Masik Karthigai Vrat Ki Katha: मासिक कार्तिगाई तमिल हिंदू समुदाय के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला एक प्रमुख त्योहार है, जो हर महीने मनाया जाता है। जिस दिन आकाश में कृतिका नक्षत्र प्रबल होता है, उसी दिन मासिक कार्तिगाई का पर्व मनाया जाता है। इस दिन भगवान शिव और कार्तिकेय जी की पूजा की जाती है। साथ ही मंदिरों, घरों और गलियों में एक पंक्ति में तेल के दीपक जलाए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मासिक कार्तिगाई के दिन पूजा-पाठ करने, व्रत रखने और दीपदान करने से परेशानियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। साथ ही जीवन में ज्योति के समान प्रकाश फैलता है।
मासिक कार्तिगाई व्रत की पूजा के दौरान शिव जी के ज्योति स्वरूप से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी पढ़ी जाती है, जिसके बाद ही पूजा को पूर्ण माना जाता है। यदि आप भी मासिक कार्तिगाई के दिन व्रत रखते हैं तो यहां से मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा यानी कहानी पढ़ सकते हैं।
मासिक कार्तिगाई व्रत की कथा
ब्रह्मा और विष्णु जी के बीच छिड़ गई बहस
सृष्टि की रचना भगवान ब्रह्मा ने की है, जबकि सृष्टि और समस्त जीवों का पोषण, संरक्षण तथा पालन भगवान विष्णु करते हैं। वहीं, भगवान शिव सृष्टि के संहारकर्ता हैं। जब ब्रह्मांड में भ्रम, अज्ञान और अस्थिरता बढ़ती है, तो शिव जी ही उसका नाश कर सत्य की फिर से स्थापना करते हैं। प्राचीन काल में एक दिन अपनी-अपनी श्रेष्ठता को लेकर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच बहस छिड़ गई।
शिव जी ने निकाला रास्ता
दोनों देवताओं के बीच का विवाद खत्म होने की जगह रोजाना बढ़ता जा रहा था। एक दिन सभी देवतागण इस परेशानी को लेकर भगवान शिव के पास पहुंचे। शिव जी ने सभी देवताओं को भरोसा दिलाया कि वो इस मामले में कुछ न कुछ जरूर करेंगे। इसके बाद शिव जी अपने अनंत ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए और आकाशवाणी हुई कि 'ब्रह्मा और विष्णु जी में से, जो भी पहले इस ज्योतिर्लिंग का आदि या अंत ढूंढ लेगा, उसे ही सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ माना जाएगा'।
ब्रह्मा और विष्णु जी ने धारण किए अवतार
आकाशवाणी खत्म होने के तुरंत बाद ब्रह्मा जी ने हंस रूप धारण किया और आकाश की ऊंचाई में ज्योतिर्लिंग का अंत ढूंढने के लिए निकल गए। दूसरी तरफ विष्णु जी ने वराह अवतार लिया और वो पाताल लोक में ज्योतिर्लिंग का आदि ढूंढने के लिए निकल पड़े। ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों ने कई युगों तक ज्योतिर्लिंग का आदि और अंत ढूंढने का प्रयास किया, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।
ब्रह्मा जी ने दिलवाई झूठी गवाही
आखिर में जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने अपनी हार स्वीकार कर ली, परंतु ब्रह्मा जी अपनी हार स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने केतकी के फूल की मदद ली और उससे कहा कि वो झूठी गवाही दे कि 'उन्हें ज्योतिर्लिंग का अंत मिल गया है।' शिव जी को ज्ञात था कि ब्रह्मा जी झूठ बोल रहे हैं। उन्होंने ब्रह्मा जी से कई बार बोला कि वो सत्य बता दें और अपनी हार स्वीकार कर लें, लेकिन ब्रह्मा जी अपनी बात पर अड़े रहे।
शिव जी ने धारण किया अपना प्रचंड रूप
भगवान शिव ने गुस्से में आकर अपना प्रचंड रूप धारण किया और तांडव करने लगे, जिससे सृष्टि पर हाहाकार मच गया। सृष्टि का संतुलन बिगड़ते देख सभी देवतागण शिव जी के पास पहुंचे और उनसे माफी मांगी। शिव जी ने देवताओं की बात मानी और अपना शांत रूप फिर से धारण कर लिया, लेकिन उनके प्रचंड स्वरूप से एक ज्योति निकली, जो तिरुमल्लई पर्वत पर अरुणाचलेश्वर लिंग के रूप में स्थापित हुई।
मासिक कार्तिगाई का त्योहार भगवान शिव की इसी ज्योति से जुड़ा है। इस दिन पर्वत की चोटी पर एक विशाल दीप जलाया जाता है, जिसे महादीपम कहते हैं। ये ज्योति आज भी भक्तों के लिए आस्था, सत्य और सकारात्मकता का मार्ग प्रशस्त करती है।
