पंचांग

ज्योतिष शास्त्र: जन्मपत्री के पंचम भाव से कैसे जानें संतान योग और उससे जुड़ी मान्यताएं

ज्योतिष शास्त्र में जन्मपत्री का पंचम भाव संतान सुख का कारक माना जाता है। ग्रहों की स्थिति के आधार पर पुत्र-पुत्री योग का आकलन कैसे किया जाता है और इसके लिए क्या उपाय बताए गए हैं, जानें विस्तार से।

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भारतीय ज्योतिष शास्त्र में जन्मपत्री को भविष्य का दर्पण माना गया है। विवाह के उपरांत संतान सुख की कामना हर दम्पति की होती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की जन्मपत्री का पांचवां भाव (पंचम भाव) संतान, वंश वृद्धि और पुत्र-पुत्री योग को दर्शाता है। विद्वानों का मानना है कि यदि पति और पत्नी दोनों की कुंडलियों का संयुक्त अध्ययन किया जाए, तो भावी संतान के बारे में संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।

ज्योतिष में विवाह से पूर्व कुंडली मिलान के दौरान नाड़ी दोष पर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि मान्यता है कि नाड़ी दोष होने पर संतान प्राप्ति में बाधाएं आ सकती हैं। हालांकि, संतान सुख के सटीक आकलन के लिए केवल पंचम भाव ही नहीं, बल्कि ग्रहों की महादशा, अंतर्दशा और गोचर (ग्रहों का वर्तमान भ्रमण) जैसे अन्य महत्वपूर्ण ज्योतिषीय बिंदुओं का भी सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक होता है।