करवा चौथ का पावन पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को यह व्रत रखा जाता है। इस वर्ष करवा चौथ की सही तारीख को लेकर कई लोगों के मन में संशय बना हुआ है कि व्रत 28 अक्टूबर को रखा जाए या 29 अक्टूबर को। पंचांग की गणना के अनुसार, इस उलझन को दूर करना आवश्यक है ताकि व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
शास्त्रों के अनुसार, करवा चौथ का व्रत कार्तिक कृष्ण चतुर्थी तिथि पर आधारित होता है। पंचांग के अनुसार, इस वर्ष चतुर्थी तिथि का आरंभ 28 अक्टूबर की देर रात 1 बजकर 7 मिनट पर हो रहा है और इसका समापन 29 अक्टूबर की रात 10 बजकर 11 मिनट पर होगा। उदया तिथि (सूर्योदय के समय व्याप्त तिथि) के नियम को ध्यान में रखते हुए, 29 अक्टूबर को ही व्रत रखना शास्त्र सम्मत और उत्तम माना गया है।
करवा चौथ पर विशेष संयोग और पूजा का महत्व
इस वर्ष करवा चौथ पर कई शुभ योग बन रहे हैं, जो इसे और भी विशेष बनाते हैं। 29 अक्टूबर को शुक्र अपनी स्वराशि तुला में उदित होंगे और बुध के साथ युति बनाएंगे। ज्योतिषीय दृष्टि से इसे 'लक्ष्मी नारायण योग' कहा जाता है, जो वैवाहिक जीवन में सुख और समृद्धि लाने वाला माना गया है। इसके अलावा, इस दिन चंद्रमा अपनी उच्च राशि वृषभ में गोचर करेंगे। साथ ही, रात 11 बजकर 12 मिनट तक रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव रहेगा। चंद्रमा का वृषभ राशि में होना और रोहिणी नक्षत्र का साथ मिलना वैवाहिक जीवन में प्रेम और मधुरता बढ़ाने वाला एक अत्यंत सुंदर संयोग माना जाता है।
सरगी और व्रत पारण का समय
जिन परिवारों में सरगी (व्रत शुरू करने से पहले खाया जाने वाला भोजन) की परंपरा है, उन्हें सूर्योदय से लगभग एक घंटे पहले इसे ग्रहण कर लेना चाहिए। सामान्यतः सुबह 4 बजे से 5 बजे के बीच का समय सरगी के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसके बाद पूरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है और शाम को चंद्रमा के उदय होने के बाद ही व्रत का पारण (व्रत खोलना) किया जाता है। 29 अक्टूबर को चंद्रमा के दर्शन के साथ ही व्रती अपना उपवास पूर्ण कर सकेंगी।
