आज के दौर में युवाओं के लिए अच्छी पढ़ाई, शानदार करियर, पैसा और बेहतर लाइफस्टाइल बड़ी प्राथमिकताएं मानी जाती हैं। लेकिन इसी दौर में एक ऐसी तस्वीर भी सामने आ रही है, जो कई लोगों को सोचने पर मजबूर करती है। कुछ युवा अच्छी-खासी पढ़ाई और सुविधाओं से भरी जिंदगी छोड़कर संन्यास की राह चुन रहे हैं। खास बात यह है कि इनमें संपन्न परिवारों और उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं की संख्या भी दिखाई देती है।
भक्ति टाइम्स के साथ बातचीत के दौरान जैन संत आचार्य लोकेश मुनि ने इसी बदलाव और युवाओं के संन्यास की ओर बढ़ने को लेकर खुलकर बातचीत की है। उन्होंने इसे केवल किसी एक व्यक्ति के जीवन का फैसला नहीं, बल्कि सोच में आए बदलाव से जोड़कर देखा।
पहले संन्यास के लिए परिवार को मनाना पड़ता था
आचार्य लोकेश मुनि ने बातचीत में अपने समय और आज के समय के बीच का अंतर बताया। उनके मुताबिक पहले अगर कोई युवा संन्यास लेना चाहता था तो परिवार की सहमति हासिल करना आसान नहीं होता था। कई बार माता-पिता अपने बच्चे को इस रास्ते पर जाने से रोकते थे और काफी समझाने-बुझाने के बाद ही अनुमति मिलती थी।
लेकिन अब स्थिति कुछ बदली हुई नजर आती है। कई परिवार अपने बच्चों के संन्यास लेने के फैसले को स्वीकार कर रहे हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में परिवार की इकलौती संतान भी दीक्षा लेने का निर्णय ले रही है।
बड़ी डिग्री और संपन्न परिवारों के युवा भी ले रहे दीक्षा
बातचीत में यह मुद्दा भी सामने आया कि आज संन्यास लेने वाले युवाओं में कई ऐसे हैं, जिन्होंने अच्छी शिक्षा हासिल की है और संपन्न परिवारों से आते हैं। आचार्य लोकेश मुनि के अनुसार, जैन समाज में हर साल बड़ी संख्या में युवा दीक्षा की ओर बढ़ रहे हैं। बातचीत में सालाना करीब 300 से 400 युवाओं के दीक्षा लेने का आंकड़ा बताया गया। इनमें अच्छी शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले युवा भी शामिल हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जब किसी युवा के सामने पढ़ाई, नौकरी, पैसा और सुविधाओं के विकल्प मौजूद हों, तब वह सांसारिक जीवन से अलग रास्ता क्यों चुनता है?
समाज के लिए अच्छा काम करने से मिलती है प्रेरणा
आचार्य लोकेश मुनि ने युवाओं के इस बदलाव को प्रेरणा से भी जोड़कर देखा। उनका कहना था कि जब युवा किसी व्यक्ति को समाज, देश या दुनिया के लिए अच्छा काम करते हुए देखते हैं तो वे भी उस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। यानी संन्यास का फैसला हमेशा सिर्फ दुनिया से दूरी बनाने की इच्छा से जुड़ा हो, ऐसा जरूरी नहीं है। कुछ लोगों के लिए यह समाज और मानवता के लिए काम करने का एक अलग तरीका भी हो सकता है।
पैसा और सुविधाओं से अलग भी जिंदगी का मकसद
आज की जिंदगी में सफलता को अक्सर अच्छी नौकरी, बड़ी सैलरी, अपना घर, गाड़ी और आरामदायक जीवन से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन हर व्यक्ति के लिए सफलता का मतलब एक जैसा नहीं होता। कुछ लोगों के लिए जीवन में मानसिक शांति, आध्यात्मिक संतुष्टि और दूसरों के लिए काम करना ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकता है। ऐसे में संन्यास उनके लिए जीवन को देखने का एक अलग नजरिया बन सकता है। आचार्य लोकेश मुनि ने भी बातचीत में अपने संन्यासी जीवन के अनुभव को इसी संदर्भ में बताया। उन्होंने कहा कि संन्यास लेने के बाद उनका परिवार छोटा नहीं बल्कि व्यापक हुआ है। पहले एक परिवार था, जबकि अब पूरा संसार ही परिवार जैसा लगता है।
संन्यास के बाद क्या मिलता है?
जब उनसे पूछा गया कि अगर उन्होंने संन्यास नहीं लिया होता तो शायद समस्याओं का दायरा छोटा होता, तो उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उनके चेहरे पर असंतोष के बजाय खुशहाली दिखाई देती है और यही उनके जीवन के बदलाव को समझने का एक तरीका है।
उनके मुताबिक दूसरों के लिए अच्छा काम करने से भीतर संतुष्टि मिलती है। समाज, राष्ट्र और दुनिया के लिए कुछ सकारात्मक कर पाने का भाव जीवन को सार्थक महसूस करा सकता है।
युवाओं के लिए संन्यास सिर्फ त्याग नहीं
युवाओं के संन्यास को केवल नौकरी, पैसा या परिवार छोड़ने के नजरिए से देखना इस पूरी तस्वीर का एक छोटा हिस्सा होगा। किसी व्यक्ति के लिए यह आध्यात्मिक खोज हो सकती है, किसी के लिए जीवन के उद्देश्य की तलाश और किसी के लिए समाज की सेवा का रास्ता।
इसलिए बड़ी डिग्री हासिल करने के बाद संन्यास लेने वाले युवाओं का फैसला यह भी दिखाता है कि आधुनिक जीवन में सफलता और संतुष्टि को लेकर सोच एक जैसी नहीं है। कुछ लोग भौतिक उपलब्धियों के साथ आगे बढ़ना चाहते हैं, जबकि कुछ लोग जीवन का अर्थ आध्यात्मिकता और सेवा में तलाशते हैं।
आचार्य लोकेश मुनि की बातों से एक बात साफ तौर पर सामने आती है कि संन्यास उनके लिए केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं, बल्कि व्यापक जिम्मेदारी और मानव कल्याण से जुड़ा जीवन भी है। यही सोच कुछ युवाओं को इस राह की ओर आकर्षित कर सकती है।
