Ashtavakra Gita Hindi: भारतीय दर्शन के प्रमुख ग्रंथों में से एक अष्टावक्र गीता (Ashtavakra Gita) में राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र के बीच संवाद के जरिए जीवन के कई बड़े सवालों के जवाब मिलते हैं। अष्टावक्र गीता में महर्षि अष्टावक्र ने राजा जनक को जीवन के उलझनों से बाहर निकलने का रास्ता बताया है। उनके अनुसार, सच्ची मुक्ति केवल संसार छोड़ देने में नहीं, बल्कि मन की इच्छाओं, मोह, अहंकार और सुख-दुख के बंधनों से आजाद होने में है। अष्टावक्र के ये श्लोक समझाते हैं कि इंसान दुनिया में रहते हुए भी भीतर से शांत, स्वतंत्र और संतुष्ट रह सकता है।
श्लोक
1- निर्वासनो निरालंबः स्वच्छंदो मुक्तबंधनः।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्।।
महर्षि अष्टावक्र कहते हैं कि जो इंसान इच्छाओं से मुक्त हो चुका है, जिसे किसी बाहरी सहारे की जरूरत नहीं है और जो मोह-माया के बंधनों से आजाद है, वह जीवन की परिस्थितियों के साथ उसी तरह आगे बढ़ता है, जैसे हवा के झोंके से सूखा पत्ता उड़ता है।
2- असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते।।
महर्षि अष्टावक्र कहते हैं- जो इंसान संसार के मोह और मानसिक बंधनों से मुक्त हो जाता है, वह न तो किसी बात पर जरूरत से ज्यादा खुश होता है और न ही दुख में पूरी तरह डूब जाता है। उसका मन शांत रहता है और वह देह के मोह से मुक्त व्यक्ति की तरह जीवन जीता है।
3- कुत्रापि न जिहासाऽस्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः।।
महर्षि अष्टावक्र कहते हैं- जो व्यक्ति अपनी आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, जिसका मन शांत और निर्मल है, उसके भीतर किसी चीज को जबरन छोड़ने की इच्छा नहीं होती और न ही किसी चीज के नष्ट होने का भय रहता है।
4- प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता।।
अष्टावक्र कहते हैं- जिसका मन स्वाभाविक रूप से इच्छाओं और मानसिक उलझनों से खाली है, वह सहज भाव से अपने काम करता है। ऐसा धीर व्यक्ति न तो मान-सम्मान मिलने पर अहंकार करता है और न ही अपमान होने पर भीतर से टूट जाता है।
5- कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिंतानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न।।
अष्टावक्र कहते हैं- जो व्यक्ति यह समझता है कि शरीर के माध्यम से कर्म हो रहे हैं, जबकि उसका शुद्ध आत्मस्वरूप इन कर्मों से अलग है, वह काम करते हुए भी खुद को कर्मों का अहंकारी कर्ता नहीं मानता।
6- अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते।।
अष्टावक्र कहते हैं- आत्मज्ञान प्राप्त व्यक्ति संसार में रहते हुए भी भीतर से स्वतंत्र रहता है। वह बाहरी जीवन के काम करता है, लेकिन उसके मन पर मोह और अहंकार का बंधन नहीं रहता। ऐसा व्यक्ति जीवन में संतुष्ट और शांत दिखाई देता है।
