Krishna Bhakti: जन्माष्टमी के पावन मौके पर भक्त भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं। कोई व्रत रखता है, कोई पूजा की तैयारी करता है तो कोई लड्डू गोपाल को नए कपड़े पहनाकर उनका श्रृंगार करता है। इस पूरे उत्सव के बीच एक सवाल मन में जरूर आता है- क्या कृष्ण की पूजा करना ही भक्ति है या फिर उनसे प्रेम करना उससे भी आगे की बात है?
हम अक्सर भगवान की पूजा एक उम्मीद के साथ करते हैं। मन में कोई इच्छा होती है तो हम प्रार्थना करते हैं कि भगवान उसे पूरा कर दें। परीक्षा अच्छी हो जाए, नौकरी मिल जाए, घर में सुख-शांति बनी रहे या कोई परेशानी दूर हो जाए। लेकिन कृष्ण भक्ति का भाव शायद इससे कहीं ज्यादा गहरा है। यहां बात सिर्फ भगवान से कुछ मांगने की नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन का हिस्सा मानने की है।
कृष्ण की सबसे खास बात यही है कि वे सिर्फ पूजे जाने वाले भगवान नहीं हैं। वे किसी के बेटे हैं, किसी के सखा हैं, किसी के प्रिय हैं और किसी के लिए नटखट कान्हा। यशोदा मैया ने उन्हें सिर्फ भगवान मानकर नहीं देखा था। उन्होंने कान्हा को दुलार दिया, डांटा, उनके पीछे भागीं और उनकी शरारतों पर कभी हंसीं तो कभी नाराज भी हुईं। यही कृष्ण के साथ रिश्ते की खूबसूरती है।
जब हम कृष्ण को सिर्फ एक भगवान मानकर दूर से हाथ जोड़ते हैं, तब हमारे और उनके बीच एक दूरी बनी रहती है। लेकिन जब हम उन्हें अपना मानने लगते हैं, तब भक्ति का रंग बदल जाता है। फिर पूजा केवल पूजा की थाली, दीपक और अगरबत्ती तक सीमित नहीं रहती। रोजमर्रा की जिंदगी में भी कृष्ण याद आने लगते हैं।
कई आध्यात्मिक शिक्षक भी भक्ति में इसी भाव को महत्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना है कि भगवान के साथ रिश्ता किसी लेन-देन जैसा नहीं होना चाहिए। यानी मैंने इतना व्रत रखा, इतनी पूजा की, इसलिए भगवान मुझे यह दे दें। सच्ची भक्ति में धीरे-धीरे यह हिसाब खत्म होने लगता है। वहां इंसान भगवान से सिर्फ मांगता नहीं, बल्कि उन पर भरोसा करना भी सीखता है।
कृष्ण से प्रेम करने का मतलब यह नहीं कि आप पूजा-पाठ छोड़ दें। पूजा भी भक्ति का ही एक सुंदर रास्ता है। फर्क सिर्फ भावना का है। अगर पूजा करते समय मन में कृष्ण के लिए अपनापन है, उनके प्रति प्रेम है और यह एहसास है कि वे हमारे सुख-दुख में हमारे साथ हैं, तो वही पूजा धीरे-धीरे प्रेम भक्ति में बदलने लगती है।
जन्माष्टमी पर जब आप आधी रात को कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाएं, तो एक बार खुद से जरूर पूछिए- क्या मैं कृष्ण से सिर्फ अपनी इच्छाएं पूरी करवाने के लिए जुड़ा हूं या उन्हें सच में अपने जीवन का हिस्सा मानता हूं? जब कृष्ण से रिश्ता मांगने से ज्यादा प्रेम करने का हो जाता है, तब भक्ति सिर्फ एक रस्म नहीं रहती, बल्कि जीवन जीने का एक खूबसूरत तरीका बन जाती है।
