Shardiya Navratri 2026 Day 1 (maa shailputri katha in hindi): शारदीय नवरात्रि की शुरुआत आज 11 अक्टूबर 2026, रविवार से हो गई है। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना यानी कलश स्थापना करने के पश्चात मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री को पर्वतराज हिमालय की पुत्री और माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है, जिनका वाहन वृषभ यानी बैल है। मां शैलपुत्री के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन व्रत रखने और मां शैलपुत्री की पूजा करने से जीवन में खुशियों का आगमन होता है। साथ ही मन स्थिर रहता है और मानसिक तनाव दूर होता है। चन्द्रमा यानी चंद्र ग्रह, देवी शैलपुत्री द्वारा शासित हैं। ऐसे में नवरात्रि के प्रथम दिन आदि शक्ति के इस रूप की पूजा करने से जन्म कुंडली में चन्द्र ग्रह की स्थिति भी मजबूत होती है।
यदि आप भी आज व्रत रख रहे हैं और मां शैलपुत्री की पूजा करने वाले हैं तो पूजन के दौरान मां शैलपुत्री के स्वरूप से जुड़ी पौराणिक कथा का पाठ जरूर करें। यहां पर आज पढ़ी जाने वाली मां दुर्गा की पहली शक्ति शैलपुत्री की पावन कथा दी गई है।
मां शैलपुत्री की कथा (maa shailputri ki katha hindi mein)
प्रजापति दक्ष ने किया यज्ञ का आयोजन
प्राचीन काल में एक दिन प्रजापति दक्ष ने अपने राजमहल में विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। राजा दक्ष ने भगवान शिव को छोड़कर सभी देवताओं को यज्ञ में शामिल होने का निमंत्रण भेजा था। जब देवी सती को इस यज्ञ के बारे में पता चला तो उन्होंने शिव जी से यज्ञ में जाने की जिद्द की। शिव जी ने देवी सती को बहुत समझाया कि बिना निमंत्रण के यज्ञ में जाना सही नहीं रहेगा, लेकिन माता ने शंकर जी की एक बात नहीं मानी और अकेले ही जाने की जिद्द करने लगी।
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देवी सती का किया अपमान
देवी सती के काफी समय तक मनाने के बाद शिव जी ने उन्हें यज्ञ में जाने की इजाजत दे दी। देवी सती जब अपने मायके गई तो केवल उनकी मां और बहनों ने उनका स्वागत किया। उनके पिता प्रजापति दक्ष ने उनका अपमान किया और भगवान शिव की भी निंदा करने लगे।
देवी सती ने अपने शरीर को किया भस्म
देवी सती अपने पति का अपमान सह न सकीं और आत्मग्लानि में योगबल (योगाग्नि) प्रकट करके अपने शरीर को वहीं भस्म कर लिया। भगवान शिव को जब इस घटना के बारे में पता चला तो उन्हें बहुत दुख हुआ। दुख और क्रोध में उन्होंने देवी सती का शरीर अपने कंधों पर उठाया और तांडव करने लगे।
भगवान विष्णु ने किया सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल
शिव जी के गुस्से से ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ रहा था, जिसे संतुलित करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंगों के विभिन्न हिस्से कर दिए। जिस-जिस स्थान पर देवी सती के अंगों के हिस्से गिरे थे, उन्हें आज शक्तिपीठों के रूप में पूजा जाता है। इसके बाद देवी सती का पुनर्जन्म पर्वतराज हिमालय की पुत्री देवी शैलपुत्री के रूप में हुआ।
