Bach Baras 2026 Katha: बछ बारस का दिन धार्मिक दृष्टि से खास होता है। इस दिन गाय और उसके बछड़े की विशेष रूप से पूजा की जाती है। मान्यता है कि बछ बारस पर पूजा करने से परिवार में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। साथ ही संतान के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद मिलता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, हर साल भाद्रपद माह में आने वाली कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को बछ बारस का पर्व मनाया जाता है। साल 2026 में भाद्रपद कृष्ण द्वादशी तिथि 7 सितंबर की शाम 5 बजकर 3 मिनट से 8 सितंबर की दोपहर 2 बजकर 42 मिनट तक रहेगी। इसी वजह से आज 7 सितंबर 2026, सोमवार को बछ बारस मनाई जा रही है।
बछ बारस पर राजा देवदानी से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी पढ़ी जाती है, जिसके बाद ही पूजा का पूर्ण फल मिलता है। आइए जानें बछ बारस पर्व की कथा क्या है।
बछ बारस की कथा
राजा के पास एक गाय और भैंस थी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में भारत में सुवर्णपुर नाम का एक नगर था, जहां देवदानी नामक राजा का राज चलता था। राजा की दो रानियां थीं। पहली रानी का नाम 'सीता' तो दूसरी का नाम 'गीता' था। राजा को जानवरों से बहुत प्यार था। उन्होंने एक गाय और एक भैंस को पाल रखा था। रानी सीता को भैंस से खास लगाव था। वो भैंस को अपनी सखी मानती और उसका बहुत ख्याल रखती। वहीं, दूसरी रानी को गाय और उसके बछड़े से बहुत प्यार था। वो दोनों को सखी के समान प्यार करती थी।
भैंस ने की रानी सीता से शिकायत
एक दिन भैंस ने रानी सीता से कहा 'गाय का बछड़ा है, जिससे रानी गीता बहुत प्यार करती हैं। मुझे बछड़े से ईर्ष्या होती है क्योंकि मेरा बच्चा नहीं है।' रानी को ये बात सुन दुख हुआ और उसने भैंस को वचन दिया कि वो सब कुछ ठीक कर देगी।
रानी सीता ने किए बछड़े के टुकड़े
रानी सीता ने उसी दिन शाम के समय गाय के बछडे़ को अगवा किया और उसके कई टुकड़े कर गेहूं की राशि में छुपा दिए। रानी गीता को जब बहुत देर तक बछड़ा नहीं मिला तो उन्होंने उसे ढूंढने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कुछ भी पता नहीं चला।
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महल में हुई रक्त और मांस की वर्षा
अगले दिन जब राजा भोजन करने के लिए अपने स्थान पर बैठे तो उसी समय आसमान से खून और मांस की वर्षा होने लगी। कुछ ही समय में पूरे महल में रक्त और मांस फैल गया तथा मल-मूत्र आदि की बास आने लगी। राजा ये देख घबरा गया और भगवान से इसके कारण के बारे में पूछने लगा। तभी आकाशवाणी हुई 'हे राजा, रानी सीता ने तेरी गाय के बछडे़ को काटा और उसके टु़कड़े गेहूं की राशि में छुपा दिए। तेरे महल में ये सब इसलिए हो रहा है। कल 'गोवत्स द्वादशी' है। कल तू भैंस को अपने नगर से बाहर निकालने के बाद गाय और बछडे़ की पूजा कर। साथ ही पूरे दिन गाय का दूध और कटे फलों का सेवन न कर। इससे रानी सीता का पाप नष्ट होगा और बछड़ा पुनर्जीवित हो जाएगा।'
राजा को मिला अपनी पूजा का फल
राजा ने पूरी श्रद्धा से गोवत्स द्वादशी के दिन पूजा की और सभी नियमों का पालन किया, जिसके बाद बछड़ा पुनर्जीवित हो गया और महल की स्थिति भी अपने आप सुधर गई। कहा जाता है कि इसी घटना के बाद से देशभर में हर साल भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी मनाने की परंपरा शुरू हो गई, जिसे बछ वारस, बछ बारस और वसु बारस आदि नामों से जाना जाता है।
