Maa Skandamata: नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना की जाती है। माता का यह स्वरूप ममता, वात्सल्य, शक्ति और करुणा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां स्कंदमाता अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देवी दुर्गा के इस स्वरूप का नाम स्कंदमाता कैसे पड़ा? इसके पीछे भगवान शिव, माता पार्वती और उनके पुत्र कार्तिकेय से जुड़ी एक रोचक पौराणिक कथा प्रचलित है।
कैसे पड़ा मां का स्कंदमाता नाम?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय को स्कंद नाम से भी जाना जाता है। स्कंद की माता होने के कारण देवी पार्वती के इस स्वरूप को स्कंदमाता कहा जाता है। मां का यह रूप अपने पुत्र को गोद में लिए हुए दिखाई देता है, जो मां और संतान के बीच अटूट प्रेम तथा वात्सल्य को दर्शाता है। धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में भगवान कार्तिकेय को देवताओं का सेनापति माना गया है। उन्होंने असुरों के विरुद्ध युद्ध में देवताओं का नेतृत्व किया था। इस प्रकार मां स्कंदमाता का स्वरूप मातृत्व के साथ-साथ शक्ति और साहस का भी संदेश देता है।
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तारकासुर वध से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, तारकासुर नाम का एक शक्तिशाली असुर था, जिसने अपनी तपस्या से ब्रह्माजी को प्रसन्न कर लिया था। उसने ब्रह्माजी से ऐसा वरदान प्राप्त किया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र के हाथों ही हो सकता था। तारकासुर को विश्वास था कि भगवान शिव तपस्या में लीन रहते हैं और उनके विवाह तथा संतान होने की संभावना बहुत कम है। इसी विश्वास के कारण वह स्वयं को अजेय समझने लगा। वरदान मिलने के बाद उसने देवताओं और तीनों लोकों में अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसके आतंक से परेशान होकर देवता भगवान शिव के पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा करने लगे।
तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म हुआ। उन्हें स्कंद, कुमार और षण्मुख जैसे नामों से भी जाना जाता है। भगवान कार्तिकेय बचपन से ही तेजस्वी, पराक्रमी और युद्ध कौशल में निपुण माने जाते हैं। जब वे बड़े हुए, तो देवताओं ने उन्हें अपनी सेना का सेनापति नियुक्त किया। इसके बाद भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर के विरुद्ध युद्ध किया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, उन्होंने तारकासुर का वध करके देवताओं को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। इस कथा में भगवान कार्तिकेय की वीरता के साथ उनकी माता पार्वती की शक्ति और मातृत्व का भी महत्व बताया गया है।
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मां स्कंदमाता की गोद में है पुत्र
मां स्कंदमाता की प्रतिमा में उन्हें अपने पुत्र स्कंद यानी भगवान कार्तिकेय को गोद में लिए हुए दिखाया जाता है। माता का यह स्वरूप बेहद शांत, सौम्य और ममतामयी माना जाता है। उनकी चार भुजाओं का वर्णन मिलता है। वे दो हाथों में कमल धारण करती हैं, एक हाथ से भगवान स्कंद को संभालती हैं और दूसरे हाथ से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। उन्हें कमल के आसन पर विराजमान होने के कारण पद्मासना देवी भी कहा जाता है।
नोट - इस तरह मां स्कंदमाता का नाम केवल भगवान कार्तिकेय की माता होने के कारण नहीं, बल्कि मातृत्व, शक्ति और धर्म की रक्षा से जुड़ी मान्यताओं के कारण भी विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि का यह दिन भक्तों को प्रेम, साहस और सकारात्मकता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
