Buddha Teachings: भगवान बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित धम्मपद के सातवें और आठवें युग्म से लेकर बारहवें श्लोक तक का अर्थ इस आर्टिकल के माध्यम से आपको बताया गया है। इंद्रियों पर नियंत्रण, सही सोच, संयमित भोजन और मन को साधना क्यों जरूरी है इन श्लोकों के माध्यम से उन्हें समझने की कोशिश करते हैं।
सुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु असंवुतं।
भोजनम्हि अमत्तञ्ञुं कुसीतं हीनवीरियं।
तं वे पसहति मारो वातो रुक्खं’ व दुब्बलं।।7।।
अर्थ- जो व्यक्ति अशुभ और बुरी चीजों पर ध्यान लगाए रखता है, अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रखता, खाने में संयम नहीं बरतता और आलसी रहता है, उसे मार उसी तरह अपने वश में कर लेता है, जैसे तेज हवा कमजोर पेड़ को गिरा देती है।
असुभानुपस्सिं विहरन्तं इन्द्रियेसु सुसंवुतं।
भोजनम्हि च मत्तञ्ञुं सद्धं आरवद्धवीरियं।
तं वे नप्पसहति मारो वातो सेलं’ व पब्बतं।।8।।
अर्थ- जो व्यक्ति अशुभ और बुरी चीजों से दूर रहने का अभ्यास करता है, अपनी इंद्रियों पर अच्छी तरह नियंत्रण रखता है, भोजन में संयम बरतता है, श्रद्धा रखता है और पूरी मेहनत से प्रयास करता है, उसे मार उसी तरह नहीं हरा सकता, जैसे तेज हवा पहाड़ को नहीं हिला सकती।
असारे सारमतिनो सारे चासारदस्सिनों।
ते सारं नाधिगच्छन्ति मिच्छासङ्कप्पगोचरा।।9।।
अर्थ- जो व्यक्ति असार यानी व्यर्थ चीजों को सार्थक समझता है और सार्थक चीजों को व्यर्थ मानता है, वह गलत विचारों में उलझा रहता है और जीवन के वास्तविक सार को प्राप्त नहीं कर पाता।
सारंञ्च सारतो ञत्वा असारञ्च असारतो।
ते सारं अधिगच्छन्ति सम्मासङ्कप्पगोचरा।।10।।
अर्थ- जो व्यक्ति सार्थक चीजों को सार्थक और व्यर्थ चीजों को व्यर्थ समझता है, वह सही विचारों के मार्ग पर चलता है और जीवन के वास्तविक सार को प्राप्त कर लेता है।
यथागारं दुच्छन्नं वुट्ठी समतिविज्झति।
एवं अभावितं चित्तं रागो समतिविज्झति।।11।।
अर्थ- जिस तरह खराब छत वाले घर में बारिश का पानी अंदर घुस जाता है, उसी तरह ठीक से विकसित और साधा न गया मन भी राग यानी आसक्ति को अपने भीतर प्रवेश करने देता है।
यथागारं सुच्छन्नं वुट्ठी न समतिविज्झति।
एवं सुभावितं चित्तं रागो न समतिविज्झति।।12।।
अर्थ- जिस तरह अच्छी तरह ढके हुए घर में बारिश का पानी प्रवेश नहीं कर पाता, उसी तरह अच्छी तरह विकसित और साधे हुए मन में राग यानी आसक्ति प्रवेश नहीं कर पाती।
इन छह श्लोकों से क्या सीख मिलती है?
इंद्रियों पर नियंत्रण रखें: हर इच्छा को पूरा करना जरूरी नहीं है।
अनुशासन अपनाएं: भोजन, आराम और मेहनत के बीच संतुलन बनाएं।
सही सोच विकसित करें: दिखावे के बजाय उन चीजों को महत्व दें, जो वास्तव में जीवन को बेहतर बनाती हैं।
विवेक से फैसले लें: किसी चीज को पाने से पहले समझें कि वह आपके लिए कितनी जरूरी है।
मन को समझें: लालच, मोह और आसक्ति को पहचानना सीखें।
मानसिक मजबूती बढ़ाएं: नियमित आत्मचिंतन और जागरूकता से कठिन परिस्थितियों का सामना बेहतर तरीके से किया जा सकता है।
