Diwali Chopda Pujan: दिवाली का त्योहार मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा के साथ-साथ व्यापारियों के लिए भी बेहद खास होता है। इस दिन व्यापारी अपने पुराने बही-खातों को बंद करके नई खाता-बही की पूजा करते हैं। इस परंपरा को चोपड़ा पूजन कहा जाता है। मान्यता है कि विधि-विधान से चोपड़ा पूजन करने से व्यापार में सुख-समृद्धि आती है और नए साल की शुरुआत शुभ होती है। आइए विस्तार से जानते हैं इसके बारे में...
क्या है चोपड़ा पूजन की परंपरा
दिवाली के दिन होने वाला चोपड़ा पूजन मुख्य रूप से गुजरात और पश्चिमी भारत के व्यापारी समुदायों की एक प्राचीन परंपरा है। गुजराती भाषा में चोपड़ा या चोपड़ी का अर्थ खाता-बही अथवा हिसाब-किताब रखने वाली पुस्तक से होता है। पुराने समय में व्यापारी अपने व्यापार का पूरा लेखा-जोखा इन्हीं बही-खातों में लिखकर रखते थे। आज भले ही कारोबार में डिजिटल अकाउंटिंग और कंप्यूटर का इस्तेमाल बढ़ गया हो, लेकिन चोपड़ा पूजन की परंपरा का महत्व अब भी बरकरार है। इस दिन व्यापारी अपने पुराने हिसाब-किताब को समेटते हैं और नई खाता-बही की शुरुआत करते हैं। इसे केवल लेखा-जोखा बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नए व्यापारिक वर्ष के स्वागत और समृद्धि के संकल्प के रूप में भी देखा जाता है।
दिवाली पर क्यों होती है बही-खातों की पूजा?
हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी तथा भगवान गणेश को बुद्धि और विघ्नहर्ता माना गया है। वहीं मां सरस्वती ज्ञान और विवेक की अधिष्ठात्री देवी हैं। व्यापार में धन के साथ सही निर्णय लेने की क्षमता और ज्ञान भी जरूरी होता है। यही वजह है कि चोपड़ा पूजन में इन देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नई बही-खातों की पूजा करने से कारोबार में बरकत आती है और पूरे साल आर्थिक उन्नति के रास्ते खुलते हैं। व्यापारी प्रार्थना करते हैं कि आने वाले वर्ष में उनका व्यापार ईमानदारी, सद्बुद्धि और अच्छे कर्मों के साथ आगे बढ़े।
चोपड़ा पूजन की विधि
चोपड़ा पूजन के लिए व्यापारी सबसे पहले अपने पुराने बही-खातों का हिसाब पूरा करते हैं। इसके बाद नई खाता-बही, रजिस्टर और लेखा पुस्तकों को साफ-सुथरी जगह पर स्थापित किया जाता है। इन पुस्तकों के पहले पन्ने पर रोली, कुमकुम, चंदन और केसर से स्वास्तिक बनाया जाता है। कई व्यापारी नई बही के पहले पन्ने पर 'श्री गणेशाय नमः', 'शुभ-लाभ' और 'श्री लक्ष्मी नमः' भी लिखते हैं। इसके बाद फूल, अक्षत, धूप, दीप और मिठाई अर्पित करके मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर मां सरस्वती का भी विशेष पूजन होता है।
गुजरात और राजस्थान में खास है चोपड़ा पूजन
चोपड़ा पूजन की परंपरा गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के कई व्यापारी परिवारों में विशेष रूप से प्रचलित है। गुजराती और मारवाड़ी समुदाय के व्यापारी इसे बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। गुजरात में दिवाली के अगले दिन यानी कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से गुजराती नववर्ष की शुरुआत होती है। ऐसे में दिवाली की रात होने वाला चोपड़ा पूजन नए व्यापारिक वर्ष के स्वागत की महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा बन जाता है। इस अवसर पर व्यापारी एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं भी देते हैं।
