Sharad Purnima 2026 Today (sharad purnima vrat katha in hindi, sharad purnima ki kahani likhi hui hindi mein): शरद पूर्णिमा का दिन मां लक्ष्मी, कृष्ण जी और चंद्र देव की उपासना के लिए खास होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा मनाई जाती है। इस बार 25 अक्टूबर की सुबह 11 बजकर 55 मिनट से लेकर 26 अक्टूबर की सुबह 9 बजकर 41 मिनट तक आश्विन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि रहेगी। ऐसे में आज 25 अक्टूबर 2026, रविवार को शरद पूर्णिमा मनाई जा रही है। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा के पावन दिन मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुई थीं और भगवान कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस दिन चंद्र देव भी अपनी 16 कलाओं से पूर्ण होते हैं और धरती पर अमृत की वर्षा करते हैं।
शरद पूर्णिमा के दिन पूजा-पाठ के अलावा व्रत रखने का भी विधान है। आज यहां पर आप शरद पूर्णिमा व्रत की पूजा के दौरान पढ़ी जाने वाली कथा के बारे में विस्तार से जानेंगे।
शरद पूर्णिमा व्रत की कथा
दोनों बेटियां रखती थीं पूर्णिमा का व्रत
प्राचीन काल में एक नगर में 1 साहूकार अपनी दो बेटियों के साथ रहता था। साहूकार की दोनों बेटियां पूर्णिमा का व्रत रखती थीं। छोटी बेटी का व्रत किसी न किसी कारण से हर बार बीच में टूट जाता था, जबकि बड़ी बेटी पूरे विधि-विधान और श्रद्धा भाव से पूर्णिमा के व्रत को पूर्ण करती थी।
दोनों बेटियों की हो गई शादी
कुछ समय बाद साहूकार ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया। शादी के कुछ समय बाद बड़ी बेटी को संतान सुख मिला। वो अपने पति के साथ बहुत खुश थी, लेकिन छोटी बेटी के जीवन में आएदिन परेशानियां आती रहती थीं। छोटी बेटी की संतान जन्म लेने के कुछ समय बाद ही मर जाती थी, जिससे वो अंदर से टूट चुकी थी।
पंडित जी ने कराया गलतियों का अहसास
एक दिन छोटी बेटी अपनी परेशानियों को लेकर महान ज्ञानी पंडित के पास पहुंची। पंडित ने उसे बताया कि ऐसा उसके साथ पूर्णिमा का व्रत पूर्ण न करने के कारण हो रहा है। पंडित जी की बात मानकर छोटी बेटी ने फिर से पूरे विधि-विधान से पूर्णिमा के व्रत रखने शुरू कर दिए। इसके कुछ समय बाद उसने एक पुत्र का जन्म दिया, लेकिन इस बार भी उसका बच्चा जन्म के कुछ समय बाद मर गया।
बड़ी बहन के व्रत का मिला फल
छोटी बेटी ने अपने मरे हुए बच्चे को एक आसन पर लिटाया और उसे कपड़े से ढक दिया। इसके कुछ समय बाद उसकी बड़ी बहन वहां आई और गलती से उसी आसन पर बैठने लगी। जैसे ही बड़ी बहन ने आसन को छुआ तो बच्चा रोने लगा। ये देख दोनों बहनें हैरान हो गईं। उसी समय एक पंडित वहां आया और उसने बताया कि तुम्हारी बहन पूर्णिमा का व्रत पूर्ण करती थी, जिसके प्रभाव से तुम्हारा बच्चा फिर से जीवित हुआ है। इसके बाद छोटी बहन को पूर्णिमा व्रत के महत्व का एहसास हुआ और उसने अपनी गलतियों के लिए माफी मांगी। मान्यता है कि पूर्णिमा के दिन जो भी भक्त ये कथा पढ़ता है, उसे अपनी तमाम परेशानियों से मुक्ति मिलती है और जीवन में विभिन्न खुशियों का आगमन होता है।
