Durva Ashtami Vrat Katha 2026: दूर्वा अष्टमी का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, जिन्हें विघ्नों को हरने वाले, बुद्धि और विवेक का देवता माना जाता है। इस दिन गणपति बप्पा की विशेष रूप से पूजा की जाती है। साथ ही उन्हें दूर्वा की 21 गांठें अर्पित की जाती हैं। मान्यता है कि दूर्वा अष्टमी पर तप-त्याग करने से जीवन में आ रही परेशानियां कम होती हैं। जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है तथा घर-परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दूर्वा अष्टमी मनाई जाती है। साल 2026 में आज 18 सितंबर, शुक्रवार को दूर्वा अष्टमी मनाई जा रही है।
दूर्वा अष्टमी की पूजा के दौरान गणेश जी को समर्पित पौराणिक कथा पढ़ने का भी विधान है। आज यहां पर आप दूर्वा अष्टमी पर पढ़ी जाने वाली दो पौराणिक कथाओं के बारे में जानेंगे।
दूर्वा अष्टमी व्रत की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में अनलासुर नामक एक राक्षस था, जिसके मुख से अग्नि निकला करती थी। अनलासुर का आतंक धीरे-धीरे तीनों लोकों में बढ़ता जा रहा था। वो अपने रास्ते में आने वाले हर व्यक्ति को जला देता था। अनलासुर से परेशान होकर एक दिन सभी देवतागण गणेश जी के पास पहुंचे। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान गणेश ने विराट रूप धारण किया और अनलासुर राक्षस को जिंदा निगल लिया।
राक्षस को जिंदा निगलने के कारण गणेश जी को पेट में अत्यधिक जलन होने लगी। कई ऋषियों ने गणेश जी के पेट की जलन को शांत करने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। अंत में गणेश जी कश्यप ऋषि के पास गए और उन्हें पूरी बात बताई।
कश्यप ऋषि ने गणेश जी को खाने के लिए दूर्वा (घास) की 21 गांठें दीं, जिन्हें खाते ही बप्पा के पेट की जलन पूरी तरह से शांत हो गई। गणेश जी ने जिस दिन दूर्वा का सेवन किया था, उस दिन भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी। इसी के बाद से हर साल इस तिथि पर भगवान गणेश को दूर्वा चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई और इस तिथि को दूर्वा अष्टमी के नाम से जाना जाने लगा।
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दूर्वा अष्टमी से जुड़ी अन्य कथा
दूर्वा अष्टमी से जुड़ी एक अन्य कथा भी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब देवता और असुर अमृत के लिए लड़ रहे थे तो उस दौरान अमृत की कुछ बूंदें दूर्वा घास पर गिर गईं। इससे दूर्वा पवित्र और अमर हो गई। गणेश जी को दूर्वा अत्यंत प्रिय थी, जिसके बाद से उन्हें दूर्वा अर्पित करने की परंपरा शुरू हो गई। मान्यता है कि दूर्वा अष्टमी पर गणेश जी को दूर्वा अर्पित करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट होते हैं तथा मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
