Ashtavakra Gita Hindi: भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के दसवें भाग में आज हम आपको श्लोक 60 से श्लोक 65 तक के अर्थों का सार बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में राजा जनक कह रहे हैं कि आत्मज्ञान का अर्थ संसार छोड़ना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए मोह, इच्छा, अहंकार और भय से मुक्त हो जाना है।
श्लोक 60- हंतात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जो व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर चुका है और धैर्यवान है, वह संसार में रहते हुए भी जीवन के भोगों और गतिविधियों को एक खेल की तरह देखता है। उसकी तुलना उन अज्ञानी लोगों से नहीं की जा सकती, जो संसार के मोह-माया के बोझ को ढोते रहते हैं।'
श्लोक 61- यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।
अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जिस परम अवस्था को प्राप्त करने की इच्छा इंद्र आदि सभी देवता भी करते हैं, उसी अवस्था में स्थित योगी को देखकर आश्चर्य होता है कि वह उसमें भी कोई विशेष हर्ष या उत्साह नहीं दिखाता।'
श्लोक 62- तज्ज्ञस्य पुण्यपापाभ्यां स्पर्शो ह्यन्तर्न जायते।
न ह्याकाशस्य धूमेन दृश्यमानोऽपि संगतिः।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'उस आत्मज्ञानी व्यक्ति के भीतर पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता। जैसे आकाश दिखाई देने वाले धुएं से वास्तव में जुड़ता नहीं है, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति कर्मों के बंधन से भीतर से प्रभावित नहीं होता।'
श्लोक 63- आत्मवेदं जगत्सर्वं ज्ञातं येन महात्मना।
यदृच्छया वर्तमानं तं निषेद्धुं क्षमेत कः।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जिस महात्मा ने इस पूरे संसार को अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जान लिया है, और जो जीवन में सहज रूप से जैसा घट रहा है वैसा ही स्वीकार करते हुए रहता है, उसे रोकने या बांधने की सामर्थ्य किसमें है?'
श्लोक 64- आब्रह्मस्तम्बपर्यन्ते भूतग्रामे चतुर्विधे।
विज्ञस्यैव हि सामर्थ्यमिच्छानिच्छाविवर्जने।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'ब्रह्मा से लेकर छोटे से छोटे जीव तक इस संसार में जितने भी चार प्रकार के जीव हैं, उनमें आत्मज्ञानी व्यक्ति ही ऐसा है जो इच्छा और अनिच्छा—दोनों से परे रहने की सामर्थ्य रखता है।'
श्लोक 65- आत्मानमद्वयं कश्चिज्जानति जगदीश्वरम्।
यद्वेति तत्स कुरुते न भयं तस्य कुत्रचित्।।
अर्थ- राजा जनक कहते हैं, 'जो कोई व्यक्ति अपने अद्वैत आत्मस्वरूप को ही जगत के ईश्वर के रूप में जान लेता है, वह जैसा अपने वास्तविक स्वरूप को जानता है, उसी ज्ञान के अनुसार जीवन जीता है। फिर उसे किसी भी बात का भय नहीं रहता।'
इन 6 श्लोकों का सार
इन श्लोकों में राजा जनक एक आत्मज्ञानी व्यक्ति की अवस्था को बहुत सुंदर तरीके से समझाते हैं। राजा जनक कहते हैं- वह संसार में रहता है, लेकिन संसार का गुलाम नहीं होता। सुख-सुविधाओं को जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं मानता। बड़ी उपलब्धि मिलने पर भी अहंकार नहीं करता। पुण्य-पाप और कर्मों से अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को अलग जानता है। परिस्थितियों को सहजता से स्वीकार करता है। इच्छा और अनिच्छा के द्वंद्व से ऊपर उठता है। और अंततः अद्वैत आत्मज्ञान के कारण भय से मुक्त हो जाता है।
