Gajendra Moksha: हिंदू धार्मिक परंपरा में भगवान विष्णु की भक्ति और शरणागति से जुड़े अनेक स्तोत्रों का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र की कथा बेहद भावपूर्ण है। यह केवल एक हाथी और मगरमच्छ के संघर्ष की कहानी नहीं, बल्कि उस क्षण की कथा है जब अपनी पूरी शक्ति समाप्त होने के बाद गजेंद्र ने स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। मान्यता है कि सच्चे मन से भगवान का स्मरण करने पर भक्त को कठिन परिस्थितियों में भी आशा और संबल मिलता है।
गजेंद्र मोक्ष का मूल प्रसंग श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कंध में आता है। दूसरे अध्याय में गजेंद्र के संकट का वर्णन है, जबकि तीसरे अध्याय में उसकी भगवान विष्णु के प्रति प्रार्थना और उसके बाद भगवान द्वारा उद्धार का प्रसंग मिलता है। अध्याय 3 में 33 श्लोक हैं। आगे पढ़ें गजेंद्र संपूर्ण मोक्ष स्तोत्र (Gajendra Moksha Stotram Lyrics) अर्थ सहित....
गजेंद्र मोक्ष का पाठ - Gajendra Moksha Stotram Lyrics
1. ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥
अर्थ: गजेंद्र भगवान श्रीहरि का ध्यान करते हुए कहते हैं मैं उन परम शक्तिशाली भगवान को नमन करता हूं, जिनके कारण शरीर और मन में चेतना का संचार होता है। जो समस्त सृष्टि के आदि कारण और हर जीव के भीतर चेतना के रूप में विद्यमान हैं, मैं उन्हीं परमेश्वर का स्मरण करता हूं।
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2.
यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥
अर्थ: गजेंद्र कहते हैं, मैं उन स्वयंभू भगवान की शरण लेता हूं, जिनके आधार पर यह पूरा संसार टिका है और जिनसे इसकी उत्पत्ति हुई है। जिन्होंने प्रकृति की रचना की और स्वयं उससे परे रहते हुए भी हर जगह मौजूद हैं, ऐसे सर्वोच्च परमात्मा को मैं नमन करता हूं।
3.
यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षतेस आत्ममूलोवतु मां परात्परः॥
अर्थ: जो भगवान अपनी माया से इस संसार को कभी प्रकट और कभी अप्रकट करते हैं, लेकिन स्वयं इन सभी परिवर्तनों के साक्षी बने रहते हैं और उनसे प्रभावित नहीं होते, वे परमात्मा मेरी रक्षा करें।
4.
कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरंयस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः।।
अर्थ: जब समय के साथ समस्त लोक और उनके रक्षक पंचतत्वों में विलीन हो जाते हैं तथा सृष्टि के सभी कारण प्रकृति में समा जाते हैं, तब केवल गहरा अंधकार रह जाता है। उस अंधकार से परे अपने परम धाम में प्रकाशित होने वाले सर्वव्यापी भगवान मेरी रक्षा करें।
5.
न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतोदुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥
अर्थ: जिनके वास्तविक स्वरूप को देवता और ऋषि भी पूरी तरह नहीं जान पाते, उन्हें एक सामान्य जीव कैसे समझ या वर्णित कर सकता है? जैसे अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले अभिनेता का वास्तविक रूप पहचानना कठिन होता है, वैसे ही भगवान की वास्तविक महिमा समझना भी अत्यंत कठिन है। ऐसे अगम्य स्वरूप वाले प्रभु मेरी रक्षा करें।
6.
दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलमविमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वनेभूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः॥
अर्थ: जिन परमात्मा के मंगलमय स्वरूप का दर्शन करने की इच्छा से ऋषि-मुनि संसार से विरक्त होकर वन में रहते हैं और कठिन व्रतों का पालन करते हैं, वही परम प्रभु मेरे जीवन की अंतिम शरण और परम गति हैं।
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7.
न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वान नाम रूपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यःस्वमायया तान्युलाकमृच्छति॥
अर्थ: परमात्मा का हमारे समान कोई जन्म नहीं होता और न ही वे कर्मों के बंधन में बंधते हैं। उनके निर्गुण स्वरूप का कोई निश्चित नाम या रूप नहीं है। फिर भी संसार की सृष्टि और प्रलय के लिए वे अपनी माया के माध्यम से अलग-अलग रूपों में प्रकट होते हैं।
8.
तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे॥
अर्थ: अनंत शक्तियों से संपन्न उस परम ब्रह्म परमेश्वर को मेरा प्रणाम है। जो मूल रूप से निराकार हैं, फिर भी अनेक रूपों में प्रकट होते हैं और जिनकी लीलाएं अद्भुत हैं, ऐसे भगवान को बार-बार नमन है।
9.
नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥
अर्थ: जो स्वयं प्रकाशमान हैं, सबके साक्षी और परमात्मा हैं, उन्हें मेरा शत-शत प्रणाम। जो वाणी, मन और चित्त की सामान्य सीमाओं से परे हैं, उन परमेश्वर को मेरा बार-बार नमन है।
10.
सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥
अर्थ: जो विवेकशील और निष्काम भाव से साधना करने वाले भक्तों को प्राप्त होते हैं तथा मोक्ष के आनंद का अनुभव कराते हैं, उन परम भगवान को मेरा नमन है। वे ही कैवल्य और मुक्ति के स्वामी हैं।
11.
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥
अर्थ: जो सत्त्व, रज और तम—तीनों गुणों के आधार हैं, फिर भी इन गुणों से परे हैं; जो शांत स्वरूप, ज्ञान के सघन स्वरूप और समभाव वाले परमात्मा हैं, उन्हें मेरा प्रणाम है।
12.
क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः॥
अर्थ: हे प्रभु! आप सभी शरीरों के ज्ञाता, सबके स्वामी और साक्षी हैं। आप सभी जीवों के अंतर्यामी हैं और प्रकृति के मूल कारण हैं, जबकि आपका स्वयं कोई दूसरा कारण नहीं है। ऐसे परमेश्वर को मेरा शत-शत नमन है।
13.
सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः॥
अर्थ: जो सभी इंद्रियों और उनके विषयों के ज्ञाता हैं, हर प्रकार की अनुभूति के मूल कारण हैं और इस जड़ संसार के पीछे विद्यमान चेतना के आधार हैं, उन भगवान को मेरा प्रणाम है।
14.
नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय।
सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय॥
अर्थ: हे प्रभु! आप समस्त सृष्टि के कारण हैं, लेकिन स्वयं किसी कारण से उत्पन्न नहीं हुए। आप सभी कारणों से भी विलक्षण और अद्भुत हैं। वेद-शास्त्र जिनके परम सत्य की ओर संकेत करते हैं, ऐसे मोक्षस्वरूप और श्रेष्ठ परम आश्रय भगवान को बार-बार प्रणाम है।
15.
गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपायतत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥
अर्थ: जो त्रिगुणों के भीतर छिपी ज्ञानरूपी अग्नि के समान हैं और जिनकी शक्ति से सृष्टि की गतिविधियां आरंभ होती हैं, उन स्वयं प्रकाशित भगवान को मेरा प्रणाम है। जो आत्मज्ञान के माध्यम से कर्मों के बंधन और शास्त्रों के विधि-निषेध से भी ऊपर उठने का मार्ग दिखाते हैं, उन्हें नमन है।
16.
मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥
अर्थ: मेरे जैसे शरणागत जीवों को अज्ञान और बंधनों से मुक्त करने वाले, अत्यंत दयालु और करुणामय भगवान को मेरा प्रणाम है। जो अपने अंश के रूप में सभी जीवों के मन में अंतर्यामी बनकर विद्यमान हैं और सबका मार्गदर्शन करते हैं, उन अनंत परमात्मा को मेरा नमन है।
17.
आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥
अर्थ: जो शरीर, संतान, मित्र, घर, धन और परिवार के मोह में बंधे लोगों के लिए कठिनाई से प्राप्त होते हैं, लेकिन मुक्त आत्माओं द्वारा हृदय में निरंतर अनुभव किए जाते हैं, उन ज्ञानस्वरूप सर्वशक्तिमान परमेश्वर को मेरा प्रणाम है।
18.
यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामाभजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययंकरोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम्॥
अर्थ: जिन भगवान की उपासना करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे अपने इच्छित पुरुषार्थ प्राप्त करने की कामना करता है, वे भक्तों को अनेक प्रकार के वरदान देने में समर्थ हैं। ऐसे दयालु प्रभु मुझे इस संकट और बंधन से स्थायी मुक्ति प्रदान करें।
19.
एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थवांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलंगायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः॥
अर्थ: जो भक्त पूरी तरह भगवान की शरण में आ जाते हैं, वे सांसारिक वस्तुओं की इच्छा नहीं रखते। वे भगवान के अत्यंत अद्भुत और मंगलमय चरित्र का गुणगान करते हुए भक्ति के आनंद में डूबे रहते हैं।
20.
तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥
अर्थ: मैं उन अविनाशी और परम ब्रह्म की स्तुति करता हूं, जो इंद्रियों की पहुंच से परे हैं, अत्यंत सूक्ष्म हैं और भक्तियोग के माध्यम से अनुभव किए जा सकते हैं। वे अनंत, आदि और हर प्रकार से पूर्ण परमात्मा हैं।
21.
यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥
अर्थ: जिन परमात्मा की शक्ति के छोटे से अंश से ब्रह्मा सहित सभी देवता, चारों वेद तथा संसार के समस्त चर-अचर जीव नाम और रूप के भेद के साथ अस्तित्व में आए हैं, मैं उन्हीं भगवान को नमन करता हूं।
22.
यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयोनिर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहोबुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥
अर्थ: जिस तरह अग्नि की लपटें और सूर्य की किरणें अपने मूल स्रोत से निकलकर फिर उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इंद्रियां और विभिन्न शरीर परमात्मा से उत्पन्न होकर अंततः उसी में समा जाते हैं।
23.
स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंगन स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासननिषेधशेषो जयतादशेषः॥
अर्थ: भगवान न देवता हैं, न असुर, न मनुष्य और न किसी अन्य योनि के जीव। वे न स्त्री हैं, न पुरुष और न ही नपुंसक। वे न गुण हैं, न कर्म और न कार्य-कारण के सामान्य बंधन में आते हैं। इन सभी सीमाओं से परे जो परम सत्य है, वही भगवान का वास्तविक स्वरूप है। ऐसे प्रभु मेरी रक्षा करें।
24.
जिजीविषे नाहमिहामुया कि मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम॥
अर्थ: गजेंद्र कहते हैं - अब मैं केवल इस हाथी के शरीर के साथ जीवित रहने की इच्छा नहीं रखता। मैं उस अज्ञान के आवरण से मुक्त होना चाहता हूं, जो आत्मा के वास्तविक स्वरूप को ढक देता है और जिसे केवल समय बीतने से दूर नहीं किया जा सकता।
25.
सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम॥
अर्थ: मैं उस परम भगवान की शरण में जाता हूं, जो संसार के रचयिता हैं, स्वयं संसार में व्याप्त हैं और फिर भी संसार से परे हैं। वे अजन्मा, सर्वव्यापी और सभी प्राप्त करने योग्य वस्तुओं में सर्वोच्च परम पद हैं।
26.
योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम॥
अर्थ: जिन योगेश्वर भगवान को योगी अपने शुद्ध हृदय में योग के माध्यम से अनुभव करते हैं और जिनकी शक्ति से कर्मों के बंधन समाप्त हो जाते हैं, उन परम योगेश्वर को मैं नमन करता हूं।
27.
नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥
अर्थ: हे प्रभु! आपकी तीनों शक्तियां अत्यंत प्रबल हैं और आपकी महिमा इंद्रियों की सामान्य सीमा से परे है। आप शरण में आए भक्तों की रक्षा करने वाले और अनंत शक्ति से संपन्न हैं। ऐसे परमेश्वर को मेरा बार-बार प्रणाम है।
28.
नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम॥
अर्थ: अज्ञान और अहंकार की शक्ति से ढका हुआ जीव स्वयं अपने वास्तविक स्वरूप को भी ठीक से नहीं पहचान पाता। ऐसे अपार महिमा वाले भगवान को मैं अपनी शरण मानता हूं और उन्हें नमन करता हूं।
गजेंद्र को मिला वरदान
गजेंद्र की प्रार्थना समाप्त होते ही भगवान विष्णु उसकी पुकार सुनकर गरुड़ पर सवार होकर वहां पहुंचते हैं। श्रीमद्भागवत के वर्णन के अनुसार भगवान चक्र धारण किए हुए गजेंद्र के पास आते हैं। गजेंद्र भगवान को देखकर अपनी सूंड में उठाए कमल को उनकी ओर अर्पित करता है और उन्हें प्रणाम करता है। इसके बाद भगवान विष्णु गजेंद्र को मगरमच्छ के बंधन से मुक्त करते हैं।
