Dronacharya Mela, Uttar Pradesh: देशभर में समय-समय पर विभिन्न मेलों का आयोजन होता है, जिनमें द्रोणाचार्य मेला भी प्रमुख है। द्रोणाचार्य मेला (Guru Dronacharya Mela Kahan Per Lagta Hai) हर साल उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले के दनकौर कस्बे में आयोजित किया जाता है। इस मेले की शुरुआत श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन से होती है, जबकि समापन कृष्ण जन्मोत्सव के ठीक 10 दिन बाद होता है। साल 2026 में द्रोणाचार्य मेला 4 सितंबर से 13 सितंबर तक चलेगा। हर साल द्रोणाचार्य मेले में श्रद्धालुओं की अच्छी-खासी भीड़ देखने को मिलती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि द्रोणाचार्य मेला क्यों लगता है? इसके पीछे का इतिहास क्या है और लोगों की इस मेले से इतनी गहरी आस्था क्यों जुड़ी हुई है? अगर आपके मन में भी द्रोणाचार्य मेले से जुड़े ऐसे ही सवाल हैं तो यहां पर आपको इन सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे।
द्रोणाचार्य मेला क्यों लगता है? (dronacharya mela kya hota hai)
द्रोणाचार्य मेला गुरु द्रोणाचार्य की याद में लगता है। गुरु द्रोणाचार्य का जन्म द्वापर युग में हुआ था। वो महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के गुरु थे। उन्होंने अपने शिष्यों को अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कला की शिक्षा दी थी। खासकर, अर्जुन को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बनने की शिक्षा दी थी। इसके अलावा अर्जुन ने दिव्यास्त्रों का ज्ञान भी गुरु द्रोणाचार्य से प्राप्त किया था।
दनकौर में ही क्यों लगता है द्रोणाचार्य मेला?
उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले के दनकौर कस्बे को गुरु द्रोणाचार्य की जन्मभूमि माना जाता है। इसी वजह से उनकी याद में हर साल यहां पर द्रोणाचार्य मेला लगता है। दनकौर में गुरु द्रोणाचार्य को समर्पित एक मंदिर है, जिसके परिसर में मेले का आयोजन होता है। कहा जाता है कि इस मंदिर में गुरु द्रोणाचार्य की जो मूर्ति स्थापित है, उसे एकलव्य ने खुद अपने हाथों से बनाया था। एकलव्य महाभारत के एक महान और प्रसिद्ध पात्र थे। एकलव्य मुख्यतौर पर अपनी गुरु-भक्ति और श्रेष्ठ धनुर्विद्या के लिए जाने जाते थे। माना जाता है कि द्वापर युग में यहां गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम था, जहां उन्होंने कौरवों और पांडवों को शिक्षा दी थी।
द्रोणाचार्य मेले में क्या होता है?
द्रोणाचार्य मेले (dronacharya mela mai kya hota hai in hindi) में कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों व प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। मेले की शुरुआत गुरु द्रोण की प्रतिमा की पूजा और भव्य झांकी निकालने के साथ होती है, जिसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला शुरू होता है। इन कार्यक्रमों में लोकगीत, महारानी किरन बाई नाटक, श्रीकृष्ण लीला नाटक और कवि सम्मेलन शामिल हैं। मेले में स्थानीय शिल्प, अलग-अलग तरह के भोजन और हस्तकला की प्रदर्शनी भी होती है। इसके अलावा हर उम्र के लोगों के लिए विभिन्न झूले लगाए जाते हैं।
