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कुशाग्रहणी अमावस्या 2026: साल भर की पूजा के लिए इस दिन एकत्र की जाती है कुशा, जानें महत्व और नियम

पितृपक्ष से पहले आने वाली कुशाग्रहणी अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन साल भर के धार्मिक कार्यों के लिए कुशा एकत्र की जाती है। जानें कुशा उखाड़ने की विधि और इससे जुड़ी परंपराएं।

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सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है, लेकिन भाद्रपद माह की अमावस्या को 'कुशाग्रहणी अमावस्या' के रूप में जाना जाता है। इसे कुशोत्पाटिनी और पिठौरी अमावस्या के नाम से भी पुकारा जाता है। यह तिथि पितृपक्ष के आगमन से ठीक पहले आती है, इसलिए इसका धार्मिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस दिन साल भर के लिए आवश्यक 'कुशा' (एक प्रकार की पवित्र घास) को विधि-विधान के साथ एकत्र करने की परंपरा है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन, तर्पण और श्राद्ध जैसे कार्यों में कुशा का उपयोग अनिवार्य माना गया है। माना जाता है कि कुशा के बिना किए गए धार्मिक अनुष्ठान अधूरे रह सकते हैं। इस वर्ष कुशाग्रहणी अमावस्या 10 सितंबर, गुरुवार को मनाई जाएगी। इस दिन एकत्र की गई कुशा का उपयोग पूरे वर्ष पितृपक्ष, गणपति महोत्सव, संकल्प और ग्रह शांति जैसे विभिन्न अनुष्ठानों में किया जाता है।