Ganesh Chaturthi Vrat Katha In Hindi: आज 14 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर देशभर में भगवान गणेश का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, जिसे गणेश चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, प्राचीन काल में आज की ही तिथि के दिन गणेश जी का जन्म हुआ था। मान्यता है कि आज के दिन व्रत रखने, गणेश जी की पूजा करने और उनकी मूर्ति को घर में स्थापित करने से महालाभ होता है। खासकर, अटके कार्य पूर्ण होते हैं और जीवन में मंगल ही मंगल होता है। यदि आप भी आज गणेश चतुर्थी के दिन गणपति बप्पा की पूजा करने वाले हैं या व्रत रख रहे हैं तो पूजन के दौरान उनके जन्म की कथा जरूर पढ़ें। मान्यता है कि इस कथा को पढ़ने के बाद ही पूजा सफल होती है। चलिए अब जानें गणेश चतुर्थी की कथा यानी कहानी के बारे में।
गणेश चतुर्थी की कथा
शरीर के उबटन से बने थे गणेश जी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रोजाना की तरह ही माता पार्वती एक दिन स्नान करने के लिए जा रही थीं। स्नान कक्ष में गलती से भी कोई न आ जाए, इसके लिए उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक बच्चे के शरीर का निर्माण किया। उबटन से बने इस बालक को माता पार्वती ने गणेश का नाम दिया और उसमें प्राण डाल दिए।
गणेश जी ने शिव जी को रोका
देवी पार्वती ने गणेश को अपना पुत्र माना और उन्हें स्नान कक्ष के बाहर पहरा देने के लिए खड़ा कर दिया। साथ ही उनसे कहा मेरी अनुमति के बिना किसी को भी अंदर न आने दें। कुछ समय के बाद भगवान शिव वहां आए और स्नान कक्ष के अंदर जाने लगे, लेकिन गणेश जी ने उन्हें वहीं रोक दिया और अंदर नहीं जाने दिया। शिव जी ने समझाया कि वो अंदर मौजूद देवी पार्वती के पति हैं, लेकिन गणेश जी मां द्वारा दिए गए अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे और शिव जी को अंदर नहीं जाने दिया।
माता पार्वती ने किया शिव जी से आग्रह
भगवान शिव को गणेश जी पर बहुत गुस्सा आया, जिसके बाद उन्होंने उनका सिर अलग कर दिया। कुछ देर बाद माता पार्वती स्नान कक्ष से बाहर आईं तो उन्होंने गणेश जी के सिर को शरीर से अलग देखा, जिससे उन्हें बहुत दुख हुआ। उन्होंने शिव जी को बताया कि उन्होंने ही इस बालक को अपने शरीर के उबटन से बनाया था और अपना पुत्र माना था। माता पार्वती को शिव जी पर बहुत गुस्सा आया और उन्होंने महादेव से अपने पुत्र को पुन: जीवित करने का आग्रह किया।
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गणों को मिला हाथी का सिर
शिव जी से माता पार्वती की पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। इसलिए उन्होंने अपने गणों को आदेश दिया कि वो किसी ऐसे जीव का सिर लेकर आएं, जिसका मुख उत्तर दिशा की ओर हो। गण इस दिशा में आगे चलने लगे तो उन्हें हाथी का सिर मिला। हाथी का सिर लेकर गण शिव जी के पास आए, जिसके बाद महादेव ने गणेश जी के सिर की जगह हाथी का सिर लगा दिया तथा गणेश जी को फिर से जीवन प्रदान किया। इस तरह गणेश जी को नया स्वरूप मिला।
शिव जी ने माना गणेश जी को अपना पुत्र
शिव जी ने भी गणेश जी को अपने पुत्र का दर्जा दिया। साथ ही उन्हें सभी गणों के अधिपति और परम पूज्य देव का वरदान दिया। इसी वजह से हर शुभ काम से पहले गणेश जी का स्मरण किया जाता है।
