Papankusha Ekadashi 2026: आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने, व्रत रखने, मंत्रों का जाप करने और जरूरतमंदों को दान देने से पुण्य मिलता है। कहा जाता है कि इस व्रत को करने से जाने-अनजाने में किए गए पापों से मुक्ति पाने का रास्ता मिलता है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। पापांकुशा एकादशी का महत्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भी समझाया था। आइए, जानते हैं इस व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा और इसके पीछे की धार्मिक मान्यता।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, 'हे जगदीश्वर! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? इस व्रत को करने से मनुष्य को किन फलों की प्राप्ति होती है? कृपया मुझे इस व्रत का विधान और इसका माहात्म्य विस्तार से बताइए।'
अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, 'हे अर्जुन! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी कहा जाता है। इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। इस दिन व्यक्ति को अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा करनी चाहिए।'
पौराणिक कथा
प्राचीन समय की बात है, विंध्य पर्वत पर एक क्रूर बहेलिया रहता था। उसने अपना पूरा जीवन हिंसा, लूटपाट, मद्यपान और बुरी संगति में बिताया था। अपने गलत कर्मों के कारण उसका जीवन पापों से भर गया था। जब उसके जीवन का अंतिम समय निकट आया, तब यमराज के दूत उसे लेने पहुंचे। उन्होंने बहेलिये से कहा कि अगले दिन उसके जीवन का अंतिम दिन होगा और वे उसे लेने दोबारा आएंगे। यह सुनकर बहेलिया बुरी तरह भयभीत हो गया। उसे अपने पापों का एहसास हुआ और वह मुक्ति का उपाय खोजने लगा।
इसी उद्देश्य से वह महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर अपने प्राणों की रक्षा तथा पापों से मुक्ति पाने की प्रार्थना करने लगा। बहेलिये की व्याकुलता देखकर महर्षि अंगिरा को उस पर दया आ गई। उन्होंने उसे आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का महत्व बताते हुए विधिपूर्वक पापांकुशा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।
महर्षि के बताए विधान के अनुसार बहेलिये ने श्रद्धापूर्वक व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना की। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस व्रत के पुण्य और भगवान की कृपा से उसके पाप नष्ट हो गए और उसे विष्णुलोक की प्राप्ति हुई। जब यमदूत उसे लेने पहुंचे, तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गए और बिना उसे लिए यमलोक लौट गए।
