शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व शक्ति की उपासना का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि के अंतिम दो दिन, यानी अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व है। इस वर्ष अष्टमी और नवमी की तिथियों को लेकर श्रद्धालुओं के मन में कुछ असमंजस की स्थिति बनी हुई है, जिसे स्पष्ट करना आवश्यक है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी तिथि को मां महागौरी की पूजा की जाती है, जबकि नवमी तिथि मां सिद्धिदात्री को समर्पित है। कई भक्त इन तिथियों पर कन्या पूजन भी करते हैं। तिथियों के चयन में पंचांग की गणना का विशेष ध्यान रखा जाता है, ताकि पूजा का फल शास्त्र सम्मत विधि से प्राप्त हो सके।
अष्टमी और नवमी पूजा की विधि और महत्व
अष्टमी और नवमी के दिन पूजा की प्रक्रिया में कुछ विशेष अनुष्ठान शामिल होते हैं। भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र के समक्ष दीपक जलाकर पूजा का संकल्प लिया जाता है। इस दौरान मां के मंत्रों का जाप करना अत्यंत शुभ माना जाता है।अष्टमी की पूजा में महागौरी की आराधना की जाती है, जो शांति और सुख की प्रतीक मानी जाती हैं। वहीं, नवमी तिथि पर सिद्धिदात्री की पूजा का विधान है, जिन्हें सभी सिद्धियों की दाता माना गया है। इन दिनों में घरों और मंदिरों में विशेष हवन और अनुष्ठान किए जाते हैं। कन्या पूजन के दौरान छोटी कन्याओं को मां का स्वरूप मानकर उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार भेंट किए जाते हैं।
पूजा के दौरान रखें इन बातों का ध्यान
नवरात्रि के समापन के समय सात्विकता का पालन करना बहुत जरूरी है। पूजा स्थल की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें और पूरी श्रद्धा के साथ मां की भक्ति में लीन रहें। यदि आप अष्टमी या नवमी का व्रत रख रहे हैं, तो सात्विक भोजन का ही सेवन करें। शास्त्रों के अनुसार, इन तिथियों पर तामसिक भोजन से परहेज करना चाहिए।भक्तों को सलाह दी जाती है कि वे अपने स्थानीय पंचांग या मंदिर के विद्वान पंडितों से तिथियों की पुष्टि कर लें, ताकि पूजा के समय को लेकर कोई भ्रम न रहे। सही समय पर की गई पूजा ही पूर्ण फलदायी मानी जाती है। नवरात्रि का यह पर्व हमें अनुशासन और भक्ति के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
