Aarti Kunj Bihari Ki: आज जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन देशभर के घरों और मंदिरों में भक्त पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ पूजा-पाठ करते हैं। जन्माष्टमी की पूजा में कई तरह की धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं, जिनमें भगवान कृष्ण की आरती (Krishna Aarti) का खास महत्व माना जाता है। खासतौर पर- 'आरती कुंज बिहारी की' कृष्ण भक्तों के बीच काफी लोकप्रिय है।
यह आरती भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित आरती है। इसमें कान्हा के सुंदर और मनमोहक स्वरूप का वर्णन मिलता है। भगवान कृष्ण को कुंज बिहारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे वृंदावन की कुंज गलियों में अपनी बाल लीलाओं से सभी का मन मोह लेते थे। उनकी बांसुरी की धुन और उनकी मोहक छवि का वर्णन कृष्ण भक्ति में खास जगह रखता है। आरती के दौरान भक्त दीप जलाकर, घंटी बजाकर और हाथ जोड़कर भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं।
अगर आप भी इस जन्माष्टमी व्रत रख रहे हैं या घर पर कान्हा की पूजा कर रहे हैं, तो पूजा के बाद भगवान कृष्ण की यह आरती जरूर गा सकते हैं। सही बोलों के साथ आरती करने से पूजा का माहौल और भी भक्तिमय हो जाता है। यहां हम- 'आरती कुंज बिहारी की' के पूरे बोल हिंदी में दे रहे हैं, ताकि आप जन्माष्टमी के मौके पर श्रद्धा के साथ कान्हा की आराधना कर सकें।
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी शिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
