी की व्यवस्था करते हैं।</p><p><h2>यहां चूहों को खिलाया जाता है प्रसाद</h2></p><p>मंदिर में चूहों के लिए दूध, मिठाई, अनाज और अन्य खाद्य सामग्री रखी जाती है। श्रद्धालु भी इन्हें प्रसाद खिलाते हैं। मान्यता है कि अगर कोई चूहा भक्त के पैरों के ऊपर से गुजर जाए तो इसे शुभ संकेत माना जाता है। यहां सफेद चूहों को विशेष रूप से दुर्लभ और शुभ माना जाता है। मंदिर में सफेद चूहा दिखाई देना सौभाग्य से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, ये सभी बातें धार्मिक आस्था और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/september-2026-shubh-muhurat-for-griha-pravesh-marriage-vehicle-buying-auspicious-dates-property-purchase-date-article-156006257" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>सितंबर में कब करें शादी, गृह प्रवेश, मुंडन और कार-संपत्ति की खरीदारी?</strong></a></p><p><h2>चूहों के बीच प्रसाद का महत्व</p><p></h2></p><p>करणी माता मंदिर की एक और अनोखी परंपरा - यहां चूहों द्वारा छुआ हुआ प्रसाद ग्रहण करना है। श्रद्धालुओं का मानना है कि ऐसा प्रसाद ग्रहण करना शुभ होता है। मंदिर में चूहों की बड़ी संख्या होने के बावजूद भक्त बिना डर के उनके आसपास बैठकर पूजा करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। यही अनुभव इस मंदिर को दूसरे धार्मिक स्थलों से बिल्कुल अलग बनाता है। पहली बार आने वाले पर्यटकों के लिए यह दृश्य हैरान करने वाला हो सकता है, जबकि स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के लिए यह सदियों पुरानी आस्था का हिस्सा है।</p><p><h2>संगमरमर और चांदी का खूबसूरत मंदिर</p><p></h2></p><p>करणी माता मंदिर केवल चूहों के कारण ही प्रसिद्ध नहीं है। इसकी वास्तुकला भी आकर्षण का केंद्र है। मंदिर के प्रवेश द्वार और परिसर में संगमरमर का खूबसूरत काम दिखाई देता है। चांदी के दरवाजे और बारीक नक्काशी मंदिर की भव्यता को और बढ़ाते हैं। धार्मिक आस्था, अनोखी परंपरा और स्थापत्य कला का यह मेल देशनोक के करणी माता मंदिर को राजस्थान के उन स्थानों में शामिल करता है, जिन्हें देखने के लिए पर्यटक दूर-दूर से पहुंचते हैं। यहां आने वाला हर व्यक्ति मंदिर की इस अनोखी दुनिया को अपने साथ एक याद के रूप में लेकर लौटता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156006257</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 12:21:17 +0530</pubDate><title><![CDATA[ September 2026 Shubh Muhurat: सितंबर में कब करें शादी, गृह प्रवेश, मुंडन और कार-संपत्ति की खरीदारी? देखें शुभ मुहूर्त ]]></title><description><![CDATA[ September 2026 Auspicious Dates: क्या आप भी सितंबर 2026 में सगाई, शादी, गृह प्रवेश, मुंडन या कार-संपत्ति खरीदने की सोच रहे हैं? अगर हां, तो सबसे पहले इस महीने की सभी जरूरी शुभ तारीखों और समय के बारे में जान लें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/september-2026-shubh-muhurat-for-griha-pravesh-marriage-vehicle-buying-auspicious-dates-property-purchase-date-article-156006257 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156006374,thumbsize-173032,width-1280,height-720,resizemode-75/156006374.jpg" alt="september 2026 shubh muhurat for griha pravesh marriage vehicle buying auspicious dates property purchase date" /></div><p><strong>September 2026 Auspicious Dates:</strong> हिंदू धर्म के लोगों के लिए शुभ मुहूर्त का खास महत्व होता है। अधिकतर लोग हर जरूरी कार्य से पहले शुभ मुहूर्त देखते हैं। मान्यता है कि शुभ मुहूर्त में किए गए कार्य के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा कार, बाइक, स्कूटर, गोल्ड और डायमंड आदि कीमती चीजों की खरीदारी भी शुभ मुहूर्त में करनी अच्छी रहती है। यदि आप भी सितंबर 2026 में कोई कीमती सामान खरीदने वाले हैं या कोई मांगलिक कार्यक्रम करने की योजना बना रहे हैं तो सबसे पहले इस माह के शुभ मुहूर्त के बारे में जान लें।<h2><strong>सितंबर 2026 में वाहन खरीदने-बेचने का शुभ मुहूर्त</strong></h2><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th>तारीख</th><th>दिन</th><th>शुभ समय 1</th><th>शुभ समय 2</th><th>शुभ समय 3</th><th>योग</th></tr></thead><tbody><tr><td><strong>7 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>सुबह 06:39 से 07:02</td><td>सुबह 09:10 से 10:44</td><td>दोपहर 03:27 से शाम 05:04</td><td>—</td></tr><tr><td><strong>11 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>दोपहर 01:15 से 01:51</td><td>शाम 04:57 से 06:31</td><td>—</td><td>—</td></tr><tr><td><strong>13 सितंबर 2026</strong></td><td>रविवार</td><td>सुबह 07:38 से दोपहर 12:16</td><td>दोपहर 01:49 से 03:22</td><td>—</td><td>—</td></tr><tr><td><strong>17 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>सुबह 10:48 से दोपहर 01:47</td><td>शाम 04:51 से 06:24</td><td>—</td><td><strong>अमृत सिद्धि एवं सर्वार्थ सिद्धि योग</strong></td></tr><tr><td><strong>21 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>सुबह 06:08 से 07:40</td><td>सुबह 09:11 से 10:42</td><td>—</td><td><strong>सर्वार्थ सिद्धि योग</strong></td></tr><tr><td><strong>24 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>सुबह 10:42 से दोपहर 01:43</td><td>—</td><td>—</td><td>—</td></tr><tr><td><strong>28 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>सुबह 06:12 से 07:42</td><td>दोपहर 03:11 से शाम 06:10</td><td>—</td><td>—</td></tr></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody></table>इसके अलावा 4 सितंबर 2026 (शुक्रवार), 6 सितंबर 2026 (रविवार), 14 सितंबर 2026 (सोमवार) और 16 सितंबर 2026 (बुधवार) को भी वाहन बेचा या खरीदा जा सकता है।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/rashifal/bhadrapada-month-2026-start-date-and-end-date-planets-transit-dates-grah-gochar-timings-article-156005185" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>भाद्रपद माह में कब-कब कौन-से ग्रह बदलेंगे चाल? जानें</strong></a></p><p><h2><strong>सितंबर 2026 में संपत्ति खरीदने-बेचने का शुभ मुहूर्त</strong></h2><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th><strong>तिथि</strong></th><th><strong>दिन</strong></th><th><strong>शुभ मुहूर्त (समय)</strong></th><th><strong>नक्षत्र / विशेष योग</strong></th></tr></thead><tbody><tr><td><strong>11 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>सुबह 06:04 से दोपहर 01:16</td><td>पूर्वा फाल्गुनी</td></tr><tr><td><strong>17 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>• सुबह 07:39 से 09:11• सुबह 10:43 से दोपहर 01:47</td><td>अनुराधा<strong>सर्वार्थ सिद्धि योग</strong></td></tr><tr><td><strong>18 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>रात 10:44 से अगले दिन (19 सितंबर) सुबह 06:08</td><td>मूला</td></tr><tr><td><strong>25 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>सुबह 11:22 से अगले दिन (26 सितंबर) सुबह 06:11</td><td>पूर्वा भाद्रपद</td></tr></tbody><tbody></tbody></table>इसके अलावा 4 सितंबर 2026 (शुक्रवार) और 10 सितंबर 2026 (गुरुवार) को भी संपत्ति बेची या खरीदी जा सकती है।</p><p><h2><strong>सितंबर 2026 में गोल्ड खरीदने का शुभ मुहूर्त</p><p></strong></h2><h3><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th><strong>तिथि</strong></th><th><strong>दिन</strong></th><th><strong>शुभ मुहूर्त (समय)</strong></th><th><strong>नक्षत्र / विशेष योग</strong></th></tr></thead><tbody><tr><td><strong>4 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>• सुबह 06:00 से 07:35• सुबह 09:10 से 10:45• दोपहर 12:20 से 01:54• शाम 05:04 से 06:39</td><td>रोहिणी नक्षत्र</td></tr><tr><td><strong>17 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>पूरे दिन</td><td>पुष्य नक्षत्र योग</td></tr></tbody><tbody></tbody></table></p><p></h3></p><p><strong><h2>सितंबर 2026 में मांगलिक कार्य करने के लिए शुभ मुहूर्त</p><p></h2></strong></p><p>बता दें कि सितंबर 2026 में चातुर्मास रहेगा, जिसके कारण इस महीने में शादी, सगाई, गृह प्रवेश और मुंडन आदि मांगलिक कार्य करने शुभ नहीं रहेंगे।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156005126</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 05:37:54 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bhadrapada Month 2026: आज 29 अगस्त से भाद्रपद माह शुरू, जानें भादो के अगले 29 दिन क्या करें और क्या नहीं ]]></title><description><![CDATA[ Bhadrapada Month 2026 Date & Niyam: भाद्रपद यानी भादो माह का आरंभ आज 29 अगस्त 2026 से हो गया है, जिसका समापन 29 दिन बाद होगा। चलिए जानें इस दौरान किन नियमों का पालन करना जरूरी है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/bhadrapada-month-2026-start-date-and-end-date-bhado-me-kya-karna-chahiye-aur-kya-nhi-niyam-article-156005126 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156005134,thumbsize-167871,width-1280,height-720,resizemode-75/156005134.jpg" alt="bhadrapada month 2026 start date and end date bhado me kya karna chahiye aur kya nhi niyam" /></div><p><strong>Bhadrapada Month 2026 Date &amp; Niyam:</strong> हिंदू धर्म के लोगों के लिए भाद्रपद माह का खास महत्व है, जिसे भादो के नाम से भी जाना जाता है। ये माह अगस्त और सितंबर के बीच पड़ता है, जो कि हिंदू पंचांग या सनातन कैलेंडर का छठा (6th) महीना है। इस दौरान शिव जी और माता पार्वती के साथ-साथ गणेश जी और कृष्ण भगवान की पूजा करना शुभ रहता है। साथ ही व्रत रखने और स्नान-दान करने का विधान है। इसके अलावा पितरों की आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से पूजा और तर्पण भी किया जाता है। मान्यता है कि इस महीने में विशेष अवसरों पर पूजा-पाठ करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और सभी प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। हालांकि, भादो महीने में कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी जरूरी होता है। आज यहां पर आप भाद्रपद माह 2026 की तिथि, व्रत-त्योहार और नियम आदि के बारे में जानेंगे।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह 2026 की तिथि</p><p></strong></h2>पंचांग के अनुसार, आज 29 अगस्त 2026, वार शनिवार से भाद्रपद माह का आरंभ हो गया है। आज सुबह 9 बजकर 57 मिनट तक भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा तिथि रहेगी। वहीं, इस महीने का समापन 26 सितंबर 2026, शनिवार को होगा। इस दिन रात 10 बजकर 18 मिनट तक भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि रहेगी।</p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में कौन से व्रत-त्योहार हैं?</p><p></strong></h2><table style="background-color: rgb(255, 255, 255);" class="redcator-table-advance"><thead><tr><td><strong>दिनांक</strong></td><td><strong>दिन</strong></td><td><strong>प्रमुख व्रत, पर्व एवं जयंती</strong></td></tr></thead><tbody><tr><td><strong>31 अगस्त 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>कजरी तीज, बहुला चतुर्थी, हेरम्ब संकष्टी, महा संकटहरा चतुर्थी</td></tr><tr><td><strong>1 सितंबर 2026</strong></td><td>मंगलवार</td><td>नाग पंचमी (गुजरात और बंगाल - अमांत कैलेंडर)</td></tr><tr><td><strong>2 सितंबर 2026</strong></td><td>बुधवार</td><td>हल षष्ठी, रांधण छठ (शीतला माता)</td></tr><tr><td><strong>3 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>शीतला सातम, मासिक कार्तिगाई</td></tr><tr><td><strong>4 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, आद्याकाली जयंती, विन्ध्यवासिनी जयंती, मासिक कालाष्टमी, मासिक कृष्ण जन्माष्टमी, अष्टमी रोहिणी, अगस्त्य अर्घ्य, रोहिणी व्रत</td></tr><tr><td><strong>5 सितंबर 2026</strong></td><td>शनिवार</td><td>दही हांडी, श्री गोगा नवमी, शिक्षक दिवस</td></tr><tr><td><strong>7 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>अजा एकादशी, बछ बारस द्वादशी</td></tr><tr><td><strong>8 सितंबर 2026</strong></td><td>मंगलवार</td><td>भौम प्रदोष व्रत, कृष्ण दामोदर द्वादशी, पर्युषण पर्व</td></tr><tr><td><strong>9 सितंबर 2026</strong></td><td>बुधवार</td><td>मासिक शिवरात्रि</td></tr><tr><td><strong>10 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>पिठोरी अमावस्या, दर्श अमावस्या</td></tr><tr><td><strong>11 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>भाद्रपद अमावस्या, पोला, वृषभोत्सव</td></tr><tr><td><strong>12 सितंबर 2026</strong></td><td>शनिवार</td><td>सामवेद उपाकर्म</td></tr><tr><td><strong>13 सितंबर 2026</strong></td><td>रविवार</td><td>वराह जयंती, चंद्र दर्शन</td></tr><tr><td><strong>14 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी, गौरी हब्बा, मलयालम विनायक चतुर्थी, सिद्धिविनायक चतुर्थी, हिंदी दिवस</td></tr><tr><td><strong>15 सितंबर 2026</strong></td><td>मंगलवार</td><td>विश्वकर्मा जयंती, इंजीनियर्स डे, संवत्सरी पर्व, ऋषि पंचमी</td></tr><tr><td><strong>16 सितंबर 2026</strong></td><td>बुधवार</td><td>स्कंद षष्ठी, बलराम जयंती</td></tr><tr><td><strong>17 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>कन्या संक्रांति, विश्वकर्मा पूजा, ज्येष्ठ गौरी आवाहन</td></tr><tr><td><strong>18 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>दूर्वा अष्टमी, ज्येष्ठ गौरी पूजा, ललिता सप्तमी</td></tr><tr><td><strong>19 सितंबर 2026</strong></td><td>शनिवार</td><td>राधा अष्टमी, दधीचि जयंती, ज्येष्ठ गौरी विसर्जन, मासिक दुर्गाष्टमी, महालक्ष्मी व्रत आरंभ</td></tr><tr><td><strong>21 सितंबर 2026</strong></td><td>सोमवार</td><td>दशावतार व्रत</td></tr><tr><td><strong>22 सितंबर 2026</strong></td><td>मंगलवार</td><td>परिवर्तिनी एकादशी, कल्कि द्वादशी</td></tr><tr><td><strong>23 सितंबर 2026</strong></td><td>बुधवार</td><td>भुवनेश्वरी जयंती, वामन जयंती</td></tr><tr><td><strong>24 सितंबर 2026</strong></td><td>गुरुवार</td><td>गुरु प्रदोष व्रत</td></tr><tr><td><strong>25 सितंबर 2026</strong></td><td>शुक्रवार</td><td>गणेश विसर्जन, अनंत चतुर्दशी (अनंत चौदस)</td></tr><tr><td><strong>26 सितंबर 2026</strong></td><td>शनिवार</td><td>भाद्रपद पूर्णिमा व्रत</td></tr></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody></table></p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: आज का पंचांग 29 अगस्त 2026: <a href="https://www.bhaktitimes.in/panchang/aaj-ka-panchang-29-august-2026-bhadrapada-month-shubh-muhurat-article-156005073" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>भाद्रपद मास का शुभारंभ, जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि</strong></a></p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में क्या करना चाहिए?</p><p></strong></h2></p><p>धार्मिक मान्यता है कि जो लोग भाद्रपद माह में जमीन पर चटाई बिछाकर सोते हैं, गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते हैं तथा श्रीमद्भागवत गीता का पाठ करते हैं, उन्हें देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसके अलावा भादों में सात्विक भोजन करने का विशेष महत्व है। इस दौरान आप चावल, गेहूं, जौ, मक्का, मूंग दाल, अरहर दाल, आंवला, अमरूद, मौसमी फल और तुलसी के पत्तों का सेवन कर सकते हैं। पानी और दूध उबालकर पीना चाहिए। </p><p><h2><strong>भाद्रपद माह में क्या नहीं करना चाहिए?</p><p></strong></h2>भाद्रपद का महीना चातुर्मास में आता है, जिसके कारण इस दौरान विवाह, मुंडन संस्कार, सगाई, जनेऊ संस्कार और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य नहीं करने चाहिए। साथ ही खाने में कच्ची हरी पत्तेदार सब्जियां, मूली, बैंगन और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा दही, छाछ, गुड़ और शहद को खाने से भी बचना चाहिए। </p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156002295</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 18:50:23 +0530</pubDate><title><![CDATA[ भक्तों के लिए रहस्य से कम नहीं ये मंदिर, दिन में दो बार हो जाता है अदृश्य ]]></title><description><![CDATA[ Gujarat Mysterious Temple: स्तंभेश्वर महादेव मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह ऐसी जगह है जहां आस्था और प्रकृति एक साथ देखने को मिलती हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/mysterious-shiva-temple-gujarat-stambheshwar-mahadev-temple-article-156002295 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156002293,thumbsize-751682,width-1280,height-720,resizemode-75/156002293.jpg" alt="mysterious shiva temple gujarat stambheshwar mahadev temple" /></div><p><strong>Gujarat Mysterious Temple: </strong>गुजरात के मंदिरों का जिक्र आते ही ज्यादातर लोगों के जहन में अहमदाबाद, द्वारका, सोमनाथ या पाटन जैसे शहर आते हैं। लेकिन गुजरात में एक ऐसा शिव मंदिर भी है, जो अपनी अनोखी वजह से लोगों के बीच काफी चर्चा में रहता है। यह मंदिर दिन में दो बार कुछ समय के लिए समुद्र के पानी में डूब जाता है और फिर पानी उतरने के बाद दोबारा नजर आने लगता है। हम बात कर रहे हैं गुजरात के कवी कंबोई गांव के पास स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर की जहां श्रद्धालुओं का भारी संख्या में आना जाना लगा रहता है। </p><p>मालूम हो कि यहां मंदिर का पानी में डूबना किसी चमत्कार की वजह से नहीं, बल्कि समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटे की वजह से होता है। हालांकि, जिस तरह मंदिर धीरे-धीरे पानी में समाता और फिर वापस दिखाई देता है, वह नजारा किसी रहस्य से कम नहीं लगता।</p><p><h2>ज्वार आते ही समुद्र में डूबने लगता है मंदिर</h2></p><p>स्तंभेश्वर महादेव मंदिर समुद्र के काफी करीब बना हुआ है। जब ज्वार आता है और समुद्र का पानी बढ़ने लगता है, तो पानी धीरे-धीरे मंदिर की ओर बढ़ता है। देखते ही देखते मंदिर का काफी हिस्सा पानी में डूब जाता है। कुछ समय के लिए ऐसा लगता है जैसे मंदिर समुद्र के अंदर चला गया हो।</p><p>ज्वार के दौरान मंदिर का ढांचा पानी में छिप जाता है और कई बार केवल शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता है। इसके बाद जैसे-जैसे समुद्र का पानी वापस जाने लगता है, मंदिर भी धीरे-धीरे सामने आने लगता है। यही वजह है कि इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं।</p><p><h2>मंदिर के दर्शन ज्वार-भाटे के हिसाब से होते हैं</h2></p><p>इस मंदिर की सबसे खास बात यही है कि यहां दर्शन करने के लिए आपको समुद्र के ज्वार-भाटे का ध्यान रखना पड़ता है। अगर आप ऐसे समय पहुंच गए जब पानी बढ़ रहा है, तो मंदिर तक जाना संभव नहीं होगा। इसलिए यहां जाने से पहले ज्वार का समय पता करना काफी जरूरी माना जाता है।</p><p>पानी उतरने के बाद मंदिर का रास्ता फिर से खुल जाता है और श्रद्धालु वहां जाकर भगवान शिव के दर्शन और पूजा कर सकते हैं। इस तरह यहां आने वाले लोगों के लिए समुद्र का बदलता रूप भी यात्रा का एक खास हिस्सा बन जाता है।</p><p><h2>स्तंभेश्वर नाम कैसे पड़ा?</h2></p><p>कहा जाता है कि मंदिर का नाम स्तंभेश्वर महादेव भगवान शिव के नाम से जुड़ा है। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और स्थानीय परंपराओं की वजह से यह जगह भक्तों के बीच काफी आस्था रखती है। समुद्र के बीच आने वाले ज्वार के बावजूद मंदिर का लंबे समय से यहां मौजूद रहना भी लोगों के लिए आकर्षण का कारण है।</p><p>यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा करते हैं और समुद्र के पानी को मंदिर के चारों ओर आते-जाते हुए देखते हैं। कई लोगों के लिए यह धार्मिक आस्था के साथ-साथ प्रकृति को करीब से देखने का भी अनोखा अनुभव होता है।</p><p><h2>मंदिर जाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान</h2></p><p>अगर आप स्तंभेश्वर महादेव मंदिर जाने का प्लान बना रहे हैं, तो सबसे पहले ज्वार-भाटे का समय जरूर देख लें। मंदिर के दर्शन पानी के स्तर पर निर्भर करते हैं। गलत समय पर पहुंचने पर आपको मंदिर के अंदर जाने के बजाय दूर से ही समुद्र का नजारा देखना पड़ सकता है। वडोदरा और अहमदाबाद से यहां सड़क मार्ग के जरिए पहुंचा जा सकता है। इसलिए यात्रा शुरू करने से पहले रास्ते के साथ-साथ ज्वार का समय भी चेक कर लेना बेहतर रहेगा।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156001304</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 16:41:33 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कालीघाट मंदिर से जुड़ी खास मान्यता, जहां मन का दबा दर्द बाहर आने की है मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Kalighat Temple Kolkata: कालीघाट मंदिर भक्तों के लिए सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह आस्था, शक्ति और भावनाओं से जुड़ा हुआ स्थान भी है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/spiritual-significance-of-kalighat-temple-article-156001304 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156001303,thumbsize-242290,width-1280,height-720,resizemode-75/156001303.jpg" alt="spiritual significance of kalighat temple" /></div><p><strong>Kalighat Temple Kolkata:</strong> कोलकाता के कालीघाट इलाके में स्थित कालीघाट मंदिर देश के प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां देवी सती के शरीर का एक अंग गिरा था। यही वजह है कि इस मंदिर को मां काली की शक्तिशाली उपस्थिति से जोड़कर देखा जाता है। कालीघाट मंदिर में मां काली का स्वरूप शक्ति और सच्चाई का प्रतीक माना जाता है। </p><p>यहां आने वाले कई भक्तों के लिए मां के दर्शन सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह उनके लिए एक गहरा भावनात्मक अनुभव है। भक्तों का मानना है कि मां के सामने वह अपने मन की बातें बिना किसी डर के रख सकते हैं। कई बार लंबे समय से दबे हुए दुख, गुस्सा या दर्द भी यहां माता के सामने आकर बाहर निकल जाते हैं।</p><p>कुछ लोग मंदिर में पूजा या दर्शन के दौरान भावुक हो जाते हैं और उनकी आंखों से आंसू निकल आते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसे मन के बोझ को बाहर निकालने और मां के सामने अपनी भावनाएं समर्पित करने से जोड़कर देखा जाता है।</p><p><h2>शक्तिपीठ होने की वजह से खास है कालीघाट</h2></p><p>हिंदू धर्म में शक्तिपीठों को देवी शक्ति से जुड़े बेहद पवित्र स्थान माना जाता है। कालीघाट भी इन्हीं शक्तिपीठों में शामिल है। मान्यता है कि इन जगहों पर देवी की शक्ति का विशेष प्रभाव रहता है। जो लोग किसी नुकसान, रिश्ते में परेशानी या दिल टूटने जैसी भावनाओं से गुजर रहे होते हैं, उनके लिए किसी पवित्र जगह पर जाकर प्रार्थना करना मन को संभालने का एक जरिया बन सकता है। कालीघाट में भी कई भक्त अपने मन की परेशानियां मां के सामने रखते हैं और भावनात्मक रूप से हल्का महसूस करते हैं।</p><p><h2>मन का दर्द छोड़ने का एहसास</h2></p><p>कई बार हम अपनी परेशानियां दूसरों से खुलकर नहीं कह पाते। बाहर से सब ठीक नजर आता है, लेकिन अंदर बहुत कुछ चलता रहता है। ऐसे में मंदिर जैसे शांत और आस्था से जुड़े स्थान पर जाकर प्रार्थना करना व्यक्ति को अपनी भावनाओं को स्वीकार करने का मौका दे सकता है। कालीघाट मंदिर में भक्त मां काली के सामने अपनी परेशानियां रखते हैं। कोई चुपचाप प्रार्थना करता है तो कोई भावुक होकर रो पड़ता है। धार्मिक नजरिए से इसे मां के सामने अपने दुख और चिंताओं को छोड़ देने की भावना से जोड़ा जाता है।</p><p><h2></p><p>मां काली के सामने खुलकर भावनाएं रखने की मान्यता</h2></p><p>मां काली को शक्ति और निडरता का प्रतीक माना जाता है। इसलिए भक्तों के बीच यह भावना भी है कि मां के सामने अपने मन की बात छिपाने की जरूरत नहीं है। कोई अपने परिवार की परेशानी लेकर आता है, कोई रिश्तों की चिंता लेकर, तो कोई अपने जीवन की मुश्किलों से परेशान होकर मां के दरबार में पहुंचता है। यहां प्रार्थना करने के बाद कई भक्तों को ऐसा महसूस होता है कि उनके मन का कुछ बोझ कम हुआ है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156000380</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 14:13:14 +0530</pubDate><title><![CDATA[ आंख फड़कना शुभ या अशुभ? जानिए इसके पीछे की आध्यात्मिक मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Eye Twitching Signs: आंख के फड़कने को आध्यात्मिक मान्यताओं में अलग-अलग संकेतों से जोड़ा जाता है। अलग-अलग परंपराओं में इसके अलग-अलग मतलब बताए गए हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/dharm/spiritual-meaning-of-eye-twitching-article-156000380 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156000378,thumbsize-99046,width-1280,height-720,resizemode-75/156000378.jpg" alt="spiritual meaning of eye twitching" /></div><p><strong>Eye Twitching Signs:</strong> आंख का अचानक फड़कना या झपकना काफी आम बात है लेकिन, आध्यात्मिक मान्यताओं में इसे शरीर और मन में होने वाले बदलावों से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग परंपराओं में इसके अलग-अलग मतलब बताए गए हैं। कुछ आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार हमारा शरीर सिर्फ बाहरी रूप से ही बदलाव महसूस नहीं करता, बल्कि हमारे मन और भावनाओं में होने वाले बदलावों का असर भी शरीर पर दिखाई दे सकता है। </p><p>इसी वजह से आंख का फड़कना या झपकना कभी-कभी आंतरिक ऊर्जा में बदलाव का संकेत माना जाता है। अगर आप किसी तनाव, भावनात्मक बदलाव या जीवन के किसी बड़े फैसले से गुजर रहे हैं, तो इसे अपने मन की स्थिति पर ध्यान देने का एक मौका माना जा सकता है।</p><p><h2>बाईं और दाईं आंख फड़कने का क्या है मतलब</h2></p><p>भारतीय लोक मान्यताओं में बाईं और दाईं आंख के फड़कने को अलग-अलग संकेतों से जोड़कर देखा जाता है। कुछ मान्यताओं में बाईं आंख के फड़कने को मन की भावनाओं, चिंता या किसी अंदरूनी उलझन से जोड़ा जाता है। वहीं दाईं आंख के फड़कने को बदलाव, नए अवसर या जीवन में होने वाली किसी नई घटना का संकेत माना जाता है।</p><p><h2>अंतर्ज्ञान से भी जोड़ा जाता है</h2></p><p>कुछ आध्यात्मिक परंपराओं में आंखों के फड़कने को इंट्यूशन यानी अंतर्ज्ञान से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि शरीर में होने वाली ऐसी छोटी प्रतिक्रियाएं हमें अपने आसपास और अपने मन में चल रही चीजों पर ध्यान देने का संकेत दे सकती हैं। अगर आंख फड़कने के साथ आपको किसी बात को लेकर बार-बार विचार आ रहे हैं, तो कुछ समय शांत बैठकर अपने विचारों को समझने की कोशिश कर सकते हैं।</p><p><h2>जीवन में बड़े बदलाव का संकेत</h2></p><p>जब इंसान की जिंदगी में कोई बड़ा बदलाव आता है, जैसे नौकरी बदलना, रिश्तों में बदलाव, नई जिम्मेदारी या किसी पुराने विचार को छोड़ना, तो उसका असर मन और शरीर दोनों पर पड़ सकता है। आध्यात्मिक नजरिए से आंख का फड़कना ऐसे ही आंतरिक बदलाव या नई ऊर्जा के आने का संकेत माना जाता है। इसे डरने के बजाय खुद को समझने का एक मौका माना जा सकता है। हालांकि, इन बातों को धार्मिक या लोक मान्यता के तौर पर ही देखना चाहिए। हर बार आंख फड़कने का मतलब कोई घटना होने वाली है, ऐसा जरूरी नहीं है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item></channel></rss>