Buddha Teachings: मन की असली शांति कहां से आती है? बौद्ध धर्म के प्रमुख ग्रंथ धम्मपद में भगवान बुद्ध ने इस सवाल का जवाब अपने उपदेशों के जरिए दिया है। धम्मपद के जिन श्लोकों के बारे में हम आज जानेंगे वह बताते हैं कि ज्ञान से ज्यादा जरूरी सही आचरण और मन की शुद्धता है।
इध सोचति पेच्च सोचति पापकारी उभयत्थ सोचति।
सो सोचति सो विहञ्ञति दिस्वा कम्मकिलिट्ठमत्तनो।।
हिंदी अनुवाद- बुरा कर्म करने वाला व्यक्ति इस जीवन में भी पछताता है और आगे भी पछताता है। वह दोनों जगह दुखी होता है। अपने बुरे कर्मों को देखकर वह शोक करता है और मानसिक परेशानी झेलता है।
इध मोदति पेच्च मोदति कतपुञ्ञो उभयत्थ मोदति।
सो मोदति सो पमोदति दिस्वा कम्मविसुद्धिमत्तनो।।
हिंदी अनुवाद- पुण्य कर्म करने वाला व्यक्ति इस जीवन में भी खुश रहता है और आगे भी खुश रहता है। वह दोनों जगह आनंदित होता है। अपने अच्छे और पवित्र कर्मों को देखकर उसका मन प्रसन्न होता है।
इध तप्पति पेच्च तप्पति पापकारी उभयत्थ तप्पति।
पापं मे कतन्ति तप्पति भीय्यो तप्पति दुग्गतिङ्गतो।।
हिंदी अनुवाद- बुरा कर्म करने वाला व्यक्ति इस जीवन में भी दुखी होता है और आगे भी दुखी होता है। वह सोचता है कि मैंने बुरा काम किया है, इसलिए पछताता है। दुर्गति में जाने पर उसका दुख और बढ़ जाता है।
बहुम्पि चे सहितं भासमानो न तक्करो होति नरो पमत्तो।
गोपो व गावो गणयं परेसं न भागवा सामञ्ञस्स होति।।16।।
हिंदी अनुवाद- कोई व्यक्ति धर्म की बहुत-सी बातें बोलता हो, लेकिन अगर वह लापरवाही के कारण उनके अनुसार आचरण नहीं करता, तो वह धर्म के वास्तविक लाभ से वंचित रहता है। वह उस ग्वाले की तरह है, जो दूसरों की गायें गिनता है, लेकिन उनके दूध का लाभ उसे नहीं मिलता।
अप्पम्पि चे सहितं भासमानो धम्मस्स होति अनुधम्मचारी।
रागञ्च दोसञ्च पहाय मोहं सम्मप्पजानो सुविमुत्तचित्तो।
अनुपादियानो इध वा हुरं वा स भागवा सामञ्ञस्स होति।।17।।
हिंदी अनुवाद- कोई व्यक्ति धर्म की थोड़ी-सी बातें ही क्यों न बोलता हो, लेकिन अगर वह उसके अनुसार आचरण करता है, तो वह धर्म के मार्ग पर चलता है। राग, द्वेष और मोह को छोड़कर, सही समझ विकसित करके और मन को आसक्ति से मुक्त करके वह धर्म के वास्तविक फल का अधिकारी बनता है।
