Navratri 9th Day Katha In Hindi (maa siddhidatri story): प्रत्येक वर्षआश्विन माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर शारदीय नवरात्रि की नवमी यानी महानवमी का समापन होता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, आज 19 अक्टूबर 2026 को सुबह 10 बजकर 51 मिनट पर नवमी तिथि का आरंभ हुआ, जिसका समापन कल 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर होगा। ऐसे में आज महानवमी का पावन पर्व मनाया जा रहा है। हालांकि, आज सुबह आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रभावी थी, जिसके कारण शारदीय नवरात्रि की अष्टमी की पूजा भी आज की गई।
नवरात्रि की नवमी तिथि पर मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यदि आप भी आज मां सिद्धिदात्री की पूजा करने वाले हैं तो उन्हें समर्पित व्रत कथा का पाठ जरूर करें। यहां पर नवरात्रि के 9वें दिन की व्रत कथा दी गई है।
देवी सिद्धिदात्री का स्वरूप
मां सिद्धिदात्री की 4 भुजाएं हैं और वो खिले हुए कमल के फूल पर विराजमान हैं, लेकिन उनका वाहन सिंह है। मां दुर्गा के एक बाएं हाथ में शंख, दूसरे बाएं हाथ में कमल का पुष्प, एक दाहिने हाथ में चक्र और एक दाएं हाथ में गदा सुशोभित है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से मां दुर्गा के स्वरूप देवी सिद्धिदात्री की पूजा करता है, उसका जीवन सुख-समृद्धि से भरा रहता है। साथ ही ज्ञान, बुद्धि, अलौकिक सिद्धियों, सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है।
देवी सिद्धिदात्री की व्रत कथा
त्रिदेवों की रचना की थी मां कुष्मांडा ने
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में अचानक से एक दिन ब्रह्मांड में अंधकार फैल गया था। ब्रह्मांड में अंधेरा देख मां कुष्मांडा ने अपनी दिव्य शक्ति से भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव की रचना की। साथ ही उन्हें त्रिदेवों का नाम दिया। मां कुष्मांडा ने ब्रह्मा जी को सृष्टि के कर्ता का स्थान दिया, जबकि भगवान विष्णु को पालनकर्ता का दर्जा दिया गया। भगवान शिव की बात करें तो उन्हें ब्रह्मांड के संहारक का कार्य सौंपा गया। इसके कुछ ही समय के बाद तीनों देवताओं ने अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से निभाना शुरू कर दिया, जिससे ब्रह्मांड में फिर से प्रकाश फैलने लगा।
मां कुष्मांडा ने की थी देवी सिद्धिदात्री की रचना
इस बीच भगवान शिव के मन में एक भाव उत्पन्न हुआ। उन्होंने मां कुष्मांडा की कठोर तपस्या की, जिसके बाद माता रानी शिव जी के सामने प्रकट हुई और उनसे उनकी इच्छा पूछी। भगवान शिव ने मां कुष्मांडा से अपनी पूर्णता को प्राप्त करने का आशीर्वाद मांगा। शिव जी की इच्छा का मान रखते हुए कुष्मांडा माता ने मां सिद्धिदात्री की रचना की।भक्ति टाइम्स पर ये भी पढ़ें- आज महानवमी पर इन खास संदेश, कोट्स, फोटोज के जरिए दें अपनों को शुभकामनाएं
मां सिद्धिदात्री ने दिया शिव जी को विशेष आशीर्वाद
मां सिद्धिदात्री ने शिव जी को अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व आठ सिद्धियों का वरदान दिया। साथ ही दूरश्रवण (दूर की आवाज को सुनना), दूरदर्शन (दूर की वस्तुओं को देखना), मनोजव (मन की गति से कहीं भी पहुंच जाना), कामरूप (इच्छा के अनुसार कोई भी रूप धारण करना), परकायं प्रवेश (लोगों के शरीर में प्रवेश करना), स्वच्छंद मृत्यु (अपनी इच्छा से मृत्यु का वरण करना), देव क्रीड़ा (देवताओं के साथ क्रीड़ा करना), यथार्थ संकल्प (संकल्पों का तुरंत पूरा होना), अप्रतिहत आज्ञा (आज्ञा का उल्लंघन न होना) और त्रिकालज्ञत्व (भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान होना) की 10 गौण सिद्धियों का आशीर्वाद दिया।
अर्धनारीश्वर नाम का कारण
दूसरी तरफ ब्रह्मा जी के मन में ब्रह्मांड में जीवन भरने का विचार आया, जिसके लिए उन्हें एक पुरुष और एक महिला की आवश्यकता थी। ब्रह्मा जी ने अपने इस विचार के बारे में देवी सिद्धिदात्री को बताया, जिसके बाद उन्होंने खुद को भगवान शिव के आधे शरीर से जोड़ लिया। अब शिव जी का शरीर आधा पुरुष और आधा स्त्री का हो गया था। भगवान शिव के इस स्वरूप को अर्धनारीश्वर कहा जाता है, जिनकी पूजा नवरात्रि के 9वें दिन करनी शुभ होती है।
