हम अक्सर महसूस करते हैं कि कुछ लोगों से मिलकर मन खुश हो जाता है, जबकि कुछ लोगों के साथ समय बिताने के बाद थकान और बेचैनी महसूस होने लगती है। आध्यात्मिक दुनिया में इसे Aura यानी ऊर्जा से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन क्या हमारी सोच और आदतें हमारी Aura को प्रभावित कर सकती हैं? क्या ग्रेटिट्यूड यानी शुक्राना करने से जिंदगी को देखने का नजरिया बदल सकता है? भक्ति टाइम्स पर बातचीत के दौरान आशमीन मुंजाल ने Aura, पॉजिटिव एनर्जी, मैनिफेस्टेशन और ग्रेटिट्यूड से जुड़ी कई बातें साझा कीं।
क्या हमारी Aura का दूसरों पर भी पड़ता है असर?
आशमीन मुंजाल के मुताबिक, हमारी सोच, भावनाओं और व्यवहार का असर हमारे आसपास के लोगों पर भी पड़ सकता है। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक सकारात्मक सोच रखता है और दूसरों के प्रति आभार महसूस करता है, तो उसके व्यवहार में भी इसका असर दिखाई दे सकता है। इसके उलट, अगर कोई लगातार चिंता, गुस्से और तनाव में रहता है, तो उसकी बातों और व्यवहार में नकारात्मकता झलक सकती है। उन्होंने समझाया कि इसलिए खुद पर काम करना जरूरी है। हालांकि, Aura के जरिए किसी दूसरे व्यक्ति की ऊर्जा के सीधे असर पड़ने की बात को वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
मनचाही जिंदगी के लिए पॉजिटिव सोच क्यों जरूरी है?
आशमीन मुंजाल ने बातचीत में बताया कि अगर आप जिंदगी में अपने मनचाहे रिश्ते, नौकरी और सफलता की तरफ बढ़ना चाहते हैं, तो अपनी सोच पर ध्यान देना जरूरी है। हम कई बार उन चीजों के बारे में ज्यादा सोचते और बात करते हैं, जिन्हें अपनी जिंदगी में नहीं चाहते। उदाहरण के लिए, बच्चों से बार-बार यह कहना कि पढ़ाई नहीं करोगे तो फेल हो जाओगे, उन्हें डर के नजरिए से सोचने की आदत डाल सकता है। इसकी जगह उन्हें मेहनत करने और अच्छे परिणाम की उम्मीद रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
मुश्किल समय में भी कैसे बनाए रखें सकारात्मकता?
जिंदगी में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जब चिंता करना स्वाभाविक होता है। परिवार में किसी की तबीयत खराब हो या कोई अपना मुश्किल दौर से गुजर रहा हो, तो मन में बार-बार उसके ख्याल आना सामान्य है। ऐसे समय में खुद को जबरदस्ती सकारात्मक रखने के बजाय अपनी भावनाओं को समझना जरूरी है। आशमीन ने ग्रेटिट्यूड और विजुअलाइजेशन का तरीका बताया। इसमें व्यक्ति आंखें बंद करके अपने प्रियजन के स्वस्थ होने की कल्पना करता है और मन में उनके लिए शुभकामनाएं रखता है। यह अभ्यास मन को संभालने और उम्मीद बनाए रखने में मदद कर सकता है, लेकिन इसे इलाज का विकल्प नहीं समझना चाहिए।
शरीर के प्रति शुक्राना करना भी है जरूरी
आशमीन मुंजाल ने बताया कि हम अपने शरीर के अंगों से लगातार काम लेते हैं, लेकिन उनके प्रति आभार जताना भूल जाते हैं। सुबह उठकर अपनी आंखों, कानों, हाथों और पैरों के लिए शुक्राना करना एक अच्छी आदत बन सकती है। जब शरीर का कोई हिस्सा परेशान करता है, तब हमें उसकी अहमियत समझ आती है। इसलिए स्वस्थ रहने के दौरान भी अपने शरीर का ध्यान रखना और उसके प्रति आभार महसूस करना जरूरी है। इससे व्यक्ति अपने शरीर और सेहत के प्रति अधिक जागरूक हो सकता है।
ग्रेटिट्यूड से कैसे बदल सकता है जिंदगी देखने का नजरिया
ग्रेटिट्यूड का मतलब सिर्फ धन्यवाद कहना नहीं, बल्कि जिंदगी में मौजूद अच्छी चीजों को पहचानना भी है। आशमीन के अनुसार, जब हम हर समय कमियों पर ध्यान देने के बजाय अपने पास मौजूद चीजों की अहमियत समझते हैं, तो हमारा नजरिया बदल सकता है। हालांकि, सिर्फ शुक्राना करने से गंभीर बीमारियां ठीक हो जाती हैं या हर मनचाही चीज मिल जाती है, ऐसा साबित नहीं है। ग्रेटिट्यूड मानसिक सुकून के लिए मददगार अभ्यास हो सकता है, जबकि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में डॉक्टर की सलाह और उचित इलाज जरूरी है।
कार्मिक कनेक्शन और कॉर्ड कटिंग का क्या है मतलब
बातचीत के दौरान कार्मिक कनेक्शन और कॉर्ड कटिंग पर भी चर्चा हुई। आशमीन ने समझाया कि कुछ रिश्तों में व्यक्ति लंबे समय तक भावनात्मक रूप से उलझा रह सकता है। ऐसे में माफी मांगना, किसी को माफ करना या किसी के प्रति आभार जताना मन का बोझ हल्का करने में मदद कर सकता है। उन्होंने हो'ओपोनोपोनो अभ्यास का भी जिक्र किया, जिसमें 'आई एम सॉरी, प्लीज फॉरगिव मी, थैंक यू, आई लव यू' जैसे वाक्यों को दोहराया जाता है। इसे कुछ लोग भावनात्मक शांति के लिए अपनाते हैं। हालांकि, कार्मिक कनेक्शन और कॉर्ड कटिंग आध्यात्मिक मान्यताएं हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित प्रक्रियाएं नहीं।
दूसरों के लिए दुआ और अच्छी भावनाएं रखें
आशमीन मुंजाल के मुताबिक, दूसरों के लिए अच्छी भावनाएं रखना और उनके बेहतर स्वास्थ्य व खुशहाली की कामना करना भी जरूरी है। किसी अपने के मुश्किल समय में उसे सहारा देना, उसकी बात सुनना और उसके लिए दुआ करना रिश्तों को मजबूत बना सकता है।
