हस्तरेखा शास्त्र (हस्तरेखा विज्ञान) के अनुसार, हमारी हथेलियों में छिपे सात प्रमुख पर्वत व्यक्ति के व्यक्तित्व, स्वभाव और गुणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं। ये पर्वत असल में हथेली पर मांसल गद्दियों के रूप में उभरे हुए दिखाई देते हैं, जो ज्योतिषीय दृष्टि से विभिन्न ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हस्तरेखा विशेषज्ञों का मानना है कि इन पर्वतों की स्थिति और बनावट का अध्ययन करके किसी व्यक्ति के आंतरिक गुणों और दोषों को समझा जा सकता है।
हथेली में चार पर्वत अंगुलियों के ठीक नीचे स्थित होते हैं, जबकि दो पर्वत हथेली के किनारों पर पाए जाते हैं। सातवां पर्वत अंगूठे के आधार के पास स्थित होता है। इसके अलावा, मंगल पर्वत का अध्ययन दो भागों में किया जाता है, जिन्हें उच्च मंगल और निम्न मंगल कहा जाता है। किसी व्यक्ति के हाथ का सही विश्लेषण करने के लिए इन पर्वतों की स्थिति को पहचानना सबसे पहली और महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।
पर्वतों की बनावट और उनका प्रभाव
हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार, पर्वतों की स्थिति तीन तरह की हो सकती है। जो पर्वत स्पष्ट और उभरे हुए होते हैं, उन्हें उन्नत और सशक्त माना जाता है। वहीं, समतल या सपाट पर्वत साधारण स्थिति को दर्शाते हैं, जबकि धंसे हुए पर्वत उस ग्रह से संबंधित गुणों की कमी या दुर्बलता का संकेत देते हैं। यदि किसी व्यक्ति की हथेली में कोई एक पर्वत अन्य पर्वतों की तुलना में अधिक विकसित और बड़ा हो, तो यह इस बात का संकेत है कि उस जातक के स्वभाव में उस विशेष ग्रह के गुण अधिक प्रभावी हैं।विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि यदि किसी पर्वत से जुड़ी अंगुली अन्य अंगुलियों की तुलना में अधिक लंबी और सुविकसित हो, तो उस पर्वत के गुणों की प्रधानता और अधिक स्पष्ट हो जाती है। पर्वतों की स्थिति का सटीक आकलन करने के लिए ज्योतिर्विद अक्सर हथेली के इन पर्वतों का मिलान जन्म कुंडली में स्थित ग्रहों की स्थिति से करते हैं, जिससे फलादेश अधिक सटीक हो जाता है।
