Janmashtami 2026: भगवान ने जन्म लेते ही कंस की जेल की बेड़ियों को तोड़ दिया और गोकुल पहुंचे, इसके बाद नंदलाल के जन्मोत्सव की तैयारियां देशभर में शुरू हो चुकी हैं। इस साल 4 सितंबर 2026 को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाई जाएगी। मथुरा-वृंदावन और पूरे ब्रज में कान्हा के जन्म की खुशी अलग ही रंग में दिखाई देती है। कहीं माखन-मिश्री का भोग सजता है, तो कहीं बाल गोपाल को तरह-तरह की मिठाइयां अर्पित की जाती हैं। लेकिन ब्रजभूमि में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां भगवान श्रीकृष्ण को मिट्टी के पेड़ों का भोग लगाया जाता है।
यह अनोखी परंपरा मथुरा के महावन स्थित ब्रह्मांड घाट (Brahmand Vihari Temple) से जुड़ी है। मान्यता है कि इसी स्थान पर बाल कृष्ण ने मिट्टी खाई थी और माता यशोदा को उनके मुख में पूरे ब्रह्मांड के दर्शन हुए थे। इसी अद्भुत लीला की स्मृति में यहां आज भी कान्हा को मिट्टी से बने पेड़ों का भोग लगाने की परंपरा चली आ रही है।
जहां ब्रह्मांड के हुए दर्शन
ब्रज की गलियों में कृष्ण की बाल लीलाओं की अनगिनत कथाएं आज भी जीवंत हैं। उन्हीं में से एक सबसे अद्भुत प्रसंग ब्रह्मांड घाट से जुड़ा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, बाल कृष्ण एक दिन गोप-बालकों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते उन्होंने मिट्टी खा ली। जब यह बात माता यशोदा को पता चली तो उन्होंने बलराम से पूछा। बलराम ने भी कन्हैया के मिट्टी खाने की बात कह दी। इसके बाद मैया ने कृष्ण से अपना मुंह खोलने को कहा।
कन्हैया ने जैसे ही मुंह खोला, यशोदा मैया के सामने ऐसा दृश्य आया जिसे देखकर वह स्तब्ध रह गईं। मान्यता है कि उन्हें कृष्ण के मुख के भीतर अनगिनत ब्रह्मांड, सूर्य-चंद्रमा और ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित संपूर्ण सृष्टि के दर्शन हुए। कुछ क्षणों के लिए मैया को समझ ही नहीं आया कि वह क्या देख रही हैं। उन्होंने आंखें बंद कर लीं। लेकिन जब दोबारा आंखें खोलीं तो वही नन्हे कन्हैया उनकी गोद में बैठे थे।
ब्रह्मांड घाट नाम
कृष्ण की इसी अद्भुत लीला से इस स्थान का संबंध माना जाता है। कहा जाता है कि यशोदा मैया घर लौटने के बाद ब्राह्मणों को बुलाकर स्वस्ति वाचन कराया और गोदान सहित दान-दक्षिणा दी। कालांतर में यह स्थान ब्रह्मांड घाट के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहीं स्थापित मंदिर को ब्रह्मांड विहारी मंदिर कहा जाता है। भगवान ने अपनी बाल लीला के दौरान माता यशोदा को अपने मुख में ब्रह्मांड के दर्शन कराए थे, इसलिए उनके इसी स्वरूप की स्मृति इस स्थान से जुड़ी मानी जाती है।
मिट्टी के पेड़े का भोग
ब्रज में कृष्ण के लिए माखन-मिश्री का भोग सबसे प्रसिद्ध है। लेकिन ब्रह्मांड घाट का यह मंदिर अपनी एक अलग परंपरा के कारण भक्तों को आकर्षित करता है। यहां भगवान श्रीकृष्ण को मिट्टी से तैयार किए गए पेड़े अर्पित किए जाते हैं। बताया जाता है कि यमुना की रेत-मिट्टी से तैयार इस विशेष प्रसाद को श्रद्धालु अपने घर भी लेकर जाते हैं। अपने रिश्तेदारों, मित्रों और स्वजनों में इसे बांटने की परंपरा भी बताई जाती है। इस प्रसाद के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि कृष्ण की उस बाल लीला की स्मृति जुड़ी है जिसमें उन्होंने मिट्टी खाई थी।
कान्हा की बाल लीला से जुड़ी है मान्यता
ब्रह्मांड घाट पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि कृष्ण की बाल लीलाओं का जीवंत स्मरण है। यहां आने वाले भक्त मंदिर में दर्शन करने के साथ उस स्थान को भी नमन करते हैं, जहां मान्यता के अनुसार कन्हैया ने गोप-बालकों के साथ खेलते हुए मिट्टी खाई थी। मंदिर से जुड़ी परंपरा में मिट्टी के पेड़े का प्रसाद इसी कथा को श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाता है। भक्त इसे भगवान की लीला का प्रतीक मानकर ग्रहण करते और अपनों के बीच वितरित करते हैं।
जन्माष्टमी पर खास रौनक
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा और ब्रज के मंदिरों में विशेष सजावट, पूजा-अर्चना और भोग की तैयारियां होती हैं। ऐसे में ब्रह्मांड बिहारी मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण बन जाता है। कृष्ण जन्मोत्सव मनाने मथुरा आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह स्थान इसलिए भी खास है क्योंकि यहां उन्हें कान्हा के उस बाल स्वरूप से जुड़ी परंपरा देखने को मिलती है, जिसमें भगवान ने अपनी मां को खेल-खेल में पूरे ब्रह्मांड का दर्शन करा दिया था।
