Pitru Paksha 2026 (saptami shradh puja muhurat aur vidhi in hindi today): पितृपक्ष के प्रत्येक दिन का हिंदू धर्म के लोगों के लिए खास महत्व होता है। इस दौरान तिथि के अनुसार मृतक परिजनों का श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया जाता है। पंचांग के अनुसार, आज 2 अक्टूबर 2026 को गांधी जयंती पर पितृपक्ष की सप्तमी तिथि है। आज परिवार के उन मृतक सदस्यों के लिए पूजा की जाएगी, जिनकी मृत्यु शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर हुई हो। मान्यता है कि जिन लोगों के ऊपर उनके पितरों का आशीर्वाद होता है, उनका जीवन धन, यश, शांति, वैभव और ऐश्वर्या आदि सुख-सुविधाओं से भरा रहता है। साथ ही कुल बढ़ने में कोई दिक्कत नहीं आती है। चलिए अब जानें सप्तमी श्राद्ध 2026 की तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और विधि के बारे में।
सप्तमी श्राद्ध 2026 की तिथि
- आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि का आरंभ- आज 2 अक्टूबर 2026 को सुबह 10:15 बजे
- आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि का समापन- कल 3 अक्टूबर 2026 को सुबह 07:59 बजे
सप्तमी श्राद्ध की पूजा के शुभ मुहूर्त
बता दें कि सप्तमी श्राद्ध की पूजा कुतुप और रौहिण मुहूर्त में ही की जाती है, जबकि अपराह्न काल से पहले श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण आदि पितरों की पूजा से जुड़े सभी अनुष्ठान पूरे कर लेने चाहिए। द्रिक पंचांग के अनुसार, आज कुतुप मुहूर्त सुबह 11:46 से दोपहर 12:34 बजे तक है। कुतुप मुहूर्त के समाप्त होते ही रौहिण मुहूर्त शुरू हो जाएगा, जो दोपहर 01:21 बजे तक रहेगा। वहीं, अंत में अपराह्न काल दोपहर 01:21 से दोपहर 03:44 बजे तक रहेगा।
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पितृपक्ष में कैसे करें तर्पण? जानें विधि
सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद शुद्ध सफेद या पीले रंग के कपड़े धारण करें। शुभ मुहूर्त में पूजा स्थल की दक्षिण दिशा में गंगाजल छिड़कें, जिससे वो जगह शुद्ध हो जाए। इस दिशा में कुश का आसन रखें, जिसके ऊपर खुद बैठें। हाथ में जल, काले तिल, अक्षत और कुश लेकर अपने नाम व गोत्र का उच्चारण करें तथा तर्पण की पूजा का संकल्प लें।
अब जनेऊ को अपने दाएं कंधे पर रखें। इसके बाद हाथ की अनामिका उंगली में कुश की अंगूठी स्वयं पहनें। हाथ के अंगूठे और तर्जनी के बीच वाले भाग से जल और काले तिल की धारा धीरे-धीरे स्थापित पात्र में गिराएं। इसके बाद अपनी तीन पीढ़ियों यानी पिता, दादा और परदादा का नाम और गोत्र बोलते हुए 'ॐ पितृभ्यो नमः' मंत्र का जाप करें।
अनुष्ठान पूरा होने के बाद पूजा सामग्री को किसी पवित्र नदी में प्रवाहित कर दें। अंत में अपने हाथों से सात्विक भोजन बनाएं, जिसे गाय, कुत्ते, कौओं, चींटियों और देवताओं के लिए समान रूप से अलग करें। भोजन का वितरण करने के बाद गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। साथ ही उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार दान करें।
