सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन भाद्रपद माह की अमावस्या को 'कुशाग्रहणी अमावस्या' के रूप में जाना जाता है। इसे कुशोत्पाटिनी और पिठौरी अमावस्या के नाम से भी पुकारा जाता है। यह तिथि पितृपक्ष के आगमन से ठीक पहले आती है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन साल भर के लिए आवश्यक 'कुशा' (एक प्रकार की पवित्र घास) को विधि-विधान के साथ एकत्र करने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन, तर्पण और श्राद्ध जैसे कार्यों में कुशा का उपयोग अनिवार्य माना गया है। माना जाता है कि कुशा के बिना किए गए धार्मिक अनुष्ठान अधूरे रह सकते हैं। इस वर्ष कुशाग्रहणी अमावस्या 10 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन एकत्र की गई कुशा का उपयोग पूरे वर्ष पितृपक्ष, गणपति महोत्सव, संकल्प और ग्रह शांति जैसे विभिन्न अनुष्ठानों में किया जाता है।
कुशा एकत्र करने के नियम और परंपरा
शास्त्रों के अनुसार, कुशा को किसी भी दिन नहीं उखाड़ा जाता है, बल्कि इसके लिए साल में केवल एक ही दिन निर्धारित है। कुशा को उखाड़ने के लिए सूर्योदय का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। सूर्यास्त के बाद कुशा नहीं उखाड़नी चाहिए। परंपरा के अनुसार, कुशा को किसी औजार या कैंची से काटने के बजाय हाथों से सावधानीपूर्वक उखाड़ा जाता है, ताकि इसका अग्रभाग (ऊपरी हिस्सा) सुरक्षित रहे।कुशा उखाड़ते समय मंत्रोच्चार की भी परंपरा है। मान्यता है कि 'विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज, नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव' मंत्र का जाप करते हुए इसे ग्रहण करना चाहिए। हालांकि, विभिन्न संप्रदायों और परंपराओं के अनुसार मंत्रों और विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है। कुशा को उखाड़ने के बाद इसे साफ-सुथरे स्थान पर सुरक्षित रख लिया जाता है ताकि साल भर की पूजा में इसका उपयोग किया जा सके।
