सनातन धर्म में जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे आम बोलचाल में 'जितिया व्रत' कहा जाता है, का विशेष महत्व है। यह कठिन व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की उत्तम सेहत, लंबी आयु और सुखद भविष्य की कामना के लिए रखती हैं। उत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में इस पर्व को लेकर महिलाओं में गहरी आस्था देखी जाती है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाए जाने वाले इस व्रत में माताएं बिना अन्न और जल ग्रहण किए निर्जला उपवास रखती हैं।
वर्ष 2026 में जितिया व्रत की तिथियों का निर्धारण पंचांग के आधार पर किया गया है। व्रत के नियमों के अनुसार, सप्तमी तिथि का मान रहने पर ही अष्टमी तिथि में यह व्रत संपन्न किया जाता है। इस वर्ष आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि का आरंभ 3 अक्टूबर को होगा और यह अगले दिन सुबह 5 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इसी दिन महिलाएं संतान की मंगल कामना के लिए कठिन उपवास रखेंगी।
जितिया व्रत: नहाय-खाय और पारण का समय
जितिया व्रत की परंपरा तीन दिनों तक चलती है, जिसकी शुरुआत 'नहाय-खाय' से होती है। वर्ष 2026 में नहाय-खाय 2 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन षष्ठी तिथि का मान सुबह 10 बजकर 16 मिनट तक रहेगा, जिसके बाद सप्तमी तिथि का प्रवेश होगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नहाय-खाय के लिए दोपहर का समय अत्यंत शुभ माना गया है। विशेष रूप से अभिजीत मुहूर्त में नहाय-खाय करना उत्तम फलदायी माना जाता है। 2 अक्टूबर को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11 बजकर 52 मिनट से दोपहर 12 बजकर 35 मिनट तक रहेगा।व्रत का समापन यानी पारण अगले दिन यानी 4 अक्टूबर को किया जाएगा। शास्त्रानुसार, व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही करना उचित माना गया है। महिलाएं 4 अक्टूबर को सूर्योदय के पश्चात अपनी सुविधानुसार व्रत खोल सकती हैं।
