हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि भगवान गणेश को समर्पित मानी जाती है। इस दिन गणपति बप्पा की पूजा और व्रत करने का खास महत्व है। नवंबर 2026 में गणेश भक्तों को दो बार चतुर्थी व्रत रखने का मौका मिलेगा। पहला व्रत 13 नवंबर को लाभ चतुर्थी यानी विनायक चतुर्थी और दूसरा 27 नवंबर को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी के रूप में रखा जाएगा। आइए जानते हैं दोनों व्रतों की तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि।
नवंबर 2026 में चतुर्थी व्रत की तारीख
पंचांग के अनुसार, नवंबर में दो प्रमुख चतुर्थी व्रत पड़ेंगे।
- लाभ चतुर्थी (विनायक चतुर्थी): 13 नवंबर 2026, शुक्रवार
- गणाधिप संकष्टी चतुर्थी: 27 नवंबर 2026, शुक्रवार
विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष में आती है, जबकि संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है।
13 नवंबर को है लाभ चतुर्थी
नवंबर महीने की पहली चतुर्थी 13 नवंबर को मनाई जाएगी। इसे लाभ चतुर्थी और विनायक चतुर्थी भी कहते हैं। इस दिन गणेश जी की दोपहर में पूजा करने का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और गणपति की आराधना करने से घर में सुख-समृद्धि आती है और नए कामों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।
लाभ चतुर्थी 2026 का शुभ मुहूर्त
चतुर्थी तिथि शुरू: 12 नवंबर, शाम 6:09 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 13 नवंबर, रात 8:42 बजे
पूजा मुहूर्त: सुबह 11:01 बजे से दोपहर 1:10 बजे तक
लाभ चतुर्थी पर कैसे करें गणेश जी की पूजा?
इस दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और गणेश जी के सामने व्रत का संकल्प लें। उन्हें दूर्वा, पीले फूल, अक्षत और चंदन चढ़ाएं। इसके बाद मोदक या लड्डू का भोग लगाएं। गणेश मंत्रों का जाप करें, व्रत कथा सुनें और अंत में आरती करके अपनी मनोकामना कहें।
27 नवंबर को गणाधिप संकष्टी चतुर्थी
नवंबर की दूसरी चतुर्थी 27 नवंबर को पड़ेगी। इसे गणाधिप संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस दिन भगवान गणेश के गणाधिप स्वरूप की पूजा होती है। धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत रखने से जीवन के संकट दूर होते हैं और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
गणाधिप संकष्टी चतुर्थी 2026 का मुहूर्त
चतुर्थी तिथि शुरू: 27 नवंबर, सुबह 9:48 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त: 28 नवंबर, सुबह 6:39 बजे
चंद्रोदय: रात 8:18 बजे
संकष्टी चतुर्थी पर कैसे करें पूजा?
इस दिन सुबह गणेश जी की पूजा करके व्रत का संकल्प लें। दिनभर अपनी श्रद्धा के अनुसार व्रत रखें। शाम को गणेश जी को दूर्वा, फूल, धूप, दीप और मोदक अर्पित करें। व्रत कथा सुनें और आरती करें। रात में चंद्रमा निकलने पर उन्हें अर्घ्य दें। इसके बाद गणेश जी का स्मरण करके व्रत का पारण करें।
विनायक और संकष्टी चतुर्थी में क्या है अंतर?
विनायक चतुर्थी शुक्ल पक्ष में आती है और इस दिन दोपहर में गणेश जी की पूजा की जाती है। वहीं संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष में पड़ती है। इस दिन चंद्रमा के दर्शन और अर्घ्य देने के बाद व्रत खोला जाता है।
