Magha Shraddha 2026: पितृ पक्ष में आने वाली हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व माना गया है। इन्हीं में मघा श्राद्ध भी विशेष माना जाता है। साल 2026 में मघा श्राद्ध 7 अक्टूबर, बुधवार को किया जाएगा। इस दिन द्वादशी तिथि का संयोग रहेगा। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पितरों का श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। आइए जानते हैं मघा श्राद्ध में कब करें पितरों का तर्पण साथ ही जानें कुतुप और रोहिण काल का समय।
मघा श्राद्ध पर कब करें पितरों का तर्पण?
श्राद्ध कर्म के लिए दिन का अपराह्न काल विशेष महत्व रखता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी अवधि में पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध से जुड़े कर्म करना शुभ माना जाता है। 7 अक्टूबर 2026 को तर्पण के लिए कुतुप काल सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक माना गया है। इसके बाद रोहिण काल दोपहर 12:31 बजे से 1:19 बजे तक रहेगा। इसके पश्चात अपराह्न काल लगभग दोपहर 1:19 बजे से 3:30 बजे या कुछ पंचांगों के अनुसार 3:57 बजे तक माना जा सकता है।
इस तरह मघा श्राद्ध के दिन सुबह करीब 11:40 बजे से दोपहर 3:30 बजे के बीच पितरों का तर्पण और पिंडदान किया जा सकता है। हालांकि, सटीक समय के लिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित रहेगा।
कुतुप काल क्या होता है?
श्राद्ध कर्म में कुतुप काल को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू धार्मिक परंपरा में दिन को अलग-अलग मुहूर्तों में बांटा गया है और कुतुप काल दिन का आठवां मुहूर्त माना जाता है। मान्यता है कि यह समय पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए विशेष रूप से फलदायी होता है। इसलिए श्राद्धकर्ता इस अवधि में तर्पण, पिंडदान और अन्य पितृ कर्म करते हैं। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया कर्म पितरों की तृप्ति का माध्यम बनता है।
रोहिण काल का महत्व
कुतुप काल समाप्त होने के बाद आने वाला रोहिण मुहूर्त या रौहिण मुहूर्त भी श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना गया है। यह कुतुप काल के ठीक बाद आता है और पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस अवधि में तर्पण करने से पितरों की तृप्ति होती है। यही वजह है कि श्राद्ध की विधि में कुतुप और रोहिण काल को विशेष स्थान दिया गया है।
मघा श्राद्ध पर तर्पण की विधि
तर्पण के लिए पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पितरों का स्मरण करते हुए जल में काले तिल और कुश मिलाकर श्रद्धापूर्वक तर्पण किया जाता है। इसके बाद सामर्थ्य के अनुसार पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और जरूरतमंदों को दान किया जा सकता है। पितृ कर्म में सबसे महत्वपूर्ण भाव श्रद्धा और स्मरण का माना गया है। इसलिए कर्मकांड करते समय मन को शांत रखकर अपने पूर्वजों का स्मरण करना चाहिए।
मघा श्राद्ध में पितरों का स्मरण
मघा श्राद्ध केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की उन जड़ों को याद करने का अवसर भी है जिनसे वर्तमान पीढ़ी जुड़ी होती है। पितृ पक्ष की परंपरा हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके योगदान को स्मरण करने की सीख देती है।
