<rss version="2.0" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"><channel><lastBuildDate>Mon, 07 Sep 2026 19:00:08 +0530</lastBuildDate><title>Festivals (त्योहार): Festival Dates Times, Vrat, Puja Vidhi, Shubh Muhurat &amp; Festival Calendar News in Hindi</title><link>https://www.bhaktitimes.in/festivals</link><language/><description>Explore Hindu Festivals with accurate festival dates, vrat and fasting details, puja vidhi, shubh muhurat, festival calendar, rituals, significance, celebrations, and the latest religious festival updates in Hindi.</description><item><guid isPermaLink="false">156103505</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 17:18:50 +0530</pubDate><title><![CDATA[ शाम ढलते ही तुलसी को हाथ लगाने से क्यों किया जाता है मना? जानें धार्मिक मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ Tulsi Puja Rules: तुलसी का पौधा भारतीय घरों में आस्था, परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। सूर्यास्त के बाद इसके पत्ते न तोड़ना और न छूना धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/tulsi-religious-significance-tulsi-puja-rules-article-156103505 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156103498,thumbsize-139676,width-1280,height-720,resizemode-75/156103498.jpg" alt="tulsi religious significance tulsi puja rules" /></div><p><strong>Tulsi Puja Rules: </strong>भारत के ज्यादातर घरों में तुलसी का पौधा आसानी से देखने को मिल जाता है। तुलसी का पौधा बेहद पवित्र माना जाता है। घर के आंगन या बालकनी में तुलसी का पौधा रखना और रोज इसकी पूजा करना सदियों पुरानी परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में तुलसी को देवी तुलसी का स्वरूप माना गया है और इसका संबंध भगवान विष्णु से भी बताया जाता है। तुलसी को लेकर कुछ खास नियमों का पालन किया जाता है। आखिर ऐसा क्यों है? आइए आसान भाषा में समझते हैं।</p><p><h2>तुलसी को माना जाता है बेहद पवित्र</h2></p><p>हिंदू धर्म में तुलसी को पवित्रता और शुभता का प्रतीक माना जाता है। कई घरों में सुबह तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाया जाता है और पूजा की जाती है। भगवान विष्णु की पूजा में भी तुलसी दल का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यता है कि घर में तुलसी का पौधा होने से सकारात्मक माहौल बना रहता है। इसलिए इसके साथ भी सामान्य पौधों की तरह व्यवहार नहीं किया जाता। तुलसी के पत्ते तोड़ने से लेकर उसमें पानी देने तक के लिए कुछ परंपरागत नियम बताए गए हैं।</p><p><h2>सूर्यास्त के बाद तुलसी के पत्ते क्यों नहीं तोड़ते?</h2></p><p>मान्यता के अनुसार सूर्यास्त के बाद तुलसी के पौधे को छूना या उसके पत्ते तोड़ना उचित नहीं माना जाता। इसके पीछे धार्मिक सोच यह है कि शाम के बाद तुलसी माता विश्राम करती हैं। इसी वजह से सूर्यास्त के बाद तुलसी के पत्ते तोड़ने से बचने की परंपरा चली आ रही है। माना जाता है कि तुलसी का इस्तेमाल पूजा के लिए करना हो तो दिन के समय ही इसके पत्ते ले लेने चाहिए।</p><p><h2>रविवार को तुलसी में पानी देने की भी है मनाही</h2></p><p>रविवार का दिन भी तुलसी से जुड़े खास नियमों में शामिल है। कई हिंदू परिवारों में रविवार को तुलसी में पानी नहीं दिया जाता और इसके पत्ते भी नहीं तोड़े जाते। धार्मिक मान्यता के अनुसार रविवार को देवी तुलसी भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं। इसलिए इस दिन तुलसी के पौधे को छेड़ने से बचने की परंपरा है। यही कारण है कि घर के बड़े अक्सर कहते हैं कि रविवार को तुलसी को न तोड़ें, न ही उसमें पानी डालें।</p><p><h2>बिना स्नान किए तुलसी को छूने से क्यों बचते हैं?</h2></p><p>तुलसी को पवित्र पौधा माना जाता है, इसलिए इसकी पूजा से पहले शरीर और मन की शुद्धता पर जोर दिया जाता है। इसी वजह से बिना स्नान किए तुलसी को छूने या उसके पत्ते तोड़ने से बचने की परंपरा है। सुबह स्नान करने के बाद तुलसी को जल देना, दीपक जलाना और पूजा करना कई घरों की रोजाना की परंपरा है। इसका उद्देश्य तुलसी के प्रति सम्मान और श्रद्धा बनाए रखना है।</p><p><h2>तुलसी के पत्ते तोड़ते समय इन बातों का रखें ध्यान</h2></p><p>तुलसी के प्रति सम्मान रखना इस पूरी परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। अगर पूजा के लिए तुलसी के पत्ते लेने हैं तो सुबह का समय बेहतर माना जाता है। पत्ते तोड़ते समय पौधे को नुकसान न पहुंचे, इसका ध्यान रखना चाहिए। एक साथ बहुत सारे पत्ते तोड़ने के बजाय जरूरत के अनुसार ही पत्ते लेना अच्छा माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156102850</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 15:27:05 +0530</pubDate><title><![CDATA[ महाप्रसाद से कीर्तन तक, दिल्ली के जगन्नाथ मंदिरों में ऐसे दिखता है ओडिशा ]]></title><description><![CDATA[ Jagannath Temple Delhi: दिल्ली जैसी व्यस्त जगह में धार्मिक स्थल लोगों को कुछ पल ठहरने का मौका देते हैं। जगन्नाथ मंदिर भी इसी तरह का अनुभव देते हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/jagannath-temple-delhi-spiritual-places-in-delhi-article-156102850 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156102849,thumbsize-216060,width-1280,height-720,resizemode-75/156102849.jpg" alt="jagannath temple delhi spiritual places in delhi" /></div><p><strong>Jagannath Temple Delhi:</strong> दिल्ली शहर के बीचों-बीच कई ऐसी जगहें हैं, जहां आपको अलग-अलग राज्यों की संस्कृति और परंपराओं की झलक देखने को मिल जाती है। दिल्ली का जगन्नाथ मंदिर बेहद खास है। ये मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ की जगह नहीं हैं, बल्कि यहां ओडिशा की संस्कृति, खान-पान और धार्मिक परंपराओं को भी करीब से महसूस करने का मौका मिलता है। यहां होने वाले कीर्तन, महाप्रसाद और ओडिशा के पारंपरिक पकवान बेहद खास हैं। खासकर चना पोडो और रसगुल्ला जैसे व्यंजन मंदिर से जुड़े आपको अनुभव को और खास बना देगें।</p><p><h2>दिल्ली में मिलता है ओडिशा जैसा माहौल</h2></p><p>शहर की भागदौड़ के बीच जब लोग मंदिर पहुंचते हैं तो उन्हें सिर्फ पूजा करने का मौका नहीं मिलता, बल्कि अपने घर और अपनी संस्कृति से जुड़ने का एहसास भी होता है। हौज खास का श्री जगन्नाथ मंदिर और त्यागराज नगर का जगन्नाथ मंदिर ऐसे ही प्रमुख स्थानों में गिने जाते हैं। यहां होने वाले धार्मिक कार्यक्रमों और अनुष्ठानों में ओडिशा की परंपराओं की झलक देखने को मिलती है। मंदिर परिसर में पहुंचते ही माहौल कुछ अलग महसूस होता है। कहीं भजन-कीर्तन चल रहा होता है, तो कहीं भक्त भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए इंतजार करते नजर आते हैं। कई लोगों के लिए यह जगह कुछ समय के लिए शहर की तेज रफ्तार जिंदगी से दूर होने का जरिया भी बन जाती है।</p><p><h2>भगवान जगन्नाथ की भक्ति से जुड़ता है समुदाय</h2></p><p>भगवान जगन्नाथ की भक्ति सिर्फ ओडिशा तक सीमित नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों में भगवान जगन्नाथ के मंदिर और उनसे जुड़ी परंपराएं देखने को मिलती हैं। दिल्ली में भी इन मंदिरों ने ओडिया समुदाय को एक साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। त्योहारों और खास धार्मिक अवसरों पर मंदिरों में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है। पूजा, कीर्तन और दूसरे कार्यक्रमों में लोग परिवार के साथ शामिल होते हैं। ऐसे मौकों पर मंदिर सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं रहता, बल्कि समुदाय के लोगों के मिलने-जुलने की जगह भी बन जाता है।</p><p><h2>महाप्रसाद में छिपी है ओडिशा की खास पहचान</h2></p><p>जगन्नाथ परंपरा में महाप्रसाद का अपना विशेष महत्व है। भगवान को भोग लगाने के बाद इसे भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। इसे सिर्फ खाना समझना सही नहीं होगा, क्योंकि इसके साथ धार्मिक आस्था और परंपरा भी जुड़ी हुई है। महाप्रसाद की सबसे खास बात इसकी सादगी है। पारंपरिक भोजन में दाल, चावल, अलग-अलग तरह की सब्जियां और खीर जैसे व्यंजन शामिल हो सकते हैं। भोजन में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया जाता, फिर भी इसका स्वाद काफी खास होता है। भक्तों के लिए महाप्रसाद का अनुभव इसलिए भी खास होता है क्योंकि यहां भोजन को भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जाता है। यही वजह है कि मंदिर आने वाले कई लोगों के लिए दर्शन के साथ महाप्रसाद का अनुभव भी यात्रा का अहम हिस्सा बन जाता है।</p><p><h2>सुबह की पूजा से शाम की आरती तक</h2></p><p>अगर आप दिल्ली के किसी जगन्नाथ मंदिर में कुछ समय बिताते हैं तो यहां दिन की शुरुआत धार्मिक गतिविधियों से होती दिखाई दे सकती है। सुबह पूजा और भोग की परंपरा के बाद दिन में अलग-अलग समय पर भगवान को भोग लगाया जाता है। शाम के समय मंदिर का माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है। आरती के दौरान घंटियों और शंख की आवाज के साथ भजन-कीर्तन का माहौल बनता है। भक्त कुछ देर के लिए शांत होकर पूजा में शामिल होते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156100774</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 09:02:34 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Wishes In Hindi: 'न कोई चिंता रहे, न कोई गम रहे...' आज अजा एकादशी पर अपनों को भेजें ये भक्तिमय संदेश ]]></title><description><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Ki Shubhkamnaye: आज 7 सितंबर 2026 को अजा एकादशी है। इस पावन अवसर पर आप अपने प्रियजनों को कुछ खास कोट्स के जरिए शुभकामनाएं दे सकते हैं। चलिए जानें अजा एकादशी के दिन से जुड़े शुभकामना संदेशों के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-wishes-quotes-of-ekadashi-ki-shubhkamnaye-in-hindi-article-156100774 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156100796,thumbsize-136725,width-1280,height-720,resizemode-75/156100796.jpg" alt="aja ekadashi 2026 wishes quotes of ekadashi ki shubhkamnaye in hindi" /></div><p><strong>Aja Ekadashi 2026 Ki Hardik Shubhkamnaye In Hindi:</strong> प्रत्येक वर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार 24 एकादशी तिथियां आती हैं, जिन दिनों व्रत और विष्णु-लक्ष्मी जी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। एक साल में कुल 24 एकादशियां यानी हर महीने 2 बार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी का व्रत रखा जाता है। वर्तमान में भाद्रपद का महीना चल रहा है, जिसकी कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि आज 7 सितंबर 2026 को है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन पूजा करने से पापों के साथ-साथ कष्टों का भी नाश होता है तथा वैकुंठ धाम में जाने की संभावना बढ़ जाती है। </p><p>आज अजा एकादशी के पावन मौके पर आप कोट्स के जरिए अपने प्रियजनों को शुभकामनाएं भेज सकते हैं। यहां पर अजा एकादशी के 8 शुभकामना संदेश दिए गए हैं, जिन्हें खास लोगों के साथ साझा करने के साथ-साथ सोशल मीडिया पर स्टेटस के रूप में भी लगाया जा सकता है। </p><p><h2><strong>अजा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं</p><p></strong></h2></p><p><strong>1.</strong></p><p>श्रीहरि की भक्ति में लगाएं मन </p><p>आज अजा एकादशी का मनाएं पर्व </p><p>दूर हों जीवन के सारे दुख </p><p>विष्णु-लक्ष्मी की कृपा से खुशहाल हों दिन</p><p>अजा एकादशी 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>2.</strong></p><p>हर मनोकामना पूरी हो, हर मुश्किल दूर हो</p><p>आपको आज से श्रीहरि विष्णु का मिले साथ</p><p>जिससे जीवन में खुशियां भरी रहें</p><p>अजा एकादशी की शुभकामनाएं!!</p><p><strong>3.</strong></p><p>भक्ति में रंग जाए मन</p><p>होठों पर हो श्रीहरि का नाम</p><p>मिट जाएं जीवन से कष्ट तमाम</p><p>माता लक्ष्मी की कृपा से बढ़ें खुशियां</p><p>अजा एकादशी लाए जीवन में सुख-समृद्धि</p><p>आपको और आपके परिवार वालों को पावन अजा एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>4.</strong></p><p>न कोई चिंता रहे, न कोई गम रहे</p><p>हर पल जीवन में खुशियों का संग रहे</p><p>विष्णु जी की कृपा और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद मिले,</p><p>जीवन में हर दिन सुख-शांति के फूल खिलें</p><p>अजा एकादशी की मंगलकामनाएं!!</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-today-shubh-muhurat-vishnu-lakshmi-puja-vidhi-aaj-ekadashi-ka-vrat-kholne-ka-time-kya-hai-article-156100356" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>अजा एकादशी पर आज शुभ मुहूर्त में इस विधि से करें पूजा, जानें व्रत के नियम और पारण का समय</strong></a></p><p><strong>5.</strong></p><p>श्रीहरि के चरणों में जो व्यक्ति शीश झुकाता है</p><p>उसके जीवन में सुख-समृद्धि का दीप जलता है</p><p>आज अजा एकादशी पर प्रभु से यही अरदास है</p><p>आपके परिवार पर सदा विष्णु-लक्ष्मी का आशीर्वाद रहे</p><p>अजा एकादशी 2026 की हार्दिक बधाई!!</p><p><strong>6.</strong></p><p>एकादशी का व्रत हो</p><p>मन में सच्ची आस हो</p><p>हर सांस में श्रीहरि का एहसास हो</p><p>दुखों का अंत हो</p><p>खुशियों की शुरुआत हो</p><p>प्रभु की कृपा हर दिन साथ हो</p><p>आपको अजा एकादशी 2026 की शुभकामनाएं!!</p><p><strong>7.</strong> </p><p>आज जो सच्चे मन से व्रत करे</p><p>विष्णु कृपा बरसे उस पर</p><p>पूर्ण हो हर आस और दूर हो दुख-दर्द</p><p>अजा एकादशी की बहुत-बहुत बधाई!!</p><p><strong>8.</strong></p><p>तपस्या का ये दिन, संयम की ये रीत</p><p>विष्णु जी का आशीर्वाद मिले, सफल हो हर मीत</p><p>अजा एकादशी की हार्दिक बधाई!!</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156100578</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 08:13:49 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bach Baras Ki Katha In Hindi: आज बछ बारस की पूजा में पढ़ें ये कथा, मिल सकता है मनचाहा फल ]]></title><description><![CDATA[ Bach Baras 2026 Today: आज 7 सितंबर 2026 को बछ बारस का पर्व मनाया जा रहा है। आज गाय और बछड़े की पूजा करने के साथ-साथ राजा देवदानी से जुड़ी एक कथा भी पढ़ी जाती है। चलिए जानें आज बछ बारस पर पढ़ी जाने वाली कथा के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/govatsa-dwadashi-2026-today-bach-baras-ki-katha-in-hindi-raja-devdani-ki-kahani-article-156100578 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156100642,thumbsize-172936,width-1280,height-720,resizemode-75/156100642.jpg" alt="govatsa dwadashi 2026 today bach baras ki katha in hindi raja devdani ki kahani" /></div><p><strong>Bach Baras 2026 Katha:</strong> बछ बारस का दिन धार्मिक दृष्टि से खास होता है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि बछ बारस पर पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही संतान के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद मिलता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को बछ बारस का पर्व मनाया जाता है। साल 2026 में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी तिथि 7 सितंबर की शाम 5 बजकर 3 मिनट से 8 सितंबर की दोपहर 2 बजकर 42 मिनट तक रहेगी। इसी वजह से आज 7 सितंबर 2026, सोमवार को बछ बारस मनाई जा रही है।</p><p>बछ बारस पर राजा देवदानी से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी पढ़ी जाती है, जिसके बाद ही पूजा का पूर्ण फल मिलता है। आइए जानें बछ बारस पर्व की कथा क्या है।</p><p><h2><strong>बछ बारस की कथा</p><p></strong></h2></p><p><h3><strong>राजा के पास एक गाय और भैंस थी</p><p></strong></h3>पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भारत में सुवर्णपुर नाम का एक नगर था, जहां देवदानी नामक राजा का राज चलता था। राजा की दो रानियां थीं। पहली रानी का नाम 'सीता' तो दूसरी का नाम 'गीता' था। राजा को जानवरों से बहुत प्यार था। उन्होंने एक गाय और एक भैंस को पाल रखा था। रानी सीता को भैंस से खास लगाव था। वो भैंस को अपनी सखी मानती और उसका बहुत ख्याल रखती। वहीं, दूसरी रानी को गाय और उसके बछड़े से बहुत प्यार था। वो दोनों को सखी के समान प्यार करती थी।</p><p><h3><strong>भैंस ने की रानी सीता से शिकायत</p><p></strong></h3>एक दिन भैंस ने रानी सीता से कहा 'गाय का बछड़ा है, जिससे रानी गीता बहुत प्यार करती हैं। मुझे बछड़े से ईर्ष्या होती है क्योंकि मेरा बच्चा नहीं है।' रानी को ये बात सुन दुख हुआ और उसने भैंस को वचन दिया कि वो सब कुछ ठीक कर देगी।</p><p><h3><strong>रानी सीता ने किए बछड़े के टुकड़े</p><p></strong></h3>रानी सीता ने उसी दिन शाम के समय गाय के बछडे़ को अगवा किया और उसके कई टुकड़े कर गेहूं की राशि में छुपा दिए। रानी गीता को जब बहुत देर तक बछड़ा नहीं मिला तो उन्होंने उसे ढूंढने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कुछ भी पता नहीं चला।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/bach-baras-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-share-bach-baras-2026-wishes-with-friends-and-family-article-156100396" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>आज 'बछ बारस' पर अपनों को भेजें ये प्यार भरे शुभकामना संदेश</strong></a></p><p><h3><strong>महल में हुई रक्त और मांस की वर्षा</p><p></strong></h3>अगले दिन जब राजा भोजन करने के लिए अपने स्थान पर बैठे तो उसी समय आसमान से खून और मांस की वर्षा होने लगी। कुछ ही समय में पूरे महल में रक्त और मांस फैल गया तथा मल-मूत्र आदि की बास आने लगी। राजा ये देख घबरा गया और भगवान से इसके कारण के बारे में पूछने लगा। तभी आकाशवाणी हुई 'हे राजा, रानी सीता ने तेरी गाय के बछडे़ को काटा और उसके टु़कड़े गेहूं की राशि में छुपा दिए। तेरे महल में ये सब इसलिए हो रहा है। कल 'गोवत्स द्वादशी' है। कल तू भैंस को अपने नगर से बाहर निकालने के बाद गाय और बछडे़ की पूजा कर। साथ ही पूरे दिन गाय का दूध और कटे फलों का सेवन न कर। इससे रानी सीता का पाप नष्ट होगा और बछड़ा पुनर्जीवित हो जाएगा।'</p><p><h3><strong>राजा को मिला अपनी पूजा का फल</p><p></strong></h3>राजा ने पूरी श्रद्धा से गोवत्स द्वादशी के दिन पूजा की और सभी नियमों का पालन किया, जिसके बाद बछड़ा पुनर्जीवित हो गया और महल की स्थिति भी अपने आप सुधर गई। कहा जाता है कि इसी घटना के बाद से देशभर में हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी मनाने की परंपरा शुरू हो गई, जिसे बछ वारस, बछ बारस और वसु बारस आदि नामों से जाना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156100396</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 06:38:18 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bach Baras 2026 Wishes in Hindi: गौ माता हर मां को खुशियां... आज 'बछ बारस' पर अपनों को भेजें ये प्यार भरे शुभकामना संदेश ]]></title><description><![CDATA[ Happy Bach Baras 2026 Wishes: बछ बारस का हिंदू धर्म में खास महत्व है, जो मातृत्व, ममता और संतान की खुशहाली से जुड़ा त्योहार है। यदि इस पावन दिन आप भी अपने दोस्तों व परिवार वालों को शुभकामनाएं भेजना चाहते हैं तो नीचे दिए गए बछ बारस पर्व की विशेज साझा कर सकते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/bach-baras-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-share-bach-baras-2026-wishes-with-friends-and-family-article-156100396 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156100403,thumbsize-170972,width-1280,height-720,resizemode-75/156100403.jpg" alt="bach baras ki hardik shubhkamnaye in hindi share bach baras 2026 wishes with friends and family" /></div><p><strong>Happy Bach Baras 2026 Wishes In Hindi:</strong> हर साल भाद्रपद माह में बछ बारस द्वादशी का पर्व मनाया जाता है, जिसे बछ वारस, बछ बारस, गोवत्स द्वादशी और वसु बारस आदि नामों से जाना जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार 7 सितंबर 2026 की शाम 5 बजकर 3 मिनट से 8 सितंबर 2026 की दोपहर 2 बजकर 42 मिनट तक भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि रहेगी। ऐसे में आज 7 सितंबर 2026 को देशभर में बछ बारस का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन कृष्ण जी के साथ-साथ गाय और उसके बछड़े की पूजा की जाती है। मान्यता है कि बछ बारस के दिन पूजा करने से पारिवारिक सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही संतान की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य के लिए इस दिन उपासना की जाती है। </p><p>अगर आप भी आज बछ बारस के पर्व की शुभकामनाएं अपनी मां, बहन, पत्नी, बेटी या किसी खास प्रियजन को भेजना चाहते हैं तो ये विशेज उनके साथ साझा कर सकते हैं।</p><p><h2><strong>बछ बारस पर्व की शुभकामनाएं (bach baras 2026 ki hardik shubhkamnaye in hindi) </p><p></strong></h2><strong>1.</strong></p><p>ये पर्व आपके जीवन में खुशियां लेकर आए</p><p>आज ये है हमारी कामना </p><p>बछ बारस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>2.</strong></p><p>ममता की खुशबू से आपका घर-आंगन महके</p><p>हर दिन आपके जीवन में नई खुशियां आएं</p><p>आज बछ बारस के दिन आप पर मेहरबान हों गौ माता</p><p>बछ बारस की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>3.</strong></p><p>गौ माता के आशीर्वाद से आपके घर में सुख-शांति आए</p><p>धन-धान्य में वृद्धि हो</p><p>ये ही है आज हमारी इच्छा</p><p>आपको और आपके परिवार वालों को बछ बारस की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>4.</strong></p><p>आज से आपके आंगन में खुशियों के फूल खिलें</p><p>रोजाना अपनों के बिताएं समय</p><p>बछ बारस का आशीर्वाद ऐसा हो जिससे जीवन रंगीन बने</p><p>बछ बारस की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-today-shubh-muhurat-vishnu-lakshmi-puja-vidhi-aaj-ekadashi-ka-vrat-kholne-ka-time-kya-hai-article-156100356" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>अजा एकादशी पर आज शुभ मुहूर्त में इस विधि से करें पूजा, जानें व्रत के नियम और पारण का समय</strong></a></p><p><strong>5.</strong></p><p>गौ माता हर मां को खुशियां दें</p><p>हर संतान को सुख दें</p><p>आज बछ बारस के दिन ये ही हमारी कामना</p><p>आपको बछ बारस के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं!!</p><p><strong>6.</strong></p><p>बछ बारस का दिन आपके जीवन में सुख-शांति लेकर आए</p><p>संतान को उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु का आशीर्वाद मिले</p><p>बछ बारस के शुभ दिन की ढेरों शुभकामनाएं!!</p><p><strong>7.</strong></p><p>गौ माता की कृपा सदा आप पर बनी रहे </p><p>आपके घर-आंगन में खुशियों का वास हो</p><p>बछ बारस के पावन पर्व की ढेरों शुभकामनाएं!!</p><p><strong>8.</strong></p><p>इस पवित्र पर्व पर गौ माता का आशीर्वाद आप पर बना रहे</p><p>संतान को लंबी उम्र का मिले आशीर्वाद </p><p>उज्ज्वल भविष्य की कामना भी हो पूरी</p><p>बछ बारस के पावन पर्व की शुभकामनाएं!!</p><p><strong>9.</strong></p><p>गौ माता की कृपा से आपके घर में सुख-समृद्धि का वास हो</p><p>संतान के जीवन में भी खुशियां बनी रहें</p><p>बछ बारस के पावन पर्व पर ढेरों मंगलकामनाएं!!</p><p><strong>10.</strong></p><p>संतान का प्यार और मां की ममता </p><p>रिश्तों को बनाए शानदार</p><p>बछ बारस का पर्व आपके जीवन में लाए खुशियों की बहार</p><p>इस पावन पर्व की ढेरों शुभकामनाएं!!</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156100356</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 05:51:29 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Today: अजा एकादशी पर आज शुभ मुहूर्त में इस विधि से करें पूजा, जानें व्रत के नियम और पारण का समय ]]></title><description><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Date & Time Today: आज 7 सितंबर 2026 को अजा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। यहां पर से आप अजा एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त, पूजन विधि, मंत्र, व्रत के नियम और पारण का समय जान सकते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-today-shubh-muhurat-vishnu-lakshmi-puja-vidhi-aaj-ekadashi-ka-vrat-kholne-ka-time-kya-hai-article-156100356 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156100375,thumbsize-140175,width-1280,height-720,resizemode-75/156100375.jpg" alt="aja ekadashi 2026 today shubh muhurat vishnu lakshmi puja vidhi aaj ekadashi ka vrat kholne ka time kya hai" /></div><p><strong>Aja Ekadashi 2026 Today:</strong> हिंदू धर्म के लोगों के लिए अजा एकादशी का दिन बहुत ही खास होता है। इस दिन भक्तजन व्रत रखने के साथ-साथ भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और देवी तुलसी की पूजा करते हैं। मान्यता है कि अजा एकादशी के दिन पूजा-पाठ करने से पापों का नाश होता है। व्यक्ति का जीवन आसान होता है और उसे वैकुंठ धाम में स्थान मिलने की संभावना बढ़ जाती है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी का व्रत रखा जाता है। इस बार आज 7 सितंबर 2026, सोमवार को अजा एकादशी मनाई जा रही है। यदि आप भी आज अजा एकादशी का व्रत रख रहे हैं तो सबसे पहले देवी-देवताओं की पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, मंत्र, व्रत के नियम और पारण का समय आदि के बारे में जान लें।</p><p><h2><strong>अजा एकादशी 2026 की तिथि</p><p></strong></h2></p><p><ul><li>भाद्रपद कृष्ण एकादशी तिथि का आरंभ- कल 6 सितंबर 2026 को शाम 07:29 बजे से</li><li>भाद्रपद कृष्ण एकादशी तिथि का समापन- आज 7 सितंबर 2026 को शाम 05:03 बजे</li></ul></p><p><h2><strong>अजा एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त </p><p></strong></h2><ul><li>ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:31 बजे से 05:16 बजे तक</li><li>प्रातः सन्ध्या: सुबह 04:53 बजे से 06:02 बजे तक</li><li>अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक</li><li>विजय मुहूर्त: दोपहर 02:25 बजे से 03:15 बजे तक</li><li>गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:36 बजे से 06:59 बजे तक</li><li>सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:36 बजे से 07:45 बजे तक</li><li>अमृत काल: दोपहर 03:59 बजे से शाम 05:29 बजे तक</li><li>निशिता मुहूर्त: रात 11:56 बजे से मध्य रात्रि 12:42 बजे तक</li></ul><h2><strong>अजा एकादशी की पूजा विधि </p><p></strong></h2><ul><li>सुबह जल्दी उठकर स्नान कर पीले रंग के कपड़े पहनें। नहाने के पानी में गंगाजल जरूर मिलाएं। </li><li>पूजा शुरू करने से पहले व्रत का संकल्प लें। </li><li>घर के मंदिर की सफाई करने के बाद एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं, जिस पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की तस्वीर या मूर्ति को स्थापित करें। </li><li>देवी-देवताओं को चंदन, वस्त्र, पीले फूल, फल, मिठाई, जल और तुलसी दल अर्पित करें।</li><li>मंत्र जाप करने के बाद घी का दीपक जलाएं।</li><li>अजा एकादशी व्रत की कथा पढ़ने के बाद आरती करें।</li><li>देवी तुलसी की पूजा करें और पौधे के पास गाय के घी का दीपक जलाएं।</li><li>व्रत का पारण करने से पहले दान जरूर करें।</li></ul>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें-<a href="https://www.bhaktitimes.in/rashifal/horoscope-7-september-2026-moon-transit-cancer-astrology-predictions-article-156100312" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>7 सितंबर का राशिफल: आज चंद्रमा का कर्क में होगा गोचर, जानें 12 राशियों पर कैसा पड़ेगा प्रभाव</strong></a></p><p><h2><strong>अजा एकादशी पर जपने वाले मंत्र </p><p></strong></h2><ul><li>सरल विष्णु मंत्र- ॐ विष्णवे नमः</li><li>अष्टाक्षर विष्णु मंत्र- ॐ नमो नारायणाय</li><li>विष्णु गायत्री मंत्र- ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात॥</li><li>तुलसी माता का मूल बीज मंत्र- ॐ तुलस्यै नमः</li></ul><h2><strong>अजा एकादशी व्रत के नियम </p><p></strong></h2></p><p><ul><li>आज चावल न खाएं। </li><li>ब्रह्मचर्य का पालन करें।</li><li>किसी भी तरह की तामसिक चीज का सेवन न करें। </li><li>गुस्सा करने से बचें और नकारात्मक चीजों से दूर रहें।</li><li>दोपहर के समय सोने की जगह भगवान का ध्यान करें।</li><li>आज तुलसी का पत्ता न तोड़ें और न ही तुलसी के पौधे में जल अर्पित करें।</li></ul></p><p><h2><strong>अजा एकादशी व्रत का पारण समय</p><p></strong></h2>द्रिक पंचांग के अनुसार, आज की एकादशी का पारण कल होगा। कल 8 सितंबर 2026 की सुबह 6 बजकर 2 मिनट से अजा एकादशी व्रत का पारण समय शुरू होगा, जो सुबह 8 बजकर 33 मिनट पर समाप्त होगा। इस दौरान विष्णु और लक्ष्मी जी की पूजा करने के बाद उन्हें चढ़ाए प्रसाद को खाकर अजा एकादशी व्रत का पारण किया जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156100345</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 06:44:21 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Vrat Katha In Hindi: आज अजा एकादशी पर पढ़ें ये व्रत कथा, दूर हो सकता है हर संकट ]]></title><description><![CDATA[ भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का विशेष महत्व है। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन व्रत और कथा के श्रवण से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-vrat-katha-significance-and-story-article-156100345 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156100344,thumbsize-612676,width-1280,height-720,resizemode-75/156100344.jpg" alt="aja-ekadashi-vrat-katha-significance-and-story" /></div><p>भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को 'अजा एकादशी' के रूप में जाना जाता है। आज 7 सितंबर 2026 को ही अजा एकादशी मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह तिथि भगवान विष्णु के स्वरूप श्रीहरि की पूजा और व्रत के लिए अत्यंत शुभ मानी गई है। भक्त इस दिन विधि-विधान से व्रत का संकल्प लेते हैं और भगवान हृषिकेश की आराधना करते हैं। पद्म पुराण में इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसके अनुसार इस दिन व्रत रखने और कथा का पाठ करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।</p><p><h2><strong>अजा एकादशी व्रत की कथा</p><p></strong></h2></p><p><h2><strong>श्रीकृष्ण ने बताया अजा एकादशी का महत्व</p><p></strong></h2>पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के महत्व के बारे में जानने की जिज्ञासा प्रकट की। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें 'अजा एकादशी' के बारे में बताते हुए कहा कि यह एकादशी सभी पापों का नाश करने वाली है। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की कथा का उल्लेख करते हुए इस व्रत के प्रभाव को समझाया।</p><p>कथा के अनुसार, प्राचीन काल में राजा हरिश्चंद्र एक सत्यवादी और चक्रवर्ती सम्राट थे। दुर्भाग्यवश, कर्मों के फल स्वरूप उन्हें अपना संपूर्ण राज्य त्यागना पड़ा। कठिन परिस्थितियों के कारण उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया और स्वयं भी एक चाण्डाल के यहां दास के रूप में कार्य करने लगे। वे श्मशान में मृतकों के कफन एकत्र करने का कार्य करते थे, फिर भी उन्होंने सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा।</p><p><h3><strong>महर्षि गौतम ने दिखाया आगे का रास्ता</p><p></strong></h3>अपने दुखों से मुक्ति का मार्ग खोजने के लिए राजा हरिश्चंद्र अत्यंत व्याकुल थे। इसी दौरान उनकी भेंट महर्षि गौतम से हुई। राजा ने अपना सारा दुख मुनि के समक्ष व्यक्त किया। तब महर्षि गौतम ने उन्हें भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत करने का परामर्श दिया। मुनि ने बताया कि यह व्रत समस्त पापों का नाश करने वाला और कल्याणकारी है।</p><p><h3><strong>प्राप्त हुआ स्वर्गलोक</p><p></strong></h3>महर्षि गौतम के निर्देशानुसार, राजा हरिश्चंद्र ने पूरी श्रद्धा के साथ अजा एकादशी का व्रत रखा और रात्रि में जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी कष्ट दूर हो गए। उन्हें अपने पुत्र और पत्नी का पुनः सानिध्य प्राप्त हुआ और उनका खोया हुआ राज्य वापस मिल गया। मान्यता है कि इस व्रत के प्रताप से ही राजा हरिश्चंद्र अंत में अपने परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हुए। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को यह भी बताया कि जो भी भक्त इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156096781</guid><pubDate>Mon, 07 Sep 2026 06:56:50 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026 Niyam & Upay: आज अजा एकादशी पर करें इन नियमों का पालन, जानें विष्णु कृपा पाने के प्रभावी उपाय ]]></title><description><![CDATA[ अजा एकादशी का व्रत आज 7 सितंबर 2026 को रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा से पापों से मुक्ति मिलती है। जानें व्रत के नियम और उपाय। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-vrat-niyam-aur-upay-article-156096781 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156096780,thumbsize-655552,width-1280,height-720,resizemode-75/156096780.jpg" alt="aja-ekadashi-2026-vrat-niyam-aur-upay" /></div><p>भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अजा एकादशी के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन व्रत आज 7 सितंबर को रखा जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, इस दिन का विशेष महत्व है क्योंकि इसी महीने भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में पृथ्वी पर अवतरण लिया था। भक्त इस दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करते हैं, जिससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।</p><p>पद्म पुराण में अजा एकादशी के महत्व का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मन को शांति प्राप्त होती है। व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए और अपनी श्रद्धा के अनुसार कुछ उपाय भी करने चाहिए, जो जीवन की बाधाओं को दूर करने में सहायक माने जाते हैं।</p><p><h2>अजा एकादशी के विशेष उपाय </h2>अजा एकादशी के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए। स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाना शुभ माना जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करें। धन और समृद्धि की प्राप्ति के लिए पूजा के दौरान शुद्ध घी का दीपक जलाएं। एक लाल कपड़े में हल्दी की गांठ और एक सिक्का रखकर 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का 108 बार जाप करें। इस पोटली को बाद में उस स्थान पर रखें जहां आप अपना धन रखते हैं।</p><p>एकादशी के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा का भी विशेष विधान है, क्योंकि पीपल में देवताओं का वास माना जाता है। जल में थोड़ी चीनी और कच्चा दूध मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करें। इसके अतिरिक्त, तुलसी पूजन का भी इस दिन विशेष महत्व है। सुबह और शाम के समय तुलसी के समक्ष घी का दीपक जलाएं और माता तुलसी की परिक्रमा करें। ये छोटे-छोटे उपाय श्रद्धा और विश्वास के साथ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p><p><h2>एकादशी व्रत के दौरान इन बातों का रखें ध्यान</h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन कुछ कार्यों से परहेज करना चाहिए ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है। साथ ही, दशमी तिथि को भी चावल नहीं खाने चाहिए। एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ने की मनाही होती है। यदि आपको पूजा के लिए तुलसी की आवश्यकता हो, तो गमले के पास गिरे हुए सूखे पत्तों का ही उपयोग करें।</p><p>व्रत के दिन तामसिक भोजन (मांस-मदिरा या लहसुन-प्याज) से पूरी तरह परहेज करना चाहिए। मन में किसी के प्रति क्रोध न लाएं और वाद-विवाद से दूर रहें। इस दिन दिन में सोने से भी बचना चाहिए और अपना अधिकांश समय भगवान के नाम के स्मरण और भजन-कीर्तन में व्यतीत करना चाहिए। इन नियमों का पालन करने से व्रत की सात्विकता बनी रहती है और भक्तों को आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156095985</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 13:46:45 +0530</pubDate><title><![CDATA[ लड्डू गोपाल की छठी 2026 में कब है? जानें तिथि, शुभ तिथि, पूजा विधि और विशेष भोग ]]></title><description><![CDATA[ जन्माष्टमी के बाद लड्डू गोपाल की छठी का उत्सव मनाया जाता है। इस लेख में जानें वर्ष 2026 में छठी की सही तिथि, कान्हा के श्रृंगार की विधि और उन्हें अर्पित किए जाने वाले विशेष भोग के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/laddu-gopal-chatti-2026-date-puja-vidhi-bhog-article-156095985 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156095984,thumbsize-746987,width-1280,height-720,resizemode-75/156095984.jpg" alt="laddu-gopal-chatti-2026-date-puja-vidhi-bhog" /></div><p>जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अब भक्त उनके छठी उत्सव की तैयारी में जुट गए हैं। हिंदू परंपरा के अनुसार, किसी भी शिशु के जन्म के छठे दिन छठी का संस्कार मनाया जाता है, उसी मान्यता के अनुरूप कान्हा के प्राकट्य के छह दिन बाद यह विशेष उत्सव आयोजित किया जाता है। इस दिन भक्त अपने आराध्य लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और उन्हें विधि-विधान से भोग अर्पित करते हैं।</p><p>इस वर्ष भाद्रपद माह में जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को मनाया गया था। इस गणना के आधार पर लड्डू गोपाल की छठी 9 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन का धार्मिक महत्व इसलिए भी अधिक माना जा रहा है क्योंकि इस तिथि पर भद्रा राजयोग, मालव्य राजयोग और हंस राजयोग जैसे विशेष संयोग बन रहे हैं, जो इस पूजा को और भी शुभ बनाते हैं।</p><p><h2>लड्डू गोपाल की छठी: पूजा विधि और भोग</h2>छठी का उत्सव मुख्य रूप से शाम के समय मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत लड्डू गोपाल को दूध और जल के मिश्रण से स्नान कराकर की जाती है। स्नान के बाद उन्हें पीले रंग के नवीन वस्त्र पहनाकर उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन घर पर ही काजल तैयार कर कान्हा को अपनी छोटी उंगली से काजल लगाया जाता है। इसके बाद उनकी आरती की जाती है और उन्हें झूला झुलाकर भजन-कीर्तन किए जाते हैं।</p><p>भगवान को भोग अर्पित करते समय सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन उन्हें बिना प्याज-लहसुन के बना शुद्ध भोजन अर्पित करना चाहिए। विशेष भोग में कढ़ी-चावल, माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और खीर को प्राथमिकता दी जाती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रत्येक भोग सामग्री में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य शामिल हो। पूजा के अंत में कुछ धनराशि को कान्हा के ऊपर से वार कर (न्योछावर कर) उसे प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में वितरित करने की परंपरा है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156095051</guid><pubDate>Sun, 06 Sep 2026 13:45:12 +0530</pubDate><title><![CDATA[ गणेश चतुर्थी पर करें ये उपाय, दूर होगा बुध और केतु दोष ]]></title><description><![CDATA[ गणेश चतुर्थी 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। ज्योतिष शास्त्र में भगवान गणेश की पूजा को बुध और केतु ग्रह के दोषों को शांत करने के लिए विशेष रूप से प्रभावी माना गया है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/ganesh-chaturthi-2026-astrological-significance-mercury-ketu-remedies-article-156095051 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156095050,thumbsize-620866,width-1280,height-720,resizemode-75/156095050.jpg" alt="ganesh-chaturthi-2026-astrological-significance-mercury-ketu-remedies" /></div><p>भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को पूरे भारत में गणेश चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन तिथि 14 सितंबर को पड़ रही है। विघ्नहर्ता भगवान गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन घरों और सार्वजनिक पंडालों में गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।</p><p>गणेश चतुर्थी का यह उत्सव न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि इसका गहरा संबंध ज्योतिष शास्त्र से भी माना जाता है। पुराणों में वर्णित कथाओं और ज्योतिषीय गणनाओं के आधार पर, भगवान गणेश की उपासना को ग्रहों के दोषों को दूर करने का एक प्रभावी माध्यम माना गया है। विशेष रूप से केतु और बुध ग्रह से जुड़ी समस्याओं के निवारण में गणेश पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।</p><p><h2>केतु दोष और गणेश पूजा का संबंध</h2>ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, भगवान गणेश का संबंध केतु ग्रह से जोड़ा जाता है। इसके पीछे का तर्क यह है कि केतु को एक धड़ के रूप में माना जाता है, जिसका सिर नहीं है। पौराणिक कथाओं में जब भगवान शिव ने गणेश जी को हाथी का मस्तक प्रदान किया, तो उस स्वरूप को केतु की स्थिति से जोड़कर देखा गया। केतु को ज्ञान, आध्यात्मिकता और जीवन में आने वाले अचानक परिवर्तनों का कारक माना जाता है।</p><p>ज्योतिष शास्त्र के जानकारों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति के जीवन में भ्रम की स्थिति बनी हुई है या बनते हुए काम बार-बार बिगड़ रहे हैं, तो यह केतु के अशुभ प्रभाव का संकेत हो सकता है। ऐसी स्थिति में विघ्नहर्ता गणेश की पूजा करना बाधाओं को दूर करने और मानसिक स्पष्टता प्राप्त करने में सहायक मानी जाती है।</p><p><h2>बुध ग्रह की शांति और गणेश उपासना</h2>भगवान गणेश को बुद्धि और विवेक का अधिष्ठाता देव माना गया है, जबकि ज्योतिष में बुध ग्रह को वाणी, तर्क, शिक्षा और व्यापार का कारक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन जातकों की कुंडली में बुध कमजोर स्थिति में होता है या अशुभ फल दे रहा होता है, उनके लिए बुधवार के दिन गणेश जी की पूजा करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।</p><p>बुध ग्रह का संबंध हरे रंग से है और भगवान गणेश की पूजा में हरी दूर्वा (घास) का विशेष महत्व है। मान्यता है कि बुधवार के दिन गणेश जी को 21 दूर्वा अर्पित करने से बुध के दोष शांत होते हैं। पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, बुध की शांति के लिए 'ॐ बुं बुधाय नमः' मंत्र का उच्चारण करने की भी परंपरा है। इस दिन हरी मूंग की दाल का दान करना और हरे रंग के वस्त्र धारण करना भी बुध ग्रह से संबंधित उपायों में शामिल है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156042751</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 17:59:18 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Laddu Gopal Aarti: पूजा के समय जरूर पढ़ें बाल गोपाल की आरती ]]></title><description><![CDATA[ Laddu Gopal Aarti: लड्डू गोपाल की पूजा में आरती का विशेष महत्व माना जाता है। जन्माष्टमी के पावन मौके पर भक्त प्रेम और श्रद्धा से बाल गोपाल की आरती करते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-laddu-gopal-aarti-lyrics-in-hindi-article-156042751 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156042749,thumbsize-200613,width-1280,height-720,resizemode-75/156042749.jpg" alt="janmashtami 2026 laddu gopal aarti lyrics in hindi" /></div><p><strong>Laddu Gopal Aarti: </strong>लड्डू गोपाल को भक्त सिर्फ भगवान के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें अपने परिवार के एक सदस्य की तरह मानते हैं। लड्डू गोपाल की सेवा भक्त बड़े प्यार और अपनापन के साथ करते हैं। सुबह उठकर उन्हें स्नान कराया जाता है, साफ-सुथरे और सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं। इसके बाद चंदन, फूल और आभूषणों से उनका श्रृंगार किया जाता है। माखन-मिश्री, फल या दूसरे पसंदीदा भोग अर्पित करने के बाद उनकी आरती की जाती है।</p><p>बाल गोपाल भगवान श्रीकृष्ण का वही प्यारा बाल रूप हैं, जिसे देखकर भक्तों के मन में ममता और प्रेम का भाव जागता है। उनकी आरती करते समय मंदिर का माहौल भी भक्तिमय हो जाता है। घंटी की आवाज, दीपक की रोशनी और आरती के बोल मन को सुकून देते हैं। जन्माष्टमी के दिन तो लड्डू गोपाल की पूजा और आरती का उत्साह देखते ही बनता है। अगर आपके घर में भी कान्हा विराजमान हैं, तो पूजा के बाद श्रद्धा से उनकी आरती जरूर करें। यहां आप बाल गोपाल की आरती के पूरे लिरिक्स हिंदी में पढ़ सकते हैं और भक्ति भाव से कान्हा का गुणगान कर सकते हैं। </p><p><strong>श्री लड्डू गोपाल जी की आरती हिंदी में (Laddu Gopal Aarti)</strong></p><p>आरती श्री गोपाल जी की कीजे।</p><p>अपना जन्म सफल कर लीजे।।</p><p>श्री यशोदा का परम दुलारा।</p><p>बाबा की अखियन का तारा।।</p><p>गोपियन के प्राणों का प्यारा।</p><p>इन पर प्राण न्योछावर कीजे।।</p><p>आरती श्री गोपाल जी की कीजे।</p><p>अपना जन्म सफल कर लीजे।।</p><p>बलदाऊ के छोटो भैया।</p><p>कान्हा कहि-कहि बोलत मैया।।</p><p>परम मुदित मन लेत बलैया।</p><p>यह छवि नैनन में भर लीजे।।</p><p>आरती श्री गोपाल जी की कीजे।</p><p>अपना जन्म सफल कर लीजे।।</p><p>श्री राधावर सुघर कन्हैया।</p><p>ब्रज जन का नवनीत खवैया।।</p><p>देखत ही मन नयन चुरैया।</p><p>अपना सर्वस्व इनको दीजे।।</p><p>आरती श्री गोपाल जी की कीजे।</p><p>अपना जन्म सफल कर लीजे।।</p><p>तोतरे बोल मधुर सुहावे।</p><p>सखन संग खेलत सुख पावे।।</p><p>सोई सुकृति जो इनको ध्यावे।</p><p>अब इनको अपनो कर लीजे।।</p><p>आरती श्री गोपाल जी की कीजे।</p><p>अपना जन्म सफल कर लीजे।।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156042344</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 17:02:28 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: व्रत खोलने से पहले जान लें चंद्रोदय का समय, देखें शहरवार पूरी लिस्ट ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026: चांद निकलने का समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता। जगह बदलने के साथ इसमें कुछ मिनटों का अंतर आ जाता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/krishna-janmashtami-2026-aaj-chand-kitne-baje-niklega-article-156042344 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156042347,thumbsize-80497,width-1280,height-720,resizemode-75/156042347.jpg" alt="krishna janmashtami 2026 aaj chand kitne baje niklega" /></div><p><strong>Janmashtami 2026: </strong>जन्माष्टमी आज यानी शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाई जा रही है। आज आपके शहर में चांद कितने बजे दिखाई देगा? व्रत रखने वाले भक्तों के मन में ये सवाल रहता है क्योंकि जन्माष्टमी पर कई जगहों पर चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलने और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपरा है। चांद निकलने का समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता। जगह बदलने के साथ इसमें कुछ मिनटों का अंतर आ जाता है।</p><p>अगर आप भी आज जन्माष्टमी का व्रत रख रहे हैं और चंद्र दर्शन के बाद व्रत खोलने की तैयारी कर रहे हैं, तो अपने शहर का चंद्रोदय समय पहले से नोट कर लें। नीचे दिए गए समय शहरों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर हैं। मौसम खराब होने, बादल छाए रहने की वजह से चांद दिखाई देने में कुछ मिनटों का फर्क हो सकता है।</p><p><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th>शहर</th><th>जन्माष्टमी पर चंद्रोदय का समय</th></tr></thead><tbody><tr><td>नई दिल्ली</td><td>रात 11:24 बजे</td></tr><tr><td>नोएडा</td><td>रात 11:23 बजे</td></tr><tr><td>गुरुग्राम</td><td>रात 11:25 बजे</td></tr><tr><td>जयपुर</td><td>रात 11:34 बजे</td></tr><tr><td>लखनऊ</td><td>रात 11:13 बजे</td></tr><tr><td>कानपुर</td><td>रात 11:17 बजे</td></tr><tr><td>वाराणसी</td><td>रात 11:09 बजे</td></tr><tr><td>प्रयागराज</td><td>रात 11:13 बजे</td></tr><tr><td>पटना</td><td>रात 10:59 बजे</td></tr><tr><td>चंडीगढ़</td><td>रात 11:19 बजे</td></tr><tr><td>देहरादून</td><td>रात 11:15 बजे</td></tr><tr><td>श्रीनगर</td><td>रात 11:16 बजे</td></tr><tr><td>अहमदाबाद</td><td>रात 11:58 बजे</td></tr><tr><td>सूरत</td><td>5 सितंबर, रात 12:02 बजे</td></tr><tr><td>मुंबई</td><td>5 सितंबर, रात 12:07 बजे</td></tr><tr><td>पुणे</td><td>5 सितंबर, रात 12:05 बजे</td></tr><tr><td>भोपाल</td><td>रात 11:38 बजे</td></tr><tr><td>इंदौर</td><td>रात 11:46 बजे</td></tr><tr><td>रायपुर</td><td>रात 11:25 बजे</td></tr><tr><td>रांची</td><td>रात 11:04 बजे</td></tr><tr><td>कोलकाता</td><td>रात 10:54 बजे</td></tr><tr><td>भुवनेश्वर</td><td>रात 11:10 बजे</td></tr><tr><td>हैदराबाद</td><td>रात 11:48 बजे</td></tr><tr><td>बेंगलुरु</td><td>5 सितंबर, रात 12:02 बजे</td></tr><tr><td>चेन्नई</td><td>रात 11:51 बजे</td></tr></tbody></table></p><p><h2>जन्माष्टमी पर चंद्रमा का महत्व</h2> </p><p>मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र में हुआ था और रोहिणी नक्षत्र के स्वामी चंद्रमा माने जाते हैं। इसी वजह से जन्माष्टमी की रात चंद्रमा के दर्शन को शुभ माना जाता है। कई घरों में चांद निकलने के बाद उसे जल, दूध या सफेद फूल अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद कान्हा के जन्म की पूजा की जाती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156041893</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 15:39:28 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026 Aarti: आरती कुंज बिहारी की, पढ़ें श्रीकृष्ण की पूरी आरती ]]></title><description><![CDATA[ Aarti Kunj Bihari Ki: इस आर्टिकल के माध्यम से हम- 'आरती कुंज बिहारी की' के पूरे बोल हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप जन्माष्टमी के मौके पर श्रद्धा के साथ कान्हा की आराधना कर सकें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-aarti-krishna-aarti-aarti-kunj-bihari-ki-lyrics-article-156041893 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156041890,thumbsize-85021,width-1280,height-720,resizemode-75/156041890.jpg" alt="janmashtami 2026 aarti krishna aarti aarti kunj bihari ki lyrics" /></div><p><strong>Aarti Kunj Bihari Ki: </strong>आज जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर के घरों और मंदिरों में भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ करते हैं। जन्माष्टमी की पूजा में कई तरह की धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनमें भगवान कृष्ण की आरती (Krishna Aarti) का खास महत्व माना जाता है। खासतौर पर- 'आरती कुंज बिहारी की' कृष्ण भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है। </p><p>यह आरती भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित आरती है। इसमें कान्हा के सुंदर और मनमोहक स्वरूप का वर्णन मिलता है। भगवान कृष्ण को कुंज बिहारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे वृंदावन की कुंज गलियों में अपनी बाल लीलाओं से सभी का मन मोह लेते थे। उनकी बांसुरी की धुन और उनकी मोहक छवि का वर्णन कृष्ण भक्ति में खास जगह रखता है। आरती के दौरान भक्त दीप जलाकर, घंटी बजाकर और हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं।</p><p>अगर आप भी इस जन्माष्टमी व्रत रख रहे हैं या घर पर कान्हा की पूजा कर रहे हैं, तो पूजा के बाद भगवान कृष्ण की यह आरती जरूर गा सकते हैं। सही बोलों के साथ आरती करने से पूजा का माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है। यहां हम- 'आरती कुंज बिहारी की' के पूरे बोल हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप जन्माष्टमी के मौके पर श्रद्धा के साथ कान्हा की आराधना कर सकें।</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>गले में बैजंती माला,</p><p>बजावै मुरली मधुर बाला ।</p><p>श्रवण में कुण्डल झलकाला,</p><p>नंद के आनंद नंदलाला ।</p><p>गगन सम अंग कांति काली,</p><p>राधिका चमक रही आली ।</p><p>लतन में ठाढ़े बनमाली</p><p>भ्रमर सी अलक,</p><p>कस्तूरी तिलक,</p><p>चंद्र सी झलक,</p><p>ललित छवि श्यामा प्यारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>कनकमय मोर मुकुट बिलसै,</p><p>देवता दरसन को तरसैं ।</p><p>गगन सों सुमन रासि बरसै ।</p><p>बजे मुरचंग,</p><p>मधुर मिरदंग,</p><p>ग्वालिन संग,</p><p>अतुल रति गोप कुमारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>जहां ते प्रकट भई गंगा,</p><p>सकल मन हारिणि श्री गंगा ।</p><p>स्मरन ते होत मोह भंगा</p><p>बसी शिव सीस,</p><p>जटा के बीच,</p><p>हरै अघ कीच,</p><p>चरन छवि श्रीबनवारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>चमकती उज्ज्वल तट रेनू,</p><p>बज रही वृंदावन बेनू ।</p><p>चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू</p><p>हंसत मृदु मंद,</p><p>चांदनी चंद,</p><p>कटत भव फंद,</p><p>टेर सुन दीन दुखारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p><p>आरती कुंजबिहारी की,</p><p>श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156041235</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 13:56:53 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को सबसे पहले किस चीज का भोग लगाएं? जानें सही क्रम ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026 Today: कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत का पारण लड्डू गोपाल को भोग लगाने के बाद ही किया जाता है। चलिए जानें जन्माष्टमी की रात लड्डू गोपाल को किन चीजों का भोग लगाया जाता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-today-laddu-gopal-ko-sabse-pahle-kis-chij-ka-bhog-lagaye-panchamrit-kaise-banaen-ghar-par-article-156041235 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156041279,thumbsize-139496,width-1280,height-720,resizemode-75/156041279.jpg" alt="janmashtami 2026 today laddu gopal ko sabse pahle kis chij ka bhog lagaye panchamrit kaise banaen ghar par" /></div><p><strong>Janmashtami 2026 Bhog List:</strong> श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आज 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को मनाया जा रहा है। जन्माष्टमी के दिन जहां कुछ लोग केवल कृष्ण जी की पूजा करते हैं। वहीं, उन लोगों की भी कमी नहीं है जो दिनभर उपवास रखते हैं। जन्माष्टमी का व्रत रात में ठीक 12 बजे कृष्ण जी की पूजा करने के बाद खोला जाता है। सबसे पहले 12 बजे खीरे को काटा जाता है, जिसे श्रीकृष्ण का माता देवकी के गर्भ से बाहर आने का प्रतीक माना जाता है। लड्डू गोपाल को पंचामृत से स्नान कराने के पश्चात नए कपड़े पहनाए जाते हैं। श्रृंगार किया जाता है और फिर भोग लगाया जाता है। यदि आप भी आज जन्माष्टमी की रात कृष्ण जी को भोग लगाने वाले हैं तो जान लें कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सबसे पहले लड्डू गोपाल को किस चीज का भोग लगाया जाता है।</p><p><h2><strong>लड्डू गोपाल को सबसे पहले किस चीज का भोग लगाएं?</strong></h2></p><p>कृष्ण जन्माष्टमी की रात लड्डू गोपाल का श्रृंगार करने के बाद पंचामृत का सबसे पहले भोग लगाएं, जो कि दूध, दही, देसी घी, शहद और शक्कर को मिलाकर बनता है। पंचामृत के बाद माखन-मिश्री का भोग लगाएं। फिर धनिया पंजीरी, मखाने, पंचमेवा, ताजे फल और सात्विक मिठाइयों का भोग लगा सकते हैं। अंत में लड्डू गोपाल को छप्पन भोग भी अर्पित करें। बता दें कि लड्डू गोपाल को चढ़ाए जाने वाले सभी भोगों में तुलसी का पत्ता जरूर होना चाहिए क्योंकि इसके बिना कृष्ण जी भोग स्वीकार नहीं करते हैं। </p><p><h2><strong>पंचामृत कैसे बनाएं घर पर?</p><p></strong></h2></p><p><ul><li>पंचामृत बनाने के लिए सबसे पहले चांदी, पीतल या साफ स्टील का एक बर्तन लें। </li><li>बर्तन में 1 चम्मच गाय का घी और 2 चम्मच शहद डालें, जिन्हें अच्छी तरह से मिलाएं। </li><li>अब बर्तन में 4 चम्मच पिसी हुई मिश्री या चीनी, 8 चम्मच दही और 16 चम्मच गाय का कच्चा ठंडा दूध डालें।</li><li>सभी सामग्रियों को हल्के हाथ से तब तक मिलाएं, जब तक सभी चीजें आपस में पूरी तरह से मिल न जाएं।</li></ul></p><p><h2><strong>छप्पन भोग में शामिल मुख्य व्यंजन</p><p></strong></h2>कृष्ण जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल को छप्पन भोग लगाने का विशेष महत्व है। छप्पन भोग में चावल, दाल, चटनी, कढ़ी, दधिशाकजा, श्रीखंड, शरबत, बाटी, मुरब्बा, मिष्ठान्न, बड़ा, मठरी, फेनी, पूरी, खजला, सिरा, मालपुआ, चीला, जलेबी, मेसू, कचौरी, मीठी पूरी, दही, पक्वान्न, पाटीसपेटा, मूंग दाल, हलवा, खीर, रबड़ी, रसगुल्ला, पेड़ा, मोहन भोग, लड्डू, माखन-मिश्री, पंचामृत, काजू कतली, बर्फी, सोन पापड़ी, नारियल की बर्फी, सेवइयां, घेवर, शक्कर पारे, नमकीन मठरी, पापड़, च्यवनप्राश, फल (केला, सेब, अंगूर आदि), ड्राई फ्रूट्स (बादाम, काजू, किशमिश), पानी, छाछ, नींबू पानी, बादाम का दूध, लस्सी, आचार, लौंग पुरी, खुरमा, बासुंदी और पान शामिल हैं। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल को पूरी श्रद्धा से छप्पन भोग अर्पित करता है, उसे कृष्ण जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन में खुशियों का आगमन होता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156039555</guid><pubDate>Fri, 04 Sep 2026 07:58:03 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026 Wishes in Hindi: जन्माष्टमी पर भेजें ये खास शुभकामना संदेश, अपनों के साथ जरूर करें शेयर ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026 Wishes in Hindi: जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। इस खास दिन अपनों को भेजें प्रेम, भक्ति और खुशियों से भरे दिल छू लेने वाले शुभकामना संदेश। यहां पढ़ें हैप्पी जन्माष्टमी 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं, विशेज, ग्रीटिंग्स और बधाई संदेश। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-wishes-in-hindi-greetings-sri-krishna-janmashtmi-ki-hardik-shubhkamnaye-in-hindi-article-156039555 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156039565,thumbsize-1316309,width-1280,height-720,resizemode-75/156039565.jpg" alt="janmashtami 2026 wishes in hindi greetings sri krishna janmashtmi ki hardik shubhkamnaye  in hindi" /></div><p><strong>Happy Krishna Janmashtami 2026। जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं, विशेज इन हिंदी, Janmashtami 2026 Wishes in Hindi:</strong> जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। इस खास दिन हर कोई अपने परिवार, दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ कान्हा के प्रेम और भक्ति में रंगना चाहता है। अगर आप भी अपनों को जन्माष्टमी की खूबसूरत बधाई देना चाहते हैं, तो यहां दिए गए शुभकामना संदेश आपके काम आ सकते हैं। इन संदेशों में श्रीकृष्ण की कृपा, प्रेम, सुख, शांति और समृद्धि की मंगलकामना की गई है। आप इन खास विशेज, ग्रीटिंग्स और बधाई संदेशों को अपने प्रियजनों के साथ WhatsApp, Facebook और Instagram पर भी शेयर कर सकते हैं। पढ़ें हैप्पी जन्माष्टमी 2026 <strong>(Krishna Janmashtami Wishes)</strong> के दिल छू लेने वाले संदेश।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/krishna-janmashtami-2026-bhagwan-shri-krishna-ke-108-naam-lord-krishna-108-names-in-hindi-article-156039474" data-type="tilCustomLink" target="_blank">जन्माष्टमी पर जरूर पढ़ें भगवान श्रीकृष्‍ण के 108 नाम, इनको जपने से बनेंगे सभी काम</a></p><p></strong></p><p><h2>जन्माष्टमी के शुभकामना संदेश - Happy Janmashtami Wishes in Hindi 2026</p><p></h2></p><p><strong>1.</strong> जीवन में कभी उम्मीद कम न हो</p><p>जब रास्ते मुश्किल हों तो कान्हा आपका हाथ थामें,</p><p>जब मन उदास हो तो उनकी बांसुरी मुस्कान दे जाए।</p><p>हर नए सवेरे के साथ नई उम्मीद आपके पास आए,</p><p>श्रीकृष्ण की कृपा से जीवन खुशियों से भर जाए।</p><p><strong>शुभ जन्माष्टमी!</p><p></strong></p><p><strong>2.</strong></p><p>माखन चुराने वाले नंदलाल, आपकी हर मनोकामना पूरी करें। श्रीकृष्ण की कृपा से आपके जीवन में प्रेम, सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। </p><p><strong>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं!</strong></p><p><strong>3.</strong></p><p>मुरली की धुन और राधा का प्यार,</p><p>कान्हा की भक्ति और खुशियों की बहार।</p><p>हर पल मिले आपको कृष्ण का साथ,</p><p>जन्माष्टमी पर यही है दिल से सौगात।</p><p><strong>हैप्पी जन्माष्टमी!</strong></p><p><strong>4.</strong></p><p>जिस घर में कान्हा का नाम होता है, वहां खुशियों का बसेरा होता है। भगवान श्रीकृष्ण आपके घर-आंगन को प्रेम, सुख और सकारात्मकता से भर दें। </p><p><strong>जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं।</strong></p><p><strong>5.</strong></p><p>नटखट कान्हा मुस्कुराएं,</p><p>मुरली अपनी मधुर बजाएं।</p><p>आपके जीवन में खुशियां आएं,</p><p>हर दुख आपसे दूर हो जाए।</p><p><strong>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामनाएं!</strong></p><p><strong>6.</strong></p><p>राधे-राधे के नाम से दिन की शुरुआत हो, कान्हा की कृपा से जीवन में हर खुशी आपके साथ हो। आपके परिवार पर श्रीकृष्ण का आशीर्वाद सदैव बना रहे। </p><p><strong>हैप्पी जन्माष्टमी 2026!</strong></p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/janmashtami-2026-brahmand-vihari-temple-mathura-mitti-ke-pede-bhog-kha-lagya-jata-hai-article-156035760" data-type="tilCustomLink" target="_blank">मथुरा के इस मंदिर में कान्हा को लगता है मिट्टी के पेड़ों का भोग</a></p><p></strong></p><p><strong>7.</strong></p><p>माखन की खुशबू, मिश्री की मिठास,</p><p>कान्हा के चरणों में हो आपका विश्वास।</p><p>हर दिन जीवन में नई खुशियां आएं,</p><p>कृष्ण की कृपा से सारे सपने सज जाएं।</p><p><strong>जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई!</strong></p><p><strong>8.</strong></p><p>नंद के घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की! इस पावन पर्व पर भगवान श्रीकृष्ण आपके जीवन से सभी परेशानियां दूर करें और खुशियों से आपकी झोली भर दें। <strong>जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।</strong></p><p><strong>9.</strong></p><p>बंसी की धुन पर झूमे संसार,</p><p>कान्हा के रंग में रंगे हर परिवार।</p><p>रहे सिर पर श्रीकृष्ण का हाथ,</p><p>हर कदम पर मिले खुशियों का साथ।</p><p><strong>शुभ जन्माष्टमी!</strong></p><p><strong>10 .</strong></p><p>कान्हा की मुस्कान आपके जीवन की पहचान बने, उनकी कृपा आपके हर सपने की उड़ान बने। घर में सुख-शांति और मन में प्रेम बना रहे। </p><p><strong>आपको और आपके परिवार को जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं।</strong></p><p><strong>11.</strong></p><p>राधा के प्रेम की मिठास मिले,</p><p>कान्हा की भक्ति का एहसास मिले।</p><p>हर कदम पर खुशियां आपके साथ चलें,</p><p>श्रीकृष्ण की कृपा से जीवन के फूल खिलें।</p><p><strong>हैप्पी जन्माष्टमी 2026! </strong></p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156036501</guid><pubDate>Thu, 03 Sep 2026 16:41:32 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami Puja Samagri: पूजा की थाली में क्या-क्या रखें? यहां देखें पूरी लिस्ट ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami Puja Samagri: अगर आप भी इस बार घर पर जन्माष्टमी की पूजा करने की तैयारी कर रहे हैं तो पूजा की सामग्री पहले से जुटा लेना बेहतर रहेगा। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-puja-samagri-janmashtami-bhog-krishna-bhog-article-156036501 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156036499,thumbsize-165776,width-1280,height-720,resizemode-75/156036499.jpg" alt="janmashtami puja samagri janmashtami bhog krishna bhog" /></div><p><strong>Janmashtami Puja Samagri:</strong> भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी देश-विदेश में धूमधाम से मनाया जाता है। इस साल जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन घरों में बाल गोपाल की पूजा की जाती है, उन्हें नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और सुंदर झूले में विराजमान कराया जाता है। भक्त दिनभर व्रत रखने के बाद रात में भगवान कृष्ण के जन्म के समय पूजा करते हैं। पूजा के समय कोई जरूरी चीज छूट न जाए, इसके लिए यहां पूरी लिस्ट दी गई है।</p><p><h2>जन्माष्टमी पूजा के लिए कौन-कौन सी सामग्री चाहिए?</h2></p><p>बाल गोपाल की पूजा के लिए बहुत ज्यादा सामान की जरूरत नहीं होती। श्रद्धा और साफ मन सबसे जरूरी माना जाता है। फिर भी पूजा को विधि-विधान से करने के लिए आप ये चीजें पहले से रख सकते हैं।</p><p><ul><li>बाल गोपाल की प्रतिमा</li><li>छोटा झूला</li><li>नए वस्त्र</li><li>मुकुट और आभूषण</li><li>छोटी बांसुरी</li><li>मोर पंख</li><li>चंदन</li><li>रोली या कुमकुम</li><li>अक्षत यानी चावल</li><li>तुलसी के पत्ते</li><li>फूल और फूलों की माला</li><li>मौली</li><li>धूप और अगरबत्ती</li><li>दीपक और रुई की बत्ती</li><li>घी या सरसों का तेल</li><li>कपूर</li><li>गंगाजल</li><li>पंचामृत की सामग्री</li><li>कच्चा दूध</li><li>दही</li><li>घी</li><li>शहद</li><li>शक्कर</li><li>फल</li><li>माखन और मिश्री</li><li>नारियल</li><li>पान का पत्ता</li><li>इलायची</li><li>केसर</li><li>इत्र</li><li>सिक्के</li><li>साफ कपड़ा</li></ul></p><p><h2>बाल गोपाल को क्या पहनाएं?</h2></p><p>जन्माष्टमी पर बाल गोपाल को नए कपड़े पहनाने की परंपरा है। आप अपनी पसंद के अनुसार भगवान के लिए सुंदर पीले, लाल, नीले या दूसरे रंग के वस्त्र ले सकते हैं। इसके साथ मुकुट, बांसुरी, हार, कंगन और मोर पंख से बाल गोपाल का श्रृंगार किया जा सकता है। इसके बाद भगवान को फूलों की माला पहनाकर झूले में विराजमान कराएं। चाहें तो झूले को फूलों, मोर पंख और सजावटी सामान से खूबसूरत तरीके से सजा सकते हैं।</p><p><h2>जन्माष्टमी पर बाल गोपाल का अभिषेक कैसे करें?</h2></p><p>रात में भगवान कृष्ण के जन्म के समय अभिषेक की परंपरा है। सबसे पहले बाल गोपाल की प्रतिमा को साफ स्थान पर रखें। इसके बाद गंगाजल से स्नान कराएं। फिर दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से तैयार पंचामृत से अभिषेक किया जा सकता है। अभिषेक के बाद भगवान को साफ जल से स्नान कराएं और साफ कपड़े से हल्के हाथों से पोंछें। इसके बाद उन्हें नए वस्त्र पहनाएं और मुकुट, बांसुरी, मोर पंख और अन्य आभूषणों से सजाएं।</p><p><h2>जन्माष्टमी पर भगवान कृष्ण को क्या भोग लगाएं?</h2></p><p>भगवान कृष्ण को माखन और मिश्री बेहद प्रिय माने जाते हैं। इसलिए जन्माष्टमी पर माखन-मिश्री का भोग जरूर लगाया जाता है। इसके अलावा फल, मिठाई, दूध से बनी चीजें, पंजीरी और धनिया की पंजीरी भी भोग में रखी जा सकती है। भोग में तुलसी दल रखना भी शुभ माना जाता है। ध्यान रखें कि तुलसी के पत्ते साफ हों और उन्हें श्रद्धा के साथ भगवान को अर्पित करें।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156029254</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 23:26:34 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कैसे रखें जन्माष्टमी का व्रत, जानिए क्या है खानपान के नियम ]]></title><description><![CDATA[ जन्माष्टमी का व्रत 4 सितंबर को रखा जाएगा। इस पावन अवसर पर लड्डू गोपाल की पूजा और व्रत के नियमों के बारे में विस्तार से जानें, ताकि आप पूरी श्रद्धा के साथ व्रत संपन्न कर सकें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-vrat-vidhi-and-fasting-rules-article-156029254 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156029253,thumbsize-588291,width-1280,height-720,resizemode-75/156029253.jpg" alt="janmashtami-2026-vrat-vidhi-and-fasting-rules" /></div><p>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व इस वर्ष 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की पूजा और व्रत करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। माना जाता है कि जो भक्त पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ यह व्रत रखते हैं, उन पर भगवान कृष्ण की विशेष कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। यदि आप पहली बार जन्माष्टमी का व्रत रखने जा रहे हैं या हर साल इस परंपरा का पालन करते हैं, तो इसके नियमों को समझना आवश्यक है।</p><p>जन्माष्टमी के व्रत की शुरुआत सप्तमी तिथि से ही हो जाती है। जिस प्रकार एकादशी के व्रत में दशमी तिथि से नियमों का पालन किया जाता है, उसी तरह जन्माष्टमी के लिए भाद्रपद कृष्ण सप्तमी से ही तामसिक भोजन का त्याग कर देना चाहिए। इस दौरान लहसुन, प्याज, मांसाहार और मदिरा का सेवन पूरी तरह वर्जित है। साथ ही, सप्तमी तिथि को बैंगन और मूली जैसी सब्जियों का सेवन करने से भी परहेज करना चाहिए। व्रती को इन दिनों सात्विक जीवन शैली अपनानी चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।</p><p><h2>व्रत की विधि और संकल्प</h2>जन्माष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शास्त्रों में ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व का समय) में स्नान को विशेष महत्व दिया गया है। नित्य कर्मों के बाद हाथ में जल और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें। संकल्प के दौरान 'ममाखिलपापप्रशमनपूर्वक सर्वाभीष्ट सिद्धये श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये' मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। पूरे दिन मन में भगवान कृष्ण का स्मरण करें और उनके मंत्रों का जाप करते रहें। शाम के समय भी पुनः स्नान करना शुभ माना जाता है।</p><p>व्रत के दौरान खानपान के नियमों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। यदि आप फलाहारी व्रत रख रहे हैं, तो मौसमी फल जैसे केला, सेब और अनार का सेवन कर सकते हैं। इसके अलावा दही, कुट्टू का आटा और साबूदाना भी लिया जा सकता है। भोजन में रिफाइंड तेल और चीनी के स्थान पर घी, शहद और गुड़ का प्रयोग करना उचित माना गया है। सामान्य नमक के स्थान पर सेंधा नमक का उपयोग किया जा सकता है। ध्यान रहे कि जन्माष्टमी के दिन अन्न का सेवन वर्जित है। साथ ही, लौकी, मूली, गाजर और चुकंदर जैसी सब्जियों से भी परहेज करना चाहिए।</p><p><h2>निर्जला भी रखते हैं व्रत</h2></p><p>जो भक्त निर्जला व्रत (बिना जल के व्रत) रखते हैं, उन्हें और भी कठोर नियमों का पालन करना होता है। ऐसे व्रती को सूर्यास्त से लेकर मध्य रात्रि में भगवान कृष्ण के जन्म तक जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं करनी चाहिए। व्रत का पारण मध्य रात्रि में भगवान के जन्मोत्सव के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर किया जाता है। यदि आप व्रत नहीं भी रख रहे हैं, तब भी इस दिन सात्विकता बनाए रखना और तामसिक चीजों से दूर रहना ही उचित माना गया है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156028645</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 23:32:34 +0530</pubDate><title><![CDATA[ जन्माष्टमी पर पीरियड्स के दौरान व्रत और पूजा के नियम, जानें क्या कहती हैं मान्यताएं ]]></title><description><![CDATA[ जन्माष्टमी के पावन अवसर पर यदि मासिक धर्म (पीरियड्स) की स्थिति हो, तो व्रत और पूजा कैसे करें? ज्योतिषी और वास्तु गुरु मान्या से जानें इस दौरान पालन किए जाने वाले जरूरी नियम और सावधानियां। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-fast-rules-during-periods-worship-guidelines-article-156028645 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156032572,thumbsize-2182748,width-1280,height-720,resizemode-75/156032572.jpg" alt="janmashtami-fast-rules-during-periods-worship-guidelines" /></div><p>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्त कान्हा की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और व्रत रखते हैं। हालांकि, कई बार महिलाओं के मन में यह सवाल उठता है कि यदि जन्माष्टमी के दौरान मासिक धर्म (पीरियड्स) की स्थिति हो, तो क्या व्रत रखा जा सकता है और पूजा कैसे की जानी चाहिए। ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञ मान्या के अनुसार, ऐसी स्थिति में भी व्रत और उपासना करना पूरी तरह से संभव है, क्योंकि शुद्धता का संकल्प मुख्य रूप से मन और आत्मा से जुड़ा होता है।</p><p>शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान भी जन्माष्टमी का व्रत रखा जा सकता है। इस दौरान व्रती को सुबह उठकर पूजा घर को स्पर्श किए बिना ही मन ही मन उपवास का संकल्प लेना चाहिए। शास्त्रों में मानसिक पूजा को स्थूल पूजा से भी अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। आप अपनी आंखें बंद करके भगवान कृष्ण के जन्म और उनके अभिषेक का ध्यान कर सकती हैं। यह मानसिक समर्पण कान्हा की भक्ति का एक सरल और प्रभावी तरीका है।</p><p><h2>पीरियड्स के दौरान पूजा और सेवा के नियम</h2>यदि व्रत के दौरान आप मासिक धर्म में हैं, तो लड्डू गोपाल की सेवा के लिए घर के अन्य सदस्यों की सहायता लेना उचित रहता है। आप अपने पति, बच्चों या परिवार के किसी अन्य सदस्य से कहकर मध्य रात्रि में बाल गोपाल का अभिषेक करवा सकती हैं। कान्हा को वस्त्र पहनाना और भोग लगाने जैसे कार्य भी आप परिवार के किसी सदस्य के माध्यम से करवा सकती हैं।</p><p>मंत्र जप के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। इस दौरान तुलसी की माला या किसी भी अन्य जप माला को स्पर्श करना वर्जित माना गया है। आप बिना माला छुए उंगलियों पर या मन ही मन 'ओम नमो भगवते वासुदेवाय' या 'हरे कृष्ण' महामंत्र का जाप कर सकती हैं। इसके अलावा, आप अपने फोन या लैपटॉप पर कृष्ण जन्म की कथा सुन सकती हैं, श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोकों का श्रवण कर सकती हैं और कीर्तन सुनकर अपने मन को सात्विक बनाए रख सकती हैं।</p><p><h2>भोग और प्रसाद से जुड़ी सावधानियां</h2>मासिक धर्म के दौरान लड्डू गोपाल के लिए पंजीरी या माखन-मिश्री जैसा भोग स्वयं नहीं बनाना चाहिए। इसके लिए भी परिवार के किसी सदस्य की मदद लेना बेहतर होता है। व्रती को उन्हीं के द्वारा तैयार किया गया प्रसाद या फलाहार ग्रहण करना चाहिए।</p><p>हालांकि, यदि आपके मासिक धर्म के पांच दिन पूरे हो चुके हैं और रक्तस्राव पूरी तरह रुक गया है, तो आप शुद्धिकरण के बाद स्वयं प्रसाद बना सकती हैं। इसके लिए नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें। शुद्धिकरण के बाद आप बिना किसी संकोच के रसोई में जाकर कान्हा के लिए सात्विक भोग तैयार कर सकती हैं। यह माना जाता है कि ऐसी स्थिति में आपकी आत्मिक शक्ति अधिक प्रबल होती है और आपकी सच्ची प्रार्थना कान्हा तक शीघ्र पहुंचती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156027982</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 07:13:08 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Hal Chhath 2026 Wishes: हल छठ के पावन दिन अपनों को भेजें शुभकामनाएं, पढ़ें ममता और आशीर्वाद से भरे संदेश ]]></title><description><![CDATA[ Hal Chhath 2026 Wishes: हल छठ का पर्व संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा माना जाता है। इस खास अवसर पर भगवान बलराम जी की पूजा की जाती है। यहां पढ़ें हल छठ के शुभकामना संदेश। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/hal-chhath-2026-wishes-hindi-har-chhath-ke-shubhkamna-sandesh-article-156027982 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156027987,thumbsize-1539273,width-1280,height-720,resizemode-75/156027987.jpg" alt="hal chhath 2026 wishes hindi har chhath ke shubhkamna sandesh" /></div><p><strong>Hal Chhath 2026 Wishes:</strong> हल छठ का ये पर्व भारतीय लोकजीवन और सनातन परंपरा में खास माना जाता है। यह पर्व विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है। ग्रामीण आंचल में इस दिन की रौनक देखते ही बनती है। महिलाएं श्रद्धा और आस्था के साथ व्रत रखती हैं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना करती हैं।</p><p>हल छठ को हरछठ, हल षष्ठी और ललही छठ के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी की पूजा करने का विधान है। बलराम जी का प्रमुख अस्त्र हल था, इसलिए इस पर्व का नाम हल छठ पड़ा ऐसी मान्यता है। कृषि और धरती मां से जुड़े इस पर्व में हल का विशेष महत्व माना जाता है। यदि आप इस खास दिन अपनों को शुभकामना देना चाहते हैं, तो पढ़ें हल छठ के शुभकामना संदेश...</p><p><h2>क्यों किया जाता है हल छठ का व्रत?</p><p></h2></p><p>हल छठ <strong>(Hal Chhath 2026)</strong> के दिन माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, निरोगी जीवन और उज्ज्वल भविष्य के लिए व्रत रखती हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक हल छठ का व्रत और पूजा करने से परिवार पर सुख-समृद्धि बनी रहती है। इस दिन पूजा के दौरान पारंपरिक नियमों और लोक मान्यताओं का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस पावन अवसर पर लोग अपने परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों को शुभकामना संदेश भेजकर पर्व की बधाई देते हैं। अगर आप भी अपनों को हल छठ की शुभकामनाएं भेजना चाहते हैं, तो ये संदेश आपके काम आ सकते हैं।</p><p><h2>हल छठ के शुभकामना संदेश - Hal Chhath Wishes in Hindi</p><p></h2></p><p><strong>1. </strong>हल छठ के पावन पर्व पर भगवान बलराम जी की कृपा आप और आपके पूरे परिवार पर बनी रहे। संतान को उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-समृद्धि प्राप्त हो। </p><p><strong>हल छठ की हार्दिक शुभकामनाएं!</strong></p><p><strong>2.</strong> मां की ममता का आशीर्वाद रहे,</p><p>संतान के सिर पर खुशियों का ताज रहे,</p><p>हर कदम पर मिले सफलता और प्यार,</p><p>हल छठ का पर्व लाए खुशियां अपार।</p><p><strong>आप सभी को हल छठ की ढेरों शुभकामनाएं।</strong></p><p><strong>3.</strong> भगवान बलराम जी के आशीर्वाद से आपके परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहे। आपकी संतान सदैव स्वस्थ, खुश और सफल रहे। </p><p><strong>हल छठ की हार्दिक बधाई!</strong></p><p><strong>4.</strong>आंगन में खुशियों की फुहार हो,</p><p>हर चेहरे पर मुस्कान अपार हो,</p><p>संतान रहे सदा सुखी और निरोग,</p><p>दूर रहें जीवन के सारे संयोग-वियोग।</p><p><strong>हल छठ की मंगलमय शुभकामनाएं!</strong></p><p><strong>5.</strong> हल छठ के शुभ अवसर पर भगवान बलराम जी से प्रार्थना है कि आपके परिवार पर सदैव उनका आशीर्वाद बना रहे और घर में सुख-समृद्धि का वास हो।</p><p><strong>6.</strong> हर मां की प्रार्थना में संतान की खुशियां बसती हैं। हल छठ के इस पावन पर्व पर सभी माताओं की मनोकामनाएं पूर्ण हों। </p><p><strong>हल छठ की हार्दिक शुभकामनाएं!</strong></p><p><strong>7.</strong> मां की हर दुआ रंग लाए,</p><p>संतान जीवन में खूब तरक्की पाए,</p><p>बलराम जी का बना रहे आशीष,</p><p>हर घर में बरसे खुशियों की बारिश।</p><p><strong>हल छठ की हार्दिक बधाई!</strong></p><p><strong>8.</strong> नन्हीं मुस्कानों से महके घर-द्वार,</p><p>संतान की खुशियों से सजे संसार,</p><p>हर मनोकामना हो आज पूरी,</p><p>जीवन में न रहे कोई मजबूरी।</p><p><strong>हल छठ की हार्दिक बधाई।</strong></p><p><strong>9.</strong> ममता और आस्था के इस पवित्र पर्व पर आपके घर खुशियों के दीप जलें और परिवार का हर सदस्य स्वस्थ एवं प्रसन्न रहे। </p><p><strong>हल छठ की ढेरों शुभकामनाएं।</strong></p><p><strong>10.</strong> हल छठ का यह पावन पर्व आपके जीवन से सभी दुख दूर करे और सुख-समृद्धि से आपका घर भर दे। भगवान बलराम जी का आशीर्वाद सदैव बना रहे।</p><p><strong>11.</strong> हल से धरती पर खुशहाली आए,</p><p>हर घर में सुख-समृद्धि छाए,</p><p>संतान की लंबी उम्र का मिले वरदान,</p><p>दादा बलराम रखें सबका मान।</p><p><strong>हल छठ की ढेरों शुभकामनाएं!</strong></p><p><h3>हल छठ का महत्व</h3></p><p>हल छठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मां की ममता, संतान के प्रति प्रेम और परिवार की खुशहाली की कामना का प्रतीक भी है। इस दिन पूजा और व्रत के साथ अपनों को शुभकामनाएं देना पर्व की खुशियों को और बढ़ा देता है। आप इन संदेशों को अपने प्रियजनों के साथ साझा कर उन्हें हल छठ की बधाई दे सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156025158</guid><pubDate>Wed, 02 Sep 2026 23:27:25 +0530</pubDate><title><![CDATA[ हलषष्ठी व्रत 2026: जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा के विशेष नियम ]]></title><description><![CDATA[ भाद्रपद कृष्ण षष्ठी पर मनाया जाने वाला हलषष्ठी व्रत भगवान बलराम को समर्पित है। संतान की सुख-समृद्धि के लिए किए जाने वाले इस व्रत की तिथि, मुहूर्त और नियमों की विस्तृत जानकारी यहाँ प्राप्त करें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/hal-shashti-vrat-2026-date-muhurat-and-rules-article-156025158 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156025157,thumbsize-614347,width-1280,height-720,resizemode-75/156025157.jpg" alt="hal-shashti-vrat-2026-date-muhurat-and-rules" /></div><p>भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई और शेषनाग के अवतार माने जाने वाले भगवान बलराम के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मुख्य रूप से विवाहित महिलाएं अपनी संतान की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए व्रत रखती हैं। इसे चंदन षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।</p><p>पंचांग के अनुसार, इस वर्ष भाद्रपद कृष्ण षष्ठी तिथि का आरंभ 2 सितंबर 2026, बुधवार को सुबह 6 बजकर 13 मिनट से हो रहा है। यह तिथि 3 सितंबर, गुरुवार की सुबह 4 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। भविष्य पुराण के अनुसार, हलषष्ठी व्रत के लिए चंद्रोदय व्यापिनी तिथि को प्राथमिकता दी जाती है, इसलिए यह व्रत 2 सितंबर 2026 को ही रखा जाएगा।</p><p><h2>हलषष्ठी व्रत के प्रमुख नियम और सावधानियां</h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हलषष्ठी का व्रत अत्यंत नियम और निष्ठा के साथ किया जाता है। इस दिन व्रती महिलाओं को कुछ विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए। मान्यता है कि इस दिन हल से जोती हुई भूमि पर उगे अन्न, फल या सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए। इतना ही नहीं, हल से जोती हुई जमीन पर चलना भी वर्जित माना गया है।</p><p>व्रत के दौरान खान-पान को लेकर भी कड़े नियम हैं। इस दिन गाय के दूध, दही या घी का सेवन करने से बचना चाहिए। घर में तामसिक भोजन जैसे लहसुन और प्याज का प्रयोग पूरी तरह वर्जित है। व्रती महिलाओं को सलाह दी जाती है कि वे पूरे दिन मन में सकारात्मक विचार रखें। व्रत का पारण चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देने के उपरांत ही किया जाता है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र का संयोग भी बनता है, जो चंद्रमा को अत्यंत प्रिय है।</p><p><h2>दान का महत्व और पूजा विधि</h2>हलषष्ठी के दिन व्रत और पूजा के साथ-साथ दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। इस दिन किसी जरूरतमंद या गरीब व्यक्ति को मौसमी फलों जैसे सेब, अमरूद और नाशपाती का दान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से घर में अन्न और धन की कभी कमी नहीं होती है।</p><p>दान के क्रम में वस्त्र दान को भी उत्तम माना गया है। इसके अतिरिक्त, यदि संभव हो तो इस दिन तांबे से निर्मित नाग की प्रतिमा भगवान शिव को अर्पित करना कल्याणकारी माना जाता है। इन नियमों का पालन करते हुए श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से भगवान बलराम की कृपा प्राप्त होती है और संतान के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156024160</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 17:01:18 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर पहली बार घर ला रहे हैं लड्डू गोपाल? जानिए स्थापना से पूजा और भोग तक की संपूर्ण जानकारी ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी के अवसर पर यदि आप लड्डू गोपाल को घर में स्थापित करने जा रहे हैं, तो अभिषेक, श्रृंगार, दिशा और भोग से जुड़ी इन महत्वपूर्ण धार्मिक विधियों का पालन अवश्य करें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/laddu-gopal-sthapana-vidhi-janmashtami-puja-rules-article-156024160 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156024159,thumbsize-624666,width-1280,height-720,resizemode-75/156024159.jpg" alt="laddu-gopal-sthapana-vidhi-janmashtami-puja-rules" /></div><p><strong>Janmashtami 2026:</strong> जन्माष्टमी का पावन पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस विशेष अवसर पर कई भक्त अपने घरों में बाल गोपाल यानी लड्डू गोपाल को विराजमान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, घर में बाल स्वरूप का आगमन सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, लड्डू गोपाल की सेवा और स्थापना के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहे।</p><p><h2>स्थापना की दिशा का महत्व</h2></p><p>ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञों की मान्यता के अनुसार, बाल गोपाल की सेवा अत्यंत कोमल और शुद्ध भाव से की जानी चाहिए। यदि आप इस जन्माष्टमी पर कान्हा को अपने घर ला रहे हैं, तो उनकी स्थापना के लिए सही दिशा और पवित्रता का ध्यान रखना सबसे महत्वपूर्ण है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, लड्डू गोपाल और उनके झूले को हमेशा घर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) में रखना चाहिए, क्योंकि इसे अत्यंत शुभ और पवित्र माना गया है।</p><p><h2>स्थापना, अभिषेक और श्रृंगार की विधि</h2>लड्डू गोपाल को घर लाने के बाद सबसे पहले उनका अभिषेक करना चाहिए। जन्माष्टमी की रात को शुभ मुहूर्त में दूध, दही, घी, शहद और जल से बने पंचामृत से उनका अभिषेक करें और अंत में गंगाजल से स्नान कराएं। अभिषेक के बाद उन्हें नए पीले वस्त्र पहनाएं। श्रृंगार के दौरान उन्हें मुकुट, बांसुरी, मोरपंख, कमरबंद, कंगन, पायल और वैजयंती माला अर्पित करें। उनके माथे पर केसर, चंदन और अक्षत का तिलक लगाना शुभ माना जाता है। स्थापना के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जिस स्थान पर लड्डू गोपाल विराजमान हों, वहां पूर्ण स्वच्छता होनी चाहिए। आसपास किसी भी प्रकार का कबाड़ या अनुपयोगी वस्तुएं नहीं होनी चाहिए, ताकि सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह में कोई बाधा न आए।</p><p><h2>पूजा और भोग के नियम</h2>मध्य रात्रि के शुभ मुहूर्त में लड्डू गोपाल को सिंहासन या झूले पर बैठाकर विधि-विधान से पूजा करें। धूप-दीप जलाकर भगवान की आरती उतारें और प्रेमपूर्वक उन्हें झूला झुलाएं। मान्यता है कि रात को उन्हें लोरी सुनाकर सुलाने की परंपरा का पालन करना चाहिए।</p><p>भोग के संदर्भ में, लड्डू गोपाल को माखन-मिश्री अत्यंत प्रिय है, इसलिए इसे भोग में अवश्य शामिल करें। इसके अलावा धनिया की पंजीरी, मेवे और मौसमी फलों का भोग भी लगाया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि भगवान कृष्ण के हर भोग में तुलसी दल (तुलसी का पत्ता) जरूर रखें, क्योंकि इसके बिना जन्माष्टमी की पूजा अधूरी मानी जाती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156023213</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 16:29:08 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल का ऐसे करें श्रृंगार, नोट करें पूजन सामग्री की पूरी लिस्ट ]]></title><description><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी के पावन अवसर पर लड्डू गोपाल की सेवा और पूजा विधि-विधान से की जाती है। इस लेख में जानें अभिषेक, श्रृंगार और भोग के लिए आवश्यक सामग्री की विस्तृत सूची। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-laddu-gopal-puja-samagri-list-and-rituals-article-156023213 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156023212,thumbsize-738000,width-1280,height-720,resizemode-75/156023212.jpg" alt="janmashtami-2026-laddu-gopal-puja-samagri-list-and-rituals" /></div><p><strong>Janmashtami 2026:</strong> भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर मनाए जाने वाले श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप, जिन्हें लड्डू गोपाल के नाम से जाना जाता है, की पूजा और सेवा का विधान है। मान्यता है कि विधि-विधान से की गई पूजा से घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इस वर्ष जन्माष्टमी का त्योहार 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा।</p><p>जन्माष्टमी के दिन सुबह से लेकर मध्य रात्रि तक विभिन्न अनुष्ठान किए जाते हैं। मध्य रात्रि में कान्हा के जन्मोत्सव के समय उनका अभिषेक किया जाता है, जिसके बाद उन्हें नए वस्त्र और आभूषण पहनाकर झूला झुलाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ विशेष सामग्रियों का होना अनिवार्य माना गया है, जिनके बिना पूजा अधूरी मानी जा सकती है।</p><p><h2>लड्डू गोपाल की पूजा और श्रृंगार सामग्री</h2></p><p>भगवान कृष्ण के श्रृंगार के लिए नई पोशाक, मुकुट, मोरपंख, बांसुरी, कंगन, पायल और कमरबंद का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, उन्हें तुलसी, मोतियों और ताजे फूलों की माला अर्पित की जाती है। पूजा के लिए सिंहासन या झूला, धूप, कपूर, रोली, चंदन, सिंदूर, यज्ञोपवीत (जनेऊ), अक्षत (चावल), सुपारी, हल्दी, पान के पत्ते, रुई, सप्तधान, दूर्वा और दीपक की आवश्यकता होती है।</p><p>अभिषेक की प्रक्रिया के लिए दूध, घी, दही, जल, शक्कर, गंगाजल और इत्र का उपयोग किया जाता है। साथ ही, लड्डू गोपाल को धारण कराने के लिए सूती वस्त्रों की व्यवस्था करना शुभ माना जाता है। भोग के लिए माखन-मिश्री, पंचामृत, मौसमी फल, पंचमेवा, शक्कर, मिष्ठान, छोटी इलायची और औषधि का उपयोग किया जाता है। भोग में तुलसी दल (तुलसी की पत्तियां) को शामिल करना अनिवार्य माना गया है।</p><p><h2>जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व</h2>पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र में भगवान कृष्ण का प्राकट्य हुआ था। उस समय चंद्रमा वृषभ राशि में और सूर्य सिंह राशि में स्थित थे। इसी तिथि को आधार मानकर हर वर्ष जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन रात्रि जागरण, भजन-कीर्तन और भगवान के बाल स्वरूप की सेवा का विशेष महत्व है। परंपरा के अनुसार, मध्य रात्रि में चंद्रमा को जल अर्पित करने के बाद ही भक्त अपना व्रत पूर्ण करते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156023045</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 11:43:45 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Iskcon Krishna Janmashtami 2026: इस्कॉन में जन्माष्टमी कब मनाई जाएगी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और व्रत खोलने का समय ]]></title><description><![CDATA[ Iskcon Krishna Janmashtami 2026 Date: दुनियाभर में मौजूद इस्कॉन मंदिरों में साल 2026 में जन्माष्टमी का पर्व किस दिन मनाया जाएगा? चलिए जानते हैं इसकी सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और व्रत खोलने का समय आदि के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/iskcon-krishna-janmashtami-2026-date-and-time-nishita-kaal-janmashtami-vrat-paran-samay-article-156023045 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156023071,thumbsize-213002,width-1280,height-720,resizemode-75/156023071.jpg" alt="iskcon krishna janmashtami 2026 date and time nishita kaal janmashtami vrat paran samay" /></div><p><strong>Iskcon Krishna Janmashtami 2026 Date &amp; Time:</strong> कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसकी खास धूम दुनियाभर में फैले इस्कॉन मंदिरों में देखने को मिलती है। यहां भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को बेहद भव्य तरीके से मनाया जाता है। मंदिरों को फूलों, रंग-बिरंगी लाइटों और आकर्षक सजावटी सामान से सजाया जाता है। पूरे दिन और रात के समय मंदिर परिसर में 'हरे कृष्ण' महामंत्र का संकीर्तन गूंजता है। इसके अलावा शाम के समय भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित नाटक किए जाते हैं। रात 12 बजे श्रीकृष्ण के प्राकट्य के साथ विशेष पूजा और आरती होती है।</p><p>चलिए अब जानते हैं कि साल 2026 में इस्कॉन मंदिरों में जन्माष्टमी का पर्व कब मनाया जाएगा। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है और व्रत खोलना किस समय शुभ रहेगा।</p><p><h2><strong>2026 में इस्कॉन में जन्माष्टमी कब मनाई जा रही है? </p><p></strong></h2>हर साल भगवान कृष्ण का जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी का पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार 4 सितंबर 2026, शुक्रवार को इस्कॉन में जन्माष्टमी मनाई जाएगी। ये भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव होगा। इस बार 4 सितंबर 2026 की सुबह 2 बजकर 25 मिनट से लेकर 5 सितंबर 2026 की रात (मध्य रात्रि) 12 बजकर 13 मिनट तक भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि रहेगी।</p><p><h2>इस्कॉन जन्माष्टमी की पूजा का मुहूर्त</p><p></h2>जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा मुख्य रूप से मध्यरात्रि में निशीथ काल में की जाती है। इस बार 4 सितंबर 2026 को निशिता पूजा का समय रात 11 बजकर 57 मिनट से लेकर रात (मध्य रात्रि) 12 बजकर 43 मिनट तक है, जबकि मध्यरात्रि का क्षण 5 सितंबर 2026 को रात (मध्य रात्रि) 12 बजकर 20 मिनट है। वहीं, सुबह की पूजा ब्रह्म मुहूर्त में की जाएगी। इस दिन सुबह 04 बजकर 24 मिनट से लेकर सुबह 05 बजकर 12 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त है।</p><p><h2><strong>अन्य शहरों में इस्कॉन कृष्ण जन्माष्टमी का मुहूर्त</p><p></strong></h2><table class="redcator-table-advance"></table></p><p><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><td><strong>शहर</strong></td><td><strong>शुभ मुहूर्त</strong></td></tr></thead><tbody><tr><td>पुणे</td><td>रात 12:10 बजे से रात 12:57 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>नई दिल्ली</td><td>रात 11:57 बजे से रात 12:43 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>चेन्नई</td><td>रात 11:45 बजे से रात 12:31 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>जयपुर</td><td>रात 12:03 बजे से रात 12:49 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>हैदराबाद</td><td>रात 11:52 बजे से रात 12:38 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>गुरुग्राम</td><td>रात 11:58 बजे से रात 12:44 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>चण्डीगढ़</td><td>रात 11:59 बजे से रात 12:45 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>कोलकाता</td><td>रात 11:13 बजे से रात 11:59 बजे</td></tr><tr><td>मुम्बई</td><td>रात 12:14 बजे से रात 01:01 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>बेंगलूरु</td><td>रात 11:55 बजे से रात 12:42 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>अहमदाबाद</td><td>रात 12:16 बजे से रात 01:02 बजे, 05 सितंबर</td></tr><tr><td>नोएडा</td><td>रात 11:57 बजे से रात 12:42 बजे, 05 सितंबर</td></tr></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody></table></p><p><h2><strong>इस्कॉन के अनुसार पारण समय</p><p></strong></h2>बता दें कि जन्माष्टमी का पारण सूर्योदय के पश्चात अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद किया जाता है। 4 सितंबर को रखे जाने वाले कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का पारण 5 सितंबर 2026 को सुबह किया जाएगा। इस दिन सुबह 6 बजकर 1 मिनट के बाद आप अपना व्रत खोल सकते हैं, जिससे पहले ही अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र समाप्त हो जाएंगे।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156022710</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 15:31:05 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026: अजा एकादशी 2026 कब है? जानिए व्रत की सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और धार्मिक महत्व ]]></title><description><![CDATA[ Aja Ekadashi 2026: भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। भगवान विष्णु की कृपा पाने के लिए इस दिन पूजा और व्रत का विशेष विधान है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/aja-ekadashi-2026-vrat-date-puja-vidhi-significance-article-156022710 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156022709,thumbsize-564838,width-1280,height-720,resizemode-75/156022709.jpg" alt="aja-ekadashi-2026-vrat-date-puja-vidhi-significance" /></div><p><strong>Aja Ekadashi 2026:</strong> सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष स्थान है। हर महीने आने वाली दो एकादशियों में से भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को 'अजा एकादशी' के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से भक्तों के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है और अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। पद्म पुराण में भी इस व्रत के महात्म्य का विस्तार से वर्णन किया गया है।</p><p>पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में भाद्रपद कृष्ण एकादशी तिथि का आरंभ 6 सितंबर, रविवार की शाम 7 बजकर 30 मिनट पर होगा। यह तिथि अगले दिन यानी 7 सितंबर, सोमवार की शाम 5 बजकर 5 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि (सूर्योदय के समय व्याप्त तिथि) की मान्यता के अनुसार, अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर को रखा जाना अत्यंत शुभ और पुण्य फलदायी माना गया है।</p><p><h2>अजा एकादशी: पूजा विधि और व्रत के नियम</h2>अजा एकादशी के दिन व्रती को ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लेना अनिवार्य है। पूजा के लिए घर के मंदिर को साफ कर एक चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु व माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें।</p><p>पूजा के दौरान गंगाजल छिड़ककर शुद्धिकरण करें। एक पात्र में पवित्र जल, अक्षत (चावल), तिल और रोली मिलाकर भगवान का अभिषेक करें। इसके बाद उन्हें धूप, दीप और ताजे फूल अर्पित करें। पूजा के दौरान अजा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। भोग के रूप में तुलसी जल और तिल का उपयोग करना चाहिए। मान्यता है कि इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने और रात्रि में श्रीहरि के भजनों का जागरण करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है।</p><p><h2>व्रत का धार्मिक महत्व</h2>जन्माष्टमी के कुछ दिनों बाद आने वाली अजा एकादशी का व्रत आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। व्रती को पूरे दिन मन में भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए उनके मंत्रों का जप करना चाहिए। ऐसी धारणा है कि जो भक्त पूरी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस व्रत का पालन करते हैं, उन्हें इस लोक के साथ-साथ परलोक में भी पुण्य फलों की प्राप्ति होती है। यह व्रत न केवल आत्मिक शांति प्रदान करता है, बल्कि जीवन में सकारात्मकता लाने का एक माध्यम भी माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156021812</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 05:44:00 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Nag Panchmi 2026: आज 1 सितंबर को नाग पंचमी क्यों मनाई जा रही है? जानें कारण, पूजा का मुहूर्त, विधि और जरूरी नियम ]]></title><description><![CDATA[ Nag Panchmi 2026 Today: आज 1 सितंबर को साल 2026 की दूसरी नाग पंचमी है। यदि आप भी शिव जी और नागों की विशेष कृपा पाने के लिए आज उपासना करने वाले हैं तो सबसे पहले नाग पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और नियम आदि के बारे में जान लें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/2nd-nag-panchami-2026-date-and-time-puja-shubh-muhurat-today-amanta-panchang-article-156021812 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156021819,thumbsize-131900,width-1280,height-720,resizemode-75/156021819.jpg" alt="2nd nag panchami 2026 date and time puja shubh muhurat today amanta panchang" /></div><p><strong>Nag Panchmi 2026 Today:</strong> नाग पंचमी का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत ही खास होता है, जिसका पर्व साल में 2 बार मनाया जाता है। 17 अगस्त 2026 को सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी मनाई गई, जो कि पूर्णिमांत पंचांग (हिन्दू चंद्र कैलेंडर) पर आधारित थी। इसके बाद आज 1 सितंबर 2026, मंगलवार को अमांत पंचांग के आधार पर गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना आदि क्षेत्रों में नाग पंचमी मनाई जा रही है। सावन का महीना अमांत पंचांग में पूर्णिमांत पंचांग की तुलना में करीब 15 दिन बाद समाप्त होता है। इसी वजह से अमांत पंचांग के अनुसार सावन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है, जो कि पूर्णिमांत गणना में भाद्रपद यानी भादो माह में कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि है। </p><p>मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन शिव जी और नागों की पूजा करने से नकारात्मक ऊर्जा, सांप के काटने के भय और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। चलिए अब जानते हैं अमांत पंचांग के आधार पर नाग पंचमी 2026 की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में।</p><p><h2><strong>2026 की दूसरी नाग पंचमी की तिथि (अमांत पंचांग के अनुसार)</p><p></strong></h2><ul><li>श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का आरंभ- आज 01 सितंबर 2026 को सुबह 07:41 बजे</li><li>श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का समापन- कल 02 सितंबर 2026 को सुबह 06:12 बजे</li></ul></p><p><h2><strong>नाग पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त </p><p></strong></h2></p><p><ul><li>सूर्योदय- सुबह 05:59 बजे</li><li>नाग पंचमी की पूजा का मुहूर्त- सुबह 07:41 बजे से सुबह 08:32 बजे तक</li><li>अभिजित मुहूर्त- सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:46 बजे तक</li><li>सायाह्न संध्या- शाम 06:43 बजे से शाम 07:50 बजे तक</li></ul>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/panchang/aaj-ka-panchang-1-september-2026-shubh-muhurat-hanuman-puja-article-156021753" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>आज का पंचांग 1 सितंबर 2026: भाद्रपद चतुर्थी पर करें हनुमान जी की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त</strong></a></p><p><h2><strong>नाग पंचमी की पूजा विधि </p><p></strong></h2></p><p><ul><li>स्नान आदि कार्य करके स्वच्छ वस्त्र पहनकर तैयार हो जाएं।</li><li>पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करने के बाद एक लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।</li><li>हल्दी मिश्रित चंदन से नाग देवता का चित्र बनाएं।</li><li>गणेश जी, भगवान शिव, इष्टदेव, कुलदेवता, ग्रामदेवता, स्थानदेवता, वास्तुदेवता और नवग्रहों का स्मरण करें।</li><li>चौकी पर एक कलश की स्थापना करें, जिसमें जल, गंगाजल, अक्षत, सुपारी और सिक्का डालें। कलश के ऊपर आम के 3 पत्ते और फिर नारियल रखें।</li><li>कलश पर चंदन, अक्षत और पुष्प चढ़ाएं।</li><li>भगवान शिव का ध्यान करने के बाद शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें।</li><li>नाग देवता को जल, कच्चा दूध, अक्षत, रोली, चंदन और सफेद या पीले रंग के फूल अर्पित करें। इस दौरान 'ॐ नागदेवतायै नमः' का 108 बार जाप करें।</li><li>घी का दीपक जलाने के बाद नाग पंचमी की कथा पढ़ें।</li><li>शिव जी और नाग देवता की आरती करें।</li><li>नाग देवता की 3 बार परिक्रमा करने के बाद पूजा में जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें।</li></ul></p><p><h2><strong>नाग पंचमी की पूजा से जुड़े नियम</p><p></strong></h2></p><p>जीवित सांपों को दूध पिलाने की जगह दीवार पर गोबर, मिट्टी या हल्दी-कुमकुम से नाग देवता की आकृति बनाकर उन्हें पूजा सामग्री अर्पित करें। इस शुभ दिन कोई भी गलत काम न करें और न ही तामसिक चीजों का सेवन करें। दिनभर अपने मन को शांत रखें और सात्विक आहार लें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नाग पंचमी के दिन मिट्टी से जुड़ा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। साथ ही नुकीली चीजों के इस्तेमाल और सिलाई-बुनाई करने से बचना चाहिए।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156019339</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 18:48:05 +0530</pubDate><title><![CDATA[ मंदिर में कदम रखने से पहले करें ये छोटे काम, पूजा में बढ़ेगा ध्यान ]]></title><description><![CDATA[ Puja Rituals: मंदिर में जाने से पहले किए जाने वाले ये काम किसी कठिन नियम की तरह नहीं देखने चाहिए। इनका मकसद खुद को पूजा के लिए मानसिक रूप से तैयार करना है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/puja-rituals-temple-puja-rules-religious-rituals-puja-guidelines-article-156019339 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156019338,thumbsize-241473,width-1280,height-720,resizemode-75/156019338.jpg" alt="puja rituals temple puja rules religious rituals puja guidelines" /></div><p><strong>Puja Rituals: </strong>भागदौड़ और तनाव के बीच मंदिर ही वह कोना होता है, जहां कुछ मिनट बैठकर मन को शांत किया जा सकता है। लेकिन कई बार हम जल्दबाजी में कुछ ऐसा कर देते हैं कि मंदिर में बैठकर भी हमारा मन शांत नहीं होता। अगर मंदिर में जाने से पहले आप कुछ छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखेंगे तो पूजा के समय मन को एकाग्र करने में आसानी हो सकती है। आइए जानते हैं ऐसी ही कुछ आसान आदतें जिन्हें आप अपनी रोज की पूजा का हिस्सा बना सकते हैं।</p><p><h2>1- मन को शांत करें</h2></p><p>पूजा के लिए बैठने से पहले तुरंत मंत्र या आरती शुरू करने की जरूरत नहीं है। कुछ सेकंड रुकें और गहरी सांस लें। दिनभर की चिंता, काम का तनाव या दूसरी परेशानियां कुछ देर के लिए किनारे रखने की कोशिश करें। इससे आपका ध्यान पूजा पर लगाने में मदद मिल सकती है।</p><p><h2>2- मोबाइल को थोड़ी देर के लिए दूर रखें</h2></p><p>आजकल पूजा के दौरान सबसे बड़ा ध्यान भटकाने वाला साधन मोबाइल भी हो सकता है। बार-बार फोन देखना आपका ध्यान तोड़ देता है। इसलिए मंदिर में जाने से पहले फोन को दूर रख दें। इससे पूजा के दौरान मन को एक जगह टिकाने में मदद मिलेगी।</p><p><h2>3- मंदिर में जाने से पहले जूते-चप्पल उतारें</h2></p><p>मंदिर में जूते-चप्पल पहनकर जाना आम तौर पर उचित नहीं माना जाता। जूतों के साथ धूल और गंदगी भी आती है, इसलिए उन्हें मंदिर के बाहर ही उतारना बेहतर है। घर के मंदिर के आसपास भी साफ-सफाई रखना जरूरी है, ताकि पूजा की जगह व्यवस्थित और स्वच्छ बनी रहे।</p><p><h2>4- साफ कपड़े पहनने की कोशिश करें</h2></p><p>पूजा के लिए बहुत खास या महंगे कपड़ों की जरूरत नहीं है। बस कपड़े साफ होने चाहिए। अगर संभव हो तो नहाने के बाद साफ कपड़े पहनकर पूजा करें। ऐसा करना कई भारतीय परंपराओं में शुद्धता और अनुशासन से जोड़ा जाता है।</p><p><h2>5- मंदिर की साफ-सफाई जरूर देखें</h2></p><p>पूजा शुरू करने से पहले एक नजर मंदिर पर डाल लें। अगर पुराने फूल पड़े हैं तो उन्हें हटा दें। पूजा की चौकी पर धूल है तो साफ कपड़े से पोंछ दें। भगवान की मूर्तियों के आसपास बिखरी चीजों को व्यवस्थित कर दें। साफ मंदिर देखने में अच्छा लगता है और पूजा के दौरान भी मन व्यवस्थित रहता है।</p><p><h2>6- मंदिर में शांति बनाए रखें</h2></p><p>मंदिर के पास तेज आवाज में बातचीत करने या शोर करने से बचें। धीरे-धीरे मंदिर के पास जाएं और कुछ समय शांत रहें। घर में दूसरे लोग मौजूद हों तो उनकी पूजा या ध्यान में भी व्यवधान न डालें।</p><p><h2>7- पूजा के दौरान वर्तमान में रहें</h2></p><p>अक्सर शरीर मंदिर के सामने होता है, लेकिन दिमाग ऑफिस, घर, पैसे या किसी दूसरी परेशानी में उलझा रहता है। कोशिश करें कि पूजा के कुछ मिनट सिर्फ उसी पल के लिए हों। मंत्र बोलते समय शब्दों पर ध्यान दें, आरती करते समय भाव पर ध्यान दें और प्रार्थना करते समय अपने मन की बात शांति से रखें।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156018539</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 07:12:11 +0530</pubDate><title><![CDATA[ पितृपक्ष 2026: 26 सितंबर से शुरू होगा श्राद्ध पक्ष, इस बार बनेगा विशेष गजच्छाया योग ]]></title><description><![CDATA[ वर्ष 2026 में पितृपक्ष 26 सितंबर से आरंभ हो रहा है। इस दौरान श्राद्ध और तर्पण का विशेष महत्व है। इस वर्ष पितृपक्ष में गजच्छाया योग का दुर्लभ संयोग भी बन रहा है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/pitru-paksha-2026-start-date-and-gajachhaya-yoga-details-article-156018539 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156018538,thumbsize-578064,width-1280,height-720,resizemode-75/156018538.jpg" alt="pitru-paksha-2026-start-date-and-gajachhaya-yoga-details" /></div><p>सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उन्हें स्मरण करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन 15 दिनों की अवधि में हमारे पितर पितृलोक से पृथ्वी पर आते हैं और अपने परिजनों को आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इसी कारण इन दिनों में तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य जैसे कार्यों का विशेष विधान बताया गया है। वर्ष 2026 में पितृपक्ष का आरंभ 26 सितंबर से होने जा रहा है।</p><p>पंचांग की गणना के अनुसार, पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा तिथि के श्राद्ध के साथ होगी। इस वर्ष पितृपक्ष के दौरान एक विशेष खगोलीय और धार्मिक संयोग 'गजच्छाया योग' का निर्माण हो रहा है। मान्यता है कि जब सूर्य और चंद्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में गोचर करते हैं, तब इस योग का निर्माण होता है। इस बार 10 अक्टूबर को यह विशेष योग बन रहा है, जो श्राद्ध, तर्पण और तीर्थ स्नान के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।</p><p><h2>पितृपक्ष 2026 की प्रमुख तिथियां और श्राद्ध का महत्व</h2>इस वर्ष पितृपक्ष के दौरान चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन, यानी 30 सितंबर को किया जाएगा। श्राद्ध की तिथियों का विवरण इस प्रकार है: 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध, 27 सितंबर को प्रतिपदा, 28 सितंबर को द्वितीया, 29 सितंबर को तृतीया, 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध होगा। इसके बाद 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 अक्टूबर को सप्तमी, 3 अक्टूबर को अष्टमी, 4 अक्टूबर को नवमी, 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी और 7 अक्टूबर को द्वादशी तिथि का श्राद्ध संपन्न होगा।</p><p>इसी क्रम में 7 अक्टूबर को मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी और 9 अक्टूबर को चतुर्दशी तिथि का श्राद्ध किया जाएगा। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। सर्वपितृ अमावस्या का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो। 10 अक्टूबर को गजच्छाया योग का प्रभाव सूर्योदय से सूर्यास्त तक रहेगा, जो पितृ कर्मों के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156018103</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 07:12:50 +0530</pubDate><title><![CDATA[ जन्माष्टमी 2026: लड्डू गोपाल की पूजा में जरूर शामिल करें ये 9 चीजें, बनी रहेगी विशेष कृपा ]]></title><description><![CDATA[ जन्माष्टमी के पावन अवसर पर लड्डू गोपाल की पूजा और श्रृंगार में किन 9 चीजों को शामिल करना शुभ माना जाता है, जानिए इसके पीछे की धार्मिक मान्यताएं और महत्व। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-laddu-gopal-puja-rituals-significance-article-156018103 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156018102,thumbsize-665366,width-1280,height-720,resizemode-75/156018102.jpg" alt="janmashtami-2026-laddu-gopal-puja-rituals-significance" /></div><p>श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन भक्त अपने घरों में बाल गोपाल का स्वागत करते हैं, उन्हें सुंदर वस्त्रों और आभूषणों से सजाते हैं और विधि-विधान से उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल के श्रृंगार और पूजा की थाली में कुछ विशेष वस्तुओं को शामिल करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इन चीजों को अर्पित करने से न केवल बाल गोपाल प्रसन्न होते हैं, बल्कि घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मकता का संचार भी होता है।</p><p>जन्माष्टमी के अवसर पर लड्डू गोपाल की सेवा में किन वस्तुओं का विशेष महत्व है और उन्हें किस प्रकार रखा जाना चाहिए, इसे लेकर कई धार्मिक परंपराएं प्रचलित हैं। आइए जानते हैं उन 9 प्रमुख चीजों के बारे में जो कान्हा जी की पूजा में शामिल करना शुभ माना जाता है।</p><p><h2>लड्डू गोपाल की पूजा में इन 9 चीजों का है विशेष महत्व</h2>बांसुरी भगवान कृष्ण का सबसे प्रिय वाद्य यंत्र और प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि इसे लड्डू गोपाल के पास रखने से घर में प्रेम और शांति का वास होता है। इसी तरह, मोरपंख का महत्व भी कम नहीं है। कान्हा जी के मुकुट पर मोरपंख सजाने और मंदिर में इसे रखने से घर की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। पूजा में माखन-मिश्री का भोग लगाना अनिवार्य माना गया है, क्योंकि यह उनके बाल स्वरूप की चंचलता को दर्शाता है। साथ ही, हर भोग में तुलसी दल (तुलसी की पत्तियां) रखना आवश्यक है, क्योंकि बिना इसके भगवान भोग स्वीकार नहीं करते।</p><p>श्रृंगार की बात करें तो वैजयंती माला और चांदी की पायल कान्हा जी को बहुत प्रिय हैं। घुंघरू वाली पायल की मधुर ध्वनि घर के वातावरण को शुद्ध और खुशहाल बनाती है। इसके अलावा, कामधेनु गाय और बछड़े की छोटी प्रतिमा (पीतल, चांदी या पत्थर की) रखना संतान सुख और सौभाग्य में वृद्धि का कारक माना जाता है। पूजा के दौरान चंदन, केसर और अक्षत का तिलक लगाना भी शुभ होता है।</p><p>जन्माष्टमी की रात को बाल गोपाल को सुंदर झूले पर झूला झुलाने की परंपरा है, इसलिए एक सुसज्जित झूला या सिंहासन का होना आवश्यक है। अंत में, पूजा की थाली में शंख का होना भी बहुत महत्वपूर्ण है। शंख का उपयोग लड्डू गोपाल के अभिषेक के लिए किया जाता है और इसकी ध्वनि घर के वास्तु दोषों को दूर करने में सहायक मानी जाती है। इन सभी सामग्रियों को विधिपूर्वक अर्पित करने से भक्त कान्हा जी की विशेष कृपा प्राप्त कर सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017951</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 15:04:48 +0530</pubDate><title><![CDATA[ घर में रोज पूजा करते हैं तो ये 5 गलतियां बिल्कुल न करें, जानें सही तरीका ]]></title><description><![CDATA[ Common Puja Mistakes: पूजा के जरिए मन को शांति मिलती है और कुछ देर के लिए हम रोज की भागदौड़ से दूर हो जाते हैं। पूजा करते समय कुछ छोटी बातों का ध्यान रखना बेहद जरूरी है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/common-puja-mistakes-puja-mistakes-at-home-article-156017951 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017966,thumbsize-167900,width-1280,height-720,resizemode-75/156017966.jpg" alt="common puja mistakes puja mistakes at home" /></div><p><strong>Common Puja Mistakes: </strong>घर में पूजा करना हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा है। कई लोग सुबह उठकर भगवान के सामने दीपक जलाते हैं, तो कुछ लोग दिन की शुरुआत प्रार्थना से करते हैं। लेकिन कई बार अनजाने में हम पूजा के दौरान ऐसी छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं, जिनसे पूजा की पवित्रता और हमारा ध्यान प्रभावित हो सकता है। घर में रोज पूजा करते समय ये 5 गलतियां बिल्कुल न करें-</p><p><h2>1- पूजा की जगह साफ न रखना</h2></p><p>घर में पूजा का स्थान जितना साफ-सुथरा रहेगा, वहां बैठकर मन लगाना उतना ही आसान होगा। कई बार रोज की व्यस्तता में पूजा की जगह पर धूल, पुराने फूल या दूसरी चीजें पड़ी रह जाती हैं। पूजा शुरू करने से पहले पूजा की जगह को साफ कर लें। भगवान की मूर्तियों या तस्वीरों के आसपास बेकार सामान जमा न होने दें। रोज थोड़ी सफाई करने से पूजा स्थल व्यवस्थित बना रहेगा।</p><p><h2>2- पुराने फूल और पूजा सामग्री न रखें</h2></p><p>भगवान को चढ़ाए गए फूल कुछ समय बाद मुरझा जाते हैं। इसी तरह पूजा में इस्तेमाल होने वाले बर्तन भी अगर गंदे रह जाएं तो पूजा स्थल की साफ-सफाई प्रभावित होती है। मुरझाए फूलों को समय पर हटा दें और पूजा के बर्तनों को साफ करके रखें। पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री भी जरूरत के हिसाब से ही रखें।</p><p><h2>3- बिना मन लगाए जल्दी-जल्दी पूजा करना</h2></p><p>कई लोगों के पास सुबह समय कम होता है, इसलिए वे पूजा को जल्दी खत्म करने की कोशिश करते हैं। ऐसे में शरीर तो पूजा के सामने होता है, लेकिन मन दूसरी चीजों में लगा रहता है। अगर आपके पास ज्यादा समय नहीं है तो लंबी पूजा करने के बजाय कुछ मिनट शांत होकर प्रार्थना करें। </p><p><h2>4- पूजा के दौरान मोबाइल चलाना</h2></p><p>आजकल मोबाइल हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा बन चुका है। लेकिन पूजा के समय बार-बार फोन देखना ध्यान भटका सकता है। पूजा के दौरान फोन को साइलेंट कर दें और कुछ समय के लिए उसे अपने से दूर रखें। इससे आप बिना किसी रुकावट के प्रार्थना कर पाएंगे।</p><p><h2>5- पूजा स्थल पर मूर्तियों को अस्त-व्यस्त रखना</h2></p><p>पूजा की जगह पर कई देवी-देवताओं की तस्वीरें और मूर्तियां रखी होती हैं। अगर इन्हें बिना किसी व्यवस्था के रखा जाए तो पूजा स्थल अव्यवस्थित दिखाई देता है। मूर्तियों और तस्वीरों को साफ करके व्यवस्थित तरीके से रखें। पूजा स्थल पर उतनी ही सामग्री रखें, जितनी आसानी से संभाली जा सके।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017852</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 07:23:56 +0530</pubDate><title><![CDATA[ जन्माष्टमी 2026 पर दुर्लभ जयंती योग का संयोग, जानें व्रत और पारण का सही समय ]]></title><description><![CDATA[ वर्ष 2026 में जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को मनाया जाएगा। इस बार रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि के साथ कई शुभ योग बन रहे हैं, जो इसे अत्यंत विशेष बनाते हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-date-vrat-paran-time-jayanti-yog-article-156017852 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017851,thumbsize-717553,width-1280,height-720,resizemode-75/156017851.jpg" alt="janmashtami-2026-date-vrat-paran-time-jayanti-yog" /></div><p>इस वर्ष जन्माष्टमी का पावन पर्व 4 सितंबर 2026 को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाएगा। भगवान विष्णु के आठवें अवतार श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली यह तिथि भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को पड़ती है। इस बार की जन्माष्टमी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि वर्षों बाद इस दिन कई शुभ योगों का दुर्लभ संयोग बन रहा है।</p><p>इस साल जन्माष्टमी पर जयंती योग, हंस योग, मालव्य राजयोग, बुधादित्य राजयोग और हर्ष योग का अद्भुत मेल देखने को मिलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन योगों में व्रत रखने से भक्तों को विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। पद्म पुराण और निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथों में जयंती योग में जन्माष्टमी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, जिसे पूर्व जन्मों के पापों का शमन करने वाला माना जाता है।</p><p><h2>जन्माष्टमी 2026: रोहिणी नक्षत्र और जयंती योग का महत्व</h2>पंचांग गणना के अनुसार, रोहिणी नक्षत्र 3 सितंबर की रात 12 बजकर 30 मिनट से शुरू होकर 4 सितंबर की रात 11 बजकर 5 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार, 4 सितंबर को रोहिणी नक्षत्र और अष्टमी तिथि का शुभ संयोग बन रहा है, जिसके कारण इस दिन जयंती योग का निर्माण हो रहा है। शास्त्रों में उल्लेख है कि जब जन्माष्टमी का व्रत रोहिणी नक्षत्र के साथ किया जाता है, तो यह तीन जन्मों के पापों को नष्ट करने में सहायक होता है।</p><p>धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जयंती योग में व्रत करने से न केवल साधक को लाभ मिलता है, बल्कि यह पूर्वजों को भी प्रेत योनि से मुक्ति दिलाने में सहायक माना गया है। यही कारण है कि इस दुर्लभ संयोग में स्त्री, पुरुष, वृद्ध और बच्चों सभी को पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखने का विधान बताया गया है।</p><p><h2>व्रत पारण का उत्तम समय</h2>जन्माष्टमी के व्रत का पारण 5 सितंबर 2026 को किया जाएगा। शास्त्र सम्मत विधान के अनुसार, 4 सितंबर की मध्यरात्रि को भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद चरणामृत और प्रसाद ग्रहण किया जा सकता है, लेकिन अन्न ग्रहण सूर्योदय के बाद करना ही उत्तम माना गया है। 5 सितंबर को सूर्योदय सुबह 6 बजकर 1 मिनट पर होगा, जिसके बाद भक्त अपना व्रत खोल सकते हैं। इसके अलावा, भगवान श्रीकृष्ण की छठी का आयोजन बुधवार को किया जाएगा।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156017846</guid><pubDate>Tue, 01 Sep 2026 07:13:34 +0530</pubDate><title><![CDATA[ भाद्रपद मास का धार्मिक महत्व: जानें क्यों इस महीने में स्नान और दान को माना गया है मोक्षदायी ]]></title><description><![CDATA[ हिंदू पंचांग के अनुसार सावन के बाद आने वाला भाद्रपद मास अत्यंत पवित्र माना गया है। धर्मशास्त्रों के अनुसार इस माह में किए गए व्रत, स्नान और दान से व्यक्ति को असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/bhadrapada-maas-religious-significance-and-importance-of-snan-daan-article-156017846 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156017845,thumbsize-559193,width-1280,height-720,resizemode-75/156017845.jpg" alt="bhadrapada-maas-religious-significance-and-importance-of-snan-daan" /></div><p>हिंदू धर्म में भाद्रपद मास, जिसे बोलचाल की भाषा में भादो भी कहा जाता है, का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। सावन के पवित्र महीने के समापन के बाद आने वाला यह माह भक्ति और साधना के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दौरान किए गए स्नान, दान और व्रत का प्रभाव इतना गहरा होता है कि यह मनुष्य को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाने में सहायक होता है।</p><p>पौराणिक कथाओं में इस मास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। एक प्रसंग के अनुसार, देवर्षि नारद ने एक तेजस्वी ऋषि के आश्रम में भाद्रपद मास के महात्म्य का उल्लेख किया था। कहा जाता है कि स्वयं भगवान विष्णु ने ब्रह्माजी को इस माह की पवित्रता के बारे में बताया था। भगवान के अनुसार, चाहे कोई व्यक्ति किसी भी स्थिति में हो, यदि वह इस माह में नियमपूर्वक व्रत रखता है और महात्म्य का श्रवण करता है, तो वह परम पवित्र होकर बैकुण्ठ धाम का अधिकारी बनता है।</p><p><h2>अनजाने में किए गए पुण्य का भी मिलता है फल</h2>भाद्रपद मास की महिमा को दर्शाने के लिए एक प्राचीन कथा का उल्लेख मिलता है, जिसमें शम्बल नामक व्यक्ति और उसकी पत्नी सुमति की कहानी है। संतान सुख से वंचित यह दंपत्ति भाद्रपद मास में स्नान के महत्व को लेकर जागरूक था। सुमति के आग्रह पर शम्बल ने स्नान तो शुरू किया, लेकिन बीमारी के कारण वह इसे पूरा नहीं कर सका और उसकी मृत्यु हो गई।</p><p>कथा के अनुसार, अपने कर्मों के कारण शम्बल को अगले जन्म में कुत्ते की योनि प्राप्त हुई। जीवन के अंतिम समय में, भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के दौरान, वह जल में गिरा और वहीं उसके प्राण निकल गए। आश्चर्यजनक रूप से, उसे लेने के लिए भगवान के पार्षद दिव्य विमान लेकर आए। जब शम्बल ने बैकुण्ठ जाने का कारण पूछा, तो पार्षदों ने बताया कि भाद्रपद मास में जल में प्राण त्यागने के कारण उसे यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है।</p><p><h2>श्रद्धा और नियम का महत्व</h2>इस प्रसंग के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि यदि अज्ञानवश या संयोग से भी भाद्रपद मास में स्नान का फल इतना महान हो सकता है, तो जो भक्त पूर्ण श्रद्धा, भक्ति और नियमों के साथ इस माह में स्नान, दान और व्रत का पालन करते हैं, उन्हें असीम पुण्य की प्राप्ति होती है। धर्मशास्त्रों में वर्णित है कि इस पवित्र मास में किया गया दान और स्नान नरक के बंधनों को काटने वाला और जीव को बैकुण्ठ तक पहुँचाने वाला माना गया है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156016002</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 08:46:48 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Heramba Sankashti Chaturthi 2026 Upay: आज हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर शुभ मुहूर्त में करें ये 3 उपाय, गणपति बप्पा की कृपा से बनेंगे बिगड़े काम ]]></title><description><![CDATA[ Heramba Sankashti Chaturthi 2026 Upay: धार्मिक दृष्टि से हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी का दिन बहुत ही खास होता है। इस दिन पूजा-पाठ और व्रत रखने के साथ-साथ कुछ विशेष उपाय भी किए जाते हैं। चलिए जानें हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर गणेश जी को खुश करने के लिए किए जाने वाले 3 महाउपायों के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/heramba-sankashti-chaturthi-2026-today-ganesh-ji-ko-khush-karne-ke-upay-article-156016002 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156016018,thumbsize-125799,width-1280,height-720,resizemode-75/156016018.jpg" alt="heramba sankashti chaturthi 2026 today ganesh ji ko khush karne ke upay" /></div><p><strong>Heramba Sankashti Chaturthi 2026 Upay:</strong> हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी मनाई जाती है। इस बार 31 अगस्त 2026 की सुबह 08:50 बजे से लेकर 01 सितंबर 2026 की सुबह 07:41 बजे तक भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि रहेगी, जिसके कारण आज 31 अगस्त 2026 को ही हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। इस चतुर्थी पर भगवान गणेश के 32 रूपों में से एक हेरम्ब गणपति स्वरूप की पूजा की जाती है, जिन्हें 5 मुख और 10 हाथों के साथ दर्शाया गया है। भगवान हेरम्ब के नाम का अर्थ 'असहाय एवं निर्बल लोगों की रक्षा करने वाला' है, जिनकी सवारी सिंह है। </p><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के इस स्वरूप की पूजा करने से भक्तों को भय और तमाम तरह के संकटों से मुक्ति मिलती है। यदि आप भी गणेश जी से कोई आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो आज हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर कुछ विशेष उपाय कर सकते हैं। यहां पर हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर किए जाने वाले 3 अचूक उपायों के बारे में बताया गया है।</p><p><h2><strong>हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी के उपाय</p><p></strong></h2><ul><li>आज हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप की पूजा करें। साथ ही उन्हें दूर्वा की 21 गांठें अर्पित करें। ऐसा करने से आपके बिगड़े काम गणेश जी की कृपा से बनने लगेंगे।</li><li>यदि आप आज किसी खास काम के लिए जाने वाले हैं तो सबसे पहले घर में भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप की पूजा करें। उन्हें सिंदूर अर्पित करें। कुछ समय के बाद वही सिंदूर अपने माथे पर लगाएं। ऐसा करने से गणेश जी के आशीर्वाद से आपके कार्य पूरे होने लगेंगे।</li><li>घी भगवान गणेश को अति प्रिय है। इसलिए हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी पर उन्हें विशेष रूप से घी का भोग लगाया जाता है। साथ ही गरीबों को घी का दान करना शुभ रहता है। इससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं दूर होती हैं और घर में खुशहाली आती है।</li></ul>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/bahula-chaturthi-2026-today-shubh-muhurat-and-puja-vidhi-aaj-chandrodaya-ka-samay-kya-hai-article-156015711" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>बहुला चतुर्थी व्रत आज; जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और चंद्रोदय का समय</strong></a></p><p><h2><strong>आज के शुभ मुहूर्त</p><p></strong></h2>आज हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी का अमृत-सर्वोत्तम चौघड़िया मुहूर्त सुबह 05:58 बजे से सुबह 07:34 बजे तक था, जिसके बाद शुभ-उत्तम चौघड़िया मुहूर्त आरंभ होगा। ये मुहूर्त सुबह 09:10 बजे से लेकर सुबह 10:46 बजे तक रहने वाला है। इसके अलावा चन्द्रोदय रात 08:29 बजे होगा, जिसके बाद हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी व्रत का पारण किया जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156015711</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:42:55 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bahula Chaturthi 2026: बहुला चतुर्थी व्रत आज; जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और चंद्रोदय का समय ]]></title><description><![CDATA[ Bahula Chaturthi 2026 Today: आज 31 अगस्त 2026 को कजरी तीज के साथ-साथ बहुला चतुर्थी भी है। यदि आप भी बहुला चतुर्थी के दिन पूजा और व्रत रखते हैं तो इसके महत्व, शुभ मुहूर्त, विधि और अन्य जरूरी बातों के बारे में जान लें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/bahula-chaturthi-2026-today-shubh-muhurat-and-puja-vidhi-aaj-chandrodaya-ka-samay-kya-hai-article-156015711 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156015742,thumbsize-189753,width-1280,height-720,resizemode-75/156015742.jpg" alt="bahula chaturthi 2026 today shubh muhurat and puja vidhi aaj chandrodaya ka samay kya hai" /></div><p><strong>Bahula Chaturthi 2026 Today:</strong> बहुला चतुर्थी का पर्व बहुत ही खास होता है, जो विशेषतौर पर गुजरात में मनाया जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है, जिसे देश के अन्य राज्यों में बोल चौथ और हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप, कृष्ण जी, गाय और बछड़ों की विशेष रूप से पूजा की जाती है। साथ ही व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि बहुला चतुर्थी के दिन तप-त्याग करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही संतान की सेहत और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद मिलता है। चलिए अब जानें बहुला चतुर्थी की पूजा का आज शुभ मुहूर्त क्या है और व्रत का पारण किस समय किया जाएगा।</p><p><h2><strong>बहुला चतुर्थी 2026 की तिथि</p><p></strong></h2><ul><li>भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि का आरंभ- 31 अगस्त 2026 को सुबह 08:50 बजे</li><li>भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि का समापन- 01 सितंबर 2026 को सुबह 07:41 बजे</li></ul></p><p><h2><strong>बहुला चतुर्थी 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बहुला चतुर्थी की पूजा शाम में गोधूलि मुहूर्त में करनी चाहिए। आज गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 31 मिनट से लेकर शाम 06 बजकर 57 मिनट तक है, लेकिन व्रत का संकल्प सुबह ब्रह्म मुहूर्त में ही लेना शुभ होता है। आज ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 29 मिनट से लेकर सुबह 05 बजकर 14 मिनट तक था।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/kajari-teej-2026-today-shubh-muhurat-shiv-parvati-ki-puja-vidhi-aaj-ke-din-chandrodaya-ka-samay-article-156015612" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>आज शुभ मुहूर्त में करें कजरी तीज की पूजा; जानें विधि, मंत्र, नियम और व्रत के पारण का समय</strong></a></p><p><h2><strong>बहुला चतुर्थी की पूजा विधि</p><p></strong></h2><ul><li>सुबह स्नान कर साफ वस्त्र पहनें। </li><li>हाथ में जल व अक्षत लेकर पूजा और व्रत का संकल्प लें।</li><li>शाम में घर के मंदिर में एक चौकी पर पीला या लाल वस्त्र बिछाएं, जिस पर गणेश जी, कृष्ण जी और गौ माता-बछड़े की प्रतिमा स्थापित करें।</li><li>प्रतिमाओं का जल से शुद्धिकरण करें और उनका रोली या चंदन से तिलक करें।</li><li>गणेश जी को दूर्वा, कृष्ण जी को तुलसी दल और गाय-बछड़े को हरा चारा अर्पित करें। साथ ही मिठाई का भोग लगाएं। </li><li>बहुला चतुर्थी पर जपे जाने वाले मंत्रों का जाप करें और कथा पढ़ें।</li><li>घी का दीपक जलाने के बाद अलग-अलग सभी की आरती करें। </li><li>गाय और बछड़े को हरा चारा खिलाएं। </li><li>रात में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।</li></ul></p><p><h2><strong>बहुला चतुर्थी 2026 का व्रत किस समय खोलें?</p><p></strong></h2></p><p>आज 31 अगस्त 2026 को चन्द्रोदय रात 08 बजकर 29 मिनट पर होगा, जिसके बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर आप बहुला चतुर्थी व्रत का पारण कर सकते हैं। अर्घ्य देने के लिए एक तांबे का लोटा लें, जिसमें जल, दूध, रोली, अक्षत और फूल डालें।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156015875</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 07:54:05 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Bahula Chaturthi 2026 Vrat Katha: आज बहुला चतुर्थी पर जरूर पढ़ें कृष्ण जी और बहुला गाय की कथा, मिलेगा धन और संतान सुख का आशीर्वाद ]]></title><description><![CDATA[ Bahula Chaturthi 2026 Vrat Katha: कृष्ण जी को खुश करने के लिए अधिकतर लोग बहुला चतुर्थी के दिन व्रत रखते हैं, जिस दौरान कृष्ण जी और बहुला गाय की एक पौराणिक कथा भी पढ़ी जाती है। चलिए जानें इसी कथा के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/bahula-chaturthi-2026-vrat-katha-bol-chauth-vrat-ki-kahani-in-hindi-article-156015875 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156015889,thumbsize-153254,width-1280,height-720,resizemode-75/156015889.jpg" alt="bahula chaturthi 2026 vrat katha bol chauth vrat ki kahani in hindi" /></div><p><strong>Bahula Chaturthi 2026 Vrat Katha:</strong> धार्मिक दृष्टि से बहुला चतुर्थी का दिन बहुत ही खास होता है। ज्योतिष गणना का आकलन करें तो हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को बहुला चतुर्थी का पर्व मनाना शुभ रहता है। इस बार आज 31 अगस्त 2026, सोमवार को बहुला चतुर्थी मनाई जा रही है। आज 31 अगस्त 2026 की सुबह 08:50 बजे से भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी तिथि का आरंभ होगा, जो कल 01 सितंबर 2026 को सुबह 07:41 बजे समाप्त होगी। इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ भगवान गणेश के हेरम्ब स्वरूप, कृष्ण जी, गाय और उसके बछड़े की विशेष रूप से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बहुला चतुर्थी के दिन पूजा-पाठ करने से परिवार में खुशहाली आती है। साथ ही संतान सुख का आशीर्वाद मिलता है। </p><p>हालांकि, बहुला चतुर्थी के दिन कृष्ण जी और बहुला गाय की एक कथा भी पढ़ी जाती है, जिसे पढ़ने के बाद ही व्रत को सफल माना जाता है। आइए अब जानें बहुला चतुर्थी व्रत की कथा के बारे में। </p><p><h2>बहुला चतुर्थी व्रत की कथा</p><p></h2><h3><strong>कृष्ण जी की सेवा करना चाहती थी कामधेनु गाय</p><p></strong></h3></p><p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान विष्णु कृष्ण जी का रूप लेकर धरती पर आए थे। उनकी इस लीला में शामिल होने के लिए अन्य कई देवी-देवताओं ने भी गोप-गोपियों का रूप धारण किया और पृथ्वी पर आए। एक दिन दिव्य और सभी इच्छाओं को पूरा करने वाली पवित्र गाय कामधेनु के मन में भी कृष्ण जी की सेवा करने का विचार आया, जिसके बाद वो नंद बाबा की गौशाला में आ गई। नंद बाबा ने कामधेनु गाय का नाम बहुला रखा, जिससे भगवान कृष्ण भी बहुत ज्यादा प्यार करते थे।</p><p><h3><strong>कृष्ण जी ने ली बहुला की परीक्षा</p><p></strong></h3></p><p>एक दिन कृष्ण जी के मन में बहुला गाय की परीक्षा लेने का विचार आया। जब बहुला वन में अकेली चारा खा रही थी तो वो उसी समय सिंह रूप में वहां प्रकट हो गए। सिंह को देखकर बहुला को बहुत डर लगा। उसने डरते-डरते बोला 'वनराज जी, मेरा एक बछड़ा है, जो कि भूखा है। मैं उसे दूध पिलाकर वापस आ जाऊंगी।' इसके बाद सिंह ने कहा 'सामने आए भोजन को मैं कैसे जाने दूं। यदि तुम वापस नहीं आई तो मैं भूखा रह जाऊंगा।' फिर बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ ली और कहा मैं वापस जरूर आऊंगी। सिंह को बहुला पर दया आ गई और उसने उसे जाने दिया।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- <a href="https://www.bhaktitimes.in/vastu-tips/bahula-chaturthi-2026-today-shubh-muhurat-and-puja-vidhi-aaj-chandrodaya-ka-samay-kya-hai-article-156015711" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>बहुला चतुर्थी व्रत आज; जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और चंद्रोदय का समय</strong></a></p><p><h3><strong>अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए कृष्ण जी</p><p></strong></h3>कुछ देर बाद बहुला अपने बछड़े को दूध पिलाकर वापस आई। बहुला गाय की सत्यनिष्ठा देख सिंह यानी कृष्ण जी को बहुत प्रसन्नता हुई और वो अपने वास्तविक स्वरूप में आए। उन्होंने गाय से कहा 'तुम मेरी परीक्षा में सफल हुई। अब से आज ही के दिन गौ माता के रूप में तुम्हारी पूजा की जाएगी। जो भी व्यक्ति तुम्हारी सच्चे मन से पूजा करेगा, उसे मैं धन और संतान सुख का आशीर्वाद दूंगा।'</p><p>द्वापर युग में जिस दिन ये घटना घटी थी, उस दिन भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि थी। इसलिए हर साल इसी तिथि पर बहुला चतुर्थी मनाई जाती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156015612</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 05:34:52 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Kajari Teej 2026: आज शुभ मुहूर्त में करें कजरी तीज की पूजा; जानें विधि, मंत्र, नियम और व्रत के पारण का समय ]]></title><description><![CDATA[ Kajari Teej 2026 Today: आज 31 अगस्त 2026, वार सोमवार को कजरी तीज का व्रत रखा जा रहा है। यदि आपने भी आज उपवास रखा है तो सबसे पहले इसकी पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, मंत्र, पारण का समय और नियम आदि के बारे में जान लें। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/kajari-teej-2026-today-shubh-muhurat-shiv-parvati-ki-puja-vidhi-aaj-ke-din-chandrodaya-ka-samay-article-156015612 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156015653,thumbsize-180839,width-1280,height-720,resizemode-75/156015653.jpg" alt="kajari teej 2026 today shubh muhurat shiv parvati ki puja vidhi aaj ke din chandrodaya ka samay" /></div><p><strong>Kajari Teej 2026 Today:</strong> कजरी तीज का व्रत शिव जी और माता पार्वती को समर्पित है, जो हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाता है। आमतौर पर ये व्रत सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, खुशहाल मैरिड लाइफ और परिवार वालों की सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। इसके अलावा मनचाहा और योग्य वर पाने के लिए कुछ अविवाहित लड़कियां भी ये व्रत रखती हैं। तीज का ये व्रत निर्जला होता है, जिस दौरान शाम तक कुछ भी खाने और पीने की इजाजत नहीं होती है। शाम में चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति के हाथ से जल ग्रहण करके व्रत खोला जाता है, जिससे पहले नीम के पेड़ की विशेष रूप से पूजा की जाती है। चलिए अब जानें कजरी तीज 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि, मंत्र, नियम और व्रत के पारण का समय आदि के बारे में।</p><p><h2><strong>कजरी तीज 2026 की तिथि</p><p></strong></h2><ul><li>तृतीया तिथि प्रारम्भ- 30 अगस्त 2026 को सुबह 09:36 बजे</li><li>तृतीया तिथि समाप्त- 31 अगस्त 2026 को सुबह 08:50 बजे</li></ul></p><p><h2><strong>कजरी तीज 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त </p><p></strong></h2></p><p><ul><li>ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:29 बजे से 05:14 बजे तक</li><li>अभिजित मुहूर्त: सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक</li><li>गोधूलि मुहूर्त: शाम 06:44 बजे से 07:06 बजे तक</li><li>सायाह्न सन्ध्या: शाम 06:44 बजे से 07:51 बजे तक</li><li>अमृत काल: मध्य रात्रि 01:01 बजे से 02:36 बजे तक (1 सितंबर 2026)</li><li>निशिता मुहूर्त: रात 11:59 बजे से मध्य रात्रि 12:44 बजे तक</li></ul></p><p><h2><strong>कजरी तीज की पूजा विधि </p><p></strong></h2><ul><li>सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कार्य करके स्वच्छ हरे या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। साथ ही सोलह श्रृंगार करें।</li><li>पूजा स्थल की सफाई करके एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।</li><li>पूजा और व्रत का संकल्प लेने के बाद देवी-देवताओं को जल, गंगाजल, बेलपत्र, धतूरा, फल, फूल, अक्षत, चंदन, सुहाग का सामान और वस्त्र अर्पित करें।</li><li>पूजा सामग्री अर्पित करते समय मंत्र जाप करते रहें।</li><li>घी का दीपक जलाने के बाद कजरी तीज व्रत की कथा पढ़ें। </li><li>आरती करके पूजा का समापन करें।</li><li>शाम के समय घर की उत्तर या पूर्व दिशा में नीम की एक टहनी (नीमड़ी) को प्रतीक रूप में स्थापित करें। </li><li>नीम की टहनी पर गाय का दूध, पंचामृत, हल्दी, रोली, अक्षत, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी, चूड़ियां, लाल चुनरी और वस्त्र अर्पित करें।</li><li>साथ ही सत्तू, फल, चावल और गुड़ का भोग लगाएं। </li><li>रात 8 बजकर 29 मिनट पर चंद्रमा का उदय होने के बाद चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।</li></ul>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/panchang/aaj-ka-panchang-31-august-2026-shubh-muhurat-shiv-puja-article-156015575" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>आज का पंचांग 31 अगस्त 2026: भाद्रपद कृष्ण तृतीया पर जानें शुभ मुहूर्त और पूजा विधि</strong></a></p><p><h2><strong>कजरी तीज पर जपने वाले मंत्र </p><p></strong></h2><ul><li>ॐ शर्वाय नम:</li><li>ॐ कपर्दिने नम:</li><li>ॐ भैरवाय नम:</li><li>ॐ ईशानाय नम:</li><li>ॐ शूलपाणये नम:</li><li>ॐ विश्वरूपिणे नम:</li><li>ॐ विरूपाक्षाय नम:</li></ul></p><p><h2><strong>कजरी तीज व्रत के नियम</p><p></strong></h2>संकल्प लेने के बाद ही पूजा और व्रत का आरंभ करें। संकल्प लेने के बाद व्रत को बीच में न तोड़ें। दिनभर बाल और नाखून न काटें। मन के साथ-साथ तन को भी दिनभर शुद्ध रखें। किसी भी व्यक्ति से कटु शब्द न बोलें और नकारात्मक चीजों से दूर रहें।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156015626</guid><pubDate>Mon, 31 Aug 2026 06:03:31 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कजरी तीज व्रत आज, अखंड सौभाग्य के लिए पढ़ें ये पौराणिक कथा ]]></title><description><![CDATA[ भाद्रपद कृष्ण तृतीया के दिन कजरी तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं इस दिन विशेष पूजा और व्रत कथा का पाठ करती हैं। जानें इस व्रत का महत्व और पौराणिक कथा। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/kajari-teej-vrat-katha-significance-and-story-article-156015626 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156015625,thumbsize-715091,width-1280,height-720,resizemode-75/156015625.jpg" alt="kajari-teej-vrat-katha-significance-and-story" /></div><p>भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को कजरी तीज का पावन पर्व मनाया जा रहा है। इस विशेष दिन पर सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ व्रत रखती हैं, वहीं कुंवारी कन्याएं भी मनवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करती हैं। इस दिन कजली माता के साथ-साथ भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करने की परंपरा है।</p><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कजरी तीज के दिन व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि कथा सुनने या पढ़ने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस दिन महिलाएं पूरे दिन निर्जला या फलाहारी व्रत रखकर शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही अपना व्रत खोलती हैं।</p><p><h2>कजरी तीज व्रत की पौराणिक कथा</h2>कजरी तीज से जुड़ी एक प्रचलित कथा के अनुसार, एक गांव में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि दो समय का भोजन जुटाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। एक बार भाद्रपद कृष्ण तृतीया के दिन ब्राह्मण की पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखने का संकल्प लिया। उसने अपने पति से कहा कि आज तीज का व्रत है, इसलिए उन्हें पूजा के लिए चने का सत्तू चाहिए।</p><p>ब्राह्मण के पास सत्तू खरीदने के लिए धन नहीं था, लेकिन पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए वह रात के अंधेरे में एक साहूकार की दुकान में पहुंच गया। वहां उसने चने की दाल, घी और शक्कर लेकर सवा किलो सत्तू तैयार किया। जैसे ही वह दुकान से निकलने लगा, आहट सुनकर वहां के नौकर जाग गए और शोर मचाने लगे। साहूकार ने मौके पर पहुंचकर ब्राह्मण को पकड़ लिया।</p><p>जब साहूकार ने ब्राह्मण से चोरी का कारण पूछा, तो उसने पूरी सच्चाई बता दी। ब्राह्मण ने कहा कि वह चोर नहीं है, बल्कि एक गरीब व्यक्ति है जिसकी पत्नी ने तीज माता का व्रत रखा है और वह केवल सत्तू लेने आया था। साहूकार ने ब्राह्मण की तलाशी ली, तो उसके पास सत्तू के अलावा कुछ भी नहीं मिला। ब्राह्मण की निष्ठा और सच्चाई देखकर साहूकार का हृदय परिवर्तन हो गया।</p><p>साहूकार ने ब्राह्मण की पत्नी को अपनी धर्म बहन मान लिया और उन्हें सत्तू के साथ-साथ धन, गहने और अन्य उपहार देकर विदा किया। ब्राह्मण घर पहुंचा और अपनी पत्नी के साथ मिलकर विधि-विधान से कजली माता की पूजा की। मान्यता है कि जिस प्रकार कजली माता की कृपा से उस गरीब ब्राह्मण के दिन बदल गए, उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक व्रत करने वाली महिलाओं के जीवन में भी माता सुख और सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करती हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156013320</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 16:47:54 +0530</pubDate><title><![CDATA[ पूजा के फूल सूख गए हैं तो भूलकर भी न करें ये काम, जानें सही तरीका ]]></title><description><![CDATA[ Hindu Rituals: पूजा के फूलों को लेकर अलग-अलग देवी-देवताओं, मंदिरों और परिवारों में अलग परंपराएं हो सकती हैं।  ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/hindu-rituals-what-to-do-with-puja-flowers-article-156013320 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156013319,thumbsize-1001201,width-1280,height-720,resizemode-75/156013319.jpg" alt="hindu rituals what to do with puja flowers" /></div><p><strong>Hindu Rituals:</strong> पूजा के दौरान ईश्वर को फूल चढ़ाने की परंपरा बेहद प्राचीन है। फूलों को सिर्फ सजावट के तौर पर नहीं बल्कि भक्त की श्रद्धा, प्रेम और समर्पण के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। लेकिन, एक सवाल जो ज्यादातर भक्तों के मन में रहता है वो ये है कि जब भगवान को चढ़ाए हुए फूल मुरझाने या सूखने लगें तो इन फूलों का क्या किया जाए? धार्मिक मान्यताओं में इसके कई तरीके बताए गए हैं। साथ ही इन्हें साधारण कचरे की तरह फेंकने से बचने की सलाह भी दी गई है। </p><p><h2>क्या सूखे फूल घर में रख सकते हैं?</h2></p><p>अगर मंदिर से प्रसाद या आशीर्वाद के रूप में भगवान को चढ़ा हुआ फूल या माला मिली है, तो कई जगहों पर उसे सूखने के बाद भी श्रद्धा से संभालकर रखने की परंपरा है। कुछ मान्यताओं में ऐसे फूलों को साफ कपड़े में बांधकर पूजा स्थान, तिजोरी या किसी सुरक्षित जगह पर रखने की बात कही गई है।</p><p><h2>सूखे फूलों को पेड़ के नीचे रख सकते हैं</h2></p><p>अगर फूल पूरी तरह सूख गए हैं, तो उन्हें किसी साफ जगह पर ले जाकर पेड़ या पौधे की जड़ के पास मिट्टी में दबाया जा सकता है। यह तरीका धार्मिक भावना के साथ-साथ प्रकृति के लिए भी अच्छा है। फूलों को मिट्टी में मिलाने से वे धीरे-धीरे जैविक खाद का हिस्सा बन सकते हैं। घर में बगीचा या गमले हैं तो सूखे फूलों को खाद बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।</p><p><h2>फूलों का जल में विसर्जन कर सकते हैं</h2></p><p>कई धार्मिक परंपराओं में पूजा के फूलों को जल में प्रवाहित करने की मान्यता है। अगर आपके क्षेत्र या परिवार में यह परंपरा चली आ रही है तो फूलों का सम्मानपूर्वक विसर्जन किया जा सकता है। हालांकि यहां एक जरूरी बात ध्यान रखें। प्लास्टिक की थैली, धागा, चमकीली सजावट या अन्य गैर-जैविक चीजों को पानी में न डालें। </p><p><h2>फूलों को कूड़ेदान में डालने से बचें</h2></p><p>जिस फूल को आपने भगवान के चरणों में अर्पित किया, उसे पूजा के बाद सामान्य कचरे के साथ डालना कई लोग उचित नहीं मानते। इसलिए उसे पेड़ की जड़ में दबाना, मिट्टी में मिलाना या अपनी स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार विसर्जित करना बेहतर विकल्प माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156012364</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 13:43:22 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Nag Panchami 2026: 17 अगस्त के बाद 1 सितंबर को फिर क्यों मनाई जाएगी नाग पंचमी? जानें कारण, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि ]]></title><description><![CDATA[ Nag Panchami 2026 Date & Time: 17 अगस्त को नाग पंचमी का पर्व मनाया गया, जिसके बाद 1 सितंबर को फिर से नाग पंचमी की पूजा की जाएगी। ऐसा क्यों है? जानिए इसका कारण, 1 सितंबर की पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि आदि के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/1-september-ko-kya-nag-panchami-hai-nag-panchami-ki-puja-ka-samay-aur-vidhi-article-156012364 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156012421,thumbsize-167434,width-1280,height-720,resizemode-75/156012421.jpg" alt="1 september ko kya nag panchami hai nag panchami ki puja ka samay aur vidhi" /></div><p><strong>Nag Panchami 2026 Date &amp; Time:</strong> भगवान शिव के भक्तों के लिए नाग पंचमी का दिन बहुत ही खास होता है। इस दिन भगवान शिव के साथ नागों के राजा शेषनाग और अन्य नाग देवताओं की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है और कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है। इस बार सावन शुक्ल पंचमी 17 अगस्त 2026 को थी, जिस दिन नाग पंचमी का पर्व मनाया गया, लेकिन अब 1 सितंबर को भी नाग पंचमी की पूजा की बात कही जा रही है। </p><p>चलिए जानते हैं कि इस साल दो बार नाग पंचमी मनाने का कारण क्या है। साथ ही आपको 1 सितंबर 2026 के दिन की पूजा का शुभ मुहूर्त और नाग पंचमी की पूजन विधि के बारे में जानने को मिलेगा।</p><p><h2><strong>1 सितंबर को क्या नाग पंचमी है?</p><p></strong></h2>यह बात सही है कि 2026 में नाग पंचमी दो अलग-अलग तिथियों पर मनाई जा रही है। सबसे पहले 17 अगस्त को नाग पंचमी मनाई गई, जिसके बाद फिर से 1 सितंबर को नागों की पूजा की जाएगी। बता दें कि साल 2026 में दो बार नाग पंचमी मनाने का मुख्य कारण भारत में प्रचलित पूर्णिमांत और अमांत पंचांग के बीच अंतर है। </p><p><h2><strong>नाग पंचमी दो बार क्यों मनाई जा रही है?</p><p></strong></h2>उत्तर भारत के राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और पंजाब आदि क्षेत्रों में लोग पूर्णिमांत पंचांग को मानते हैं, जिसमें महीने का समापन पूर्णिमा के दिन होता है। इस गणना के अनुसार 17 अगस्त 2026 को सावन शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि पर नाग पंचमी मनाई गई। वहीं, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल आदि क्षेत्रों में अमांत पंचांग को प्राथमिकता दी जाती है, जिसमें महीने का समापन अमावस्या के दिन होता है। अमांत पंचांग में सावन का महीना पूर्णिमांत पंचांग की तुलना में करीब 15 दिन बाद समाप्त होता है। इसी वजह से अमांत पंचांग के अनुसार सावन महीने के कृष्ण पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी मनाई जाती है। बता दें कि पूर्णिमांत गणना में यही तिथि भाद्रपद यानी भादो माह में कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि पर आती है, जो इस बार 1 सितंबर 2026 को है।</p><p><h2><strong>नाग पंचमी 2026 की तिथि</p><p></strong></h2><ul><li><strong>17 अगस्त 2026-</strong></li></ul>सावन शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि का आरंभ- 16 अगस्त 2026 को दोपहर 04:52 बजे</p><p>सावन शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि का समापन- 17 अगस्त 2026 को शाम 05:00 बजे</p><p><ul><li><strong>1 सितंबर 2026-</strong></li></ul></p><p>भाद्रपद कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का आरंभ (पूर्णिमांत पंचांग) / श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का आरंभ (अमांत पंचांग)- 01 सितंबर 2026 को सुबह 07:41 बजे</p><p>भाद्रपद कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का समापन (पूर्णिमांत पंचांग) / श्रावण कृष्ण पक्ष पंचमी तिथि का समापन (अमांत पंचांग)- 02 सितंबर 2026 को सुबह 06:12 बजे</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/festivals/pithori-amavasya-2026-mai-kab-hai-date-and-time-shubh-muhurat-64-yogini-puja-vidhi-article-156006702" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>10 या 11 सितंबर, पिठोरी अमावस्या कब है? जानें तिथि और शुभ मुहूर्त</strong></a></p><p><h2><strong>नाग पंचमी 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त <strong>(1 सितंबर)</strong></p><p></strong></h2><table class="redcator-table-advance"><thead><tr><th><strong>मुहूर्त </strong></th><th><strong>समय</strong></th></tr></thead><tbody><tr><td><strong>सूर्योदय</strong></td><td>सुबह 05:59 बजे</td></tr><tr><td><strong>ब्रह्म मुहूर्त</strong></td><td>सुबह 04:29 बजे से 05:14 बजे तक</td></tr><tr><td><strong>नाग पंचमी पूजा मुहूर्त</strong></td><td>सुबह 07:41 बजे से 08:32 बजे तक</td></tr><tr><td><strong>अभिजित मुहूर्त</strong></td><td>सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:46 बजे तक</td></tr><tr><td><strong>सायाह्न संध्या</strong></td><td>शाम 06:43 बजे से 07:50 बजे तक</td></tr></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody><tbody></tbody></table></p><p><h2><strong>नाग पंचमी 2026 की पूजा विधि</p><p></strong></h2></p><p><ul><li>नाग पंचमी की पूजा से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। </li><li>पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें। </li><li>लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर भगवान शिव की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें।</li><li>हल्दी मिश्रित चंदन से नाग देवता का चित्र बनाएं। </li><li>श्री केशवाय नमः, श्री नारायणाय नमः, श्री माधवाय नमः और श्री गोविंदाय नमः बोलकर आचमन करें। प्रत्येक नाम के अंत में थोड़ा जल लेकर ग्रहण करें। अंत में हथेली में जल लेकर ताम्रपत्र में छोड़ें।</li><li>अब विष्णवे नमः, मधुसूदनाय नमः, त्रिविक्रमाय नमः, वामनाय नमः, श्रीधराय नमः, हृषीकेशाय नमः, पद्मनाभाय नमः, दामोदराय नमः, संकर्षणाय नमः, वासुदेवाय नमः, प्रद्युम्नाय नमः, अनिरुद्धाय नमः, पुरुषोत्तमाय नमः, अधोक्षजाय नमः, नारसिंहाय नमः, अच्युताय नमः, जनार्दनाय नमः, उपेन्द्राय नमः, हरये नमः और श्रीकृष्णाय नमः बोलें। अब हाथ जोड़कर भगवान शिव का स्मरण करें।</li><li>पूजा निर्विघ्न पूरी होने के लिए भगवान गणेश का ध्यान करें।</li><li>इसके बाद इष्टदेव, कुलदेवता, ग्रामदेवता, स्थानदेवता, वास्तुदेवता और नवग्रहों का स्मरण करें।</li><li>चौकी पर एक कलश की स्थापना करें, जिसमें स्वच्छ जल, गंगाजल, सुपारी, अक्षत और सिक्का डालें। कलश के ऊपर आम या अन्य उपलब्ध 3 पत्ते रखें और उसके ऊपर नारियल रखें।</li><li>'गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धुकावेरी जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥' और 'कलशाय नमः। कलशे गङ्गादितीर्थान् आवाहयामि। कलशदेवताभ्यो नमः। सकलपूजार्थे गन्धाक्षतपुष्पं समर्पयामि।' मंत्र पढ़ें।</li><li>कलश पर चंदन, अक्षत और पुष्प चढ़ाएं।</li><li>घी का एक दीपक जलाएं और उसमें चंदन, अक्षत तथा पुष्प अर्पित करें।</li><li>भगवान शिव का ध्यान करने के बाद शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें।</li><li>नवनागों का आवाहन करें और उनके नाम का जाप करें। साथ ही उन्हें अक्षत, चंदन, कुमकुम, पुष्प, तुलसी, बेलपत्र, दूध, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य और जल अर्पित करें।</li><li>नाग पंचमी की कथा पढ़ें।</li><li>सबसे पहले दीप से और फिर कपूर से शिव जी तथा नागों की आरती करें।</li><li>आरती के बाद हाथ जोड़कर प्रणाम करें और ये मंत्र 'ॐ अनन्तादिनागदेवताभ्यो नमः। नमस्कारान् समर्पयामि॥' बोलें।</li><li>नाग देवता की श्रद्धापूर्वक 3 बार प्रदक्षिणा (परिक्रमा) करें।</li><li>पूजा में किसी प्रकार की कमी रह गई हो तो उसके लिए क्षमा मांगें।</li></ul></p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156011808</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 12:12:06 +0530</pubDate><title><![CDATA[ कृष्ण जन्माष्टमी पर अपनी राशि के अनुसार करें कान्हा का शृंगार, जानें पूजा विधि ]]></title><description><![CDATA[ 4 सितंबर 2026 को मनाई जाने वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर अपनी राशि के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का शृंगार करना विशेष फलदायी माना गया है। जानें मेष से मीन राशि तक के लिए पूजा के विशेष उपाय। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-puja-vidhi-according-to-zodiac-sign-article-156011808 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156011807,thumbsize-534961,width-1280,height-720,resizemode-75/156011807.jpg" alt="janmashtami-2026-puja-vidhi-according-to-zodiac-sign" /></div><p>इस वर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पावन पर्व 4 सितंबर 2026 को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी पूजा, अनुष्ठान या दान-पुण्य के समय अपनी जन्म राशि और लग्न राशि का ध्यान रखना अत्यंत शुभ माना जाता है। माना जाता है कि अपनी राशि के स्वामी के अनुरूप देवी-देवताओं की उपासना करने से सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है और मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।</p><p>ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हर राशि का एक स्वामी ग्रह होता है और उस ग्रह से संबंधित रंग या वस्तुएं उस राशि के जातकों के लिए विशेष रूप से प्रभावशाली होती हैं। जन्माष्टमी के अवसर पर यदि भक्त अपनी राशि के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का शृंगार करते हैं, तो इसे आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत लाभकारी माना गया है।</p><p><h2>राशि अनुसार करें भगवान श्रीकृष्ण का शृंगार</h2>मेष राशि के स्वामी मंगल हैं, इसलिए इस राशि के जातकों को कान्हा को लाल रंग के वस्त्र अर्पित करने चाहिए और घर की झांकी में भी लाल रंग का अधिक प्रयोग करना चाहिए। वृष राशि के स्वामी शुक्र हैं, अतः इन्हें भगवान को चटक सफेद रंग के वस्त्र पहनाने चाहिए। मिथुन राशि के स्वामी बुध हैं, जिन्हें हरा रंग प्रिय है, इसलिए इस राशि के लोगों को हरे वस्त्रों और हरियाली का उपयोग करना चाहिए। कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा होने के कारण इन्हें श्वेत वस्त्रों का प्रयोग करना शुभ रहता है।</p><p>सिंह राशि के स्वामी सूर्य हैं, अतः इस राशि के भक्त भगवान को लाल या गुलाबी रंग के वस्त्र पहनाएं। कन्या राशि के स्वामी बुध हैं, इसलिए इन्हें भी हरे रंग के वस्त्रों से कान्हा का शृंगार करना चाहिए। तुला राशि के स्वामी शुक्र हैं, जिन्हें चटक सफेद रंग के वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए। वृश्चिक राशि के स्वामी मंगल हैं, अतः इस राशि के जातकों को लाल रंग के वस्त्र अर्पित करने चाहिए।</p><p>धनु राशि के स्वामी बृहस्पति हैं, इसलिए इस राशि के लोगों को पीले रंग के वस्त्रों का उपयोग करना चाहिए और झांकी में लाल रंग की प्रधानता रखनी चाहिए। मकर और कुंभ राशि के स्वामी शनि देव हैं, अतः इन दोनों राशियों के जातकों को भगवान श्रीकृष्ण को श्याम वर्ण (गहरे नीले या काले रंग) के वस्त्र धारण कराने चाहिए। अंत में, मीन राशि के स्वामी बृहस्पति हैं, जिन्हें भगवान को पीले रंग के वस्त्र अर्पित करने चाहिए।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156010905</guid><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 06:59:51 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Janmashtami 2026: जन्माष्टमी से पहले घर लाएं ये 5 शुभ चीजें, बनी रहेगी सुख-समृद्धि ]]></title><description><![CDATA[ जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान कृष्ण की कृपा पाने के लिए ज्योतिष शास्त्र में कुछ विशेष वस्तुओं को घर लाना शुभ माना गया है। जानिए वे 5 चीजें जो आपके घर में सुख और शांति ला सकती हैं। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/janmashtami-2026-auspicious-items-for-home-prosperity-article-156010905 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156010904,thumbsize-621407,width-1280,height-720,resizemode-75/156010904.jpg" alt="janmashtami-2026-auspicious-items-for-home-prosperity" /></div><p>जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में पूरे देश में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान विष्णु के आठवें अवतार के रूप में श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ था। इस दिन भक्त अपने घरों में बाल गोपाल यानी लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि जिस घर में लड्डू गोपाल की सेवा की जाती है, वहां सदैव सुख-समृद्धि और भगवान विष्णु का आशीर्वाद बना रहता है।</p><p>जन्माष्टमी के पावन अवसर पर कुछ विशेष वस्तुओं को घर में लाना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है। इन वस्तुओं को घर में रखने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में खुशहाली आती है। आइए जानते हैं कि वे कौन सी पांच चीजें हैं जिन्हें जन्माष्टमी से पहले घर लाना चाहिए।</p><p><h2>जन्माष्टमी पर घर लाएं ये 5 शुभ वस्तुएं</h2>सबसे पहले भगवान कृष्ण की बांसुरी को घर में जरूर लाएं। लकड़ी की बनी बांसुरी को प्रेम, मधुरता और सकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है। इसे घर के मंदिर में या किसी स्वच्छ स्थान पर रखना चाहिए, जिससे जीवन में सामंजस्य बना रहे। इसके अलावा, गाय और बछड़े की प्रतिमा को घर में रखना बहुत शुभ माना गया है। चूंकि श्री कृष्ण का गौ-सेवा से गहरा नाता रहा है, इसलिए उनकी प्रतिमा या चित्र घर में रखने से पारिवारिक सुख और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसे मंदिर में भगवान कृष्ण के पास स्थापित करना चाहिए।</p><p>तीसरी महत्वपूर्ण वस्तु लक्ष्मी-नारायण की उपासना या श्री यंत्र है। जन्माष्टमी के दिन श्री यंत्र घर लाना आर्थिक समृद्धि के लिए शुभ माना जाता है। चौथी वस्तु तुलसी का पौधा है। यदि आपके घर में तुलसी नहीं है, तो जन्माष्टमी से पहले इसे जरूर लगाएं। तुलसी को नियमित जल अर्पित करने और सेवा करने से घर में मंगल होता है। अंत में, पूजा के लिए शुद्ध गौ-घृत (गाय का घी) घर में जरूर रखें। जन्माष्टमी की रात भगवान के जन्म के समय घी का दीपक जलाना अत्यंत सात्विक और शुभ माना जाता है, जो घर में पवित्रता और प्रकाश का संचार करता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156007697</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 16:10:08 +0530</pubDate><title><![CDATA[ सिर्फ पूजा नहीं, मन को शांत करने का तरीका भी है मंत्र जाप, जानें कैसे ]]></title><description><![CDATA[ Mantra Chanting Benefits: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारा दिमाग लगातार तनाव में उलझा रहता है। मंत्र की आवाज और उसकी लय पर ध्यान देने से मन को एक सहारा मिलता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/mantra-chanting-benefits-daily-mantra-chanting-mantra-meditation-article-156007697 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156007695,thumbsize-891791,width-1280,height-720,resizemode-75/156007695.jpg" alt="mantra chanting benefits daily mantra chanting mantra meditation" /></div><p><strong>Mantra Chanting Benefits: </strong>मंत्र जाप हमारी पुरानी परंपराओं का एक अहम हिस्सा रहा है। पूजा-पाठ में तो इसका इस्तेमाल होता ही है, लेकिन इसका उपयोग मन को शांत रखने और ध्यान लगाने के लिए भी किया जाता है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारा दिमाग लगातार तनाव में उलझा रहता है। काम का तनाव हो या घर की जिम्मेदारियां तमाम तरह कि चिंताएं मन को परेशान करती रहती हैं। ऐसे में कुछ मिनट किसी मंत्र, शब्द या छोटी प्रार्थना को बार-बार दोहराने से हमारा ध्यान एक जगह टिकने लगता है।</p><p><h2>मन को शांत करने में मिल सकती है मदद</h2></p><p>जब हम लगातार एक ही मंत्र का जाप करते हैं तो हमारा ध्यान कुछ समय के लिए बाकी चीजों से हट जाता है। मंत्र की आवाज और उसकी लय पर ध्यान देने से मन को एक सहारा मिलता है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं जैसे दिमाग को कुछ देर के लिए ब्रेक मिल गया हो। धीरे-धीरे मन की बेचैनी कम महसूस हो सकती है और आप खुद को पहले से ज्यादा शांत महसूस कर सकते हैं।</p><p><h2>फोकस बढ़ाने में हो सकता है मददगार</h2></p><p>अगर आपका मन जल्दी-जल्दी दूसरी चीजों की तरफ चला जाता है तो मंत्र जाप आपके लिए एक तरह की प्रैक्टिस बन सकता है। इसमें आपको बार-बार अपना ध्यान उसी मंत्र पर वापस लाना होता है। यही अभ्यास धीरे-धीरे एकाग्रता यानी फोकस बनाए रखने में मदद कर सकता है। पढ़ाई करते समय, काम के दौरान या किसी जरूरी काम पर ध्यान लगाने में भी इसका फायदा महसूस किया जा सकता है।</p><p><h2>ध्यान लगाना हो सकता है आसान</h2></p><p>कई लोगों को मेडिटेशन करते समय सबसे बड़ी परेशानी यही होती है कि उनका मन बार-बार इधर-उधर भटकता रहता है। ऐसे में मंत्र एक आसान फोकस पॉइंट बन सकता है। आप मंत्र को सुनते हुए या मन ही मन दोहराते हुए अपनी सांसों पर भी ध्यान दे सकते हैं। इससे ध्यान की शुरुआत करना थोड़ा आसान लग सकता है।</p><p><h2>मंत्र जाप की शुरुआत कैसे करें</h2></p><p>इसके लिए आपको किसी खास तैयारी की जरूरत नहीं है। घर में कोई शांत जगह चुनें और आराम से बैठ जाएं। अपनी आंखें बंद करें और कुछ गहरी सांस लें। इसके बाद आप अपनी पसंद का कोई मंत्र चुन सकते हैं। जैसे 'ॐ', 'सो हम' या कोई ऐसा मंत्र जिससे आपको आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस होता हो। शुरुआत में सिर्फ 5 से 10 मिनट जाप करें। अगर आपको अच्छा लगे तो धीरे-धीरे समय बढ़ा सकते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि इसे जबरदस्ती न करें। इसे अपनी रोज की दिनचर्या का शांत और आसान हिस्सा बनाएं।</p><p><strong>Disclaimer:</strong> यह लेख सामान्य जानकारी और लोकप्रिय आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित है। मंत्र जाप के प्रभाव व्यक्ति-दर-व्यक्ति अलग हो सकते हैं। भक्ति Times इस जानकारी की सटीकता या पूर्णता के लिए जिम्मेदार नहीं है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156006702</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 13:34:56 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Pithori Amavasya 2026: 10 या 11 सितंबर, पिठोरी अमावस्या कब है? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत का महत्व ]]></title><description><![CDATA[ Pithori Amavasya 2026 Date & Time: पिछले साल की तरह इस बार भी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि यानी पिठोरी अमावस्या की तिथि को लेकर कन्फ्यूजन बना हुआ है। चलिए पंचांग के जरिए जानें पिठोरी अमावस्या की तिथि और शुभ मुहूर्त तथा पूजा विधि के बारे में। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/pithori-amavasya-2026-mai-kab-hai-date-and-time-shubh-muhurat-64-yogini-puja-vidhi-article-156006702 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156006800,thumbsize-151190,width-1280,height-720,resizemode-75/156006800.jpg" alt="pithori amavasya 2026 mai kab hai date and time shubh muhurat 64 yogini puja vidhi" /></div><p><strong>Pithori Amavasya 2026 Date &amp; Time:</strong> पिठोरी अमावस्या का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत ही खास होता है। इस दिन केवल व्रत ही नहीं रखा जाता है, बल्कि 64 योगिनियों, सप्त मातृकाओं, माता पार्वती और देवी पिठोरी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि पिठोरी अमावस्या व्रत के सफल होने से देवियों के आशीर्वाद से संतान के उज्ज्वल भविष्य, सुख-समृद्धि, दीर्घायु, कुल की रक्षा और अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है। कुछ लोग पितरों की कृपा प्राप्ति के लिए भी पिठोरी अमावस्या का व्रत रखते हैं, जो भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। यदि आप भी पिठोरी अमावस्या का व्रत रखने वाले हैं तो सबसे पहले इसकी तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में जान लें।</p><p><h2><strong>पिठोरी अमावस्या 2026 में कब है?</p><p></strong></h2>द्रिक पंचांग के अनुसार, साल 2026 में 10 सितंबर, वार गुरुवार को पिठोरी अमावस्या मनाई जाएगी। इस बार 10 सितंबर 2026 की सुबह 10 बजकर 33 मिनट से भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का आरंभ हो रहा है, जिसका समापन अगले दिन 11 सितंबर को सुबह 8 बजकर 56 मिनट पर होगा। </p><p><h2><strong>पिठोरी अमावस्या की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?</p><p></strong></h2>धार्मिक मान्यता है कि पिठोरी अमावस्या के दिन माता पार्वती और 64 योगिनियों की पूजा प्रदोष काल (संध्या काल) में की जाती है। इस बार 10 सितंबर 2026 को प्रदोष मुहूर्त शाम 06 बजकर 32 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा ब्रह्म मुहूर्त सुबह 04 बजकर 31 मिनट से लेकर सुबह 05 बजकर 17 मिनट तक है।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/september-2026-shubh-muhurat-for-griha-pravesh-marriage-vehicle-buying-auspicious-dates-property-purchase-date-article-156006257" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>सितंबर में कब करें शादी, गृह प्रवेश, मुंडन और कार-संपत्ति की खरीदारी? देखें शुभ मुहूर्त</strong></a></p><p><h2><strong>पिठोरी अमावस्या की पूजा विधि क्या है?</p><p></strong></h2></p><p><ul><li>व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर तैयार हो जाएं।</li><li>व्रत का संकल्प लेने के बाद घर के मंदिर में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें।</li><li>दीवार पर गाय के गोबर या गेहूं के आटे से 64 योगिनियों, सप्त मातृकाओं तथा देवी पिठोरी की आकृतियां बनाएं।</li><li>अब हाथी, घोड़े, सिंहासन और झूला आदि मंगल चिह्नों की रचना करें।</li><li>देवियों को हल्दी, कुमकुम, चावल, पुष्प, मौली और 11 या 21 प्रकार के पकवान अर्पित करें।</li><li>64 योगिनियों के नाम जपने के बाद चौकी पर घी का दीपक जलाएं।</li><li>पिठोरी अमावस्या व्रत की कथा पढ़ें।</li><li>आरती करके पूजा का समापन करें।</li></ul></p><p><h2><strong>पिठोरी अमावस्या व्रत उद्यापन विधि</p><p></strong></h2></p><p>बता दें कि पिठोरी अमावस्या का व्रत केवल एक बार ही नहीं रखा जाता है, बल्कि इसे निरन्तर 5 या 7 वर्षों तक करना जरूरी होता है। इसके बाद ही उद्यापन किया जाता है, जिस दौरान व्रती 7 से 11 सुहागन स्त्रियों की सामूहिक पूजा करती हैं। अंत में स्त्रियों को भोजन और दान देकर विदा किया जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156006511</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 12:44:19 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Holi Date 2027: 2027 में कब मनाई जाएगी होली? नोट कर लें तारीख, होलिका दहन और पूजा का शुभ मुहूर्त ]]></title><description><![CDATA[ Holi Date 2027: 2027 में होली का त्योहार साल 2027 में मार्च महीने में मनाया जाएगा। जानें होली की सही तारीख, होलिका दहन और पूजा से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/holi-date-2027-holika-dahan-shubh-muhurat-holi-kab-hai-article-156006511 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156006514,thumbsize-2259166,width-1280,height-720,resizemode-75/156006514.jpg" alt="holi date 2027 holika dahan shubh muhurat holi kab hai" /></div><p><strong>Holi Date 2027:</strong> रंगों और उमंगों का त्योहार होली आने में अभी समय है, लेकिन त्योहारों की तैयारियां पहले से शुरू हो जाती हैं। खासकर होली की तारीख को लेकर लोगों के मन में अक्सर सवाल रहता है कि आखिर किस दिन होलिका दहन होगा और किस दिन रंगों वाली होली खेली जाएगी। पंचांग के अनुसार, 2027 में होली 22 मार्च, सोमवार को मनाई जाएगी, जबकि इसके एक दिन पहले यानी 21 मार्च, रविवार को होलिका <strong>(Holika Dahan Date 2027)</strong> दहन होगा।</p><p><h2>2027 में होली कब है?</p><p></h2></p><p>साल 2027 में रंगों से खेलने वाली होली 22 मार्च, सोमवार को पड़ेगी। यह दिन फाल्गुन पूर्णिमा के बाद आने वाली प्रतिपदा तिथि से जुड़ा होता है और देशभर में लोग इस दिन एक-दूसरे को गुलाल लगाकर होली की शुभकामनाएं देते हैं। वहीं होली से एक रात पहले होलिका दहन की परंपरा निभाई जाती है। इस लिहाज से होली का त्योहार दो दिनों में मनाया जाएगा। 21 मार्च को होलिका दहन और 22 मार्च को रंग वाली होली मनाई जाएगी। </p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/vastu-tips/home-vastu-tips-eye-level-placement-vastu-guidelines-in-positive-energy-article-156006347" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>घर में रखी चीजें आपकी नजर के सामने कितनी ऊंचाई पर हैं? जानें वास्तु में Eye-Level Placement का महत्व</strong></a></p><p><h2>2027 में होलिका दहन कब होगा?</p><p></h2></p><p>2027 में होलिका दहन 21 मार्च, रविवार को किया जाएगा। इसे छोटी होली या होलिका दहन के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार होलिका दहन बुराई पर अच्छाई और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है। इसका संबंध भक्त प्रह्लाद और भगवान विष्णु की कथा से भी जोड़ा जाता है। होलिका दहन के दौरान लोग विधि-विधान से पूजा करते हैं और इसके बाद शुभ मुहूर्त में होलिका की अग्नि प्रज्वलित की जाती है।</p><p><h2>होलिका दहन का शुभ मुहूर्त</p><p></h2></p><p>नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार, 21 मार्च 2027 को होलिका दहन का शुभ मुहूर्त शाम 6:33 बजे से रात 8:55 बजे तक रहेगा। इस दौरान होलिका पूजन और दहन किया जा सकता है। अलग-अलग शहरों में सूर्यास्त के समय में अंतर होने के कारण मुहूर्त में कुछ मिनट का बदलाव हो सकता है। पंचांग के अनुसार इस दिन फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 21 मार्च को शाम 6:21 बजे शुरू होकर 22 मार्च को शाम 4:13 बजे तक रहेगी।</p><p><strong>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/dharm/september-2026-shubh-muhurat-for-griha-pravesh-marriage-vehicle-buying-auspicious-dates-property-purchase-date-article-156006257" data-type="tilCustomLink" target="_blank">सितंबर में कब करें शादी, गृह प्रवेश, मुंडन और कार-संपत्ति की खरीदारी?</a></p><p></strong></p><p><h2>होलिका दहन की पूजा में क्या करें?</p><p></h2></p><p>होलिका पूजन के लिए रोली, अक्षत, फूल, गुड़, माला, कच्चा सूत और अन्य पूजन सामग्री रखी जा सकती है। परंपरा के अनुसार होलिका की परिक्रमा करते हुए परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना की जाती है। कई स्थानों पर नई फसल से जुड़े अनाज को भी होलिका की अग्नि में अर्पित करने की परंपरा है।ध्यान रखें कि होलिका दहन का समय स्थानीय पंचांग के अनुसार ही तय करना बेहतर होता है, क्योंकि भद्रा और प्रदोष काल जैसे कारकों के कारण शहर के अनुसार मुहूर्त में अंतर हो सकता है।</p><p><h2>होलिका दहन की कहानी</p><p></h2></p><p>होली सिर्फ रंग और उत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह भक्ति, विश्वास और सत्य की जीत का संदेश भी देती है। पौराणिक कथा में हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रोधित था। उसने प्रह्लाद को समाप्त करने के लिए अपनी बहन होलिका की सहायता ली, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका का अंत हो गया। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन की परंपरा मानी जाती है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156005900</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 11:09:51 +0530</pubDate><title><![CDATA[ सितंबर 2026 व्रत-त्योहार: जन्माष्टमी से पितृपक्ष तक, देखें प्रमुख तिथियों की पूरी सूची ]]></title><description><![CDATA[ सितंबर 2026 भक्ति और आस्था के लिहाज से बेहद खास है। इस महीने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी और पितृपक्ष जैसे महत्वपूर्ण पर्व मनाए जाएंगे। यहां देखें प्रमुख व्रत-त्योहारों की पूरी सूची। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/september-2026-vrat-tyohar-list-festivals-calendar-article-156005900 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156005899,thumbsize-680419,width-1280,height-720,resizemode-75/156005899.jpg" alt="september-2026-vrat-tyohar-list-festivals-calendar" /></div><p>सितंबर 2026 का महीना धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहने वाला है। इस माह में कई प्रमुख व्रत और त्योहारों का संयोग बन रहा है, जो भक्तों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। महीने की शुरुआत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व से होगी, वहीं इसका समापन पितृपक्ष के आरंभ के साथ होगा। इस दौरान हरतालिका तीज, गणेश चतुर्थी और पद्मा एकादशी जैसे महत्वपूर्ण व्रत भी आएंगे।</p><p>हिंदू पंचांग के अनुसार, सितंबर में आने वाले ये पर्व न केवल सांस्कृतिक परंपराओं को दर्शाते हैं, बल्कि भक्तों के लिए आत्मिक शांति और श्रद्धा का अवसर भी लेकर आते हैं। आइए जानते हैं कि इस महीने कौन-कौन से प्रमुख व्रत और त्योहार किस तिथि को पड़ रहे हैं।</p><p><h2>सितंबर 2026 के प्रमुख व्रत और त्योहारों की सूची</h2>सितंबर माह में आने वाले प्रमुख पर्वों की तिथियां इस प्रकार हैं: 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, 7 सितंबर को अजा एकादशी, 10 सितंबर को कुशाग्रहणी या पिठोरी अमावस्या, 14 सितंबर को हरतालिका तीज, कलंक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी का पर्व है। इसके बाद 18 सितंबर से महालक्ष्मी व्रत शुरू होगा, 19 सितंबर को राधाष्टमी, 22 सितंबर को पद्मा एकादशी, 23 सितंबर को वामन जयंती, 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी, 26 सितंबर को प्रोष्ठपदी पूर्णिमा श्राद्ध और 27 सितंबर से पितृपक्ष की शुरुआत होगी।</p><p>इन पर्वों से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वहीं, हरतालिका तीज पर महिलाएं अखंड सौभाग्य के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। गणेश चतुर्थी के साथ शुरू होने वाला गणेश उत्सव 10 दिनों तक चलता है, जिसका समापन अनंत चतुर्दशी पर बप्पा की विदाई के साथ होता है। इसके अतिरिक्त, पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए तर्पण और श्राद्ध जैसे कार्य किए जाते हैं, जिसे हिंदू धर्म में अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156005409</guid><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 08:09:31 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Kajari Teej 2026: 30 या 31 अगस्त कब है कजरी तीज? जानें सही तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त ]]></title><description><![CDATA[ Kajari Teej 2026: इस साल कजरी तीज की तारीख को लेकर असमंजस है कि व्रत 30 या 31 अगस्त को रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण तृतीया 30 अगस्त से शुरू होकर 31 अगस्त को समाप्त होगी। आइए जानते हैं कब है कजरी तीज और पूजा का शुभ मुहूर्त... ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/kajari-teej-2026-date-shubh-muhurat-kajari-teej-kab-hai-30-or-31-august-article-156005409 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156005408,thumbsize-2130550,width-1280,height-720,resizemode-75/156005408.jpg" alt="kajari teej 2026 date shubh muhurat kajari teej kab hai 30 or 31 august" /></div><p><strong>Kajari Teej 2026: </strong>सावन के बाद भाद्रपद मास की शुरुआत होते ही त्योहारों का सिलसिला फिर से तेज हो जाता है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में कजरी तीज का विशेष स्थान है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह व्रत पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से जुड़ा है। वहीं, अविवाहित कन्याएं भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना से यह व्रत रखती हैं। इस बार कजरी तीज की तारीख (Kajari Teej Date) को लेकर 30 और 31 अगस्त के बीच असमंजस बना हुआ है। आइए जानते हैं पंचांग के अनुसार सही तारीख और पूजा का शुभ समय।</p><p><h2>30 या 31 अगस्त कब है कजरी तीज?</p><p></h2></p><p>पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि 30 अगस्त 2026 को सुबह करीब 9:36 बजे शुरू होगी और 31 अगस्त को सुबह करीब 8:50 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के नियम के अनुसार कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त 2026, सोमवार को रखा जाएगा। यानी अगर आपके मन में भी यह सवाल है कि 30 या 31 अगस्त में से कजरी तीज कब है, तो इसका सीधा जवाब है कि 31 अगस्त को कजरी तीज मनाई जाएगी।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/rashifal/bhadrapada-month-2026-start-date-and-end-date-planets-transit-dates-grah-gochar-timings-article-156005185" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>भाद्रपद माह में कब-कब कौन-से ग्रह बदलेंगे चाल? जानें राशि और नक्षत्र परिवर्तन का समय</strong></a></p><p><h2>कजरी तीज पर कौन से शुभ मुहूर्त रहेंगे?</h2></p><p>31 अगस्त को पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों के लिए कई शुभ समय बताए गए हैं। अलग-अलग स्थानों के अनुसार मुहूर्त में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है। दिल्ली के लिए उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:29 से 5:14 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:56 से दोपहर 12:47 बजे तक और संध्या काल शाम 6:44 से 7:51 बजे तक बताया गया है।</p><p>वहीं, कजरी तीज के दिन अमृत चौघड़िया सुबह 5:58 से 7:34 बजे, शुभ चौघड़िया सुबह 9:10 से 10:45 बजे, लाभ चौघड़िया दोपहर 3:33 से शाम 5:08 बजे और अमृत चौघड़िया शाम 5:08 से 6:44 बजे तक रहने की जानकारी दी गई है।</p><p><h2>शिव-पार्वती की पूजा से जुड़ा है पर्व</p><p></h2></p><p>कजरी तीज को भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन महिलाएं माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख-शांति और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। अविवाहित कन्याएं भी अच्छे जीवनसाथी की इच्छा से यह व्रत कर सकती हैं।</p><p>भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें: <a href="https://www.bhaktitimes.in/rashifal/grah-budh-yam-triseptile-yog-2026-good-effect-on-zodiac-signs-horoscope-august-article-155979434" data-type="tilCustomLink" target="_blank"><strong>ट्रीसेपटाइल योग के शुभ प्रभाव से चमकेगा इन 3 राशियों का भाग्य</strong></a></p><p><h2>कैसे करें कजरी तीज की पूजा?</p><p></h2></p><p>कजरी तीज के दिन व्रती महिलाएं सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित की जाती है। उन्हें जल, अक्षत, रोली, चंदन, फूल, फल और मिठाई अर्पित की जाती है। इसके बाद शिव-पार्वती की पूजा, व्रत कथा और आरती की जाती है। कई क्षेत्रों में कजरी तीज की पूजा से जुड़ी स्थानीय परंपराएं भी देखने को मिलती हैं। इसलिए अपने परिवार और क्षेत्र में प्रचलित विधि का पालन करना भी महत्वपूर्ण माना जाता है।</p><p><h2>क्यों खास है कजरी तीज?</p><p></h2></p><p>कजरी तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना का त्योहार भी है। उत्तर भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार में इसकी विशेष मान्यता है। तो इस साल कैलेंडर में 31 अगस्त की तारीख जरूर नोट कर लें। 30 अगस्त को तृतीया तिथि शुरू होने के बावजूद उदया तिथि के कारण कजरी तीज का व्रत 31 अगस्त, सोमवार को ही रखा जाएगा।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">156002047</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 18:21:14 +0530</pubDate><title><![CDATA[ दीपक की लौ का अचानक बढ़ना क्यों माना जाता है शुभ? जानें धार्मिक मान्यता ]]></title><description><![CDATA[ spiritual signs: पूजा में दीपक का खास महत्व होता है। पूजा के दौरान अचानक दीपक की लौ तेज हो जाए तो इसके पीछे क्या धार्मिक मान्यता है उसे यहां डिटेल में समझाया गया है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/positive-signs-during-puja-diya-flame-spiritual-meaning-article-156002047 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-156002044,thumbsize-151560,width-1280,height-720,resizemode-75/156002044.jpg" alt="positive signs during puja diya flame spiritual meaning" /></div><p><strong>spiritual signs:</strong> दीपक की रोशनी सकारात्मकता, ज्ञान और शुभता का प्रतीक होती है। पूजा-पाठ के दौरान दीपक जलाने की परंपरा हिंदू धर्म में बेहद प्राचीन है। भक्त पूजा या आरती में दीपक जलाकर भगवान के सामने अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं। कुछ खास बाते हैं जिनमें से एक है- पूजा के समय दीपक की लौ का अचानक से तेज हो जाना। इस बात को लेकर कई तरह की धार्मिक मान्यताएं लोगों के बीच प्रचलित हैं। कई बार पूजा करते समय आपके ऐसा देखा होगा कि दीपक की लौ अचानक तेज हो गई है। आखिर इसका क्या मतलब हो सकता है आइए जानते हैं।</p><p><h2>तेज लौ को माना जाता है शुभ संकेत</h2></p><p>धार्मिक मान्यताओं में दीपक की तेज और स्थिर लौ को शुभ संकेत माना जाता है। पूजा के दौरान दीपक की लौ का अचानक तेज होना सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा संकेत माना जाता है। मान्यता है कि पूजा करते समय दीपक की लौ सामान्य से ज्यादा तेज और चमकदार हो जाए, तो यह भगवान की कृपा या पूजा के स्वीकार होने का प्रतीक हो सकता है। हालांकि, ऐसी मान्यताएं अलग-अलग परंपराओं और परिवारों में अलग हो सकती हैं।</p><p><h2>मनोकामना पूरी होने से जोड़कर जाता है देखा</h2></p><p>धार्मिक मान्यताओं में दीपक की तेज लौ को मनोकामना से भी जोड़कर देखा जाता है। माना जाता है कि अगर व्यक्ति पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ पूजा कर रहा हो और उसी दौरान दीपक की लौ अचानक तेज हो जाए, तो यह उसकी प्रार्थना के सकारात्मक परिणाम की ओर इशारा है।</p><p><h2>दीपक जलाते समय किन बातों का रखें ध्यान</h2></p><p>पूजा के दौरान दीपक जलाते समय साफ-सुथरे दीपक का इस्तेमाल करना चाहिए। दीपक को ऐसी जगह रखें जहां वह आसानी से न गिरे। दीपक के आसपास ज्वलनशील सामान न रखें। पूजा के दौरान भगवान का स्मरण, मंत्र जाप और प्रार्थना करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। पूजा का सबसे बड़ा आधार श्रद्धा और भावना को माना जाता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">155999998</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 13:03:42 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन पर श्रवण पूजन क्यों करते हैं? जानें भाई-बहन के त्योहार इस त्योहार पर खास पूजा का महत्व ]]></title><description><![CDATA[ Raksha Bandhan 2026: रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का त्योहार नहीं, बल्कि पारिवारिक संस्कारों और जिम्मेदारियों की याद दिलाने वाला पर्व भी है। इस दिन श्रवण पूजन भी किया जाता है? आइए जानते हैं इस दिन की पूजा का महत्व... ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/raksha-bandhan-2026-shravan-pujan-importance-in-raksha-bandhan-article-155999998 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-155999996,thumbsize-1463496,width-1280,height-720,resizemode-75/155999996.jpg" alt="raksha bandhan 2026 shravan pujan importance in raksha bandhan" /></div><p><strong>Raksha Bandhan 2026:</strong> रक्षाबंधन केवल भाई की कलाई पर राखी बांधने और उपहार देने का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति में भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक भी माना जाता है। सावन पूर्णिमा के दिन मनाए जाने वाले इस त्योहार से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जिनके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं छिपी हुई हैं। इन्हीं परंपराओं में श्रवण पूजन (Shravan Pujan) भी एक है। आइए विस्तार से समझते हैं रक्षाबंधन के दिन श्रवण पूजन का महत्व...</p><p><h2>श्रवण पूजन का रक्षाबंधन से क्या संबंध है?</p><p></h2></p><p>धार्मिक मान्यताओं में श्रवण कुमार को माता-पिता की सेवा, समर्पण और आज्ञाकारिता का आदर्श माना गया है। उनके जीवन की कथा भारतीय जनमानस में मातृ-पितृ भक्ति के प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है। रक्षाबंधन पर श्रवण पूजन का भाव इसी सेवा, कर्तव्य और पारिवारिक प्रेम से जोड़ा जाता है। रक्षाबंधन जहां भाई-बहन के रिश्ते की मजबूती का पर्व है, वहीं श्रवण पूजन परिवार के प्रति जिम्मेदारी और बड़ों के सम्मान का संदेश देता है। इस तरह यह पर्व केवल रिश्तों को मनाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवार के संस्कारों को भी याद दिलाता है।</p><p><h2>श्रवण कुमार की कथा का संदेश</p><p></h2></p><p>पौराणिक और लोककथाओं में श्रवण कुमार का वर्णन एक ऐसे पुत्र के रूप में किया गया है, जिसने अपने नेत्रहीन माता-पिता की सेवा को जीवन का सबसे बड़ा धर्म माना। वे अपने माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के लिए उन्हें कांवर में बैठाकर यात्रा पर निकले थे। मान्यता है कि इसी यात्रा के दौरान राजा दशरथ के हाथों एक दुर्घटना हुई और श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई। उनकी अंतिम इच्छा और माता-पिता का दुख भारतीय धार्मिक परंपरा में करुणा, कर्तव्य और माता-पिता की सेवा का गहरा संदेश छोड़ता है।</p><p><h2>सोना पूजन विधि (Sona Pujan Vidhi)</p><p></h2></p><p>रक्षाबंधन पर कई स्थानों पर सोना पूजन की परंपरा निभाई जाती है। इसके लिए हल्दी, रोली, अक्षत, जल से भरा लोटा, राखी या कलावा, गेरू और मीठे जवे की आवश्यकता होती है। सबसे पहले घर की साफ दीवार पर गेरू से सोना का चित्र बनाया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से सोना का पूजन किया जाता है। पूजा के दौरान हल्दी, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं तथा जल चढ़ाया जाता है। इसके बाद सोना को राखी या कलावा अर्पित किया जाता है और मीठे जवे का भोग लगाया जाता है। मान्यता के अनुसार, सोना पूजन के बाद ही भाई की कलाई पर राखी बांधने की परंपरा निभाई जाती है।</p><p><h3>श्रवण पूजन कैसे किया जाता है?</p><p></h3></p><p>क्षेत्रीय परंपराओं के अनुसार श्रवण पूजन की विधि अलग-अलग हो सकती है। सामान्य रूप से पूजा स्थल की साफ-सफाई करके भगवान का स्मरण किया जाता है। इसके बाद श्रवण कुमार का ध्यान करते हुए दीपक, अक्षत, पुष्प और जल अर्पित किया जाता है। माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना भी इस परंपरा का महत्वपूर्ण भाव माना जाता है।</p><p><strong>नोट - हालांकि, श्रवण पूजन की कोई एक सर्वमान्य विधि सभी क्षेत्रों में प्रचलित नहीं है। इसलिए स्थानीय परंपरा और परिवार की मान्यता के अनुसार पूजा करना उचित माना जाता है।</strong></p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">155998913</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 12:43:10 +0530</pubDate><title><![CDATA[ रक्षाबंधन की पौराणिक कथा: जब माता लक्ष्मी ने राजा बली को बांधी थी राखी ]]></title><description><![CDATA[ रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के अटूट प्रेम की कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से राजा बली और माता लक्ष्मी की कथा विशेष महत्व रखती है, जो इस त्योहार की परंपरा को दर्शाती है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/raksha-bandhan-mythological-story-mata-lakshmi-and-raja-bali-article-155998913 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-155998912,thumbsize-637863,width-1280,height-720,resizemode-75/155998912.jpg" alt="raksha-bandhan-mythological-story-mata-lakshmi-and-raja-bali" /></div><p>रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के स्नेह और सुरक्षा के अटूट बंधन का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व को लेकर हमारे धर्म ग्रंथों और लोक परंपराओं में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन कथाओं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रसंग माता लक्ष्मी और राजा बली से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन इन कथाओं का श्रवण करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।</p><p>पौराणिक कथाओं के अनुसार, दैत्यराज राजा बली भगवान विष्णु के परम भक्त थे। एक बार जब देवराज इंद्र युद्ध में बली को पराजित करने में असमर्थ रहे, तो उन्होंने भगवान विष्णु से सहायता मांगी। भगवान विष्णु ने इंद्र और बली के बीच मध्यस्थता करते हुए समझौता कराया। इसके बाद, भगवान ने बली को पाताल लोक का राज्य सौंप दिया और उन्हें अमरता का वरदान दिया। इतना ही नहीं, बली के राज्य की सुरक्षा का वचन देते हुए भगवान विष्णु स्वयं पाताल लोक में रहने लगे।</p><p><h2>माता लक्ष्मी का पाताल लोक जाना और राखी का महत्व</h2>भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से माता लक्ष्मी अत्यंत चिंतित हो गईं। वे चाहती थीं कि भगवान विष्णु जल्द से जल्द वैकुंठ लौट आएं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए माता लक्ष्मी ने एक ब्राह्मणी का वेश धारण किया और राजा बली के पास पहुंचीं। उन्होंने बली से कहा कि उनके पति किसी आवश्यक कार्य से बाहर गए हैं और जब तक वे वापस नहीं आते, तब तक वे उनकी शरण में रहना चाहती हैं।</p><p>राजा बली ने ब्राह्मणी के अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह सम्मान दिया। श्रावण पूर्णिमा के पावन अवसर पर माता लक्ष्मी ने राजा बली की कलाई पर रक्षा-सूत्र यानी राखी बांधी और उनके सुख, समृद्धि व दीर्घायु की कामना की। बली ने माता लक्ष्मी को अपनी बहन के रूप में स्वीकार कर लिया और बदले में उन्हें उपहार मांगने का आग्रह किया।</p><p>तब माता लक्ष्मी ने अपना वास्तविक परिचय दिया और बताया कि वे भगवान विष्णु की पत्नी हैं। उन्होंने बली से कहा कि वे अपने पति को वापस वैकुंठ ले जाना चाहती हैं। माता लक्ष्मी की बात सुनकर राजा बली ने बिना किसी संकोच के भगवान विष्णु को वैकुंठ लौटने की अनुमति दे दी। इस प्रकार उन्होंने अपनी बहन को दिए वचन का पालन किया। मान्यता है कि इसी घटना के बाद से श्रावण पूर्णिमा के दिन भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा के प्रतीक के रूप में राखी बांधने की परंपरा शुरू हुई।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">155998855</guid><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 08:20:46 +0530</pubDate><title><![CDATA[ Raksha Bandhan 2026 Timings: 28 अगस्त को रक्षा बंधन कितने बजे से कितने बजे तक है, जानें सही मुहूर्त और भद्रा-राहुकाल का समय ]]></title><description><![CDATA[ Raksha Bandhan 2026 Timings: रक्षाबंधन का पर्व 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। जानें 28 अगस्त को भाई की कलाई पर राखी कब और कितने बजे तक बांध सकते हैं। नोट करें राखी बांधने का शुभ समय क्या है? ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/raksha-bandhan-2026-timings-rakhi-banding-time-muhurat-28-august-article-155998855 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-155998859,thumbsize-875359,width-1280,height-720,resizemode-75/155998859.jpg" alt="raksha bandhan 2026 timings rakhi banding time muhurat 28 august" /></div><p><strong>Raksha Bandhan 2026 Timings:</strong> रक्षाबंधन का पर्व इस साल शुक्रवार, 28 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। बहनों के लिए यह दिन भाई की कलाई पर प्रेम और रक्षा का सूत्र बांधने का है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि 28 अगस्त को राखी बांधने का शुभ समय कब से शुरू होगा और कितने बजे तक भाई को राखी बांधी जा सकती है।</p><p><h2>28 अगस्त को कब से शुरू होगा राखी बांधने का शुभ मुहूर्त?</p><p></h2></p><p>रक्षाबंधन (Rakhi Timing 2026) के दिन राखी बांधने के लिए सुबह का समय सबसे शुभ माना जा रहा है। दिल्ली और आसपास के समय के अनुसार 28 अगस्त को सुबह 5 बजकर 57 मिनट से लेकर 9 बजकर 48 मिनट तक राखी बांधी जा सकती है। इस दौरान बहनें पूजा की तैयारी करके भाई को तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांध सकती हैं। इस तरह बहनों के पास मुख्य मुहूर्त में राखी बांधने के लिए लगभग 3 घंटे 51 मिनट का समय रहेगा। जो परिवार रक्षाबंधन की रस्में शास्त्रीय मुहूर्त के अनुसार करना चाहते हैं, उनके लिए सुबह का यह समय विशेष महत्व रखता है।</p><p><h2>रक्षाबंधन 2026: 27 या 28 अगस्त, किस दिन मनाया जाएगा?</h2></p><p>इस बार पूर्णिमा तिथि 27 अगस्त की सुबह 9 बजकर 8 मिनट से प्रारंभ होगी और 28 अगस्त की सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। हालांकि 27 अगस्त को भद्रा का प्रभाव होने के कारण उस दिन राखी बांधने को उचित नहीं माना गया है। 28 अगस्त की सुबह सूर्योदय के समय पूर्णिमा तिथि बनी रहेगी और भद्रा का समय समाप्त हो चुका होगा। इसी वजह से उदया तिथि और भद्रा की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस वर्ष रक्षाबंधन का पर्व आज यानी 28 अगस्त को मनाया जाएगा।</p><p><h3>भाई को राखी बांधने का आखिरी समय क्या है?</p><p></h3></p><p>अगर आप मुख्य धार्मिक मुहूर्त के अनुसार राखी बांधना चाहते हैं तो 28 अगस्त को सुबह 9:48 बजे तक यह रस्म पूरी कर लेना बेहतर रहेगा। इसी समय के साथ पूर्णिमा तिथि भी समाप्त हो जाएगी। सुबह 6 बजे से लेकर 9:30 बजे के आसपास तक का समय उन परिवारों के लिए भी सुविधाजनक रहेगा, जो पूजा, आरती, तिलक और राखी बांधने की रस्म बिना किसी जल्दबाजी के करना चाहते हैं।</p><p><h3>अगर सुबह राखी नहीं बांध पाएं तो क्या करें?</p><p></h3></p><p>कई बार नौकरी, यात्रा या अलग-अलग शहरों में रहने के कारण भाई-बहन सुबह एक साथ नहीं मिल पाते। ऐसी स्थिति में चिंता करने की जरूरत नहीं है। पारिवारिक परिस्थितियों के अनुसार बाद में भी राखी बांधी जा सकती है। हालांकि यह ध्यान रखना चाहिए कि सुबह 9:48 बजे के बाद पूर्णिमा तिथि समाप्त हो जाएगी, इसलिए उस समय को मुख्य राखी मुहूर्त नहीं माना जाएगा। दोपहर 12:40 बजे से 4:15 बजे और शाम 6:29 बजे से रात 9:12 बजे तक के समय को स्थानीय चौघड़िया और सुविधा के आधार पर वैकल्पिक रूप से देखा जा सकता है।</p><p><h3>क्या राहुकाल में राखी बांधना चाहिए?</p><p></h3></p><p>28 अगस्त को राहुकाल लगभग सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:25 बजे तक रहने की जानकारी दी जा रही है। धार्मिक परंपराओं में राहुकाल के दौरान नए शुभ कार्य शुरू करने से सामान्यतः बचने की सलाह दी जाती है। इसलिए यदि सुबह का मुख्य मुहूर्त निकल जाए, तो राहुकाल की अवधि से बचते हुए उसके बाद राखी बांधना बेहतर विकल्प माना जा सकता है। फिर भी, यदि परिवार की परिस्थितियों के कारण समय में बदलाव करना पड़े तो भाई-बहन के स्नेह और परंपरा को ध्यान में रखते हुए रस्म पूरी की जा सकती है।</p><p><h3>क्या रक्षाबंधन पर सूतक लगेगा?</p><p></h3></p><p>28 अगस्त को आंशिक चंद्र ग्रहण भी होने वाला है। हालांकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। चूंकि ग्रहण के समय भारत में दिन रहेगा और यहां इसकी दृश्यता नहीं होगी, इसलिए भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसका सूतक प्रभाव यहां मान्य नहीं माना जाएगा। इस कारण रक्षाबंधन की पूजा और भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधने में ग्रहण के कारण कोई विशेष बाधा नहीं मानी जा रही है। बहनें निर्धारित शुभ समय में पूजा करके भाई को राखी बांध सकती हैं।</p><p>रक्षाबंधन सिर्फ शुभ मुहूर्त में राखी बांधने का पर्व नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में प्रेम, विश्वास और साथ का संकल्प दोहराने का अवसर भी है। इसलिए यदि किसी मजबूरी के कारण तय समय पर रस्म न हो पाए, तो परिवार की सुविधा और परंपरा के अनुसार त्योहार मनाया जा सकता है।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item><item><guid isPermaLink="false">155996078</guid><pubDate>Thu, 27 Aug 2026 17:22:07 +0530</pubDate><title><![CDATA[ रक्षाबंधन पर भाई की खुशहाली के लिए जरूर करें ये काम, मां लक्ष्मी की बरसेगी कृपा ]]></title><description><![CDATA[ रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भाई-बहन के रिश्ते में मिठास और घर में बरकत लाने के लिए ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार कुछ विशेष नियमों और उपायों का पालन करना शुभ माना जाता है। ]]></description><link><![CDATA[ https://www.bhaktitimes.in/festivals/raksha-bandhan-2024-rituals-and-astrological-tips-for-prosperity-article-155996078 ]]></link><content:encoded><![CDATA[ <div><img class="type:primaryImage" src="https://images.bhaktitimes.in/thumb/msid-155996077,thumbsize-621726,width-1280,height-720,resizemode-75/155996077.jpg" alt="raksha-bandhan-2024-rituals-and-astrological-tips-for-prosperity" /></div><p>रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनकी लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाए और कुछ सरल उपाय अपनाए जाएं, तो यह भाई के जीवन में सफलता के द्वार खोल सकता है और घर में सकारात्मकता का संचार करता है।</p><p>ज्योतिष और वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, राखी बांधने की रस्म को सही विधि और शुभ मुहूर्त में संपन्न करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस दिन की जाने वाली छोटी-छोटी सावधानियां न केवल परंपराओं का सम्मान करती हैं, बल्कि घर में सालभर बरकत बनाए रखने में भी सहायक मानी जाती हैं। आइए जानते हैं कि इस विशेष दिन पर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कौन से उपाय करने चाहिए।</p><p><h2>रक्षाबंधन पर शुभ उपाय और ध्यान रखने योग्य नियम</h2>मान्यता है कि राखी बांधने से ठीक पहले बहन को अपने भाई के हाथ में एक पानी वाला नारियल और एक सिक्का देना चाहिए। इसके बाद भाई को अपने दाहिने हाथ की मुट्ठी में थोड़े से अक्षत (साबुत चावल) या पीली सरसों और एक सिक्का रखकर उसे बंद कर लेना चाहिए। तिलक लगाने की प्रक्रिया में कुमकुम और केसर का उपयोग करना शुभ माना जाता है। राखी बांधते समय तीन गांठ लगाने की परंपरा का पालन करना चाहिए।</p><p>पूजा के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। सबसे पहले, राखी बांधते समय भाई और बहन दोनों को अपना सिर ढककर रखना चाहिए। भाई को रुमाल या टोपी का उपयोग करना चाहिए, जबकि बहनों को दुपट्टे से सिर ढकना चाहिए। इसके अलावा, राखी की थाली में घी का दीपक जलाना चाहिए, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p><p>वास्तु के अनुसार, राखी बंधवाते समय भाई का मुख दक्षिण दिशा की ओर नहीं होना चाहिए, क्योंकि इस दिशा को यमराज और पितरों का स्थान माना जाता है। साथ ही, पूजा के दौरान जमीन पर बैठने के बजाय लकड़ी के आसन या कपड़े का उपयोग करना चाहिए। तिलक के लिए हमेशा साबुत अक्षत का ही प्रयोग करें, क्योंकि खंडित या टूटे हुए चावल पूजा में वर्जित माने जाते हैं।</p><p>धार्मिक कार्यों में काले रंग का प्रयोग शुभ नहीं माना जाता है, इसलिए रक्षाबंधन के दिन भाई-बहन को काले रंग के वस्त्र पहनने से बचना चाहिए और काले रंग की राखी का उपयोग भी नहीं करना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि राखी हमेशा शुभ मुहूर्त में ही बांधी जानी चाहिए। पंचांग के अनुसार, भद्रा काल में राखी बांधना वर्जित माना गया है, इसलिए इस समय का विशेष ध्यान रखें। इन सरल नियमों का पालन करके आप इस त्योहार को अधिक मंगलमय और सुखद बना सकते हैं।</p> ]]></content:encoded><dc:creator><![CDATA[ Bhakti Times ]]></dc:creator></item></channel></rss>