Shardiya Navratri 2026 Day 6 Today Katha (maa katyayani vrat katha in hindi): शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व कुल 9 दिनों तक चलता है, जिस दौरान मां दुर्गा और उनके 9 स्वरूपों की विशेष रूप से पूजा की जाती है। साथ ही फलाहार व्रत रखने का विधान है। साल 2026 में 11 अक्टूबर से लेकर 19 अक्टूबर तक शारदीय नवरात्रि का पर्व चलेगा। इस बीच आज 16 अक्टूबर, शुक्रवार को शारदीय नवरात्रि के छठे दिन की पूजा की जाएगी। नवरात्रि का छठा दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप देवी कात्यायनी को समर्पित है। देवी कात्यायनी की पूजा करने से मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है और लव लाइफ खुशियों से भरी रहती है। साथ ही देवगुरु बृहस्पति ग्रह के अशुभ प्रभाव से मुक्ति मिलती है।
यदि आपने भी आज नवरात्रि के छठे दिन व्रत रखा है तो पूजा के दौरान देवी कात्यायनी से जुड़ी कथा जरूर पढ़ें। यहां पर देवी कात्यायनी की व्रत कथा हिंदी में दी गई है।
देवी कात्यायनी की व्रत कथा
मां भगवती की उपासना करते थे ऋषि कात्यायन
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में कात्यायन नाम के एक ऋषि थे। कात्यायन ऋषि देवी भगवती के बहुत बड़े भक्त थे। वो नियमित रूप से देवी भगवती की पूजा करते और व्रत रखते थे। देवी भगवती से मनचाहा आशीर्वाद पाने के लिए कात्यायन ऋषि ने कई वर्षों तक उनकी कठिन तपस्या की थी।
ऋषि कात्यायन ने देवी से मांगा ये वरदान
ऋषि की तपस्या से खुश होकर मां भगवती ने एक दिन उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। ऋषि ने माता भगवती से वरदान में मांगा कि 'वो उनकी पुत्री के रूप में जन्म लें।' माता भगवती ऋषि की तपस्या से काफी प्रसन्न थीं, इसलिए उन्होंने इस इच्छा को पूरा होने का वरदान दे दिया।
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महिषासुर का बढ़ता जा रहा था आतंक
इस बीच धरती पर महिषासुर नामक राक्षस का अत्याचार बढ़ता जा रहा था। महिषासुर धीरे-धीरे तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा रहा था। महिषासुर राक्षस के आतंक से सभी देवतागण, ऋषि-मुनि और मनुष्य परेशान थे। एक दिन सभी देवतागण अपनी इस परेशानी को लेकर भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश यानी त्रिदेवों के पास गए।
ऐसे प्रकट हुईं देवी कात्यायनी
देवताओं ने अपनी परेशानी त्रिदेवों को बताई, जिसके बाद भगवान ने अपने तेज पुंज से दिव्य 'कात्यायनी' देवी को प्रकट किया। देवी कात्यायनी ने ऋषि कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्म लिया और अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को अपने दिव्य स्वरूप में आकर महिषासुर राक्षस का वध किया। इसके बाद तीनों लोकों में फिर से शांति स्थापित हो गई और ऋषि कात्यायन को मिला वरदान भी पूरा हो गया।
