करवाचौथ का पावन पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। इस साल करवाचौथ का व्रत 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला उपवास रखती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, जिनमें से एक सबसे प्रमुख है सास को 'बायना' देना। यह परंपरा न केवल श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि यह बहू और सास के बीच के प्रेम और सम्मान के रिश्ते को भी दर्शाती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवाचौथ का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता जब तक सास को बायना न दिया जाए। बायना देते समय मन में प्रसन्नता और आदर का भाव होना अत्यंत आवश्यक है। यह रस्म आपसी संबंधों को मजबूती प्रदान करती है। जिस प्रकार सुबह सास अपनी बहू को 'सरगी' (व्रत शुरू करने से पहले दिया जाने वाला भोजन और उपहार) देती हैं, उसी प्रकार शाम को पूजा के बाद बहू अपनी सास को बायना भेंट करती है।
बायने में क्या-क्या दें और पूजा की विधि
बायने की सामग्री में मुख्य रूप से वस्त्र और श्रृंगार की वस्तुएं शामिल की जाती हैं। आप अपनी सास की पसंद के अनुसार उन्हें साड़ी या सूट भेंट कर सकती हैं। इसके साथ ही श्रृंगार का सामान जैसे चूड़ियां, पायल, बिछिया, सिंदूर, बिंदी, मेहंदी और लिपस्टिक आदि का एक सेट बनाकर देना शुभ माना जाता है। इन उपहारों के साथ कुछ दक्षिणा (नकद राशि) भी अवश्य रखें। ध्यान रहे कि बायने का सारा सामान एक थाली में सजाकर ही पूजा में रखा जाना चाहिए।बायने की विधि में 'अठावली' का विशेष महत्व है। अठावली के अंतर्गत आठ पूरियां, हलवा और कुछ दक्षिणा रखी जाती है। हालांकि, कई क्षेत्रों में परंपरा के अनुसार अठावली में मीठे पूड़े, आठ फुलके और कढ़ी-चावल रखने का भी विधान है। शाम के समय पूजा के दौरान इन सभी सामग्रियों को करवा माता के सामने रखें और घी का दीपक जलाएं। इसके बाद थोड़ा जल लेकर पांच या सात बार थाली के चारों ओर घुमाएं (पानी फेरें) और करवा माता से अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करें।
पूजा संपन्न होने के बाद, श्रद्धापूर्वक यह बायना अपनी सास को भेंट करें और उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराओं के अनुसार बायने की सामग्री और विधि में थोड़ा अंतर हो सकता है। अंततः, यह रस्म प्रेम और आदर का प्रतीक है, जिसे पूरे मन से निभाना ही इस व्रत की सार्थकता है।
