Ashtavakra Gita Hindi: भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र ऋषि राजा जनक को समझा रहे हैं कि असली मुक्ति बाहर की चीजों से नहीं, बल्कि अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने से मिलती है।
एको द्रष्टाऽसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बंधो द्रष्टारं पश्यसीतरम्।। 7।।
अर्थ- अष्टावक्र कहते हैं- 'तुम इस पूरे संसार को देखने वाले साक्षी हो। वास्तव में तुम हमेशा से ही मुक्ति के बहुत करीब हो। तुम्हारा सबसे बड़ा बंधन यह है कि तुम अपने अलावा किसी दूसरे को देखने वाला मान रहे हो।
अहं कतेत्यहंमानमहाकृष्णहि दंशितः।
नाहं कर्त्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव।। 8।।
अर्थ- तुम्हें मैं ही सब कुछ करता हूं वाले अहंकार ने पकड़ रखा है। इसके बजाय यह समझो कि मैं वास्तव में कर्ता नहीं हूं। इस ज्ञान को समझकर सुखी हो जाओ।
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव।। 9।।
अर्थ- दृढ़ता से यह समझो कि मैं शुद्ध चेतना हूं। इस ज्ञान की अग्नि से अपने अज्ञान को जला दो और फिर दुख से मुक्त होकर सुखी हो जाओ।
अष्टावक्र कहते हैं- तुम्हारे शरीर को तुम देख सकते हो। तुम अपने विचारों को भी देख सकते हो। तुम अपने दुख को भी महसूस करके जान सकते हो। तो फिर जो इन सबको जान रहा है, वह कौन है? अष्टावक्र उसी को शुद्ध बोध या चेतना कहते हैं।
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनंदपरमानंदः स बोधस्त्वं सुखं चर।। 10।।
अर्थ- जिस चेतना में यह पूरा संसार दिखाई देता है, वह कुछ-कुछ वैसा है जैसे अंधेरे में रस्सी को सांप समझ लेना। जब सही ज्ञान होता है तो भ्रम दूर हो जाता है। वह ज्ञान ही आनंद का स्वरूप है और वही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है।
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किंवदंतीह सत्येयं या मतिः स गतिर्भवेत।। 11।।
अर्थ- जो व्यक्ति अपने आपको मुक्त मानता है, वह मुक्त हो जाता है। जो खुद को बंधा हुआ मानता है, वह बंधन में रहता है। क्योंकि जैसी हमारी धारणा होती है, वैसी ही हमारी दिशा बनती है।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिद् क्रियः।
असंगो निस्पृहः शांतो भ्रमात संसारवानिव।। 12।।
आत्मा साक्षी है, पूर्ण है, स्वतंत्र है, चेतन है और कर्मों से परे है। वह किसी चीज से चिपकी नहीं है, उसे किसी चीज की लालसा नहीं है और उसका स्वभाव शांत है। लेकिन भ्रम के कारण ऐसा लगता है कि वह संसार में बंधी हुई है।
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथांतरम्।। 13।।
अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को पहचानो। वह स्थिर, शुद्ध चेतना और अद्वैत है। मैं केवल यह दिखाई देने वाला शरीर या व्यक्तित्व हूं इस भ्रम को छोड़कर अपने भीतर और बाहर दिखाई देने वाले भेद से ऊपर उठो।
अष्टावक्र की सीख
'तुम अपने शरीर, मन, विचार और परिस्थितियां नहीं हो। तुम वह हो जो इन सबको देख रहा है। जब तुम खुद को इन्हीं चीजों से जोड़ लेते हो तो बंधन महसूस होता है। जब अपने साक्षी स्वरूप को पहचानते हो तो मुक्ति का अनुभव होता है।'
