Lalita Saptami 2026 Vrat Katha In Hindi: ललिता सप्तमी का दिन धार्मिक दृष्टि से बहुत ही खास होता है। इस दिन राधा रानी की प्रिय सखी श्रीललिता की पूजा की जाती है। साथ ही व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि ललिता सप्तमी पर पूजा-पाठ करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। व्यक्ति का मन शांत रहता है और वो भक्ति की तरफ आगे बढ़ता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को ललिता सप्तमी मनाई जाती है। साल 2026 में आज 18 सितंबर को ललिता सप्तमी मनाई जा रही है।
देश के कुछ क्षेत्रों में ललिता सप्तमी को संतान सप्तमी और मुक्ताभरण सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है। ये व्रत माताएं मुख्य रूप से संतान प्राप्ति तथा संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखती हैं। इसके अलावा व्रत के दौरान एक प्राचीन कथा पढ़ी
जाती है। आइए अब जानें ललिता सप्तमी की कथा के बारे में।
ललिता सप्तमी की कथा
दोनों सहेलियों के बीच था गहरा प्रेम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी थी। रानी चंद्रमुखी की एक सखी थी, जिनका नाम रूपमती था। रूपमती एक ब्राह्मण की पत्नी थीं। दोनों सहेलियों के बीच बहुत प्यार था। दोनों एक-दूसरे से हर बात साझा करती और हर कार्य में एक-दूसरे की मदद किया करती थीं।
व्रत करने का किया निश्चय
एक दिन दोनों सहेलियां सरयू नदी के तट पर स्नान करने के लिए गईं। उन्होंने देखा कि तट के किनारे नगर की कई स्त्रियां मौजूद थीं, जो संतान सप्तमी व्रत की पूजा कर रही थीं। दोनों कुछ समय के लिए वहां रुकीं और संतान सप्तमी व्रत की कथा सुनी। साथ ही पुत्र प्राप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आने के बाद दोनों इस व्रत को करना भूल गईं।
अब प्राप्त हुई पशु योनि
कुछ दिनों के बाद एक साथ दोनों सहेलियों की मृत्यु हो गई और उन्हें पशु योनि प्राप्त हुई। हजारों वर्षों तक विभिन्न योनियों में जन्म लेने के बाद दोनों सहेलियों को मनुष्य योनि प्राप्त हुई। इस बार चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी एक राजा की पत्नी थीं, जबकि भूषणा एक ब्राह्मण की पत्नी थीं। पिछले जन्म की तरह इस जन्म में भी इन दोनों सहेलियों के बीच बहुत प्रेम था।
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भूषणा ने रखा संतान सप्तमी का व्रत
पिछले जन्म में भूषणा ने कुछ अच्छे कर्म किए थे, जिसके कारण इस जन्म में उसे पूर्व की कुछ बातें याद थीं। इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत रखा और पूरे विधि-विधान से देवी की पूजा की, जिसके पश्चात उसे आठ पुत्रों की प्राप्ति हुई। वहीं, ईश्वरी को कुछ भी याद नहीं था, जिसके कारण उसने संतान सप्तमी का व्रत नहीं रखा। इसलिए उसकी कोई संतान नहीं हुई।
ईश्वरी ने बताया अपना सत्य
भूषणा के संतान होने के कारण ईश्वरी को उससे ईर्ष्या होने लगी। उसने कई बार भूषणा के पुत्रों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन संतान सप्तमी व्रत के प्रभाव से उसके पुत्रों को नुकसान नहीं पहुंचा। एक दिन ईश्वरी को अपनी गलती का अहसास हुआ और उसने अपने पापों के बारे में भूषणा को बताया तथा उससे क्षमा मांगी।
ईश्वरी ने भी रखा संतान सप्तमी का व्रत
भूषणा ने ईश्वरी को माफ किया और उसे बताया कि उसे अपने पूर्व जन्म की बात याद थी, जिसके कारण उसने संतान सप्तमी का व्रत रखा। इसके बाद ईश्वरी ने भी संतान सप्तमी का व्रत रखा, जिसके पश्चात उसे भी संतान की प्राप्ति हुई। इसी के बाद से देशभर में बड़ी संख्या में महिलाओं ने संतान सप्तमी यानी ललिया सप्तमी व्रत को रखना आरंभ कर दिया।
