Ashtavakra Gita Hindi: भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता की अपनी इस सीरीज के 11वें भाग में आज हम आपको श्लोक 66 से श्लोक 73 तक के अर्थों का सार बता रहे हैं। अष्टावक्र गीता के इन श्लोकों में अष्टावक्र और राजा जनक के बीच आत्मज्ञान, संसार की वास्तविकता और त्याग की गहरी बात कही गई है।
न ते संगोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
संघातविलयं कुवर्र्न्नेमेव लयं व्रज।। 66।।
अष्टावक्र कहते हैं, 'इंसान दुखी इसलिए होता है क्योंकि वह शरीर, रिश्तों, विचारों और इच्छाओं को अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है। आत्मज्ञान होने पर समझ आता है कि आत्मा इन सबसे अलग और शुद्ध है।'
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुदबुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज।। 67।।
अष्टावक्र कहते हैं, 'जैसे समुद्र से बुलबुला उठता है और वापस समुद्र में मिल जाता है, वैसे ही संसार भी उसी परम चेतना से प्रकट होकर उसी में समाप्त होता है।'
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यकृमेवमेव लयं व्रज।। 68।।
अष्टावक्र कहते हैं, 'रस्सी वास्तव में रस्सी ही रहती है, लेकिन अज्ञान के कारण वह सांप दिखाई देती है। इसी तरह आत्मा के ऊपर संसार की अलग-अलग पहचान और भेद दिखाई देते हैं। ज्ञान होने पर भ्रम दूर हो जाता है।'
समदुःख सुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवित मृत्युः सन्नैवमेव लयं व्रज।। 69।।
अष्टावक्र कहते हैं, 'आत्मज्ञानी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार बहुत ज्यादा खुश या दुखी नहीं होता। वह समझता है कि सुख-दुख और जीवन-मृत्यु बदलने वाली अवस्थाएं हैं, जबकि आत्मा इन सबसे परे है।'
आकाशवदनंतोऽहं घटवत् प्राकृतं जगत्।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 70।।
राजा जनक कहते हैं, 'मैं आकाश की तरह अनंत हूं और यह संसार एक घड़े की तरह सीमित और प्रकृति से बना हुआ है। इस ज्ञान को समझ लेने के बाद न मुझे किसी चीज का त्याग करना है, न किसी चीज को पकड़कर रखना है और न ही किसी चीज में लीन होने की इच्छा है।'
महौदधिरिवाहं स प्रपंचो वीचिसन्निभिः।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 71।।
राजा जनक कहते हैं, 'मैं स्वयं विशाल समुद्र के समान हूं और यह पूरा संसार समुद्र की लहरों के समान है। लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं। यह ज्ञान होने के बाद मेरे लिए न त्याग है, न ग्रहण और न ही किसी चीज में विलय की आवश्यकता।'
अहं स शुक्तिसंकाशो रूप्पवद्विश्वकल्पना।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 72।।
राजा जनक कहते हैं, 'मैं उस सीप के समान हूं जिसमें चांदी दिखाई देने का भ्रम पैदा हो सकता है। उसी तरह इस संसार के अलग-अलग रूप भी एक कल्पना या भ्रम की तरह हैं। इस सत्य को जान लेने के बाद मुझे कुछ छोड़ने या कुछ पाने की आवश्यकता नहीं है।'
अहं वा सर्वभूतेषु सर्वभूतान्ययो मयि।
इति ज्ञानं तथैतस्य न त्यागो न ग्रहो लयः।। 73।।
राजा जनक कहते हैं, 'मैं सभी प्राणियों में मौजूद हूं और सभी प्राणी मेरे ही भीतर मौजूद हैं। जब यह ज्ञान हो जाता है, तब किसी चीज को छोड़ने या पाने का सवाल ही नहीं रहता।'
