विश्वकर्मा जयंती का पावन पर्व इस वर्ष 17 सितंबर 2026, गुरुवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाएगा। हिंदू धर्म में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम वास्तुकार और इंजीनियर माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भाद्रपद मास में जब सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह जयंती मनाई जाती है। इस दिन विशेष रूप से अपनी कार्यशालाओं, दुकानों, फैक्ट्रियों और मशीनों की पूजा करने की परंपरा है।
इस दिन कई स्थानों पर लोग अपने औजारों का उपयोग नहीं करते हैं और उन्हें साफ करके पूजा के लिए रखते हैं। मान्यता है कि विधि-विधान से पूजा करने से कार्यक्षेत्र में उन्नति होती है और मशीनों की कार्यक्षमता बनी रहती है। पंडित राकेश झा के अनुसार, इस पूजा में कुछ विशेष सामग्रियों का होना अनिवार्य है, जिनके बिना अनुष्ठान अधूरा माना जाता है।
पूजा सामग्री और विधि
विश्वकर्मा पूजा के लिए आपको भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति या तस्वीर, अक्षत (चावल), कुमकुम, रोली, सुपारी, रक्षासूत्र, गुलाल, धूप, दीप, देसी घी, गंगाजल, मौसमी फल, मिठाई, दही, पंचामृत और पंचमेवा की आवश्यकता होगी। इसके अलावा, पूजा के लिए एक लकड़ी की चौकी, लाल या पीला साफ कपड़ा, ताजे फूल और फूलों की माला, जल से भरा कलश और दीपक के लिए बाती भी तैयार रखें।
पूजा की विधि के अनुसार, सबसे पहले सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर या कार्यस्थल के मंदिर को साफ कर लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित करें। प्रतिमा के चारों ओर गंगाजल छिड़कें। इसी प्रकार अपने औजारों और मशीनों को भी साफ करके पूजा स्थल के पास रखें।
पूजा के दौरान सतनाजा (सात प्रकार के अनाज) पर जल से भरा कलश स्थापित करें और उस पर रोली-अक्षत लगाएं। हाथ में अक्षत और फूल लेकर 'ओम पृथिव्यै नमः, ओम अनंतम नमः, ओम कूमयि नमः, ओम श्री सृष्टतनया सर्वसिद्धया विश्वकर्माया नमो नमः।' मंत्र का जाप करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा, कलश और अपने औजारों पर फूल अर्पित करें। अंत में शुद्ध देसी घी का दीपक जलाकर भगवान को फल, मिठाई और पंचमेवा का भोग लगाएं। यदि आप फैक्ट्री या ऑफिस में पूजा कर रहे हैं, तो अपने सहयोगियों के साथ मिलकर आरती करें और प्रसाद का वितरण करें।
