जन्माष्टमी के पावन पर्व पर भगवान कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद अब भक्त उनके छठी उत्सव की तैयारी में जुट गए हैं। हिंदू परंपरा के अनुसार, किसी भी शिशु के जन्म के छठे दिन छठी का संस्कार मनाया जाता है, उसी मान्यता के अनुरूप कान्हा के प्राकट्य के छह दिन बाद यह विशेष उत्सव आयोजित किया जाता है। इस दिन भक्त अपने आराध्य लड्डू गोपाल की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और उन्हें विधि-विधान से भोग अर्पित करते हैं।
इस वर्ष भाद्रपद माह में जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर को मनाया गया था। इस गणना के आधार पर लड्डू गोपाल की छठी 9 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन का धार्मिक महत्व इसलिए भी अधिक माना जा रहा है क्योंकि इस तिथि पर भद्रा राजयोग, मालव्य राजयोग और हंस राजयोग जैसे विशेष संयोग बन रहे हैं, जो इस पूजा को और भी शुभ बनाते हैं।
लड्डू गोपाल की छठी: पूजा विधि और भोग
छठी का उत्सव मुख्य रूप से शाम के समय मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत लड्डू गोपाल को दूध और जल के मिश्रण से स्नान कराकर की जाती है। स्नान के बाद उन्हें पीले रंग के नवीन वस्त्र पहनाकर उनका भव्य श्रृंगार किया जाता है। परंपरा के अनुसार, इस दिन घर पर ही काजल तैयार कर कान्हा को अपनी छोटी उंगली से काजल लगाया जाता है। इसके बाद उनकी आरती की जाती है और उन्हें झूला झुलाकर भजन-कीर्तन किए जाते हैं।भगवान को भोग अर्पित करते समय सात्विकता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन उन्हें बिना प्याज-लहसुन के बना शुद्ध भोजन अर्पित करना चाहिए। विशेष भोग में कढ़ी-चावल, माखन-मिश्री, धनिया की पंजीरी और खीर को प्राथमिकता दी जाती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रत्येक भोग सामग्री में तुलसी का पत्ता (तुलसी दल) अवश्य शामिल हो। पूजा के अंत में कुछ धनराशि को कान्हा के ऊपर से वार कर (न्योछावर कर) उसे प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में वितरित करने की परंपरा है।
