पितृपक्ष का समय अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का एक विशेष अवसर होता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026 से हो रही है। इन 16 दिनों की अवधि में लोग अपने दिवंगत परिजनों की पुण्यतिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कार्यों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि का वास बना रहता है।
धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ वास्तु शास्त्र में भी पितृपक्ष के दौरान दिशाओं का विशेष महत्व बताया गया है। कई परिवारों में पितृपक्ष के दौरान ब्राह्मणों को घर पर आमंत्रित कर उन्हें भोजन कराने और दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। वास्तु के जानकारों के अनुसार, पितरों से जुड़े इन कार्यों के लिए घर की दक्षिण-पश्चिम दिशा, जिसे नैऋत्य कोण भी कहा जाता है, सबसे उत्तम मानी गई है।
नैऋत्य कोण का महत्व और श्राद्ध की व्यवस्था
वास्तु शास्त्र में दक्षिण-पश्चिम दिशा को पितरों का स्थान माना गया है। यह दिशा पृथ्वी तत्व से जुड़ी है, जो स्थिरता और मजबूती का प्रतीक है। यही कारण है कि पूर्वजों के निमित्त किए जाने वाले कार्यों के लिए इस दिशा को प्राथमिकता दी जाती है। यदि आपके घर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में पर्याप्त स्थान उपलब्ध है, तो पितृपक्ष के दौरान ब्राह्मण भोज और दान-दक्षिणा की व्यवस्था इसी दिशा में करना शुभ माना जाता है। इस दौरान घर की स्वच्छता और सात्विक वातावरण का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
यदि किसी कारणवश घर में दक्षिण-पश्चिम दिशा में पर्याप्त जगह न हो, तो आप दक्षिण दिशा से लेकर पश्चिम दिशा के शुरुआती हिस्से तक के स्थान का उपयोग कर सकते हैं। वहीं, पितरों की तस्वीरों को लगाने के लिए भी दक्षिण-पश्चिम दिशा को ही उपयुक्त माना गया है। हालांकि, इस बात का विशेष ध्यान रखें कि पूर्वजों की तस्वीरों को कभी भी घर के पूजा घर या मंदिर में देवी-देवताओं के साथ न रखें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देव स्थान और पितृ स्थान को हमेशा अलग-अलग रखना चाहिए।
